शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

🌞 शिष्य संजीवनी (भाग 62) 👉 व्यवहारशुद्धि, विचारशुद्धि, संस्कारशुद्धि

 🔵 शिष्य संजीवनी के सभी सूत्रों में यह सूत्र अतिदुर्लभ है। इसके रहस्य को जान पाना, इसे प्रयोग कर पाना सबके बस की बात नहीं है। इसकी सही समझ एवं इसका सही प्रयोग केवल वही कर सकते हैं, जो अपने आप को वासनाओं से मुक्त कर चुके हैं। वासनाओं की कीचड़ से सना, इस कालिख से पुता व्यक्ति अपने अन्तरतम की गहराइयों में प्रवेश ही नहीं कर सकता। उसके पल्ले तो भ्रम- भुलावे और भटकनें ही पड़ती हैं। वह हमेशा भ्रान्तियों की भूल- भुलैया में ही भटका करता है। इससे उबरना तभी सम्भव है, जब अन्तःकरण में वासनाओं का कोई भी दाग न हो। अन्तर्मन अपनी सम्पूर्णता में शुभ्र- शुद्ध एवं पवित्र हो।

🔴 बंगाल के महान् सन्त विजयकृष्ण गोस्वामी इन भ्रमों के प्रति हमेशा अपने शिष्यों को सावधान करते रहते थे। उनका कहना था कि साधना की सर्वोच्च सिद्धि पवित्रता है। न तो इससे बढ़कर कुछ है और न इसके बराबर कुछ है। इसलिए प्रत्येक साधक को इसी की प्राप्ति के लिए सतत यत्न करना चाहिए। महात्मा विजयकृष्ण का कथन है कि साधक के शरीर और मन ही उसके अध्यात्म प्रयोगों की प्रयोगशाला है। उसका अन्तःकरण ही इस प्रयोगशाला के उपकरण हैं। अगर यह प्रयोगशाला और प्रयोग में आने वाले उपकरण ही सही नहीं है तो फिर प्रयोग के निष्कर्ष कभी सही नहीं आ सकते। इतना ही नहीं, ऐसी स्थिति में आध्यात्मिक प्रयोगों की सफलता और सार्थकता भी संदिग्ध बनी रहेगी।
   
🔵 इस पथ पर एक बड़ा खतरा और भी है। और यह खतरा है अन्तरात्मा की आवाज का। आमतौर पर जिसे लोग अन्तरात्मा की आवाज कहते हैं वह केवल उनके मन की कल्पनाएँ होती हैं। अपने मन के कल्पना जाल को ही वे अन्तरात्मा की आवाज अथवा अन्तरतम की वाणी कहते हैं। इस मिथ्या छलावे में फँसकर वे हमेशा अपने लक्ष्य से दूर रहते हैं। उनकी भटकने अन्तहीन बनी रहती हैं। ध्यान रहे यदि मन में अभी भी कहीं आसक्तियाँ हैं तो अन्तरतम की आवाज नहीं सुनी जा सकती है। वासनामुक्त हुए बिना जीवन के परम रहस्य को नहीं जाना जा सकता।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 डॉ. प्रणव पण्डया
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Devo/vyav

👉 उपासना, साधना व आराधना (भाग 6)


🔵 सादा जीवन के माने है- कसा हुआ जीवन। आपको अपना जीवन सादा बनाना होगा। माल- मजा उड़ाते हुए, लालची और लोभी रहते हुए आप चाहें कि राम नाम सार्थक हो जाएगा? नहीं कभी सार्थक नहीं होगा। हमारे गुरु ने, हमारे महापुरुषों ने हमें यही सिखाया है कि जो आदमी महान बने, ऊँचे उठे हैं, उन सभी ने अपने आपको तपाया है। आप किसी भी महापुरुष का इतिहास उठाकर पढ़कर देखें, तो पायेंगे कि अपने को तपाने के बाद ही उन्होंने वर्चस्व प्राप्त किया और फिर जहाँ भी वे गये चमत्कार करते चले गये।

🔴 तलवार से सिर काटने के लिए उसे तेज करना पड़ता है, पत्थर पर घिसना पड़ता है। आपको भी प्रगति करने के लिए अपने आपको तपाना होगा, घिसना होगा। हमने एक ही चीज सीखी है कि अपने आपको अधिक से अधिक तपाएँ, अधिक से अधिक घिसें, ताकि हम ज्यादा- से समाज के काम आ सकें। समाज की सेवा करना ही हमारा लक्ष्य है। अगर आप भी ऐसा कर सकें, तो बहुत फायदा होगा, जैसा कि हमें हुआ है।

🔵 साधना के पश्चात् आराधना की बात बताता हूँ आपको कि आराधना क्या है और किसकी की जानी चाहिए? आराधना कहते हैं- समाजसेवा को, जन कल्याण को। सेवाधर्म वह नकद धर्म है, जो हाथों हाथ फल देता है। इसमें पहले बोना पड़ता है। आज से साठ वर्ष पूर्व हमारे पूज्य गुरुदेव ने हमारे घर पर आकर दीक्षा दी और यह कहा कि तुम बोने और काटने की बात मत भूलना। कहीं से भी कोई चीज फोकट में नहीं मिलती है, चाहे वे गुरु हों या भगवान् हों। हाँ, यह हो सकता है कि बोया जाए और काटा जाए। हम मक्के का एक बीज बोते हैं, तो न जाने कितने हजार हो जाते हैं। वही बाजरे के साथ भी होता है।

🔴 उन्होंने हमसे कहा कि बेटे, फोकट में खाने की विद्या एवं माँगने की विद्या छोड़कर बोने और काटने की विद्या सीख, इससे ही तुम्हें फायदा होगा। उन्होंने इसके लिए विधान भी बतलाया कि तुम्हें चौबीस साल तक गायत्री के महापुरश्चरण करने होंगे। इस समय जौ की रोटी एवं छाछ पर रहना होगा। उन्होंने जो भी विधि हमें बतायी, उसे हमने नोट कर लिया था। इसमें उन्होंने हमें एक नयी विधि बतलायी। वह विधि बोने और काटने की थी। उन्होंने कहा कि जो कुछ भी तेरे पास है, उसे भगवान् के खेत में बो दो। उन्होंने यह भी कहा कि तीन चीजें भगवान् की दी हुई हैं और एक चीज तुम्हारी कमाई हुई है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पूज्य पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Lectures/112

👉 आत्मचिंतन के क्षण 22 July 2016


🔴 मान, बड़ाई, प्रतिष्ठा तथा कार्यों में अभिमान प्राप्त करने की इच्छा खाज की भाँति बड़ा सुहावना रोग है। इसके वश में हो जाने पर मनुष्य सत्कर्मों तक को अभिमान की अग्नि से भस्म कर देता है, प्रमादी बन जाता है। अपने भाग्य पर इतराता है और आत्मा का पतन करता है। अभिमान बड़ी संक्रामक बीमारी है, जो मनुष्य को अधोगति में पहुँचा सकती है।

🔵 परिश्रम और केवल उचित परिश्रम ही सफलता का आधार है। इसके लिए परमात्मा की अनायास कृपा पर निर्भर करना अनधिकार चेष्टा है, जो किसी प्रकार पूरी नहीं हो सकती। परमात्मा कृपा करता अवश्य है, किन्तु उन्हीं पर जो पहले स्वयं अपने पर कृपा करते हैं। उस परमात्मा ने मनुष्य को पहले से ही बल, बुद्धि और विशेषताओं से भरा शरीर देकर महती कृपा कर दी है। अपनी योग्यता और पात्रता बढ़ाइए , अपना लक्ष्य निश्चित करिये और एकनिष्ठ होकर पुरुषार्थ में संलग्न हो जाइए। आपको सफलता अवश्य मिलेगी।

🔴 सामाजिक सुख-शान्ति और मानवता के मंगल के लिए आवश्यक है कि संसार से मांस भोजन की प्रथा को उठा दिया जाये। इसकी विकृति के कारण मनुष्य क्रोधी बनकर असामाजिक बन जाता है। समाज एवं राष्ट्र के उत्थान के लिए जिन सुंदर गुणों, सुकुमार भावनाओं और सद्प्रवृत्तियों की आवश्यकता होती है, मांसाहार के कारण उनका स्निग्ध विकास नहीं हो पाता। मांसाहार से मनुष्य में हिंसा की भावना बढ़ती है, जिससे समाज में अशान्ति और अमंगल की परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

👉 "उच्चतम अवस्था की प्राप्ति


🔵 यदि दूसरों के विचार आपके विचारों से मुक्त हों तो उनसे लड़ाई-झगड़ा न करो। अनेक प्रकार के मन होते हैं। विचारने की शैली अनेक प्रकार की हुआ करती है। विचारने के भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण हुआ करते हैं। अतएव सभी दृष्टिकोण निर्दोष हो सकते हैं। लोगों के मत के अनुकूल बनो। उनके मत को भी ध्यान तथा सहानुभूतिपूर्वक देखो और उनका आदर करो। अपने अहंकार चक्र के क्षुद्र केंद्र से बाहर निकलो और अपनी दृष्टि को विस्तृत करो। अपना मन सर्वग्राही और उदार बनाकर सबके मत के लिए स्थान रखो, तभी आपका जीवन विस्तृत और हृदय उदार होगा।

🔴 आपको धीरे-धीरे, मधुर और नम्र होकर बातचीत करनी चाहिए। मितभाषी बनो। अवांछनीय विचारों और संवेदनाओं को निकाल दो। अभिमान या चिड़चिड़ेपन को लेशमात्र भी बाकी नहीं रहने दो। अपने आप को बिलकुल भुला दो। अपने व्यक्तित्व का एक भी अंश या भाव न रहने पावे। सेवा-कार्य के लिए पूर्ण आत्मसमर्पण की आवश्यकता है।

🔵 यदि आप में उपर्युक्त सद्गुण मौजूद हैं तो आप संसार के लिए पथप्रदर्शक और अमूल्य प्रसाद रूप हो। आप एक अलौकिक सुगंधित पुष्प हो जिसकी सुगंध देश-भर में व्याप्त हो जाएगी। यदि आपने ऐसा कर लिया तो समझ लो आपने बुद्धत्व की उच्चतम अवस्था को प्राप्त कर लिया।

🌹 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 आत्मज्ञान और आत्मकल्याण पृष्ठ 5

👉   "On the way to Enlightenment

🔵 Do not argue with others if you find their thoughts conflicting with or going against yours. There are countless number of people living on our planet having diverse views, ideas, beliefs, ways of thinking and outlooks. There is every possibility that any of these viewpoints could be right. Therefore, you should learn not to disregard others’ opinion, be a sympathetic listener and respect their views. Get rid of any egocentric self-opinionated attitude you might have and expand the horizons of your vision. Be open-minded and, be willing to listen to and consider others’ views. Then only your life would become extremely fruitful and really helpful to others.

🔴 Talk gently, humbly, amicably, pleasingly and moderately. Give up any unworthy ideas and strong feelings. Get rid of any traces of arrogance or grumpiness. Try not to attach any importance to yourself. The task of serving humanity expects an individual to become totally devoted to the cause, with other people being at the forefront of his/her consideration.

🔵 If you do possess all the the aforesaid characteristics, you are indeed a leading light and a boon to the world. You are like a celestial fragrant flower whose fragrance will disperse far and wide (i.e. inspire others). If you do succeed in accomplishing this much, you can safely assume that you are on your way to reach the acme of enlightenment.

🌹 Pt. Shriram Sharma Aacharya
🌹 Aatmagyaan aur Atmakalyaan  (Self-realization and Self-benefit) Page 5

👉 आस्था

यात्रियों से खचाखच भरी एक बस अपने गंतव्य की ओर जा रही थी। अचानक मौसम बहुत खराब हो गया।तेज आंधी और बारिश से चारों ओर अँधेरा सा छा गया। ड्...