गुरुवार, 13 अक्तूबर 2016

👉 मैं क्या हूँ ? What Am I ? (भाग 2)

🔴 पहला अध्याय

कः कालः कानि मित्राणि, को देशः कौ व्ययाऽऽगमौ।
कश्चाहं का च मे शक्तिरितिचिन्त्यं मुहुर्मुहः॥
-चाणक्य नीति 4.18


🔵 ''कौन सा समय है, मेरे मित्र कौन हैं, शत्रु कौन हैं, कौन सा देश (स्थान) है, मेरी आय-व्यय क्या है, मैं कौन हूँ, मेरी शक्ति कितनी है? इत्यादि बातों का बराबर विचार करते रहो।'' सभी विचारकों ने ज्ञान का एक ही स्वरूप बताया है, वह है ''आत्म-बोध''। अपने सम्बन्ध में पूरी जानकारी प्राप्त कर लेने के बाद कुछ जानना शेष नहीं रह जाता। जीव असल में ईश्वर ही है। विचारों से बँधकर वह बुरे रूप में दिखाई देता है, परन्तु उसके भीतर अमूल्य निधि भरी हुई है। शक्ति का वह केन्द्र है और इतना है जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। सारी कठिनाइयाँ, सारे दुःख इसी बात के हैं कि हम अपने को नहीं जानते। जब आत्म स्वरूप को समझ जाते हैं, तब किसी प्रकार का कोई कष्ट नहीं रहता।

🔴 आत्म स्वरूप का अनुभव करने पर वह कहता है-

''नाहं जातो जन्म मृत्यु कुतो मे, नाहं प्राणः क्षुस्मिपासे कुतो मे।
नाहं चित्तं शोक मोहौ कुतो मे, नाहं कर्ता बंध मोक्षौ कुतो मे॥''


🔵 मैं उत्पन्न नहीं हुआ हूँ, फिर मेरा जन्म-मृत्यु कैसे? मैं प्राण नहीं हूँ, फिर भूख-प्यास मुझे कैसी? मैं चित्त नहीं हूँ, फिर मुझे शोक-मोह कैसे? मैं कर्ता नहीं हूँ, फिर मेरा बन्ध-मोक्ष कैसे?

🌹 क्रमशः जारी 🌹
🌹 मैं क्या हूँ? 🌹
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य 🌹

👉 गहना कर्मणोगति: (भाग 2)

चित्रगुप्त का परिचय

🔵 नयन्ति नरकं नूनं मात्मानो मानवान् हतः।
दिवं लोकं च ते तुष्टा इत्यूचुर्मन्त्र वेदिनः।।       

-पंचाध्यायी
           
🔴 (नूनं) निश्चय से (हताः) हनन की हुई (आत्मनः) आत्माएँ (मानवान्) मनुष्यों को (नरकं) नरक को (नयन्ति) ले जाती हैं (च) और (तुष्टा) संतुष्ट हुई (ते) वे आत्माएँ (दिव्य लोकं) दिव्य लोक को ले जाती हैं (इति) ऐसा (मंत्र वेदिनः) रहस्य को समझाने वालों ने (प्रोचुः) कहा है।

🔵 उपरोक्त श्लोक में कहा गया है कि हनन की हुई आत्मा नरक को ले जाती है और संतुष्ट की हुई आत्मा दिव्य लोक प्रदान करती है। श्लोक में इस गुत्थी को सुलझा दिया है कि स्वर्ग-नरक किस प्रकार मिलता है? गरुड़ पुराण में इस सम्बन्ध में एक अलंकारिक विवरण दिया गया है, जिसमें कहा गया है कि यमलोक में ‘चित्रगुप्त’ नामक देवता हर एक जीव के भले-बुरे कर्मों का विवरण प्रत्येक समय लिखते रहते हैं। जब प्राणी मरकर यमलोक में जाता है, तो वह लेखा पेस किया जाता है और उसी के आधार पर शुभ कर्मों के लिए स्वर्ग और दुष्कर्मों के लिए नरक प्रदान किया जाता है।

🔴 साधारण दृष्टि से चित्रगुप्त का अस्तित्व काल्पनिक प्रतीत होता है, क्योंकि पृथ्वी पर अरबों तो मनुष्य ही रहते है, फिर ऐसा ही तथाकथित चौरासी लाख योनियों, जिनमें से अनेक तो मनुष्य जाति से अनेक गुनी अधिक हैं, इन सब की संख्या गिनी जाए, तो इतनी अधिक हो जाएगी कि हमारे अंकगणित की वहाँ तक पहुँच भी न होगी। फिर इतने असंख्य प्राणियों द्वारा पल-पल पर किए जाने वाले कार्यों का लेखा दिन-रात बिना विश्राम के कल्प-कल्पांतों तक लिखते रहना एक देवता के लिए कठिन है। इस प्रकार चित्रगुप्त का कार्य असम्भव प्रतीत होता है, इस कथानक को एक कल्पना मान लेने पर चित्रगुप्त का अस्तित्व भी संदिग्ध हो जाता है।

🌹 क्रमशः जारी 🌹
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य 🌹
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/gah/chir.1

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 55)

🔵 वत्स! छोटी छोटी बातों पर ध्यान न दो। जब विश्वस्वरूप स्वयं तुम पर प्रकाशित हो उठा है तब व्यौरों का क्या महत्त्व है। व्यौरे सब केवल भौतिक हैं। उन पर अपने मन को केन्द्रित न करो। एकत्व की चिन्ता करो, बहुत्व की नहीं। वैराग्य की भावना लेकर, ब्यौरों के क्या अनुभव आते हैं, उनकी चिन्ता न करो। स्मरण रखो तुम स्वयं ही अपने शत्रु तथा कल्याणाकांक्षी हो। अपने पूर्ण संस्कारों के सके को तुम एक ही झटके से नहीं काट सकते। एक बार तुम्हारे मन में आवश्यक संकल्प जाग उठने पर यह कार्य सरल हो जायेगा तथा मेरी कृपा और आशीर्वाद इस संकल्प को दृढ़ बनाने में तुम्हारे साथ रहेंगे। विश्वास रखो और तुम्हारे साथ सभी शुभ होगा। 
🔴  दूसरों के मतों की चिन्ता क्यों करते हो? तुम्हारी इस मनोवृत्ति से क्या लाभ होगा? जब तक तुम दूसरों के मत की अपेक्षा करते हो तब तक यह जान लो कि तुम्हारे हृदय पर अहंकार का अधिकार है। स्वयं की दृष्टि में सदाचारी बनो फिर दूसरे लोग कुछ भी कहें तुम उनकी चिन्ता नहीं करोगे। परामर्श न लो अपनी उच्च का पालन। केवल अनुभव ही तुम्हें सिखा सकता है। अपने समय को व्यर्थ की चर्चा में नष्ट न करो। इससे तुम्हें कुछ भी लाभ न होगा। प्रत्येक व्यक्ति अपने अनुभव से ही परिचालित होता है। फिर कौन किसे परामर्श दे सकता है? सर्वतोभावेन स्वयं पर निर्भर रहो। मार्गदर्शन के लिये स्वयं के पास जाओ। दूसरों के पास नहीं।

🔵 तुम्हारी निष्ठा तुम्हें दृढ़ता प्रदान करेगी, तुम्हारी दृढ़ता तुम्हें लक्ष्य पर पहुँचा देगी। तुम्हारी निष्ठा तुम्हें दृढ़प्रतिज्ञ भी करेगी तथा तुम्हारी प्रतिज्ञायें तुम्हें सभी प्रकार के भय पर विजय प्रदान करेंगी। मेरा आशीर्वाद तुम पर है; सदैव के लिये है!

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 14 Oct 2016

🔵 विवाहों को मँहगा बनाना अपनी बच्चियों के जीवन विकास पर कुठाराघात करना है। जिन्हें अपनी या दूसरों की बच्चियों के प्रति मोह-ममता न हो, जिन्हें इस दो दिन की धूमधाम की तुलना में नारी जाति की बर्बादी उपेक्षणीय लगती हो, वे ही विवाहोन्माद का समर्थन कर सकते हैं। जब तक विवाह को भी नामकरण, अन्नप्राशन, मुंडन, विद्यारंभ, यज्ञोपवीत की तरह एक बहुत ही सरल, स्वाभाविक, सादा और कम खर्च का न बनाया जाएगा तब तक नारी जाति की उन्नति और सुख-शान्ति की आशा दुराशा मात्र ही रहेगी।

🔴 पूर्णतः पाक साफ, दूध का धुला हुआ कोई नहीं होता। भूलें, बुराइयाँ, पाप हो जाना मनुष्य की स्वाभाविक कमजोरी है। प्रत्येक मनुष्य पैदा होने से मरने तक कोई न कोई बुरा काम कर ही बैठता है। गिरकर उठने में, बुराई से भलाई की ओर आगे बढ़ने में ही मनुष्य की श्रेष्ठता है।

🔵 जिन्दगी को ठीक तरह जीने के लिए एक ऐसे साथी की आवश्यकता रहती है जो पूरे रास्ते हमारे साथ रहे, रास्ता बतावे, प्यार करे, सलाह दे और सहायता की शक्ति तथा भावना दोनों से ही संपन्न हो। ऐसा साथी मिल जाने पर जिन्दगी की लम्बी मंजिल बड़ी हँसी-खुशी और सुविधा के साथ पूरी हो जाती है। ऐसे सबसे उपयुक्त साथी जो निरन्तर मित्र, सखा, सेवक, गुरु, सहायक की तरह हर घड़ी प्रस्तुत रहे और बदले में कुछ भी प्रत्युपकार न माँगे, केवल एक ईश्वर ही हो सकता है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 समुद्र मंथन के तीन दिव्य रत्न

🔵 जीवन समुद्र का मंथन करने पर हमारे हाथ तीन रत्न ही लगते हैं (1) प्रेम की साध (2) ज्ञान की खोज और (3) पीड़ित मानवता के प्रति असह्य करुणा। इन तीनों के जितने अमृत कण हमारे हाथ लगते हैं हम उतने ही धन्य बनते हैं।

🔴 एकाकीपन की ऊब— कठोर परिश्रम की थकान और उतार−चढ़ावों के विक्षोभों से भरी इस जिन्दगी में सरसता केवल प्रेम में है। समस्त सुख सम्वेदनाओं की अनुभूति एकदम एक ही केंद्र पर एकत्रित है। प्रेम की पुलकन ही आनन्द भरे उल्लास में परिणत होती है। प्रेमी बनकर भले ही हमें कुछ खोना पड़े पर जो पाते हैं वह खोने से लाख करोड़ गुना अधिक होता है।

🔵 सत्य महान् है। मनुष्य क्रमशः उसके उच्च शिखर पर चढ़ता जाता है। जो अब तक जाना जा सका वह अद्भुत है, पर इससे क्या जो जानने को शेष पड़ा है वह अनन्त है। सत्य को जानने खोजने और पाने के प्रयासों में ही अब तक की विविध उपलब्धियां प्राप्त हुई हैं। आगे इसी प्रयास में खुले मस्तिष्क से लगे रहेंगे तो उसे भी प्राप्त कर सकेंगे जो अब तक प्राप्त नहीं किया जा सका।

🔴 संसार में सुख न हो सो बात नहीं, पर पीड़ाएँ भी बहुत हैं। अज्ञान और पतन की भटकन कितनी कष्टकर है इस पर जो सहृदयतापूर्वक विचार करेगा उसकी करुणा उमड़े बिना न रहेगी। आत्मा स्वर्ग से उतर कर इस पृथ्वी पर रहने के लिए इसीलिए तो आया है कि वह करुणार्द्र होकर कष्ट पीड़ितों की सेवा करते हुए मानव जीवन का आनन्द ले सके।

🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
🌹 अखण्ड ज्योति सितम्बर 1974 पृष्ठ 1

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 14 Oct 2016




👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 14 Oct 2016




👉 मैं क्या हूँ ? What Am I ? (भाग 1)

 🔴 भूमिका

🔵  इस संसार मे जानने योग्य अनेक बातें हैं। विद्या के अनेकों क्षेत्र हैं, खोज के लिए, जानकारी प्राप्त करने के लिए अमित मार्ग हैं। अनेकों विज्ञान ऐसे हैं जिनकी बहुत कुछ जानकारी प्राप्त करना मनुष्य की स्वाभाविक वृत्ति है। क्यों? कैसे? कहाँ? कब? के प्रश्न हर क्षेत्र में वह फेंकता है। इस जिज्ञासा भाव के कारण ही मनुष्य अब तक इतना ज्ञान सम्पन्न और साधन सम्पन्न बना है। सचमुच ज्ञान ही जीवन का प्रकाश स्तम्भ है।

🔴  जानकारी की अनेकों वस्तुओं में से ''अपने आपकी जानकारी*'' सर्वोपरि है। हम बाहरी अनेकों बातों को जानते हैं या जानने का प्रयत्न करते हैं पर यह भूल जाते हैं कि हम स्वयं क्या हैं? अपने आपका ज्ञान प्राप्त किए बिना जीवन का क्रम बड़ा डाँवाडोल, अनिश्चित और कंटकाकीर्ण हो जाता है। अपने वास्तविक स्वरूप की जानकारी न होने के कारण मनुष्य न सोचने लायक बातें सोचता है और न करने लायक कार्य करता है। सच्ची सुख-शान्ति का राजमार्ग एक ही है और वह है-''आत्म ज्ञान''।

🔵  इस पुस्तक में आत्म ज्ञान की शिक्षा है। ''मैं क्या हूँ?'' इस प्रश्न का उत्तर शब्दों द्वारा नहीं वरन् साधना द्वारा हृदयंगम कराने का प्रयत्न इस पुस्तक में किया गया है। यह पुस्तक अध्यात्म मार्ग के पथिकों का उपयोगी पथ प्रदर्शन करेगी, ऐसी हमें आशा है।

🌹 क्रमशः जारी 🌹
🌹 मैं क्या हूँ? 🌹
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य 🌹

http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/mai_kya_hun

गहना कर्मणोगति: (भाग 1)

भूमिका

🔴 निःसंदेह कर्म की बड़ी गहन है। धर्मात्माओं को दुःख, पापियों को सुख, आलसियों को सफलता, उद्योगशीलों को असफलता, विवेकवानों पर विपत्ति, मूर्खों के यहाँ सम्पत्ति, दंभियों को प्रतिष्ठा, सत्यनिष्ठों को तिरस्कार प्राप्त होने के अनेक उदाहरण इस दुनियाँ में देखे जाते हैं। कोई जन्म से ही वैभव लेकर पैदा होते हैं, किन्हीं को जीवन भर दुःख ही दुःख भोगने पड़ते हैं। सुख और सफलता का जो नियम निर्धारित है, वे सर्वांश पूरे नहीं उतरते।

🔵 इन सब बातों को देखकर भाग्य, ईश्वर की मर्जी, कर्म की गति के सम्बन्ध में नाना प्रकार के प्रश्न और संदेहों की झड़ी लग जाती है। इन संदेहों और प्रश्नों का जो समाधान प्राचीन पुस्तकों में मिलता है, उससे आज के तर्कशील युग में ठीक प्रकार समाधान नहीं होता। फलस्वरूप नई पीढ़ी, उन पाश्चात्य सिध्दांतों की ओर झुकती जाती है, जिनके द्वारा ईश्वर और धर्म को ढोंग और मनुष्य को पंचतत्व निर्मित बताया जाता है एवं आत्मा के अस्तित्व से इंकार किया जाता है। कर्म फल देने की शक्ति राज्यशक्ति के अतिरिक्त और किसी में नहीं है। ईश्वर और भाग्य कोई वस्तु नहीं है आदि नास्तिक विचार हमारी नई पीढ़ी में घर करते जा रहे हैं।

🔴 इस पुस्तक में वैज्ञानिक और आधुनिक दृष्टिकोण से कर्म की गहन गति पर विचार किया गया है और बताया गया है कि जो कुछ भी फल प्राप्त होता है, वह अपने कर्म के कारण ही है। हमारा विचार है कि पुस्तक कर्मफल सम्बन्धी जिज्ञासाओं का किसी हद तक समाधान अवश्य करेगी ।

प.श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Gahana_karmo_gati

👉 इस पुस्तक में हम लोग पढेंगे

  •  चित्रगुप्त का परिचय
  •  आकस्मिक सुख-दुःख
  •  तीन दुःख और उनका कारण
  •  कर्मों की तीन श्रेणियाँ
  •  अपनी दुनियाँ के स्वयं निर्माता
  •  दुःख का कारण पाप ही नहीं है

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 54)

गुरुदेव ने पुन: कहा

🔵 शब्द कहे जा चुके हैं, उपदेश दिये जा चुके हैं अब कार्य करने की आवश्यकता है। बिना आचरण के उपदेश व्यर्थ हैं।तुमने बहुत पहले ही अपने संकल्पों तथा अन्तर्दृष्टि को आचरण में नहीं लाया। इस बात का तुम्हें कितना दुःख होगा! जब रास्ता मिल गया है तब वीरतापूर्वक बढ़ो। जिसने आत्मसाक्षात्कार का दृढ़ संकल्प कर लिया है उसके मार्ग में कौन बाधा दे सकता है! जब तुम अकेले खड़े होओगे तब ईश्वर तुम्हारा साथी होगा, मित्र होगा, सर्वस्व होगा। ईश्वर के सान्निध्य का और अधिक बोध हो सके इसके लिये अन्य सभी का त्याग करना क्या अधिक अच्छा न होगा? जब तुम प्रकृति का त्याग कर दोगे तब प्रकृति स्वयं अपने सौंदर्य को तुम्हारे सामने प्रगट कर देगी। इस प्रकार तुम्हारे लिये सभी कुछ आध्यात्मिक हो जायेगा। फिर एक घास का तिनका भी तुमसे आत्मा की ही बात कहेगा।  

🔴  जब तुमने सब कुछ त्याग दिया है और एकांत पथ में चले जा रहे हो तब स्मरण रखना कि मेरा प्रेम तथा ज्ञान सदैव तुम्हारे साथ रहेगा। तुम मेरे निकट, अत्यन्त निकट रहोगे। तुम्हें और अधिक अन्तर्दृष्टि प्राप्त होगी। इच्छाशक्ति के लिये वर्धिष्णु उद्देश्य प्राप्त होगा तथा विश्वबन्धुत्व के भाव का महान विकास होगा। तुम सभी वस्तुओं के साथ एक हो जाओगे।

वत्स, त्याग ही एक पथ है। स्वयं को आज ही मृत कल्पना करो।   

🔵 कितना भी अरुचिकर क्यों न लगे यह निश्चित जान लो कि कभी, चाहे जिस प्रकार हो, आत्मा के लिये शरीर की आहुति देनी होगी। देहात्मबुद्धि को अवश्य जीतना होगा। मंद उत्साह के साथ, दुर्बल निष्ठा के साथ तुम इस लम्बे पथ पर नहीं चल सकते। समय को सामने से पकड़ो। सुविधा का लाभ तुरंत उठा लो। तुम जैसे हो तथा जो होना चाहते हो, इसके बीच की बाधा को यदि तुम एक छलांग में नहीं पार कर सकते हो, तो उसे पार करने में शीघ्रता करो। जैसे एक शेर अपने शिकार पर टूट पड़ता है उसी -प्रकार स्वयं पर टूट पड़ो। अपने मर्त्य स्वरूप पर दया न करो। तब तुम्हारा अमर स्वरूप चमक उठेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 13 Oct 2016

🔵  शुद्ध व्यवहार और सदाचार समाज की सुदृढ़ स्थिति के दो आधार स्तम्भ हैं। इनसे व्यक्ति का भाग्य और समाज का भविष्य विकसित होता है। शिक्षा, धन एवं भौतिक समुन्नति का सुख भी इसी बात पर निर्भर है कि लोग सद्गुणी और सदाचारी बनें। सामाजिक परिवर्तन का आधार व्यक्ति के अंतःकरण की शुद्धि है। यही समाज में स्वच्छ आचरण और सुन्दर व्यवहार के रूप में प्रस्फुटित होकर सुख और जनसंतोष के परिणाम प्रस्तुत करती है।

🔴 हमें मूक सेवा को महत्त्व देना चाहिए। नींव के अज्ञात पत्थरों की छाती पर ही विशाल इमारतें तैयार होती हैं। इतिहास के पन्नों पर लाखों परमार्थियों में से किसी एक का नाम संयोगवश आ पाता है। यदि सभी स्वजनों का नाम छापा जाने लगे तो दुनिया का सारा कागज इसी काम में समाप्त हो जाएगा। यह सोचकर हमें प्रशंसा की ओर से उदास ही नहीं रहना चाहिए, वरन् उसको तिलांजलि भी देनी चाहिए। नामवरी के लिए जो लोग आतुर हैं, वे निम्न स्तर के स्वार्थी ही माने जाने चाहिए।


🔵 जो बदले की नीयत से सत्कर्म कर रहा है, वह व्यापारी है। पुण्य और परमार्थ को वाहवाही के लिए बेच देने वाले व्यापारी हीरा बेंचकर काँच खरीदने वाले मूर्ख की तरह हैं। जिसने प्रशंसा प्राप्त कर ली उसे पुण्य फल नाम की और कोई चीज मिलने वाली नहीं है। दुहरी कीमत वसूल नहीं की जा सकती। अहंकार को तृप्त करने के लिए प्रशंसा प्राप्त कर लेने के बाद किसी को यह आशा नहीं करनी चाहिए कि इस कार्य में उसे परमार्थ का दुहरा लाभ भी मिल जाएगा।

*🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

👉 हम सब परस्पर एकता के सूत्र में जुड़े हैं

🔵 समुद्र में असंख्यों लहरें उठती हैं—उनका अस्तित्व अलग-अलग होता है। हर लहर पर एक स्वतन्त्र सूरज चमकता दिखाई देता है, इतने पर भी यदि तात्विक दृष्टि से देखा जाय तो प्रतीत होगा कि इस भिन्नता के भीतर एक अविछिन्न एकता की सत्ता विद्यमान है। सारा समुद्र एक ही है। एक ही सूर्य असंख्यों लहरों पर चमकता है। इन प्रतिबिंबों की अनेकता के कारण कितने ही सूर्यो की सत्ताएँ सिद्ध नहीं होती। हवा और जल के संयोग से उत्पन्न होते रहने वाले बबूले एक-दूसरे से अलग दिखाई भले ही दें वे सुविस्तृत जलाशय से पृथक नहीं माने जा सकते।

🔴 मनुष्य की संख्या करोड़ों में है। उनकी देह तथा आकृति-प्रकृति में भी अन्तर है। इतने पर भी वे सभी एक ही अनन्त विश्वात्मा के अविछिन्न अंग अवयव हैं। माला के मध्य पिरोये हुए सूत्र की तरह एक ही आत्मा सबको एकता के बन्धनों में बाँधे हुए है। देखने में हम एक दूसरे से पृथक लग सकते हैं,पर हमारा अस्तित्व पूर्ण तथा एक दूसरे पर निर्भर है। एकाकी जीवन एक क्षण के लिए भी सम्भव नहीं। सकते। दूसरे का सहयोग पाये बिना अपना निर्वाह किसी भी प्रकार नहीं हो सकता।

🔵 प्राणिमात्र के भीतर काम करने वाली इस एकात्म चेतना की अनुभूति ही अध्यात्म दर्शन का मूलभूत उद्देश्य है। समष्टि की इकाई ही व्यष्टि हे। समाज का एक पुर्जा ही मनुष्य है। इस मान्यता को अपनाकर आत्मोपभ्येन सर्वत्र की दृष्टि हम विकसित करें और आत्मा को विश्वात्मा का घटक मात्र माने तो वह जीवन लक्ष्य प्राप्त हो सकता है, जिसे ईश्वर की उपलब्धि कहते हैं।

🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
🌹 अखण्ड ज्योति अगस्त 1974 पृष्ठ 1

👉 आस्था

यात्रियों से खचाखच भरी एक बस अपने गंतव्य की ओर जा रही थी। अचानक मौसम बहुत खराब हो गया।तेज आंधी और बारिश से चारों ओर अँधेरा सा छा गया। ड्...