गुरुवार, 23 फ़रवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 24 Feb 2017


👉 आज का सद्चिंतन 24 Feb 2017


👉 फलित हुआ माँ का आश्वासन

🔴 बात उन दिनों की है जब अश्वमेध यज्ञों की श्रृंखला चल रही थी। इस श्रृंखला में पटना का अश्वमेध यज्ञ भी था। फरवरी, १९९४ का महीना था। चारों तरफ केवल यज्ञ की ही चर्चा हो रही थी। यज्ञ के बारे में लोग तरह-तरह की बातें कर रहे थे। कोई कहता कि भगवान राम ने जिस प्रकार से अश्वमेध यज्ञ किया था और पहले घोड़ा छोड़ा था उसी प्रकार से इस यज्ञ में भी घोड़ा छोड़ा जाएगा।
  
🔵 प्रत्येक परिजन में भारी उत्साह था। मैं भी यज्ञ में जाने के लिए उत्साहित था। घर में पत्नी से यज्ञ की चर्चा की और मन बना लिया। यज्ञ की महिमा और उसका प्रभाव मैं जानता था, इसलिए यह अवसर मैं गँवाना नहीं चाहता था। मेरे छोटे बहनोई थे विश्वनाथ जी। छोटी कमाई, बड़ा परिवार। घर का खर्च बड़ी मुश्किल से चलता था। ऊपर से उन्हें शराब की लत लगी हुई थी। सारा का सारा पैसा शराब पीने में चला जाता था। कई बार उनने कसम खाई लेकिन हर बार कसम तोड़ देते थे। मन में आया कि उनको भी यज्ञ में ले चलूँ, शायद कल्याण हो जाए।                                                                                      
  
🔴 मैं इसके पहले शानितकुञ्ज एवं मिशन के  बारे में कुछ नहीं जानता था, केवल यज्ञ हवन से प्रभावित था कि इतना बड़ा यज्ञ हो रहा है तो इसमें शामिल होना चाहिए, यही भावना थी; और यह भी कि यदि बहनोई की शराब की आदत छूट जाय तो बच्चों का भविष्य बन जाएगा। यज्ञ में जाने की खबर सुनकर मेरा भतीजा अनिल, जिसकी उम्र केवल ७ वर्ष की थी, वह भी आ गया। अब मैं, मेरी, पत्नी बहनोई और भतीजा चारों लोग पटना के लिए गंगा-दामोदर एक्सप्रेस ट्रेन पर बैठे। साथ में और भी सैकड़ों परिजन थे। ट्रेन में भारी भीड़ थी। लगभग ८० प्रतिशत लोग यज्ञ में जाने वालों में से  ही थे।
  
🔵 उन दिनों बिहार के मुख्यमंत्री श्री लालू प्रसाद यादव जी थे। चर्चा का विषय बना था कि उन्होंने सभी ट्रेनें यज्ञ में जाने वालों के लिए निःशुल्क करा दी हैं। वे यज्ञ में पूरा सहयोग कर रहे हैं। यज्ञ स्थल के लिए भूमि की व्यवस्था भी लालू जी ने स्वयं करवाई थी।
  
🔴 यज्ञ में पहुँचे तो वहाँ की भीड़ देखकर हम दंग रह गए। यज्ञ की व्यवस्था बहुत ही अच्छी थी। सुरक्षा व्यवस्था के लिए बनी कार्यकर्ता टोली में मुझे भी शामिल कर लिया गया था। इस दायित्व को पाकर मैं फूला नहीं समा रहा था। यज्ञ के दौरान दिए गए सारगर्भित प्रवचनों को सुनकर आत्मा तृप्त हो गई। लालू जी ने भी मंच से लोगों को संबोधित किया। वे अपने अंदाज में कह रहे थे- यह वही स्थान है जहाँ हम भैंसे चराते थे और माँड़-भात खाते थे। आज बिहार में गायत्री परिवार जैसे मिशन की आवश्यकता है, जो अपने साथ-साथ सभी को लेकर चलते हैं।       
  
🔵 माता जी से मिला, तो लगा हमें असली माँ मिल गई है। सभी परिजन उनकी बातों को सुनकर प्रसन्न हो रहे थे। माता जी का प्रवचन सुना। वे बोल रही थीं  ‘‘बेटे हम तुम्हारी रक्षा वैसे ही करेंगे, जिस तरह से चिड़िया अपने अंडों को सेती है। हमारे डैने बहुत विशाल है। इन शब्दों को सुनकर मैं सोच रहा था कि ऐसा आश्वासन तो कोई बहुत बड़े ऋषि या भगवान ही दे सकते हैं। माता जी के इन शब्दों ने जैसे वहॉँ उपस्थित सभी लोगों में नवचेतना का संचार कर दिया था। मैं अपने-आपको बहुत सौभाग्यशाली मान रहा था कि ऐसी अवतारी सत्ता का सान्निध्य पा सका। यज्ञ में करीब ६०-६५ लाख व्यक्ति मौजूद थे। लेकिन व्यवस्था में कहीं कोई गड़बड़ी नहीं। यही सोच-सोच कर मैं हैरान था।
  
🔴 यज्ञ समाप्त हुआ। हम सभी अपने-अपने घर जाने को तैयार हुए। फुलवारी शरीफ मेन रोड पर आकर देखा, सड़क पर भारी भीड़ थी। हमें सड़क पार कर उस तरफ जाना था। मेरे बहनोई सड़क पार कर गए, तो अनिल भी पीछे दौड़ पड़ा। इधर हम कुछ समझ पाते उससे पहले ही तेज गति से आ रही एक एम्बेसडर कार उसके ऊपर से गुजर गई। एकबारगी अन्तरात्मा काँप गई। अन्दर से एक विकल पुकार उठी-माता जी यह क्या हो गया? अब मैं किसको क्या मुँह दिखलाऊँगा? कई बातें मस्तिष्क में कौंध गईं। बच्चे को खोने का डर तो था ही, अन्तर को मथते हुए एक शंका यह भी उठ रही थी-लोग तरह-तरह की बातें करेंगे। माताजी के आश्वासन पर से सभी का विश्वास उठ जाएगा।
  
🔵 गाड़ी जाने के बाद हम लोग सहमते हुए आगे बढ़े। देखा बच्चा बेहोश पड़ा था। चारों ओर से सहानुभूति के स्वर सुनाई पड़ रहे थे; पर उधर ध्यान देने का वक्त नहीं था। बच्चे को गोद में उठाकर जल्दी से किनारे ले आया। बच्चे के शरीर पर एक खरोंच तक नहीं लगी थी। किसी ने इस तरफ ध्यान दिलाया तो हमारे आश्चर्य का ठिकाना न रहा। सहसा यकीन ही नहीं हुआ। क्या ऐसा भी संभव है? फिर एक उम्मीद जगी शायद माताजी की कृपा से बच ही जाए। वहाँ उपस्थित एक भाई ने बताया कि पास ही डॉक्टर का क्लीनिक है, वहाँ ले जाइए। उन्होंने हाथ से इशारा करके दिखाया। करीब दस कदम की दूरी पर एक डॉक्टर की क्लीनिक थी। वहाँ ले जाकर बच्चे को बेंच पर बैठाया तो वह बैठ गया। डॉ० ने बच्चे को जाँच कर बताया- घबड़ाने की कोई बात नहीं। बच्चा डर गया है। इसे कुछ नहीं हुआ है। १५ मिनट बाद इसे आप ले जा सकते हैं। कोई १०-१५ मिनट बाद बच्चे ने आँखें खोल दीं और घबड़ाई नजरों से इधर-उधर देखने लगा। हमें देखकर आश्वस्त हुआ। हम सबकी आँखों में आँसू छलक आए। याद आ रहा था माताजी का आश्वासन ‘‘... हमारे डैने बहुत बड़े हैं।’’ तत्क्षण हमने अनुभव किया उनके डैनों का अमृततुल्य प्रभाव।

🌹 भरत प्रसाद सिन्दरी, धनबाद (झारखण्ड)   
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/Wonderfula

👉 महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण (भाग 3)

🌹 सर्वोपरि उपलब्धि-प्रतिभा    

🔴 अपने पुरुषार्थ को इस स्तर पर सिद्ध करे कि यह मात्र दैवी अनुदानों के आधार पर ही समुन्नत बनकर नहीं रह रहा है, वरन् उसका निज का पुरुषार्थ भी समुचित मात्रा में सम्मिलित रहा है। यह प्रतिभा ही है जिसके बल पर वह अन्यायों की तुलना में अधिक सुसंस्कृत और समुन्नत बनता है। गोताखोर गहरी डुबकी लगाकर मोती बीनते हैं। हीरे खोजने वाले खदान का चप्पा-चप्पा ढूँढ़ डालते हैं। प्रतिभा को उपलब्ध करने के लिए भी इससे कम प्रयास से काम नहीं चलता।       

🔵 प्रतिभा एक दैवी स्तर की विद्युत चेतना है, जो मनुष्य के व्यक्तित्व और कर्तृत्त्व में असाधारण स्तर की उत्कृष्टता भर देती है। उसी के आधार पर अतिरिक्त सफलताएँ आश्चर्यजनक मात्रा में उपलब्ध की जाती है। साथ ही इतना और जुड़ता है कि अपने लिए असाधारण श्रेय, सम्मान और दूसरों के लिए अभ्युदय के मार्ग पर घसीट ले चलने वाला मार्ग-दर्शन वह कर सके। माँझी की तरह अपनी नाव को खेकर स्वयं पार उतरे और उस पर बिठाकर अन्यान्यों को भी पार उतारने का श्रेय प्राप्त कर सके। गिरों को उठाने, डूबतों को उबारने और किसी तरह समय गुजारने वालों को उत्कर्ष की ऊँचाई तक उछालने में समर्थ हो सके।

🔴 प्रतिभाशाली लोगों को असाधारण कहते हैं। विशिष्ट और वरिष्ठ भी कहा जाता है। साधारण जनों को तो जिन्दगी के दिन पूरे करने में ही जो दौड़-धूप करनी पड़ती है, झंझटों से निपटना और जीवनयापन के साधन जुटाना आवश्यक होता है, उसे ही किसी प्रकार पूरा कर पाते हैं। पशु-पक्षियों और पतंगों से भी इतना ही पुरुषार्थ हो पाता है और इतना ही सुयोग जुट पाता है; किन्तु प्रतिभावानों की बात ही दूसरी है, वे तारागणों के बीच चन्द्रमा की तरह चमकते हैं। उनकी चाँदनी सर्वत्र शान्ति और शीतलता बिखेरती है। वह स्वयं सुन्दर और अपनी छत्र-छाया के सम्पर्क में आने वालों को शोभा-सुन्दरता से जगमगा देते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 दुर्जनों से मान जाऊँ हार, यह संभव नही है

🔴 वाराणसी हिंदू विश्वविद्यालय के निर्माण का जो स्वरूप महामना मालवीय ने स्थिर किया था, उनके लिये बहुत धन की आवश्यकता थी। भीख माँगना अच्छा नहीं पर यदि नेक कार्य के लिये भीख भी माँगनी पडे तो मैं यह भी करुँगा, यह कहकर मालवीय जी ने विश्वविद्यालय के लिए दान माँगने का अभियान चलाया।

🔵 सत्संकल्प कभी अधूरे नही रहते। यदि ईमानदारी और निष्काम भावना से केवल लोक-कल्याणार्थ कोई काम संपन्न करना हो तो भावनाशील योगदानियों की कमी नहीं रहती। क्या धनी, क्या निर्धन विश्वविद्यालय के लिये दान देने की होड लग गई। सबने सोचा यह विद्यालय राष्ट्र की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा के लिए खुल रहा है। इसमे पढ़ने वाले छात्र चिरकाल तक प्रकाश पायेगे।

🔴 भारतीय संस्कृति के आदर्शों की रक्षा होगी इसलिये जो कुछ भी बन पडे देना चाहिये। उस समय दान के एक नये पैसे का भी वही मूल्य और महत्व हो गया, जो हजार दस हजार का होता है।

🔵 इकट्ठी और बडी रकम न मिले न सही, बहुत बडी शक्ति प्रतिभा योग्यता का एक व्यक्ति न मिले-न सही, कम योग्यता के कम साधनों के काफी व्यक्ति इकट्ठे हो जाएँ तो भी वह प्रयोजन आसानी से पूरे हो जाते है। इसलिये ५ रुपये का सहयोग भी उतना ही महत्त्व रखता है, जितना कि हजार का दान। दान में केवल व्यक्ति की भावना और लेने वाले का उद्देश्य पवित्र बना रहना चाहिए।

🔴 बिहार प्रांत का दौरा करते हुए मालवीय जी मुजफ्फरपुर पहुँचे। वहाँ एक भिखारिन ने दिन भर भीख मांगने के बाद जो पाँच पैसे मिले थे, सब मालवीय जी की झोली मे डाल दिए। पास ही एक और निर्धन व्यक्ति था उसने अपनी फटी कमीज दे दी उस कमीज को १०० रु. में नीलाम किया गया। किसी ने १०० कुर्सियों की जिम्मेदारी ली किसी ने एक कमरा बनवाने का संकल्प लिया, किसी ने पंखो के लिये रुपये दिए, किसी ने और कोई दान।

🔵 एक बंगाली सज्जन ने पाँच हजार रुपया नकद दान दिया। तो उनकी धर्मपत्नि ने बहुमूल्य कंगन दान दे दिया। पति ने दुगना दाम देकर खरीद लिया। पर भावना ही तो थी पत्नी ने उसे फिर दान दे दिया। यह क्रम इतनी देर चला कि रात हो गई। बिजली का प्रबंध था नहीं इसलिए लैंप की रोशनी में ही आई हुई धनराशि की गिनती की जाने लगी।

🔴 धन सग्रह एवं नीलामी का कार्य एक ओर चल रहा था, टिमटिमाते प्रकाश में दूसरी ओर कोठरी में रुपये गिने जा रहे थे, तभी कोइ बदमाश व्यक्ति उधर पहुँचा और बत्ती बुझाकर रूपयों से भरी तीनो थैलियां छीनकर ले भागा। कुछ लोगो ने पीछा ना किया पर अँधेरे मे वह कहाँ गायब हो गया, पता न चल पाया।

🔵 सब लोग इस घटना को लेकर दुःखी बैठे थे। एक सज्जन ने मालवीय जी से कहा- पंडित जी, इस पवित्र कार्य में भी जब लोग धूर्तता करने से बाज नहीं आते तो आप ही क्यों व्यर्थ परेशानियों का बोझ सर पर लेते है। जो कुछ मिला है किसी विद्यालय को देकर शांत हो जाइए। कोई बडा काम किया जाए, यह देश इस योग्य नहीं।

🔴 मालवीय जी गंभीर मुद्रा में बैठे थे, थोडा़ मुस्कराये और कहने लगे- भाई बदमाश एक ही तो था। मैं तो देखता हूँ कि भले आदमियों की संख्या सैकडो़ में तो यहीं खडी है। सौ भलों के बीच एक बुरे से घबराना क्या ? दुर्जनों से मान जाऊँ हार, यह मेरे लिये संभव नही। इस तरह यदि सतवृत्तियाँ रुक जाया करे, तो संसार नरक बन जायेगा। हम वह स्थिति नहीं लाने देना चाहते इसलिए अपने प्रयत्न बराबर जारी रखेगे।

🔵 मालवीय जी की तरह दुष्वृतियों से न डरने वाले लोग ही हिंदू विश्वविद्यालय जैसे बडे काम संपन्न कर पाते है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 42, 43

👉 संत का गौरव

🔴 कुछ दिनों विनोबा भावे प्रतिदिन अपने पवनार आश्रम से लगभग तीन मील दूर स्थित सुरगाँव जाते थे, एक फावड़ा कंधे पर रखकर।  
 
🔵 एक बार कमलनयन बजाज ने उनसे पूछा कि आप फावड़ा रोज इतनी दूर अपने साथ क्यों ले जाते है। उस गाँव में ही किसी के यहाँ आप फावड़ा क्यों नहीं छोड़ आते ? 
 
🔴 विनोबा जी बोले-''जिस काम के लिए मैं जाता हूँ, उसका औजार भी मेरे साथ ही होना चाहिए। फौज का सिपाही अपनी बंदूक या अन्य हथियार लेकर चलता है, उसी प्रकार एक 'सफैया' को भी अपने औजार सदा अपने साथ लेकर ही चलना चाहिए। सिपाही को अपने हथियार से मोह हो जाता है उसी तरह हमें भी अपने औजारों को अपने साथ ले जाने में आनंद और गौरव अनुभव होना चाहिए।

🌹 प्रज्ञा पुराण भाग 2 पृष्ठ 17

👉 भगवान् पवित्रता के क्षीर सागर में विराजते हैं

🔴 मनुष्य जीवन व्यापार में सतत अपने आपको एक धोखा देता रहता है कि कहीं से उस पर उसकी बाह्योपचार प्रधान पूजा-प्रार्थना-आरती आदि से अनुदान बरसेंगे एवं उसके अभाव दूर हो जायेंगे। भगवान् का नाम लेकर लोग लाटरी का टिकट खरीदते देखे जाते हैं। वे यह मान बैठते हैं कि इसके बदले उन्हें जरूर कहीं न कहीं से छप्पर फाड़कर भगवान् धन बरसा देंगे। बाहरी पूजा स्वयं करने का मौका नहीं मिलता, तो किसी और से करवा के यह समझते हैं कि उसका लाभ अपने को मिल गया, चाहे स्वयं ने कितने ही पाप क्यों न किये हों, अचिन्त्य चिन्तन क्यों न विगत में किया जाता रहा हो तथा वर्तमान के क्रियाकलाप भी वैसे ही क्यों न चल रहे हों।

🔵 यह एक छलावा है, भ्रान्ति है तथा आत्मप्रवंचना मात्र है। भगवान् को नितान्त घटिया मान बैठना, यही समझ बैठना कि जरा सी प्रार्थना से बिना अन्तरंग साफ किये, बिना औरों के प्रति संवदेना जीवन में धारणा किये भगवान् प्रसन्न हो अनुदान बरसा देगा, तो फिर इससे बड़ी नासमझी दुनिया में कोई नहीं हो सकती।
  
🔴 आज बहुसंख्य व्यक्ति धर्म के इसी रूप को जीवन में धारण किये-दिखाई देते हैं। यदि इनने सही मायने में धर्म समझा होता, तो सबसे पहले अपने अन्तरंग को निर्मल बनाया होता। भगवान् तो इतने दयालु-क्षमा वत्सल हैं कि वे भक्त के निष्काम भाव से, उनकी शरण में आ जाने पर उसके पूर्व के सब पापों का बोझ अपने पर लेकर उसे न जाने कहाँ से कहाँ पहुँचा देते हैं। शर्त एक ही है कि निश्छल भाव से समर्पण कर फिर खोदी खाई के पाटने का पुरुषार्थ किया जाता रहे तो भगवत्कृपा व सत्कर्म दोनों मिलकर व्यक्ति की आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त कर देते हैं।

🔵 भगवान् ने गीता में स्वयं यह कहा है कि पापियों से भी अधिक पाप करने वाला भी मेरी शरण में आ जाय तो वह ज्ञान रूपी नौका द्वारा सम्पूर्ण पाप समुद्र से भली भाँति स्वयं को तार सकता है (४/३५)। फिर व्यक्ति आत्मोन्मुख हो उस ज्ञान को प्राप्त करने का प्रयास क्यों नहीं करता, जो उसे पवित्रता के अनन्त स्रोत से जोड़ता है। यदि अध्यात्म का यह मर्म समझा जा सके तो बहुत से व्यर्थ के समयक्षेप करने वाले उपचारों से बचकर स्वयं को अपने समय व सारी विभूतियों को भगवत्परायण बनाते हुए निहाल हुआ जा सकता है। इस तत्व दर्शन को समझने में ही मनुष्य का हित है।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 20

👉 आत्मचिंतन के क्षण 24 Feb 2017

🔴 जो मनुष्य जितनी अधिक कामना रखता है, वह उतना ही अधिक दरिद्र रखता है। उसकी व्यग्रता उतनी बढ़ जाती है और उसका मन विविध तृष्णाओं की और दौड़ता रहता है। मनुष्य की विषय विविधता ही उसको पतन की ओर ले जाती है और पतनोन्मुख मनुष्य से किसी सदाशयता की आशा नहीं की जा सकती। उसका सन्तोष नष्ट हो जाता है और इस प्रकार उसे संसार में सभी प्राणी अपने से अधिक सुखी दिखाई देते हैं, जिससे उसे औरों से ईर्ष्या और अपने से खीझ होने लगती है। वह हर समय हर बात पर असंतुष्ट रहता है, जिससे उसमें क्रोध का बाहुल्य हो जाता है। क्रोध से विवेक नष्ट हो जाता है और विवेक के विनाश से वह सर्वनाश की ओर बड़ी तीव्र गति से अग्रसर हो पड़ता है।

🔵 क्षणिक सुख के लिए अपने जीवन लक्ष्य को भूल जाना बुद्धिमानी नहीं मान सकते। साँसारिक कामनायें अमृत तत्व की प्राप्ति नहीं करा सकतीं। उनका प्राप्त कर लेना किसी प्रकार श्रेयस्कर नहीं हो सकता। मनुष्य अपनी मूल सत्ता से बिछुड़ जाने के कारण दुःखी है। चिरन्तन शान्ति के लिए उसी परमात्मा की ही शरण लेनी होगी।

🔴 कर्म करते हुए मनुष्य से अज्ञान-वश त्रुटियाँ हो सकती हैं, किन्तु निष्काम भावना के कारण उसके सात्विक लक्ष्य पर किसी तरह का आक्षेप नहीं आता। लक्ष्य की स्थिरता ईश्वर के प्रति अनन्य भाव रखने से आती है। दोषों, त्रुटियों और भूलों से बचाव करना भी ईश्वरीय-ज्ञान के प्रकाश में ही संभव है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 19)

🌹 विचारों का व्यक्तित्व एवं चरित्र पर प्रभाव

🔴 यही कारण है कि शिशु-पालन के नियमों में माता को परामर्श दिया गया है कि बच्चे को एकान्त में तथा निश्चिन्त एवं पूर्ण प्रसन्न मनोदशा में स्तनपान करायें। क्षोभ अथवा आवेग की दशा में दूध पिलाना बच्चे के स्वास्थ्य तथा संस्कारों के लिए हानिप्रद होता है। जिन माताओं के दूध पीते बच्चे, रोगी, रोने वाले, चिड़चिड़े अथवा क्षीणकाय होते हैं, उसका मुख्य कारण यही रहता है कि वे मातायें स्तनपान के वांछित नियमों का पालन नहीं करतीं अन्यथा वह आयु तो बच्चों के स्वास्थ्य तन्दुरुस्त होने की होती है। मनुष्य के विचारों का शरीर की अवस्था में बहुत घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। यह एक प्राकृतिक नियम है।

🔵 इस नियम की वास्तविकता का प्रमाण कोई भी अपने अनुभव के आधार पर पा सकता है। वह दिन याद करें कि जिस दिन कोई दुर्घटना देखी हो। चाहे उस दुर्घटना का सम्बन्ध अपने से न रहा हो तब भी उसे देखकर मानसिक स्थिति पर जो प्रभाव पड़ा उसके कारण शरीर सन्न रह गया, चलने की शक्ति कम हो गई, खड़ा रहना मुश्किल पड़ गया, शरीर में सिहरन अथवा कम्पन पैदा हो गया, आंसू आ गये अथवा मुख सूख गया। उसके बाद भी जब उस भयंकर घटना का विचार मस्तिष्क में आता रहा शरीर पर बहुत बार उसका प्रभाव होता रहा।

🔴 मनोवैज्ञानिकों तथा चिकित्सा शास्त्रियों का कहना है कि आज रोगियों की बड़ी संख्या में ऐसे लोग बहुत कम होते हैं, जो वास्तव में किसी रोग से पीड़ित हों। अन्यथा बहुतायत ऐसे ही रोगियों की होती है, जो किसी न किसी काल्पनिक रोग के शिकार होते हैं। आरोग्य का विचारों से बहुत बड़ा सम्बन्ध होता है। जो व्यक्ति अपने प्रति रोगी होने, निर्बल और असमर्थ होने का भाव रखते हैं और सोचते रहते हैं कि उनका स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता। उन्हें आंख, नाक, कान, पेट, पीठ का कोई न कोई रोग लगा ही रहता है। बहुत कुछ उपाय करने पर भी वे पूरी तरह स्वस्थ नहीं रह पाते, ऐसे अशिव विचारों को धारण करने वाले वास्तव में कभी भी स्वस्थ नहीं रह पाते। यदि उनको कोई रोग नहीं भी होता है तो भी उनकी इस अशिव विचार साधना के फलस्वरूप कोई न कोई रोग उत्पन्न हो जाता है और वे वास्तव में रोगी बन जाते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 27)

🌹 उदारता अपनाई ही जाए  

🔵 स्वर्ग और नरक की दीवारें आपस में जुड़ी हुई हैं। घर वही है, पर एक दरवाजे से घुसने पर गन्दगी से भरीपूरी नरक वाली कोठरी में पहुँचना पड़ता हैं, किन्तु यदि दूसरे दरवाजे से होते हुये भीतर जाया जा सके तो स्वच्छता, सज्जा और सुगन्धि से भरापूरा वातावरण ही दीख पड़ेगा।    

🔴 हम अब झगड़ने, हड़पने, निगलने और समेटने-भरने पर उतारू होते हैं, तो हाथों-हाथ अनीतिजन्य आत्म प्रताडऩा सहनी पड़ती है। बाहर की भर्त्सना और प्रताडऩा को तो सहा भी जा सकता है, पर जब अन्तरात्मा कचोटती है, तब उसे सहन करना कठिन पड़ता है। पैर में लगी चोट और हाथ में लगी लाठी उतनी असह्य नहीं होती, जितना कि अपेन्डिसाइटिस, यों हृदय घात जन्य दर्द से आदमी बेहतर तिलमिला जाता है और प्राणों पर आ बीतती है।     

🔵 मानवी गरिमा को खोकर मनुष्य से ऐसा कुछ बन ही नहीं पड़ता, जिस पर वह सन्तोष या गर्व कर सके, प्रसन्नता व्यक्त कर सके और समुदाय के सम्मुख सिर ऊँचा उठाकर चल सके। बाहर की वर्षा से छाता लगाकर भी बचा जा सकता है, पर जब भीतर से लानत बरसती है तो उससे कैसे बचा जाये? धरती पर नरकीटक, नर-पशु और नर-पिशाच भी भ्रमण करते रहते हैं। देखने में उनकी भी आकृति मनुष्य जैसी ही होती है। अन्तर तो आदतों को स्वभाव बनकर जमी हुई प्रकृति को देखकर ही किया जा सकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 दीक्षा और उसका स्वरूप (भाग 1)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी

🔴 भगवान् ने मनुष्य के साथ ऐसा कोई पक्षपात नहीं किया है, बल्कि उसे अमानत के रूप में कुछ विभूतियाँ दी हैं। जिसको सोचना कहते हैं, जिसको विचारणा कहते हैं, जिसको बोलना कहते हैं, जिसको भावनाएँ कहते हैं, जिसको उसकी विशेषताएँ कहते हैं, सिद्धियाँ- विभूतियाँ कहते हैं। ये सब अमानतें हैं। ये अमानतें मनुष्यों को इसलिए नहीं दी गई हैं कि उनके द्वारा वह सुख- सुविधाएँ कमाये और स्वयं के लिए अपनी ऐय्याशी या विलासिता के साधन इकट्ठे करे और अपना अहंकार पूरा करे।

🔵 ये सारी की सारी चीजें सिर्फ इसलिए उसको दी गयी हैं कि इन चीजों के माध्यम से वो जो भगवान् का इतना बड़ा विश्व पड़ा हुआ है, उसकी दिक्कतें और कठिनाइयों का समाधान करे और उसे अधिक सुन्दर और सुव्यवस्थित बनाने के लिए प्रयत्न करे। उसके लिए सब अमानतें हैं।

🔴 बैंक के खजांची के पास धन रखा रहता है और इसलिए रखा रहता है कि सरकारी प्रयोजनों के लिए इस पैसे को खर्च करे। उसको उतना ही इस्तेमाल करने का हक है, जितना कि उसको वेतन मिलता है। खजाने में अगर लाखों रुपये रखे हों, तो खजांची उन्हें कैसे खर्च कर सकता है? उसे क्यों खर्च करना चाहिए? पुलिस के पास या फौज के पास बहुत सारी बन्दूकें और कारतूसें होती हैं वे इसलिए थोड़े ही उसके पास होती हैं कि उसको अपने लिए उनका इस्तेमाल करना चाहिए और चाहे जो तरीका अख्तियार करना चाहिए, ये नहीं हो सकता।

🔵 कप्तान को और जो फौज का कमाण्डर है, उसको अपना वेतन लेकर जितनी सुविधाएँ मिली हैं, उसी से काम चलाना चाहिए और बाकी जो उसके पास बहुत सारी सामर्थ्य और शक्ति बंदूक चलाने के लिए मिली है, उसको सिर्फ उसी काम में खर्च करना चाहिए, जिस काम के लिए सरकार ने उसको सौंपा है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Diksha/11

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 60)

🌹 अनगढ़ मन हारा, हम जीते

🔴 पिछला जीवन बिलकुल ही दूसरे ढर्रे में ढला था। सुविधाओं और साधनों के सहारे गाड़ी लुढ़क रही थी। सब कुछ सीधा और सरल लग रहा था, पर हिमालय पहुँचते ही सब कुछ उलट गया। वहाँ की परिस्थितियाँ ऐसी थीं, जिनमें निभ सकना केवल उन्हीं के लिए सम्भव था, जो छिड़ी लड़ाई के दिनों में कुछ ही समय की ट्रेनिंग लेकर सीधे मोर्चे पर चले जाते हैं और उस प्रकार के साहस का परिचय देते हैं जिसका इससे पूर्व कभी पाला नहीं पड़ा था।

🔵 प्रथम हिमालय यात्रा का प्रत्यक्ष प्रतिफल एक ही रहा कि अनगढ़ मन हार गया और हम जीत गए। प्रत्येक नई असुविधा को देखकर उसने नए बछड़े की तरह हल में चलने से कम आना-कानी नहीं की, किन्तु उसे कहीं भी समर्थन न मिला। असुविधाओं को उसने अनख तो माना और लौट चलने की इच्छा प्रकट की, किन्तु पाला ऐसे किसान से पड़ा था जो मरने मारने पर उतारू था। आखिर मन को झक मारनी पड़ी और हल में चलने का अपना भाग्य अंगीकार करना पड़ा। यदि जी कच्चा पड़ा होता तो स्थिति वह नहीं बन पड़ती, जो अब बन गई है। पूरे एक वर्ष नई-नई प्रतिकूलताएँ अनुभव होती रहीं, बार-बार ऐसे विकल्प उठते रहे जिसका अर्थ होता था कि इतनी कड़ी परीक्षा में पड़ने पर हमारा स्वास्थ्य बिगड़ जाएगा। भविष्य की साँसारिक प्रगति का द्वार बंद हो जाएगा। इसलिए समूची स्थिति पर पुनर्विचार करना चाहिए।

🔴 एक बार तो मन में ऐसा ही तमोगुणी विचार भी आया, जिसे छिपाना उचित नहीं होगा। वह यह कि जैसा बीसियों ढोंगियों ने हिमालय का नाम लेकर अपनी धर्म ध्वजा फहरा दी है, वैसा ही कुछ करके सिद्ध पुरुष बन जाना चाहिए और उस घोषणा के आधार पर जन्म भर गुलछर्रे उड़ाने चाहिए। ऐसे बीसियों आदमियों की चरित्र गाथा और ऐशो-आराम भरी विडम्बना का हमें आद्योपान्त परिचय है। यह विचार उठा, वैसे ही उसे जूते के नीचे दबा दिया। समझ में आ गया कि मन की परीक्षा ली जा रही है। सोचा कि जब अपनी सामान्य प्रतिभा के बलबूते ऐशो-आराम के आडम्बर खड़े किए जा सकते हैं, तो हिमालय को, सिद्ध पुरुषों को, सिद्धियों को, भगवान को, तपश्चर्या को बदनाम करके आडम्बर रचने से क्या फायदा?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 61)

🌹 हमारी जीवन साधना के अन्तरंग पक्ष-पहलू

🔵 हमारे बहुत से परिजन हमारी साधना और उसकी उपलब्धियों के बारे में कुछ अधिक जानना चाहते हैं और वह स्वाभाविक भी है। हमारे स्थूल जीवन के जितने अंश प्रकाश में आए हैं, वे लोगों की दृष्टि से अद्भुत हैं। उनमें सिद्धियों, चमत्कारों और अलौकिकताओं की झलक देखी जा सकती है। कौतूहल के पीछे उसके रहस्य को जानने की उत्सुकता स्वाभाविक है, सो अगर लोग हमारी आत्म- कथा जानना चाहते हैं, उसके लिए इन दिनों विशेष रूप से दबाव देते हैं। तो उसे अकारण नहीं कहा जा सकता।

🔴 यों हम कभी छिपाव के पक्ष में नहीं रहे- दुराव छल, कपट हमारी आदत में नहीं; पर इन दिनों हमारी विवशता है कि जब- तक रंग- मंच पर प्रत्यक्ष रूप से हमारा अभिनय चल रहा है, तब तक वास्तविक को बता देने पर दर्शकों का आनंद दूसरी दिशा में मुड़ जाएगा और जिस कर्तव्यनिष्ठा को सर्वसाधारण में जगाना चाहते हैं, वह प्रयोजन पूरा न हो सकेगा। लोग रहस्यवाद के जंजाल में उलझ जायेंगे, इससे हमारा व्यक्तित्व भी विवादास्पद बन जाएगा और जो करने कराने हमें भेजा गया है उसमें भी अड़चन पड़ेगी। नि:संदेह हमारा जीवन अलौकिकताओं से भरा पड़ा है। रहस्यवाद के पर्दे इतने अधिक हैं कि उन्हें समय से पूर्व  खोला जाना अहितकर ही होगा।  

🔵 पीछे वालों के लिए उसे छोड़ देते हैं कि वस्तुस्थिति की सचाई को प्रामाणिकता की कसौटी पर कसें और जितनी हर दृष्टि से परखी जाने पर सही निकले उससे यह अनुमान लगाएँ कि अध्यात्म विद्या कितनी समर्थ और सारगर्भित है। उस पारस से छूकर एक नगण्य- सा व्यक्ति अपने लोहे जैसे तुच्छ कलेवर को स्वर्ण जैसा बहुमूल्य बनाने में कैसे समर्थ, सफल हो सका। इस दृष्टि से हमारे जीवन- क्रम में प्रस्तुत हुए अनेक रहस्यमय तथ्यों की समय आने पर शोध की जा सकती है और उस समय उस कार्य में हमारे अति निकटवर्ती सहयोगी कुछ सहायता भी कर सकते हैं; पर अभी वह समय से पहले  की बात है। इसलिए उस पर वैसे ही पर्दा रहना चाहिए, जैसे अब तक पड़ा रहा है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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