गुरुवार, 11 अगस्त 2016

👉 समाधि के सोपान (भाग 15) (In The Hours Of Meditation)


🔴 और यदि प्रभु का स्मरण ही तुम्हारा जीवन- श्रम हो तो एक महान् आनंद तथा निर्विकार शांति तुम्हें प्राप्त होगी; तथा जो बीभत्स लगता था वह सुन्दर प्रतीत होगा और भयंकर- लगता था वह सर्वप्रेममय प्रतीत होगा। और तब उस सन्त के साथ जिसने नाग द्वारा डसे जाने पर कहा था देखो, देखो, मेरे प्रीतम का संदेश वाहक आया है, तुम भी वही कहोगे; या उस सन्त के समान जिसने बाघ के मुँह में भी कहा था, शिवोऽहम् शिवोऽहम्। तुम भी कहोगे, शिवोऽहम्। शिवोऽहम् यही आत्मा की शक्ति है। यही वास्तव में उसका प्रगटीकरण है। यही दिव्यता का भाव है क्योंकि यही दिव्यता का दर्शन है।

🔵 मातृभूमि की रक्षा के लिए योद्धा तोप के मुँह में दौड़ जाता है। माँ अपने बच्चे की प्राणरक्षा के लिए अग्नि में दौड़ जाती है, गहरे जल में पड़ती है, बाघ के मुँह में समा जाती है। मित्र अपने मित्र के लिए प्राण दे देता है। संन्यासी अपने आदर्श के लिए सभी प्रकार के कष्ट सहता है। तुम भी सभी प्रकार की कसौटियों को सहो, विपत्तियों का सामना करो, आदर्श का जीवन जिओ तथा ईश्वर के नाम पर निर्भीक बनो। तुम मेरे पुत्र हो।

🔴 जीवन या मृत्यु में, पुण्य या पाप में, सुख या दुःख में, भले या बुरे में, जहाँ भी तुम जाओ, जहाँ भी तुम रहो, '' तुम्हारे साथ हूँ। मैं तुम्हारी रक्षा करता हूँ। मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ। क्योंकि मैं तुमसे बँधा हुआ हूँ। ईश्वर के प्रति मेरा प्रेम मुझे तुम्हूारे साथ एक कर देता है। मैं तुम्हारी रक्षा करता हूँ। मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ। मैं तुम्हारी आत्मा हूँ। वत्स! तुम्हारा हृदय मेरा निवास स्थान है।

हरि ओम् तत् सत्

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 जैसा बोओंगे वैसा पाओंगे


🔴 दोस्तों, ये कहावत तो आपने बहुत बार सुनी होंगी और पढ़ी होंगी की “जैसा बोओंगे वैसा पाओंगे”।

🔵 एक गांव में एक व्यापारी रहता था, उसका नाम था दानी लेकिन वो उसके नाम के बिलकुल उल्टा था मतलब न तो वो स्वंय दान देता था और न ही अपने परिजनों को दान करने देता था जब भी कोई  भिक्षुक या साधु उसके, दहलीज पर भिक्षा मांगने आता तो वो उनका अपमान करके उन्हें कह देता आगे बढ़ो और इतना सा कह कर उन्हें टाल देता था।

🔴 उसकी गांव में किराने की दुकान थी. वो जो भी सामान गाव वालों को बेचता उसमें मिलावट करके बेचता था गाँव वाले लोग वो मिलावट वाली अशुध्द सामग्री खाकर अक्सर बीमार रहते थे।

🔵 दानी का एक पुत्र था उसका नाम था गणेश. वो हमेशा अपने पिताजी को मिलावट करते समय देखता। उसने एक बार अपने पिताजी से पूछा की, – पिताजी आप सामुग्री में मिलावट क्यों करते हो ? तब उस दानी ने उसे कहा की, – “बेटा, शुद्ध सामग्री हानी हानिकारक होती है. इससे गाँव वाले बीमार हो जायेंगे, इसलिये मै मिलावट करके बेचता हूँ। इस तरह उसने अपने बेटे गणेश को भी मिलावट का काम सिखा दिया मगर गणेश ने इसका उपयोग उल्टा किया मतलब दानी अक्सर अपने घर के लिये जो भी सामग्री निकालता था उसमे मिलावट नहीं करता था। गणेश सोचता की अगर हम ये शुद्ध सामग्री खायेंगे तो उससे तो हम बीमार पड़ जायेंगे तो वो घर में आये सामग्री में मिलावट कर देता था इस के बारे में दानी को पता भी नहीं चलता था क्योंकि गणेश मिलावट तो  कर देता था लेकिन बताता  किसी को भी नहीं था।

🔴 इस के कारण दानी अपने घर के लिये शुद्ध सामग्री निकलता मगर खाता मिलावट वाली सामुग्री उसे इसका एहसास खाते समय होता  वो सोचता की मैंने तो शुद्ध सामग्री निकाली थी लेकिन ये तो मिलावट वाली लग रही है। अपनी चोरी पकड़े जाने के डर से वो पूछ भी नहीं सकता था। वही मिलावट वाला खाना खाकर एक दिन दानी इतना बीमार हो गया की बिस्तर से उठना भी मुश्किल हो गया अब वो बिस्तर पे ही पडे पडे भोजन करता दुध पिता था बीमार दानी को दुध देने की जिम्मेदारी हमेशा उसके बेटे गणेश पर आती थी उसने बचपन से जो देखा उसके अनुसार दुध पूरी तरह शुद्ध है मतलब उसमे मिलावट नहीं की गई है वह सोचता की अगर ये शुद्ध दुध पिताजी को दिया तो वो और अधिक बीमार हो जायेंगे. ये सोच के साथ वह पहले आधा गिलास दुध स्वंय पी जाता और आधे दुध में पानी मिलाकर दानी को दे देता।

🔵 दानी जब दुध पिता था तब दानी को समझ में आता था की दुध बहुत पतला है इसमे पानी की मात्रा अधिक है, मगर तत्काल इससे असहमत भी हो जाता क्योंकि दुध घर का होता था और वो घर के लिये बिना मिलावट वाला दुध निकालता था तब पानी मिलाने का सवाल ही नहीं उठता था। एक दिन उसके दुध पिने का समय हुवा तो उसने खिड़की से पुत्र को देखा तो वो उसका काम देखकर दंग रह गया. बेटा आधा दुध तो खुद पी लेता था और आधे में पानी मिलाकर पिता के पास ले गया और पिताजी को दिया दानी ने उससे कहा की, बेटा गणेश क्या घर में और दुध नहीं है ? क्यों नही. घर में पुरे पांच लीटर दुध रखा है, गणेश ने जवाब दिया। दानी बोला – फिर  तुम्हे दुध पीना था तो उसमे  से क्यों नही पिया मेरा दुध पीकर उसमे  पानी क्यों मिलाया ? पुत्र ने कहा – की पिताजी आप ही तो कहते है न की कोई भी शुद्ध सामग्री हानिकारक होती है मगर माँ आपके दुध में पानी नहीं मिलाती थी. मैंने सोचा की आपको शुद्ध दुध देने से आपकी बिमारी और बढेंगी. आपकी बिमारी नहीं बढ़े यही सोचकर तो मैंने आपको  शुद्ध दुध न देते हुये उसमे मिलावट करना उचित समझा।

🔴 बुरी शिक्षा का परिणाम दानी ने देख लिया था। तब से उसने मिलावट नहीं करने की शिक्षा ली और अपने दुकान से गाँव वालो को शुद्ध सामग्री भी देने लगा, और इतना ही नहीं उसके दहलीज पर जो भी आता उन्हें भोजन अवश्य देता, और वो भी शुद्ध।

👉 गुरु पूर्णिमा-’युग निर्माण योजना’ का अवतरण पर्व (भाग ३)

राजनैतिक स्वाधीनता के लिए आत्माहुति देने वाले पिछली पीढ़ी के शहीद अपनी जलाई हुई मशाल हमारे हाथों में थमा कर गये हैं। जिनने अपने प्राण, प...