शनिवार, 16 दिसंबर 2017

👉 होशियारी और समझदारी

🔶 होशियारी अच्छी है पर समझदारी उससे भी ज्यादा अच्छी है क्योंकि समझदारी उचित अनुचित का ध्यान रखती है!

🔷 एक नगर के बाहर एक गृहस्थ महात्मा जी रहते थे और उनके आश्रम मे दुर दुर से विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने को आते थे और महात्मा जी भी सभी को समान रुप से शिक्षा देते थे!

🔶 एक बार एक युवक उनके पास आया जो बहुत ही होशियार था और उसने कहा की मैं भी आपके आश्रम मे शिक्षा-दीक्षा लेना चाहता हुं तो महात्मा जी ने कहा की ठीक है! फिर वो उस युवक को लेकर दुर नगर गये और वहाँ से जब वापस लोट रहे थे तो महात्मा जी बार बार अपने थेले को देख रहे थे और युवक इस दृश्य को बराबर देख रहा था! और फिर एक नदी के किनारे महात्मा जी ने कहा वत्स रात्री मे अब हम यही पर विश्राम करते है सुबह ही यहाँ से आश्रम के लिये निकलेंगे और पुरी रात महात्मा जी उस थेले को बारबार देख रहे थे! वो युवक बारबार उन्हे देख रहा था!

🔷 महात्मा जी ने कहा की वत्स तुम यही बैठना और इस थैले को सम्भाल के रखना मैं नदी मे स्नान कर के आता हुं और पहले महात्मा जी स्नान करने को गये और फिर वो युवक गया फिर दोनो आश्रम पहुँचे और जब वहाँ पहुँचे और जब थैले को देखा तो महात्मा जी की आँखो से आँसु आने लगे जब उस युवक ने महात्मा जी से पुछा की हॆ देव इन आँसुओं का क्या कारण है और जब महात्मा जी ने कारण बताया तो वो युवक रोने लगा और वो युवक वहाँ से चला गया !

🔶 महात्मा जी के थैले मे एक सोने की ईंट थी जो एक राजा ने उन्हे परमार्थ हेतु दी थी और महात्मा जी सोच रहे थे की इस ईंट से आश्रम मे रहने वाले विद्यार्थियों के लिये कुछ अच्छे पक्के भवन का निर्माण करवा देंगे ताकि सर्दी गर्मी बरसात से उनकी रक्षा हो सके उनकी जिंदगियों का अच्छे से निर्माण हो सकेगा और गायों के लिये भी सालभर की चारे की व्यवस्था हो जायेगी और परमार्थ के अनेक कार्य सम्पुर्ण हो सकेंगे! और युवक ने सोचा की महात्मा जी का अभी भी सोने मे मोह है और महात्मा जी ठहरे गृहस्थी कही वो भटक न जायें और उसने सोने की ईंट को नदी के बहाव मे फेंक दिया और थैले मे एक पत्थर रख दिया और बड़ा खुश होने लगा की मैंने महात्मा जी को मोह से मुप्त कर दिया!

🔷 पर जब युवक ने सत्य कहा तो महात्मा जी ने कहा वत्स विवाह न करना बड़ी बात नही है बड़ी बात है विवाह करके नियम और संयम मे जीना और धन का त्याग करना बड़ी बात नही है बड़ी बात तो तब है की तुम्हारे पास धन है पर तुम्हारे मन मे उसके प्रति उदासीनता का भाव है उस धन के प्रति तुम्हारे मन मे कोई आसक्ति अथवा कोई मोह न हो!
मेरी चिन्ता का जो कारण था वो ये था की परमार्थ की जो जिम्मेदारी मुझे सोपी कही मॆरी लापरवाही से कोई अनहोनी न हो जायें और परमार्थ का कार्य कही रुक न जायें! उस सोने की ईंट के बारे मे मुझे भी पुछ सकते थे वत्स पर वत्स तुमने आवश्यकता से ज्यादा होशियारी दिखाई तुमने अपनी ही बुद्धी से सारे निर्णय अपने आप ही ले लिये होशियारी होना अच्छी बात है पर समझदारी होना ज्यादा जरूरी है!

🔶 फिर उस युवक ने कहा देव मैं बहुत बड़ा अपराधी हुं और जब तक पश्चात्ताप न कर लू तब तक मैं आपको अपना मुँह न दिखाउँगा और फिर कुछ समय बाद वो युवक वापिस लौटा और उसने महात्मा जी के सारे सपनो को साकार किया!

🔷 उसके पास जो कुछ भी था वो सबकुछ बेच आया और अपने अपराध का पश्चात्ताप किया!

🔶 इसलिये एक बात हमेशा ध्यान रखनी चाहिये की कभी कभी आवश्यकता से ज्यादा होशियारी दिखाने पर नुकसान उठाना पड़ सकता है होशियारी अच्छी है पर आवश्यकता से ज्यादा होशियारी दुखदायी हो जाती है!

🔷 इसलिये होशियारी के साथ साथ समझदारी भी बहुत जरूरी है क्योंकि होशियारी उचित अनुचित नही देखती है पर समझदारी उचित अनुचित देखकर आगे बढ़ती है!

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 17 Dec 2017


👉 आज का सद्चिंतन 17 Dec 2017


👉 अनुशासन सीखिये

🔷 एक बार मेढ़कों को अपने समाज की अनुशासनहीनता पर बड़ा खेद हुआ और वे शंकर भगवान के पास एक राजा भेजने की प्रार्थना लेकर पहुँचे।

🔶 प्रार्थना स्वीकृत हो गई। कुछ समय बाद शिवजी ने अपना बैल मेढ़कों के लोक में शासन करने भेजा। मेढ़क इधर-उधर निःशंक भाव से घूमते फिरे सौ उसके पैरों के नीचे दब कर सैकड़ों मेढ़क ऐसे ही कुचल गये।      

🔷 ऐसा राजा उन्हें पसंद नहीं आया मेढ़क फिर शिवलोक पहुँचे और पुराना हटा कर नया राजा भेजने का अनुरोध करने लगे।

🔶 वह प्रार्थना स्वीकार कर ली गई। बैल वापिस बुला लिया गया। कुछ दिन बाद स्वर्गलोक  से एक भारी शिला मेढ़कों के ऊपर गिरी उससे हजारों की संख्या में वे कुचल कर मर गये।

🔷 इस नई विपत्ति से मेढ़कों को और भी अधिक दुःख हुआ और वे भगवान के पास फिर शिकायत करने पहुँचे।

🔶 शिवजी ने गंभीर होकर कहा-बच्चों पहले हमने अपना वाहन बैल भेजा था, दूसरी बार, हम जिस स्फटिक शिला पर बैठते हैं उसे भेजा। इसमें शासकों का दोष नहीं है। तुम लोग जब तक स्वयं अनुशासन में रहना न सीखोगे और मिल-जुलकर अपनी व्यवस्था बनाने के लिए स्वयं तत्पर न होगे तब तक कोई भी शासन तुम्हारा भला न कर सकेगा। मेढ़कों ने अपनी भूल समझी और शासन से बड़ी आशायें रखने की अपेक्षा अपना प्रबंध करने में जुट गये।

📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1973 पृष्ठ 1
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 भावनाएँ भक्तिमार्ग में नियोजित की जायें (अन्तिम भाग)

 🔶 धर्म का आडम्बर अब इतना अधिक बढ़ता चला जा रहा है कि कई बार तो यह भ्रम होने लगता है कि हम धर्मयुग में रह रहे हैं। कथा, कीर्तन, प्रवचन, सत्संग, पारायण, लीला, सम्मेलन आदि के माध्यम से जगह-जगह विशालकाय आयोजन होते हैं और उनमें एकत्रित विशाल भीड़ को देखने से प्रतीत होता है कि धर्म रुचि आकाश छूने जा रही है, पर जब गहराई में उतर कर देखते हैं तो लगता है कि यह धर्म दिखावा बहुत से लोग अपनी आंतरिक अधार्मिकता को झुठला कर आत्म प्रवंचना करने के लिए अथवा लोगों की दृष्टि में धार्मिक बनने के लिए रच कर खड़ा करते हैं। यह आवरण इसलिए खड़े किये जाते हैं ताकि उनकी यथार्थता पर पर्दा पड़ा रहे और लोग उन्हें उस ऊँचे स्तर का समझते रहे जिस पर कि वे वस्तुतः नहीं हैं।
                  
🔷 कुछ लोग वस्तुतः इन आयोजनों को सद्भावना के साथ सदृश्य के लिए भी करते हैं पर वे यह भूल जाते हैं कि धर्म आवरण का आरंभिक प्रयाग भक्ति-भावना लाभ तो मिलेगा जब आस्थाओं और क्रिया-कलापों में उच्च स्तरीय परिवर्तन संभव हो। इस कार्य के लिए उपयुक्त पथ प्रदर्शक वे हो सकते हैं जिनने अपने को मन, वचन, कर्म से सच्चा भक्त बनने में सफलता प्राप्त की हो और इस श्रेय पथ में प्रगति का प्रकाश वे ही पा सकते हैं जिन्होंने आवरण से आगे बढ़कर अपने आपको सुधारने सँभालने के लिए उत्कट प्रयास किया हो।
    
🔶 भावनाओं की शक्ति की भक्ति मार्ग में यदि नियोजन किया जा सके तो मनुष्य इतनी प्रगति कर सकता है जिससे उसकी अपूर्णता, चरम पूर्णता में परिणत हो सके।

.... समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1973 पृष्ठ 2
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1973/January/v1.2

👉 सुख चाहिए किन्तु दुःख से डरिये मत (अन्तिम भाग)

🔶 अनेक बार अनुभव किया जा सकता है कि कभी-कभी जीवन में ऐसी परिस्थितियां आ जाती हैं जिनसे जीवन का हर क्षेत्र निराशा, कठिनाइयों तथा आपत्तियों से भरा दिखाई पड़ता है। हर समय वही अनुभव होता है कि अब जीवन में कोई सार नहीं रहा है, उसके अस्तित्व को हर प्रकार से खतरा पैदा हो गया है किन्तु किसी भी माध्यम से आशा का एक प्रकाश कण दीख जाने से परिस्थिति बिल्कुल बदल जाती है और वही निराश व्यक्ति एक बार फिर कमर कसकर जीवन संग्राम में योद्धा की तरह उतर पड़ता है व निश्चय विजय किया करता है। हानि के धक्के अथवा असफलता के क्षोभ से जब भी किसी व्यक्ति की मरने अथवा निराश, निकम्मे हो बैठने का समाचार सुनें तो समझ लें कि उसने अपनी भौतिक हानि के साथ अपनी आशा की भी हानि करली है अपने उत्साह का पल्ला छोड़ दिया है।
   
🔷 आशा तथा उत्साह कहीं से लाने अथवा आने वाली वस्तु नहीं है। यह दोनों तेज आपके अन्तःकरण में सदैव ही विद्यमान रहते हैं। हां आवश्यकता के समय उनको जगाना एवं पुकारना अवश्य पड़ता है। जीवन की कठिनाइयों तथा आपत्तियों से घबराकर अपने इन अन्तरंग मित्रों को भूल जाना अथवा इनका साथ छोड़ देना बहुत बड़ी भूल है। ऐसा करने का अर्थ है कि आप अपने दुर्दिनों को स्थायी बनाते हैं अपनी कठिनाइयों को पुष्ट तथा व्यापक बनाते हैं। किसी भी अन्धकार में, किसी भी प्रतिकूलता अथवा कठिनाई में अपने आशा उत्साह के सम्बन्ध को कभी मत छोड़ियेगा, कठिनाइयां आपका कुछ भी नहीं कर सकेंगी।

🔶 सुख की कामना करिये, किन्तु दुःख से डरिये नहीं। आशा और उत्साह के बल पर उन्हें जीतकर सुख के रूप में बदल डालिये। चिर प्रसन्न आशान्वित तथा उत्साहित रहिये। आपको सुख की याचना करने की आवश्यकता न होगी। वह स्वयं दरवान की ही तरह आपके जीवन की हर ड्यौढ़ी पर खड़ा आपका स्वागत करता हुआ मिलेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- दिसंबर 1966 पृष्ठ 23
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1966/July/v1.23

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.3

👉 Prosperous Crop Of Action (Karma)

🔶 Human life is a field, wherein actions are sown & their good or bad fruits are reaped. He who does good deeds, gets good fruit. A doer of bad deeds accumulates bad fruits. It is said. “He who sows mangoes, will eat mangoes, he who sows acacia, will get thorns.” Just as getting mangoes by sowing acacia is not possible in nature, similarly getting good by sowing the seeds of evils cannot even be imagined.
 
🔷 There is no other truth in human life than this. The fruit of good cannot be anything but peace, happiness & progress. Similarly, evil has never resulted in good, nor will it ever result in good in future. History bears witness to it.

🔶 No action is ever without cause. Similarly, no action is without its result. It is the fundamental rule from both subtle & gross viewpoints that destinies are never created by themselves but are written by the pen of individual’s own action. A good & bad destiny is always the result of one’s own actions.

🔷 It is only a delusion to thind that any individual, society or country has prospered through evil. Life keeps an account of every moment. Water will always remain water. If it flows through mu, it will not be bereft of bad smell. It cannot be potable even by creating a delusion of water. Similarly, Successes achieved through fraud ultimately lead to ignominy. Everlasting success is achieved only through good. This alone reforms man’s this as well as the other life. Fruits of actions are incontrovertible.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 भावनाएँ भक्तिमार्ग में नियोजित की जायें (भाग 1)


🔶 भावनाओं की शक्ति भाप की तरह हैं यदि उसका सदुपयोग कर लिया जाय तो विशालकाय इंजन चल सकते हैं पर यदि उसे ऐसे ही खुला छोड़ दिया जाय तो वह बर्बाद ही होगी किसी के काम न आ सकेगी।
                  
🔷 भावनाओं में भक्ति का स्थान बहुत ऊँचा है। उसका सहारा लेकर मनुष्य नर से नारायण बन सकता है। किन्तु यदि उसे एक कल्पना-आवेश मात्र मन बहलाव रहने दिया जाय तो उससे किसी का कुछ प्रयोजन सिद्ध न होगा।
    
🔶 रविशंकर महाराज ने आज के भक्तों की तीन रोगों से ग्रसित गिनाया है (गाना) (2) रोना (3) दिखावा।

🔷 भजन कीर्तन के नाम पर दिन-रात झाँझ बजती और हल्ला होता है। गाना वही सार्थक है जो विवेक पूर्वक गाया जाय जिसमें प्रेरणा हो और उसे हृदयंगम करने का लक्ष्य सामने रखा गया हो। जहाँ केवल कोलाहल कही उद्देश्य हो वहाँ, भक्ति का प्रकाश कैसे उत्पन्न होगा।

🔶 रोना-अर्थात् संसार को शोक-संताप से भरा भव सागर मानना। इस दुनिया से छुटकारा पाकर-किसी अन्य लोक में जा बसने की कल्पना, अपने आपसे भागने के बराबर है। भगवान के सुरम्य उद्यान का सौंदर्य निहार कर आनंद विभोर होने की भक्ति-भावना यदि विश्व के कण-कण में संव्याप्त भगवान को देखने की अपेक्षा सर्वत्र दुःख और पाप ही देखें तो इसे बुद्धि विपर्यय ही कहा जायेगा। भक्ति भाव नहीं। पलायन नहीं-भक्ति का तात्पर्य दुखों का निराकरण एवं दुखियों की सहायता करना है। जहाँ। केवल घृणा का विषाद छाया रहे वहाँ भक्ति की आत्मा जीवित कैसे रहेगी। अपने को आर्त और दुखी के रूप में प्रस्तुत करने वाला इस कुरूप चित्रण से अपने सृष्टा को ही अपमानित करता है।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1973 पृष्ठ 2
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1973/January/v1.2

👉 यह भी नहीं रहने वाला 🙏🌹

एक साधु देश में यात्रा के लिए पैदल निकला हुआ था। एक बार रात हो जाने पर वह एक गाँव में आनंद नाम के व्यक्ति के दरवाजे पर रुका। आनंद ने साध...