बुधवार, 15 जून 2016

👉 आत्मोत्कर्ष के चार अनिवार्य चरण (भाग 7)

 
🔴 छोटी बुरी आदतों से लड़ाई आरम्भ करनी चाहिए और उनसे सरलतापूर्वक सफलता प्राप्त करते हुए क्रमशः अधिक कड़ी- अधिक पुरानी और अधिक प्रिय बुरी आदतों से लड़ाई आरम्भ करनी चाहिए। छोटी सफलताएँ प्राप्त करते चलने से साहस एवं आत्म-विश्वास बढ़ता है और इस आधार पर अवांछनीयताओं के उन्मूलन एवं सत्प्रवृत्तियों के संस्थापन में सफलता मिलती चली जाती है। यह प्रयास देर तक जारी रहना चाहिए। थोड़ी-सी सफलता से निरास नहीं हो जाना चाहिए। लाखों योनियों के कुसंस्कार विचार मात्र से समाप्त नहीं हो जाते। वे मार खाकर अन्तःकरण के किसी कोने में जा छिपते हैं और अवसर पाते ही छापामारों की तरह घातक आक्रमण करते हैं। इनसे सतत् सजग रहने की आवश्यकता है। आजन्म यह सतर्कता अनवरत रूप से बरती जानी चाहिए कि कहीं बेखबर पाकर दुर्बुद्धि और दुष्प्रवृत्ति की घातें फिर न पनपने लगें।

🔵 आत्म-निर्माण का तीसरा चरण इस प्रयोजन के लिए है कि श्रेष्ठ सज्जनों में गुण, कर्म, स्वभाव की जो विशेषताएँ होनी चाहिए उनकी पूर्ति के लिए योजनाबद्ध प्रयत्न किया जाय। दुर्गुणों की प्रतिष्ठापना भी तो होनी चाहिए। कटीली झाड़ियाँ उखाड़ कर साफ कर दी गई यह तो आधा ही प्रयोग पूरा हुआ। आधी बात तब बनेगी जब उस भूमि पर सुरम्य उद्यान लगाया जाय और उसे पाल-पोस कर बड़ा किया जाय। बीमारी दूर हो गई यह आधा काम है। दुर्बल स्वास्थ्य को बलिष्ठता की स्थिति तक ले जाने के लिए जिस परिष्कृत आहार-बिहार को जुटाया जाना आवश्यक है। उसकी ओर भी तो ध्यान देने और प्रयत्न करने में लगना चाहिए।

🔴 आलस्य दूर करने की प्रतिक्रिया श्रम-शीलता में समुचित रुचि एवं तत्परता के रूप में दृष्टिगोचर होना चाहिए। प्रमाद से पिण्ड छूटा हो- लापरवाही और गैर जिम्मेदारी हटा दी तो उसके स्थान पर जागरूकता, तन्मयता, नियमितता, व्यवस्था जैसे मनोयोग का परिचय मिलना चाहिए। मधुरता शिष्टता, सज्जनता, दूरदर्शिता, विवेकशीलता, ईमानदारी संयमशीलता, मितव्ययिता, सादगी, सहृदयता, सेवा भावना जैसी सत्प्रवृत्तियों में ही मानवी गरिमा परिलक्षित होती है। उन्हें अपनाने स्वभाव का अंग बनाने के लिये सतत् प्रयत्नशील रहा जाना चाहिये। आमतौर से लोग धन उपार्जन को प्रमुखता देते हैं और उसी के लिये अपना श्रम, संयम, मनोयोग लगाये रहते हैं। उत्कर्ष के इच्छुकों को सम्मति से भी अधिक महत्त्व सद्गुणों की विभूतियों को देना चाहिए परिष्कृत व्यक्तित्व ही वह कल्प वृक्ष है जिस तक जा पहुँचने वाला भौतिक और आत्मिक दोनों ही क्षेत्रों की सफलता प्राप्त करता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति जनवरी पृष्ठ 11
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1977/January.11

👉 गायत्री उपासना की सफलता की तीन शर्तें (भाग 4)


🔴 अटूट श्रद्धा और अडिग विश्वास गायत्री माता के प्रति रख -करके और उसकी उपासना के संबंध में अपनी मान्यता और भावना रख करके प्रयत्न किया है और उसका परिणाम पाया हैं। व्यक्तित्व को भी जहाँ तक संभव हु आ है परिष्कृत करने के लिए पूरी कोशिश की है। एक ब्राह्मण को और एक भगवान के भक्त को जैसा जीवन जीना चाहिए, हमने भरसक प्रयत्न किया है कि उसमें किसी तरह से कमी न आने पाए। उसमें पूरी पूरी सावधानी हम बरतते रहे हैं। अपने आप को धोबी के तरीके से धोने में और धुनिये के तरीके से धुनने में हमने आगा पीछा नहीं किया है। यह हमारी उपासना को फलित और चमत्कृत बनाने का एक बहुत बड़ा कारण रहा है। उद्देश्य हमेशा से ऊँचा रहे। उपासना हम किस काम के लिए करते हैं, हमेशा यह ध्यान बना रहा।

🔵 पीड़ित मानवता को ऊँचा उठाने के लिए, देश, धर्म, समाज और संस्कृति को समुन्नत बनाने के लिए हम उपासना करते हैं, अनुष्ठान करते हैं। भगवान की प्रार्थना करते हैं। भगवान ने देखा कि किस नीयत से यह आदमी कर रहा है- भगीरथ की नीयत को देखकर के गंगा जी स्वर्ग से पृथ्वी पर आने के लिए तैयार हो गई थीं और शंकर भगवान उनकी सहायता करने के लिए तैयार हो गए थे। हमारे संबंध में भी ऐसा ही हुआ। ऊँचे उद्देश्यों को सामने रख करके चले तो दैवी शक्तियों की भरपूर सहायता मिली। हमारा अनुरोध यह है कि जो कोई भी आदमी यह चाहते हों कि हमको अपनी उपासना को सार्थक बनाना है तो उन्हें इन तीनों बातों को बराबर ध्यान में रखना चाहिए।

🔴 हम देखते हैं कि अकेला बीज बोना सार्थक नहीं हो सकता। उससे फसल नहीं आ सकती। फसल कमाने के लिए बीज- एक, भूमि- दो और खाद- पानी तीन, इन तीनों चीजों की जरूरत है। निशाना लगाने के लिए बंदूक- एक, कारतूस- दों और निशाना लगा ने वाले का अध्यास तीन ये तीनों होंगी तब बात बने मूर्ति बनाने के एक पत्थर एक, छेनी हथौडा़ दो और मूर्ति बनाने की कलाकारिता तीन। लेखन कार्य के लिए कागज, स्याही और शिक्षा तीनों चीजों की जरूरत है। मोटर चलाने के लिए मोटर की मशीन  तेल और ड्राइवर तीनों चीजों की जरूरत है।

🔵 इसी तरीके से उपासना के 'चमत्कार अगर किन्हीं को देखने हों, उपासना को सार्थकता की परख करनी हो तो इन तीनों था तों को ध्यान में रखना पड़ेगा जो हमने अभी निवेदन क्रिया उच्चस्तरीय दृष्टिकोण, परिष्कृत व्यक्तित्व और अटूट श्रद्धा विश्वास। इन तीनों को मिलाकर के जो कोई भी आदमी उपासना करेगा निश्चयपूर्वक और विश्वासपूर्वक हम कह सकते हैं कि आध्यात्मिकता के तत्वज्ञान का जो कुछ भी माहात्म्य बताया गया है- कि आदमी स्वयं लाभान्वित होता है, सर्मथ बनता है, शक्तिशाली बनता है, शांति पाता है स्वर्ग मुक्ति जैसा लाभ प्राप्त करता है और दूसरों की सेवा सहायता करने में समर्थ होता है सही है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Pravachaan/prachaavachanpart5/gayatri_upasna.2

👉 आत्मचिंतन के क्षण 14 June 2016


🔴  भले ही मनुष्य अपने पापों को किसी भी तरह अनेक तर्क, युक्तियाँ लगाकर टालता रहे, किन्तु अंत में समय आने पर उसे ही पाप का फल भोगना पड़ता है। पाप जिसने किया है, उसी को भोगना पड़ता है, दूसरे को नहीं। यह मनुष्य की भूल है कि वह तरह-तरह की युक्तियों से पाप से बचना चाहते हैं। अतः जो किया, उसका आरोप दूसरे पर न करते हुए स्वयं को भोगने के लिए तैयार रहना चाहिए।

🔵  कर्म चाहे वह आज के हों अथवा पूर्व जीवन के। उनका फल असंदिग्ध है। परिणाम से मनुष्य बच नहीं सकता। दुष्कर्मों का भोग जिस तरह भोगना ही पड़ता है, शुभ कर्मों से उसी तरह श्री-सौभाग्य और लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। यह सुअवसर जिसे उपलब्ध हो वही सच्चा भाग्यशाली है और इसके लिए किसी दैव के भरोसे नहीं बैठना पड़ता।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

🔵  श्रेष्ठ मनुष्यों की मित्रता पत्थर के समान सुदृढ़, मध्यम मनुष्यों की बालू के समान और निकृष्ट मनुष्यों की पानी की लकीर जैसी क्षणिक होती है। इसके विपरीत श्रेष्ठ जनों का बैर पानी की लकीर जैसा, मध्यमों का बालू जैसा और निकृष्ट जनों का बैर पत्थर जैसा होता है।

🌹 -भर्तृहरि

👉 आत्मचिंतन के क्षण 16 Dec 2018

ऐसा कोई नियम नहीं है कि आप सफलता की आशा रखे बिना, अभिलाषा किये बिना, उसके लिए दृढ़ प्रयत्न किये बिना ही सफलता प्राप्त कर सको। प्रत्ये...