शुक्रवार, 31 मई 2019

मंत्र की महिमा Power of Mantra | डॉ चिन्मय पंड्या



Title

👉 आज का सद्चिंतन विद्या का उद्देश्य Vidya Ka Uddesya


👉 प्रेरणादायक प्रसंग अहंकार छोडो

Prernadayak Prasang Ahnkaar Chhodo


👉 सर्वस्व दान Sarvsy Daan

एक पुराना मंदिर था। दरारें पड़ी थीं। खूब जोर से वर्षा हुई और हवा चली। मंदिर का बहुत-सा भाग लडख़ड़ा कर गिर पड़ा। उस दिन एक साधु वर्षा में उस मंदिर में आकर ठहरे थे। भाग्य से वह जहां बैठे थे उधर का कोना बच गया। साधु को चोट नहीं लगी। साधु ने सवेरे पास के बाजार में चंदा जमा करना प्रारंभ किया। उन्होंने सोचा- ‘‘मेरे रहते भगवान का मंदिर गिरा है तो इसे बनवा कर ही तब मुझे कहीं जाना चाहिए।’’

बाजार वालों में श्रद्धा थी। साधु विद्वान थे। उन्होंने घर-घर जाकर चंदा एकत्र किया। मंदिर बन गया। भगवान की मूर्त की बड़े भारी उत्सव के साथ पूजा हुई। भंडारा हुआ। सबने आनंद से भगवान का प्रसाद लिया। भंडारे के दिन शाम को सभा हुई। साधु बाबा दाताओं को धन्यवाद देने के लिए खड़े हुए। उनके हाथ में एक कागज था। उसमें लम्बी सूची थी।

उन्होंने कहा- ‘‘सबसे बड़ा दान एक बुढिय़ा माता ने दिया है। वह स्वयं आकर दे गई थीं।’’ लोगों ने सोचा कि अवश्य किसी बुढिय़ा ने एक-दो लाख रुपए दिए होंगे लेकिन सबको बड़ा आश्चर्य हुआ जब बाबा ने कहा- ‘‘उन्होंने मुझे एक रुपए का सिक्का और थोड़ा-सा आटा दिया है।’’

लोगों ने समझा कि साधु मजाक कर रहे हैं। साधु ने आगे कहा- ‘‘वह लोगों के घर आटा पीस कर अपना काम चलाती हैं। यह एक रुपया वह कई महीने में एकत्र कर पाई थीं। यही उनकी सारी पूंजी थी। मैं सर्वस्व दान करने वाली उन श्रद्धालु माता को प्रणाम करता हूं।’’

लोगों ने मस्तक झुका लिए। सचमुच बुढिय़ा का मन से दिया हुआ यह सर्वस्व दान ही सबसे बड़ा था।

👉 अध्यात्म से मानव-जीवन का चरमोत्कर्ष (भाग 1)

इस संसार में मानव-जीवन से अधिक श्रेष्ठ अन्य कोई उपलब्धि नहीं मानी गई है। एकमात्र मानव-जीवन ही वह अवसर है, जिसमें मनुष्य जो भी चाहे प्राप्त कर सकता है। इसका सदुपयोग मनुष्य को कल्पवृक्ष की भाँति फलीभूत होता है।

जो मनुष्य इस सुरदुर्लभ मानव-जीवन को पाकर उसे सुचारु रूप से संचालित करने की कला नहीं जानता है अथवा उसे जानने में प्रमाद करता है, तो यह उसका एक बड़ा दुर्भाग्य ही कहा जायेगा। मानव-जीवन वह पवित्र क्षेत्र है, जिसमें परमात्मा ने सारी विभूतियाँ बीज रूप में रख दी है, जिनका विकास नर को नारायण बना देता है। किन्तु इन विभूतियों का विकास होता तभी है, जब जीवन का व्यवस्थित रूप से संचालन किया जाय। अन्यथा अव्यवस्थित जीवन, जीवन का ऐसा दुरुपयोग है, जो विभूतियों के स्थान पर दरिद्रता की वृद्धि कर देता है।

जीवन को व्यवस्थित रूप से चलाने की एक वैज्ञानिक पद्धति है। उसे अपनाकर चलने पर ही इसमें वाँछित फलों की उपलब्धि की जा सकती है। अन्यथा इसकी भी वही गति होती है, जो अन्य पशु-प्राणियों की होती है। जीवन को सुचारु रूप से चलाने की वह वैज्ञानिक पद्धति एकमात्र अध्यात्म ही है। जिसे जीवन जीने की कला भी कहा जा सकता है। इस सर्वश्रेष्ठ कला को जाने बिना जो मनुष्य जीवन को अस्त-व्यस्त ढंग से बिताता रहता है। उसे, उनमें से कोई भी ऐश्वर्य उपलब्ध नहीं हो सकता, जो लोक से लेकर परलोक तक फैले पड़े है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष जिनके अंतर्गत आदि से लेकर अन्त तक की सारी सफलतायें सन्निहित है, इसी जीवन कला के आधार पर ही तो मिलते है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1969 पृष्ठ 8


http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1969/January/v1.8

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 5)

अथर्वण विद्या की चमत्कारी क्षमता

ऐसी अनेकों सत्य घटनाएँ हैं, जो ऋषि भूमि भारत की आध्यात्मिक चिकित्सा के पुण्य प्रवाह की साक्षी रही हैं। आधुनिक बुद्धि भले ही इन्हें कल्पित गल्प माने, लेकिन जिन्हें भारतीय इतिहास के सच का ज्ञान है,जो ऋत् के प्रति आस्थावान हैं, वे इन्हें स्वीकारने में संकोच न करेंगे। जिस सत्य घटना का जिक्र यहाँ किया जा रहा है, वह उत्तर वैदिक काल की है। उन दिनों वेदत्रयी की ही मान्यता थी। अथर्वण विद्याएँ अपनी प्रतिष्ठा पाने के लिए प्रयत्नशील थीं। इन्हीं दिनों हस्तिनापुर नरेश महाराज शान्तनु बीमार पड़े। उनका दूसरा विवाह सत्यवती से हो चुका था। और कुरुवंश के गौरव देवव्रत युवराज पद को त्याग कर भीष्म बन चुके थे।

उनकी पितृभक्ति, महात्याग, कर्त्तव्यनिष्ठा एवं निरन्तर सेवा मिलकर भी महाराज शान्तनु को राहत नहीं दे पा रहे थे। उनका स्वास्थ्य निरन्तर गिरता जा रहा था। मन की क्लान्ति एवं अशान्ति बढ़ती जा रही थी। महारानी सत्यवती भी घबराई हुई थीं। क्योंकि प्राणवान औषधियाँ निष्प्राण साबित हो रही थीं। और गुणवान वैद्य गुणहीन प्रमाणित हो रहे थे। किसी को उम्मीद नहीं थी कि महाराज शान्तनु का जीवन बच पाएगा। सत्यवती ने अन्तिम प्रयास के रूप में महर्षि व्यास का स्मरण किया। पितृभक्त भीष्म उन्हें आदरपूर्वक ले आए।
व्यास ने स्थिति की सम्पूर्ण जानकारी ली और माता सत्यवती से कहा- माँ! यह कार्य कम से कम मेरे लिए तो असाध्य है। हाँ परम तपस्वी महर्षि दध्यङ्ग अथर्वण चाहे तो वे कुछ कर सकते हैं। व्यास की बातें सुनकर भीष्म उन्हें लेने के लिए उनके पास पहुँचे। पहले तो उन्होंने चलने से मना किया, पर बाद में महर्षि व्यास के अनुरोध पर तैयार हो गए। राजमहलों, राजपुरुषों एवं राजनीति से पर्याप्त दूरी बनाकर रखने वाले महर्षि अथर्वण का हस्तिनापुर आना किसी चमत्कार से कम न था। आते ही उन्होंने महाराज शान्तनु को देखा और जोर से ठहाका मार कर हँसे। उनकी हँसी देर तक बिना रूके चलती रही। सभी उपस्थित जन चकित थे।

तभी उन्होंने थोड़े से आक्रोशित लहजे में कहा- महाराज, दिखने में तो आप की देह रोगी है, पर दरअसल आप प्रारब्ध के कुयोग एवं अपनी मनोग्रन्थियों से पीड़ित हैं। समग्र उपचार के लिए आपको चिन्तन शैली एवं जीवन क्रम बदलना होगा। शान्तनु के आश्वासन देने पर उन्होंने अपनी चिकित्सा प्रारम्भ की। इसमें औषधियों के कल्प थे तो मंत्रों के प्रयोग भी। कई तरह के ऐसे अनुष्ठान थे जिनके प्रभाव से शान्तनु की देह एवं मन की स्थिति बदलने लगी। अथर्वण विद्या के प्रभाव को सभी देख रहे थे। इस घटना के साक्षी बने महर्षि व्यास ने उनसे कहा ऋषिवर! आध्यात्मिक चिकित्सा की आपकी विधियाँ चमत्कारी हैं। यह पुण्य प्रक्रिया चलती रहे, इसके लिए अथर्ववेद का प्रणयन आवश्यक है। अथर्वण के आशीर्वाद से अथर्ववेद रचा गया। और सभी ने आध्यात्मिक चिकित्सक के रूप में वेदज्ञानी गुरु का महत्त्व पहचाना।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 9

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 22)

WELCOME THE SUFFERINGS
Distress is an unwelcome phenomenon. Its immediate experience is bitterness. Nevertheless, ultimately it is meant for the well-being and happiness of man. Distress is an extraordinarily effective mechanism provided by God for rectification of evil traits and augmentation of positive values. Life is a blissful and self-enlightened spark of the Supreme-Being. He/She has self-created this world which is intrinsically blissful. The brief interludes of unhappiness in life are provided to give the needed momentum to the progressive evolution of the soul, by reminding the being about the true purpose of life, which is awakening to its original nature as a Spark of the Divine. Events producing unhappiness in life are few and their impact is self-evident. Nevertheless, we must remember that whatever little suffering we come across, is the result of our own forgetfulness of our Divine Source. Being a spark of the Blissful Supreme Being, the soul is intrinsically blissful. Nor is there any natural unhappiness in the basic structure of the cosmos, which is orderly and harmonious.

Do not be afraid of the misfortunes, which create unhappiness. Do not loose your mental equilibrium. Face misfortunes boldly. Instead of getting worried or uneasy, be prepared to sail through them. Embrace misfortune as though it were an ill-mannered but warm-hearted friend, who uses foul language, makes unpleasant criticism. Nevertheless, when it (misfortune) goes, it leaves behind the gift of a large treasure of wisdom and insight. Like a brave soldier, face misfortune defiantly and say, “O oncoming misfortunes! you are like my children. I am your creator. Therefore, I welcome you with open arms. You are my legitimate offspring. Therefore, I won’t disown you. You are free to play in the courtyard of my life. I am not a coward. I won’t shed tears in desperation on meeting you. I am not morally so bankrupt as to avoid paying for my own misdeeds. Being a creation of That Supreme Being, I am a Spark of That Absolute Truth, Absolute Benefaction and Absolute Virtue. Come ugly products of my ignorant karmas. Come! I have courage to accommodate you in my life. I don’t need help from anyone. You have arrived to test how courageous I am? I am
prepared to face you.”

Friends! Don’t commit blasphemy. Don’t ever say this world is bad, wicked, unvirtuous and full of unhappiness. In this world, created by God, each elements masterpiece. Nothing is bad in the wholistic view of creation. If you blame the creation, you are also casting aspersions on its Creator. Saying that the pot is badlymade means commenting on the proficiency of the potter. How dare you underrate the qualification of your Omnipotent Father/Mother? When you say that this world is full of misery you are casting aspersions on the integrity of God. In this celestial creation, there is not an iota of unhappiness. Our ignorance itself is the cause of our bad karmas and consequent miseries. Come! Let us cleanse and purify our inner selves of our evil thoughts and wickedness so that we are totally and finally released from our miseries and acquire ultimate deliverance.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 37

👉 ऋषि जैमिनि सात दिन कक्ष में बन्द रहे:-

प्रख्यात आर्ष दार्शनिक जैमिनि जिन्होंने ''मीमांसा"  की रचना की, के साथ एक घटना ऐसी जुडी़ है जो विचारों की शक्ति भी बताती है व इस ग्रन्थ रचना की पृष्ठभूमि थी। जब वे मीमांसा दर्शन के सूत्रों को क्रमबद्ध कर रहे थे, अपनी धर्मपत्नी को उन्होंने कह दिया ''जब तक वे न कहें  कक्ष का द्वार न खोला जाय। चाहे रात्रि का आगमन हो जाय एवं अगले दिन का अरुणोदय, कोई उनके कार्य में व्यवधान न डाले।'' बिना आहार लिए वे उसी कक्ष में ७ दिन तक बन्द रहे। बाहर निकले तो चेहरे पर अभूतपूर्व तेज था एवं सफलता कीं मुस्कान थी। वे महत्त्वपूर्ण सूत्रों को क्रमबद्ध करके ग्रन्थ की रचना पूरी कर चुके थे। ''मीमांसा दर्शन'' नामक यह ग्रन्थ अध्यात्म के मूल सिद्धांतों का आधार बना।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग 1

गुरुवार, 30 मई 2019

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 4)

अथर्वण विद्या की चमत्कारी क्षमता

हालांकि वर्ष १९८८ में यह दिव्य ग्रन्थ एक परिजन के हाथों ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के शोधकर्मियों को प्राप्त हुआ था। तब इसको आधार बनाकर ‘वेदों में मानव जीवन का स्वरूप एवं उसकी आध्यात्मिक चिकित्सा के रहस्य’ के शीर्षक से एक शोध कार्य भी कराया गया था। पर इन दिनों शोध कार्य भी संस्थान में नहीं है। परन्तु जो कार्य कराया गया था, उसके आधार पर बड़ी ही प्रामाणित रीति से कहा जा सकता है कि वेद मानव जीवन की आध्यात्मिक चिकित्सा के आदि स्रोत हैं। इनमें केवल देह की पीड़ा को दूर करने की विधियाँ भर नहीं है। बल्कि मानसिक रोगों की निवृत्ति, दरिद्रता निवारण, ब्रह्मवर्चस व स्मरण शक्ति के वर्धन, घर- परिवार की सुख- शान्ति एवं सामाजिक यश, सम्मान में अभिवृद्धि के अनेकों प्रयोग शामिल हैं।

एक लघु आलेख में इन सभी के प्रयोग के विस्तार की व्याख्या तो सम्भव नहीं है। परन्तु एक सामान्य प्रयोग की चर्चा तो की ही जा सकती है। यह चर्चा ऋग्वेद के दशम् मण्डल के १५५ वें सूक्त के बारे में है। यदि कोई व्यक्ति धनलक्ष्मी से विहीन होकर जीवन यापन कर रहा हो, तो वह इस सूक्त के समस्त पाँचों मंत्रों का नित्य प्रातःकाल स्नान करने के पश्चात् १०१ बार जप करे। इस जप से पहले एवं बाद में गायत्री महामंत्र की एक- एक माला का जप आवश्यक है। वेद में प्रयोग अनेकों एवं विधियाँ असंख्य हैं। महाकाव्य एवं पुराणकाल में इन विधियों एवं प्रयोगों का उल्लेख महाकाव्यों एवं पुराणों में हुआ। वाल्मीकि रामायण एवं महाभारत में जीवन की अनगिनत समस्याओं के समाधान हेतु विभिन्न प्रयोगों की सांकेतिक या विस्तार से चर्चा की गयी है।

आध्यात्मिक चिकित्सा के ये प्रसंग ऐतरेय ब्राह्मण, तैत्तिरीयब्राह्मण, शतपथ ब्राह्मण, ताण्ड्य ब्राह्मण तथा षडङ्क्षवश ब्राह्मण में भी पर्याप्त मिलते हैं। देवीभागवत पुराण, अग्रिपुराण, नारदादिपुराणों में तो इनकी भरमार है। इस सन्दर्भ में सूत्र ग्रन्थ भी पीछे नहीं हैं। यहाँ भी आध्यात्मिक चिकित्सा से सम्बन्धित अनेकों प्रयोग विधियाँ मिलती हैं। कल्प सूत्र, श्रोतसूत्र, गृह्यसूत्र, धर्मसूत्र एवं शुल्बसूत्र में इस विषय पर इतनी प्रचुर सामग्री है, जिसके आधार पर एक शोधग्रन्थ तैयार किया जा सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 8

👉 उपासना को समग्र रूप में अपनायें- समुचित लाभ उठायें (अन्तिम भाग)

सामान्यतया हर प्रज्ञा परिजन को युग सन्धि की बेला में अपनी उपासना को नैष्ठिक, नियमित एवं समग्र बना लेना चाहिए। तीन माला का जप, गुरुवार को जिस स्तर का बन पड़े उपवास, ब्रह्मचर्य, महीने में एक बार अग्निहोत्र का न्यूनतम साधना क्रम तो चलाना ही चाहिए। इसके अतिरिक्त अपने भावना क्षेत्र को उत्कृष्टताओं के समुच्चय परमात्मा के साथ तादात्म्य स्थापित करने का निरन्तर प्रयत्न करना चाहिए। भावना, विचारणा और क्रिया- प्रक्रिया में जितनी अधिक उत्कृष्टता आदर्शवादिता का समावेश सम्भव हो सके, उसके लिए उपाय खोजने और प्रयत्न करने में सतत संलग्न रहना चाहिए। भजन कृत्य और तादात्म्य की उभय पक्षीय प्रक्रिया उपासना को समग्र बनाती है और अपना प्रत्यक्ष प्रतिफल हाथों हाथ प्रस्तुत करती है।

युग सन्धि के अगले दिन सृजन और विनाश की सम्भावनाओं से भरे पड़े हैं। ऐसी परिस्थितियों में उपासना विधान की अपनी महत्ता है। नैष्ठिक साधना एवं प्रज्ञा पुरश्चरण इसी निमित्त आरम्भ किए गए प्रारम्भिक उपचार हैं। लेकिन यहीं तक सीमित होकर किसी को नहीं रहना है। जो भी उपासना के माध्यम से आत्मशक्ति अभिवर्द्धन की बात सोचते हैं, उन्हें अपने निजी जीवन का कायाकल्प तो करना ही है। अपने परिकर क्षेत्र को भी उसी रंग में रंगना है। इससे व्यक्तित्व में और निखार आएगा, वह पुण्य लाभ तो मिलेगा ही, जो महाकाल की योजना में भागीदार बनने से किसी को भी मिल सकता है।

इस कार्य के लिए यदि कल्प साधना में सम्मिलित होकर प्रारम्भिक स्थिति जान ली जाय एवं उसमें जो परिशोधन संभावित हो उसे मार्गदर्शकों द्वारा जानकर प्रायश्चित विधान द्वारा अपने अन्तः को परिष्कृत कर लिया जाय तो यह और भी अच्छा है। साधना से ही वह स्थिति बनती है कि मनुष्य परमात्म सत्ता के साथ तादात्म्य स्थापित कर लेता है। बिना साधना के, तप- तितिक्षा के उपासना सम्भव नहीं। साधना कड़ा संयम, आहार की तितिक्षा अपनाकर ही सम्भव है। जो इस प्रारम्भिक सोपान को पूरा कर लेता है। उसके लिए साधना मार्ग में आगे और फिर कोई अवरोध आड़े नहीं आता। साधना उपासना के बाद आराधना पुण्य परमार्थ की बात आती है। ईश्वरीय गुणों से सम्पन्न साधक बिना परमार्थ के रह नहीं सकता। लोक कल्याण, आराधना, परमार्थ परायणता ये सभी उपासना के उत्तरार्द्ध माने जा सकते हैं। जिसने स्वयं को अनुशासन के शिकंजे में कस लिया, दैवी प्रयोजन में सहभागी बनने योग्य स्वयं को बना लिया वह ईश्वर की कृपा का पात्र बन जाता है। ऐसे व्यक्ति ही व्यक्तित्व सम्पन्न बनते, लोक सम्मान व दैवी अनुग्रह पाते हैं।

उपासना अपने समग्र रूप में ही सही कही जा सकती है। साधना, तप, आराधना उसके आवश्यक अंग माने जा सकते हैं। आत्मिक प्रगति का यह अवलम्बन मनुष्य को परमात्म सत्ता के साथ जोड़ देता है, समकक्ष बना देता है। यह कथन सत्य है। परन्तु शर्त मात्र यही है कि उसे सही रूप में अपनाया गया हो, चिन्ह पूजा की लकीर भर न पीटी गयी हो।

..... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 28 मई 2019

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 3)

अथर्वण विद्या की चमत्कारी क्षमता

आध्यात्मिक चिकित्सा की पुण्य परम्परा वैदिक ऋचाओं की गूंज के साथ ही प्रारम्भ हो गयी। अपने जीवन के ऊषाकाल से ही मनुष्य को विकृति एवं विरोधों से अनेकों संघर्ष करने पड़े। इन संघर्षों में कभी तो उसकी देह क्षत- विक्षत हुई तो कभी अन्तर्मन विदीर्ण हुआ। भावनाओं के तार- तार होने के भी अनगिनत अवसर आए। विपन्नता और धनहीनता के दुःख भी उसने झेले, शत्रुओं द्वारा दी जाने वाली विषम पीड़ाएँ भी उसने सहीं। छटपटाहट भरी इन पीड़ाओं के बीच उसने समाधान की खोज में कठिन साधनाएँ की। महातप की ज्वालाओं में उसने अपने जीवन को झोंका। प्रश्र एक ही था- जीवन की विकृतियों के निदान एवं उसके चिकित्सकीय समाधान।

आत्मचेतना के केन्द्र में- परमात्म चेतना के सान्निध्य में उसे समाधान के स्वर सुनाई दिए। महातप की इस निरन्तरता ने उसके सामान्य व्यक्तित्व का ऋषिकल्प कर दिया। और उसने कहा-
तं प्रत्नास ऋषयो दीध्यानाः पुरो विप्राः दधिरे मन्द्रजिह्वम्।
-- ऋग्वेद ४/५०/१

इस ऋषि अनुभूति से यह स्पष्ट ध्वनि निकलती है कि प्राचीन ऋषिगण परब्रह्म का ध्यान कर उन्हें अपने सामने प्रकट कर लेते थे। और मन्द्रजिह्व परमात्मा द्वारा उन्हें वेदमंत्रों का उपदेश प्राप्त होता था। इन वेदमन्त्रों के शब्दार्थ कीथ एवं ब्लूमफील्ड जैसे पश्चिमी विद्वान कुछ भी खोजते रहे; पर अपने रहस्यार्थ में ये जीवन की आध्यात्मिक चिकित्सा के मंत्र हैं। आध्यात्मिक चिकित्सा के इस दिव्य काव्य के विषय में अथर्ववेद के ऋषि ने कहा-
पश्य देवस्य काव्यं न ममार न जीर्यति।
परमात्मा के काव्य (वेद) को देखो, वह न नष्ट होता है और न मरता है।

सचमुच ही इस अमृत काव्य में जीवन की सम्पूर्ण एवं सर्वविधि आध्यात्मिक चिकित्सा के अनेकों सूक्त, सूत्र एवं आयाम समाहित हैं। अपने महातप से असंख्य पीड़ित जनों की आध्यात्मिक चिकित्सा करने वाले ब्रह्मऋषि गुरुदेव ने वर्षों पूर्व इस सत्य को अपनी लेखनी से प्रकट किया था। उन्होंने ऋग्, यजुष, साम व अथर्व वेद के कतिपय विशिष्ट मंत्रों की आध्यात्मिक चिकित्सा के सन्दर्भ में महत्ता तथा इनकी प्रयोग विधि को उद्घाटित किया था। ‘वैदिक मंत्र विद्या के रूप में यह आश्चर्यजनक एवं चमत्कारी रूप से उपादेय थी, पर आज अनुपलब्ध है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 7

सोमवार, 27 मई 2019

👉 दोष तो अपने ही ढूँढ़ें Dosh Darshan

दोष दृष्टि रखने से हमें हर वस्तु दोषयुक्त दीख पड़ती है। उससे डर लगता है, घृणा होती है। जिससे घृणा होती है, उसके प्रति मन सदा शंकाशील रहता है, साथ ही अनुदारता के भाव भी पैदा होते हैं। ऐसी स्थिति में उस व्यक्ति या वस्तु से न तो प्रेम रह सकता है और न उसके गुणों के प्रति आकर्षण उत्पन्न होना ही सम्भव रहता है।

दोष दृष्टि रखने वाले व्यक्ति को धीरे-धीरे हर वस्तु बुरी, हानिकारक और त्रासदायक दीखने लगती है। उसकी दुनियाँ में सभी विराने, सभी शत्रु और सभी दुष्ट होते है। ऐसे व्यक्ति को कहीं शान्ति नहीं मिलती।

दूसरों की बुराइयों को ढूँढ़ने में, चर्चा करने में जिन्हें प्रसन्नता होती है वे वही लोग होते हैं जिन्हें अपने दोषों का पता नहीं है। अपनी ओर दृष्टिपात किया जाय तो हम स्वयं उनसे अधिक बुरे सिद्ध होंगे, जिनकी बुराइयों की चर्चा करते हुये हमें प्रसन्नता होती है। दूसरों के दोषों को जिस पैनी दृष्टि से देखा जाता है। यदि अपने दोषों का उसी बारीकी से पता लगाया जाय तो लज्जा से अपना सिर झुके बिना न रहेगा और किसी दूसरे का छिद्रान्वेषण करने की हिम्मत न पड़ेगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1961 मई Page 19

रविवार, 26 मई 2019

👉 Do Mitra दो मित्र

दो मित्र एक आम के बगीचे में पहुँचे। पेड़ पके हुए मीठे फलों से लदे हुए थे। दोनों का मन फलों को देखकर खाने के लिए ललचाने लगा। बाग का माली उधर से निकला। उसने आगन्तुकों की इच्छा को जाना और कहा-मालिक की आज्ञा है कि कोई यात्री एक दिन यहाँ ठहर सकता है, जितना खा सके आम खा सकता है पर साथ नहीं ले जा सकता। सो आप लोग चाहे तो दिन भर इच्छानुसार आम खायें पर संध्या होते-होते चले जावें। साथ में एक भी आम न ले जा सकेंगे।

मित्रों को बड़ी प्रसन्नता हुई। वे अपनी रुचि के आम खाने को चल दिये। पेड़ सभी अच्छे थे आम सभी मीठे थे सो एक मित्र जिस पेड़ पर चढ़ा उसी पर बैठा-बैठा खाने लगा। शाम तक खूब पेट भरा और तृप्त होकर नीचे आ गया।

दूसरे ने सोचा, इस सुन्दर बगीचे की जाँच पड़ताल कर ले। खट्टे, मीठे और जाति किस्म का पता लगाते अन्त में खाना आरम्भ करेंगे। वह इसी खोज बीन में लगा रहा और शाम हो गई। माली ने दोनों आगन्तुकों को बाहर किया और बाग का फाटक बन्द कर दिया। एक का पेट भर चुका था दूसरे का खाली। एक प्रसन्न था दूसरा असन्तुष्ट।

फाटक के बाहर बैठे हुए एक दरवेश ने कहा-दोस्तों यह संसार आम के बगीचे की तरह है। थोड़ी देर यहाँ रहने का मौका मिलता है और समय बीतते ही विदाई की घड़ी आ पहुँचती है। बुद्धिमान वह है जो सत्कर्मों द्वारा तृप्ति दायक सत्परिणामों का लाभ से सका, मूर्ख वह है जो मोह ममता प्रपंच में इधर-उधर मारा फिरे। लगता है कि तुम में से भी एक ने मूर्खता और एक ने बुद्धिमत्ता बरती है।

📖 अखण्ड ज्योति मई 1964

👉 उपासना को समग्र रूप में अपनायें- समुचित लाभ उठायें (भाग 4)

प्रज्ञा परिजनों को मूर्धन्य भूमिका निभाने के लिए आत्मशक्ति की प्राण ऊर्जा का बड़ी मात्रा में संचय करना होगा। यह परमात्मा से ही उसे मिलेगी। अस्तु उसे उपासना के लिए सच्चे मन से साहस जुटाना और प्रयास करना चाहिए। जीवन चर्या में उसे निष्ठापूर्वक सुनिश्चित एवं मूर्धन्य स्थान देना चाहिए। कर्मकाण्ड के लिए जितना भी समय निकाला जाय, उसे नियमित और निश्चित होना चाहिए। व्यायाम, औषधि सेवन, अध्ययन आदि के लिए समय भी निर्धारित किए जाते हैं और उसकी मात्रा का सीमा बन्धन भी रखा जाता है। यदि इन प्रसंगों में मन की मौज बरती जाय, समय और मात्रा ही उपेक्षा करके जैसा मन वैसा करने की स्वेच्छाचारिता अपनाई जाय तो पहलवान, विद्वान बनने और निरोग होने की इच्छा पूरी हो ही नहीं सकेगी। हर महत्त्वपूर्ण कार्य में नियमितता को प्रमुखता दी जाती है। जो किया जाता है उसमें समूचे मनोयोग का नियोजन किया जाता है, उपासना के सन्दर्भ में भी वही किया जाना चाहिए। अस्त- व्यस्तता बनी रहेगी तो अभीष्ट उद्देश्य की प्राप्ति अति कठिन हो जाएगी।

युग सन्धि की अवधि में सभी प्रज्ञा परिजनों को न्यूनतम तीन माला गायत्री जप प्रातःकाल नित्य कर्म से निवृत्त होकर करने के लिए कहा गया है। जप के साथ प्रभात कालीन सूर्य का दर्शन और उस सविता देवता की स्वर्णिम किरणों का स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों में प्रवेश कराने का ध्यान भी करते चलना चाहिए। शरीर, स्थान और उपकरणों की स्वच्छता के अतिरिक्त, मन, बुद्धि, चित्त की स्वच्छता के लिए आचमन, प्राणायाम और न्यास कृत्य करने का विधान है। सामान्य प्राणायाम तो रेचक, कुम्भक, पूरक द्वारा ही सम्पन्न हो जाता है, पर उसमें विशेषता लानी हो तो उसे प्राणाकर्षण स्तर का विकसित कर लेना चाहिए।

इन पंक्तियों में उसे संक्षिप्त ही लिखा जा रहा है क्योंकि अधिकांश परिजन उसे पहले से ही जानते हैं। जो नहीं जानते उनके लिए थोड़ी सी पंक्तियों के निर्देशन से काम नहीं चलेगा। उन्हें किसी समीपवर्ती निष्णात से, गायत्री महाविज्ञान से जानना होगा या शान्तिकुञ्ज पत्र व्यवहार करके अपनी वर्तमान स्थिति के अनुरूप साधना क्रम का निर्धारण करना होगा। स्पष्ट है कि साधक के स्तर और प्रवाह को ध्यान में रखते हुए साधना क्रम भी चिकित्सा उपचार की तरह आवश्यकतानुसार समय- समय पर बदलने होते हैं। शान्तिकुञ्ज को गायत्री तीर्थ के रूप में इन्हीं दिनों इसी प्रयोजन के लिए विकसित किया गया है। ताकि हर साधक की स्थिति एवं आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए उसके लिए विशेष निर्धारण किए जा सकें और जो बताया गया है उसका प्रारम्भिक अभ्यास प्रत्यक्ष मार्गदर्शन में ही सही कर लेना सम्भव हो सके।

.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा (भाग 2)

बोध, निदान एवं विज्ञान का पूर्ण तंत्र है। इसमें जीवन की दृश्य- अदृश्य संरचना का सम्पूर्ण बोध है। इसी के साथ यहाँ जीवन के दैहिक- दैविक एवं आध्यात्मिक रोगों के निदान की सूक्ष्म विधियों का समग्र ज्ञान है। इतना ही नहीं इसमें इन सभी रोगों के सार्थक समाधान का प्रायोगिक विज्ञान भी समाविष्ट है, जो मानव जीवन की सम्पूर्ण चिकित्सा के ऋषि संकल्प को दुहराता है।

यह वही महासंकल्प है, जो ऋग्वेद के दशम मण्डल के रोग निवारण सूक्त के पंचम मंत्र के ऋषि विश्वामित्र की अन्तर्चेतना में गूँजा था। नवयुग की नवीन सृष्टि करने वाले ब्रह्मऋषि विश्वामित्र उन क्षणों में चिन्तन में निमग्र थे। तभी उन्हें एक करूण, आर्त स्वर सुनाई दिया। यह विकल स्वर एक दुःखी नारी का था, जिसे उनका शिष्य जाबालि लिए आ रहा था। इस युवती नारी को रोगों ने असमय वृद्ध बना दिया था।

पास आते ही ब्रह्मज्ञानी महर्षि ने उसकी व्यथा के सारे सूत्र जान लिए। और जाबालि को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा- वत्स! चिकित्सा की सारी प्रचलित विधियाँ एवं औषधियाँ इस पर नाकाम हो गयी हैं, यही कहना चाहते हो न। हां आचार्यवर...। वह अभी आगे कुछ कह पाता तभी ऋषि बोले- वत्स! अभी एक चिकित्सा विधि बाकी है- और वह है आध्यात्मिक चिकित्सा। तुम्हारे सम्मुख मैं आज इसका प्रयोग करूँगा।

शिष्य जाबालि अपने आचार्य की अनन्त आध्यात्मिक शक्तियों से परिचित थे, सो वे शान्त रहे। फिर भी उनमें जिज्ञासा तो थी ही। जिसका समाधान करते हुए अन्तर्यामी ब्रह्मऋषि बोले- पुत्र जाबालि, सफल चिकित्सा के लिए जीवन का समग्र बोध आवश्यक है। और जीवन मात्र देह नहीं है। इसमें इन्द्रिय, प्राण, मन, चित्त, बुद्धि, अहं एवं अन्तरात्मा की अन्य अदृश्य कड़ियाँ भी हैं। रोग के सही निदान के लिए इनका पारदर्शी ज्ञान होना चाहिए। तभी समाधान का विज्ञान कारगर होता है। यह कहते हुए महर्षि ने उस पीड़ित नारी को सामने बिठाकर उसे अपने महातप के एक अंश का अनुदान देने का संकल्प करते हुए कहा-
आ त्वागमं शंतातिभिरथो अरिष्टातातिभिः।
दक्षं त उग्रमाभारिषं परा यक्ष्मं सुवामि ते॥

अर्थात्- ‘आपके पास शान्ति फैलाने वाले तथा अविनाशी साधनों के साथ आया हूँ। तेरे लिए प्रचण्ड बल भर देता हूँ। तेरे रोग को दूर भगा देता हूँ।’ महर्षि  के इस संकल्प ने उस पीड़ित नारी को स्वास्थ्य का वरदान देने के साथ आध्यात्मिक चिकित्सा की पुण्य परम्परा का प्रारम्भ भी किया

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 5

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 21)

KRIYAMAN KARMAS (Physical Karmas):

Physical actions fall in the category of Kriyaman Karmas. These produce co current results. Consumption of drugs is followed by intoxication. Death follows consumption of poison. Human body is made up of five natural basic elements. Interaction between these natural elements produces immediate reaction. As soon as we touch fire, fingers are burnt. Laws of nature govern interactions between natural elements. Defiance of these laws invites almost constant punishment by nature.

When the physical body is compelled to live on foods and habits incompatible with its physiology, there is an immediate disturbance in the natural balance of the body, which results in disease, and weakening of the harmonious working of the biological system. This is nature’s mechanism for rectification. (Vegetarianism is meant for human species, since contrary to the physiology of the carnivora, man has been provided with smaller canine teeth and larger intestine as compared to carnivora.

The smaller intestines of the carnivora do not let accumulation of residual toxins of animal fat in the body. Besides, the flesh-eating animals are provided with long tongues. The vegetarians use their lips for consuming liquids). Physical Karmas are mechanically carried out by the body without any emotional involvement unlike Sanchit and Prarabdha Karmas, they produce fruits in a short time.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 35

👉 आज का सद्चिंतन Apna Nirmaan Aap


👉 प्रेरणादायक प्रसंग Pavitr Aur Apavitra



शुक्रवार, 24 मई 2019

👉 उपासना को समग्र रूप में अपनायें- समुचित लाभ उठायें (भाग 3)

तादात्म्य अर्थात् भक्त और इष्ट की अंतःस्थिति का समन्वय एकीकरण। दूसरे शब्दों में ईश्वरीय अनुशासन के अनुरूप जीवनचर्या का निर्धारण। परब्रह्म तो अचिन्त्य है पर उपासना जिस परमात्मा की की जाती है वह आत्मा का ही परिष्कृत रूप है। वेदान्त दर्शन से सोऽहम्, शिवोऽहम्, तत्त्वमसि, अयमात्मा, ब्रह्म आदि शब्दों में अन्तःचेतना के उच्चस्तरीय विशिष्टताओं से भरे- पूरे उत्कृष्टताओं के समुच्चय को ही परमात्मा कहा गया है, उसके साथ ही मिलन का, तादात्म्य का स्वरूप तभी बनता है जब दोनों के मध्य एकता एकात्मता स्थापित हो। इसके लिए साधक अपने आपको कठपुतली की स्थिति में रखता है और अपने अवयवों में बंधे धागों को बाजीगर के हाथों सौंप देता है। दर्शकों को मन्त्र मुग्ध कर देने वाला खेल इस स्थापना के बिना बनता ही नहीं। आत्मा को परमात्मा की उच्चस्तरीय प्रेरणाएँ अपनाने और तदनुरूप जीवनचर्या बनाने पर ही उपासना का समग्र लाभ मिलता है।

लकड़ी और अग्नि की समीपता का प्रतिफल प्रत्यक्ष है। गीली लकड़ी आग के समीप पहुँचते- पहुँचते अपनी नमी गँवाती और उस ऊर्जा से अनुप्राणित होती चली जाती है। जब वह अति निकट पहुँचती है तो फिर आग और लकड़ी एक स्वरूप जैसे हो जाते हैं। साधक को भी ऐसा ही भाव समर्पण करके ईश्वरीय अनुशासन के साथ अपने आपको एक रूप बनाना पड़ता है। चन्दन के समीप वाली झाड़ियों का सुगन्धित हो जाना, स्वाति बूँद के संयोग से सीप में मोती पैदा होना, पारस छूकर लोहे का स्वर्ण बनना, नाले का गंगा में मिलकर गंगाजल बनना, पानी का दूध में मिलकर उसी भाव बिकना, बूँद का समुद्र में मिलकर सुविस्तृत हो जाना जैसे अगणित उदाहरण हैं, जिनके आधार पर यह जाना जा सकता है कि भक्त और भगवान की एकता उपासना का स्तर क्या होना चाहिए। सृष्टि के आदि से अद्यावधि सच्चे भक्तों में से प्रत्येक को ईश्वर के शरणागत होना पड़ा है। आत्म समर्पण का साहस जुटाना पड़ा है।

इसका व्यावहारिक स्वरूप है ईश्वरीय अनुशासन को, उत्कृष्ट चिन्तन एवं आदर्श कर्तृत्व को अपनी विचारणा एवं कार्यपद्धति से अनुप्राणित करना। जो इस तत्व दर्शन को जानते, मानते और व्यवहार में उतारते रहे हैं उन सच्चे ईश्वर भक्तों को सुनिश्चित रूप से वे लाभ मिले हैं, जिन्हें उपासना की फल श्रुतियों के रूप में कहा जाता रहा है। पत्नी- पति को आत्म समर्पण करती है। अर्थात उसकी मर्जी पर चलने के लिए अपनी मनोभूमि एवं क्रिया पद्धति को मोड़ती चली जाती है। इस आत्म समर्पण के बदले वह पति के वंश, गोत्र, यश, वैभव की उत्तराधिकारिणी ही नहीं अर्धांगिनी भी बन जाती है। समर्पण विहीन कर्मकाण्ड तो एक प्रकार का वेश्या व्यवसाय या चिन्ह पूजा जैसा निर्जीव ढकोसला ही माना जाएगा। भक्त भगवान के अनुरूप चलता चला जाता है और अन्ततः नर नारायण, पुरुष- पुरुषोत्तम, भक्त भगवान की एक रूपता का स्वयं प्रमाण बनता है। देवात्माओं में परमात्मा स्तर की क्षमतायें ही उत्पन्न हो जाती हैं। इन्हें ही ऋद्धि- सिद्धियाँ कहते हैं।

.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन Jeevan Kaise Jiye


👉 प्रेरणादायक प्रसंग Bhagwaan Kaise MIlte Hai



👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 1)

लेखक की ओर से

जीवन रोगों के भार और मार से बुरी तरह टूट गया है। जब तन के साथ मन भी रोगी हो गया हो, तो इन दोनों के योगफल के रूप में जीवन का यह बुरा हाल भला क्यों न होगा? ऐसा नहीं है कि चिकित्सा की कोशिशें नहीं हो रही। चिकित्सा तंत्र का विस्तार भी बहुत है और चिकित्सकों की भीड़ भी भारी है। पर समझ सही नहीं है। जो तन को समझते हैं, वे मन के दर्द को दरकिनार करते हैं। और जो मन की बात सुनते हैं, उन्हें तन की पीड़ा समझ नहीं आती। चिकित्सकों के इसी द्वन्द्व के कारण तन और मन को जोड़ने वाली प्राणों की डोर कमजोर पड़ गयी है।

पीड़ा बढ़ती जा रही है, पर कारगर दवा नहीं जुट रही। जो दवा ढूँढी जाती है, वही नया दर्द बढ़ा देती है। प्रचलित चिकित्सा पद्धतियों में से प्रायः हर एक का यही हाल है। यही वजह है कि चिकित्सा की वैकल्पिक विधियों की ओर सभी का ध्यान गया है। लेकिन एक बात जिसे चिकित्सा विशेषज्ञों को समझना चाहिए, उसे नहीं समझा गया। समझदारों की यही नासमझी सारी आफतों- मुसीबतों की जड़ है। यह नासमझी की बात सिर्फ इतनी है कि जब तक जिन्दगी को सही तरह से नहीं समझा जाता, तब तक उसकी सम्पूर्ण चिकित्सा भी नहीं की जा सकती।

जीवन- तन और मन के जोड़ से कुछ अधिक है। इसमें अन्तर्भावना, अन्तर्चेतना एवं अन्तरात्मा जैसे अदृश्य आयाम भी हैं। शारीरिक अंगों की गठजोड़ को बायलॉजी पर आधारित मेडिकल साइन्स से समझा जा सकता है। मन की चेतना- अचेतन परतें साइकोलॉजी द्वारा पढ़ ली जाती है। पर अतिचेतन की इबारत कौन पढ़े? प्रारब्ध और संस्कारों का लेखा- जोखा कौर सम्हाले? ये गहरी बातें तो अध्यात्म विद्या से ही जानी- समझी जाती है। आध्यात्मिक दृष्टि से ही जीवन की यथार्थता और सम्पूर्णता पता चलती है। इस सम्पूर्णता के बलबूते की सम्पूर्ण चिकित्सा का विधान सम्भव है।

यही वजह है कि अध्यात्म विद्या, आध्यात्मिक दृष्टि एवं आध्यात्मिक चिकित्सा की जरूरत को आज सभी अनुभव कर रहे हैं। इस पुस्तक के लेखक के रूप में मैंने इन आध्यात्मिक सत्यों को जिया है, अनुभव किया है। युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव के सान्निध्य, साहचर्य एवं सेवा में जीवन के जो पल बीते है, वे अनिवर्चनीय अनुभूतियों एवं  उपलब्धियों से भरे रहे हैं। गुरुदेव अध्यात्म विद्या एवं अध्यात्म चिकित्सा के परम विशेषज्ञ थे। उनकी इस विशेषता के क्षितिज में आध्यात्मिक चिकित्सा की नित नयी आभा को बिखेरते- विकीर्ण होते हुए मैंने अपनी इन्हीं आँखों से देखा है।

कई अवसरों पर उन्होंने स्वयं मुझे अपने पास बैठाकर आध्यात्मिक चिकित्सा की सच्चाई को बताया और समझाया। उनके श्रीमुख से जो सूत्र उनके श्री चरणों में बैठकर जैसे सीखा, उसी को बताने की चेष्टा इस पुस्तक की पंक्तियों में की गयी है। इस पुस्तक में जो कहा गया है, वह न तो कई ग्रन्थों के अध्ययन का सार है और न शब्दों का ऐन्द्रजालिक गठजोड़। इसमें तो बस अपनी अनुभूतियों एवं उपलब्धियों को उदारता पूर्वक अपनों में बाँटने की चेष्टा की गई है। इस सच्चाई को पढ़ने वाले पुस्तक की प्रत्येक पंक्ति, शब्द में अनुभव करेंगे। पढ़ने वालों की इन अनुभूतियों में उनके स्वस्थ जीवन की उपलब्धि भी जुड़े, यही गुरुसत्ता से प्रार्थना है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 1,2

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 20)

GOD IS NOT VINDICTIVE
Misfortune occurs in life in a particular order and according to a well-defined process of divine justice, but people reconcile to their inevitability by believing in socalled “Wrath of God”, “God’s Will” or “Natural woeful state of this world”. As a matter of fact, God neither creates any good fortune nor misfortune for anybody, nor He/She (God is not gender-specific as a biological being) desires
to put anyone in distress. Nor is this world wholly full of woes. A spider gets confined and entangled in its own self-woven web. Similarly, man himself makes his mind vicious, undisciplined, corrupt and sinful and when the evil mind works to create a distressing situation, he weeps, wails and blames others- including God. Here it should be clearly understood that the fruits of Prarabdha are always received as abrupt unprecedented events. (e.g., unexpected death due to disease or accident, collapsing of a house, winning a jackpot, injury due to accident, accidental loss of limbs or cessation of vital functions of body.)

God does not involve other beings directly in enforcing divine justice for a couple of reasons. One: The person enforcing divine punishment on behalf of God would create resentment against his own self- thus beginning a chain of counter reaction between himself and the person being punished. It would increase turbulence of mind. Two: The enforcer would have to be unnecessarily involved in the complex process of cause-effect by committing undesired karmas and reaping their fruits.

Here, we may once again recapitulate the characteristics of Sanchit Karmas and Prarabdha Karmas. Whereas Sanchit Karmas bear fruits only on coming across a suitable environment or otherwise get destroyed in a counter environment, the Prarabdha Karmas invariably bear fruit, though it may take a period of several life cycles. The current activities being knowingly carried out are Prarabdha Karmas, whereas the unexpected, sudden happenings are the fruits of past Prarabdha Karmas. Any failure in life due to indolence is definitely not due to Prarabdha Karmas of the past. Unlike the Prarabdha Karmas, the physical Kriyaman Karmas (discussed hereafter) bear definite fruits within a short time.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 34

👉 अर्जुन को मात्र आँख दिखी:-

लक्ष्य के प्रति तन्मयता सच्चे साधक की विशेषता है। यह विचार एकीकरण का ही परिणाम है। द्रोणाचार्य ने प्रश्न किया- ''दुर्योधन ! सामने क्या दिखाई दे रहा है ?'' ''आकाश, वृक्ष, पत्तियाँ और चिडि़या जिस पर निशाना लगाना है। ''द्रोणाचार्य ने कहा-  ''तुम्हारा निशाना सही न लगेगा, बैठ जाओ। '' एक-एक करके सारे शिष्य असफल होते गये। अब अर्जुन का नम्बर आया। आचार्य ने वही प्रश्न दुहराया। अर्जुन ने कहा- '' गुरुदेव। मुझे पक्षी की आँख के अतिरिक्त और कुछ दिखाई नहीं देता।'' '' बाण चलाओ, आचार्य ने आदेश दिया। तीर सही ठिकाने पर जा लगा। द्रोणाचार्य ने शिष्यों को बताया, जिसे लक्ष्य के अतिरिक्त कुछ दिखाई न दे उसी की साधना सफल होती है।

प्रतिभाएँ परमात्मा की देन होती है- ऐसा माना जाता है। इसी कारण हजारों में एक वैज्ञानिक, दार्शनिक अथवा विषय विशेष का निष्णात प्रकाण्ड पण्डित बन जाता है। वस्तुत: परमपिता की यह कृपा बरसती सब पर एक साथ है, लाभ वे ही उठाते हैं जो अपने विचारों को रचनात्मक चिंतन एवं कर्तृत्व में नियोजित कर लेते हैं। महर्षि पतंजलि ने विचारों की एकाग्रता का महत्व समझा, उसे जीवन में उतारा एवं योगदर्शन के रूप में एक महान ग्रंथ मानवता को दे सके।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग 1

बुधवार, 22 मई 2019

Bhagwaan Ki Sena Me Bharti Hone Ka Samay | Dr Chinmay Pandya



Title

👉 आज का सद्चिंतन विचारों की शक्ति Vicharon Ki Shakti


👉 प्रेरणादायक प्रसंग Pariksha परीक्षा

👉  प्रेरणादायक प्रसंग Pariksha परीक्षा 22 May 2019


👉 अपेक्षा ही दुःख का कारण!

किसी दिन एक मटका और गुलदस्ता साथ में खरीदा हों और घर में लाते ही 50 रूपये का मटका अगर फूट जाएं तो हमें इस बात का दुःख होता हैं। क्योंकि मटका इतनी जल्दी फूट जायेगा ऐसी हमें कल्पना भी नहीं थीं। परंतु गुलदस्ते के फूल जो 100 रूपये के हैं, वो शाम तक मुरझा जाएं, तो भी हम दुःखी नहीं होते। क्योंकि ऐसा होने वाला ही हैं, यह हमें पता ही था।

मटके की इतनी जल्दी फूटने की हमें अपेक्षा ही नहीं थीं, तो फूटने पर दुःख का कारण बना। परंतु​ फूलों से अपेक्षा थीं, इसलिए​ वे दुःख का कारण नहीं बनें। इसका मतलब साफ़ हैं कि जिसके लिए जितनी अपेक्षा ज़्यादा, उसकी तरफ़ से उतना दुःख ज़्यादा और जिसके लिए जितनी अपेक्षा कम, उसके लिए उतना ही दुःख भी कम।।

"ख़ुश रहें .. स्वस्थ रहें .. मस्त रहें .."
                        
स्वयं विचार करें

👉 Upasana Ko Apnayen उपासना को अपनायें (भाग 2)

उपासना को समग्र रूप में अपनायें- समुचित लाभ उठायें

उपासना के दो पक्ष है एक कर्मकाण्ड दूसरा तादात्म्य। दोनों शरीर एवं प्राण की तरह अन्योन्याश्रित एवं परस्पर पूरक हैं। एक के बिना दूसरे को चमत्कार प्रदर्शित करने का अवसर ही नहीं मिलता। बिजली के दोनों तार जब मिलते हैं तभी करेण्ट चलता है। अलग- अलग रहें तो कुछ बात बनेगी ही नहीं। दोनों पहिए धुरी से जुड़े हो और समान रूप से गतिशील हो तभी गाड़ी आगे लुढ़कती है। लम्बी यात्राएँ दोनों पैरों के सहारे ही संभव होती हैं, भले ही एक के कट जाने पर उसकी पूर्ति लकड़ी के पैर से ही क्यों न की जा रही हो। दोनों हाथ से ताली बजाने की उक्ति से सभी परिचित हैं। सन्तानोत्पादन में नर और नारी दोनों का संयोग चाहिए।

ठीक इसी प्रकार उपासना का शास्त्र प्रतिपादित और आप्तजनों द्वारा अनुमोदित माहात्म्य तभी चरितार्थ होता है, जब उसका कर्मकाण्ड वाला प्रत्यक्ष और तादात्म्य वाला परोक्ष पक्ष समान रूप से संयुक्त सक्रिय होते हैं। जप, ध्यान, प्राणायाम के उपासनात्मक कर्मकाण्डों का स्वरूप सभी को विदित है। जिन्हें उस जानकारी में कुछ कमी हो वे अपनी स्थिति के अनुरूप किसी अनुभवी मार्गदर्शक से परामर्श अथवा प्रामाणिक ग्रन्थ का अवलोकन करके उसका समाधान निर्धारण कर सकते हैं, बड़ी और महत्त्वपूर्ण बात तादात्म्य है। उसे जीवन सत्ता में प्राण का स्थान मिला है। कर्मकाण्ड तो काय- कलेवर की तरह उपकरण ही कहे जाते हैं, प्रहार तो तलवार ही करती है। वस्तुतः युद्ध मोर्चे को जिताने में वह लौहखण्ड उतना चमत्कार नहीं दिखाता, जितना कि प्रत्यक्ष न दीखने वाला पराक्रम और साहस। ठीक उसी प्रकार उपासना कर्मकाण्ड पक्ष का तलवार जैसा प्रतिफल देखना हो, तो उसके पीछे तादात्म्य का भाव समर्पण नियोजित किए बिना काम चलेगा ही नहीं।

उपासना कर्मकाण्डों में विधि- विधान का स्वरूप प्रज्ञा परिजनों में से सभी जानते हैं। स्थान, पूजा उपकरण, शरीर, वस्त्र आदि की शुद्धि के अतिरिक्त मन बुद्धि और अन्तःकरण की शुद्धि तथा इन्द्रियों, अवयवों को पवित्र रहने की प्रेरणा देने के लिए आचमन, न्यास आदि किए जाते हैं। पवित्रता के प्रतीक जल और प्रखरता के प्रतिनिधि दीपक या अन्य किसी विकल्प का अग्नि स्थापन किया जाता है। समझा जाना चाहिए कि आत्मिक प्रगति के लिए सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य आदि सज्जनता परक सद्गुणों की जितनी आवश्यकता है ठीक उतनी ही संयम, साहस, पराक्रम एवं संघर्ष के रूप में अपनाई जाने वाली तपश्चर्या का महत्त्व भी है। पवित्रता और प्रखरता का समन्वय ही पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचाता है। मात्र संत सज्जन बने रहने और पौरुष को त्यागकर बैठने पर तो कायरों और दीन दुर्बलों जैसी दयनीय स्थिति बन जाती है। मध्यकाल की भक्तचर्या ऐसे ही अधूरेपन से ग्रसित रहने के कारण उपहासास्पद बनती चली गई है। कर्मकाण्डों के विधि- विधान तादात्म्य की चेतना उत्पन्न करने एवं प्रेरणा देने के लिए विनिर्मित हुए हैं।

.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Moments of self-expression 22 May 2019

आत्मचिंतन के क्षण 22 May 2019

■ ‘लक्ष्मी उद्योगी पुरुष-सिंहों को प्राप्त होती है’- यह केवल सूक्ति नहीं, बल्कि एक सिद्धान्त है। ऐसा सिद्धान्त जो युग-युग के बाद स्थिर किया गया है। उन्नति, प्रगति, सफलता और सम्पन्नता का एकमात्र आधार उद्योग अथवा पुरुषार्थ ही है। जब तक मनुष्य पुरुषार्थ नहीं करेगा, परिश्रम में अपना पसीना नहीं बहायेगा, तब तक किसी प्रकार के श्रेय का अधिकारी नहीं बन सकता। लक्ष्मी श्रम और उद्योग की ही अनुगामिनी होती है।

◇ हर मनुष्य में एक जन्मजात महापुरुष छिपा होता है, लेकिन वह आसुरी तत्त्वों के कारागार में बंद होता है। मनुष्य का कर्त्तव्य है कि वह उसे देवतत्त्वों की सहायता से मुक्त कर उठाये और महान् कृत्यों द्वारा महानता की ओर बढ़े।

★ भोगेच्छा को प्रेम कहना एक बहुत बड़ी प्रवंचना है। प्रेम तो आत्मा में ही हो सकता है और भोग शरीर का किया जाता है। इसलिए जिनके प्रेम के पीछे भोग की लालसा छिपी है, उनकी दृष्टि शरीर तक ही है। आत्मा का भाग नहीं हो सकता। वह स्वतंत्र है, वह किसी बंधन में नहीं आती।

□ आदर्शों एवं सिद्धान्तों पर अड़े रहने, किसी भी प्रलोभन और कष्ट के दबाव में कुमार्ग पर पग न बढ़ाने, अपने आत्म-गौरव के अनुरूप सोचने और करने, दूरवर्ती भविष्य के निर्माण के लिए आज की असुविधाओं को धैर्य और प्रसन्न चित्त से सह सकने की दृढ़ता का नाम आत्मबल है।

◇ सतयुग और कुछ नहीं, मानवीय आस्थाओं में, मान्यताओं में, गतिविधियों में आदर्शवादिता और उत्कृष्टता के समुचित समावेश की प्रतिक्रिया मात्र है। समाज का निर्माण उच्च आदर्शों पर आधारित होगा और व्यक्ति अपनी मानवीय उत्कृष्टता का गौरव अनुभव करते हुए तदनुरूप आचरण करेगा तो इस संसार में सुख-शान्ति की अजस्र धारा बहती ही रहेगी। अभाव, कष्ट, क्लेश, संघर्ष, द्वेष, दुर्भाव और शोक-संताप का तब कोई कारण ही शेष न रहेगा।

👉 How to Stay Happy? (Last Part)

When we identify our core strengths and put in 100% effort, success is guaranteed in any field of work. However, it should be remembered that the path to success is not a bed of roses. There will be many challenges that will come our way. Whoever has reached the pinnacle of success has gone through excruciating circumstances. That is why, whatever task we take up, must be done with complete dedication. Majority of us put in half-hearted efforts to do something and fall into depths of disappointment when we fail. In order to ensure that happiness stays for long, we must express our sincere gratitude to all those who have helped us in one way or the other.

It is said that we can receive only two things from any incident or a person in our life - happiness or learning. It is good to learn a lesson because it gives us a chance to start afresh. It is extremely important that we don’t harbor any anger. It is best to resolve it with the concerned person. We should express clearly and always be ready to receive criticism and feedback. If we have any issues against someone, approach him/her in a proper manner and resolve them amicably. Try not to let negativity and complaints breed for long.

According to Robert Waldinger, director of the Harvard Study of Adult Development, ‘‘The clearest message that we get from this 75-year study is this: Good relationships keep us happier and healthier.... It’s not just the number of friends you have, and it’s not whether or not you’re in a committed relationship. It’s the quality of your close relationships that matters.’’

Yugrishi Pandit Shriram Sharma Acharya says – ‘Expanding the horizons of love and affection is the only way for never-ending happiness. You cannot be happy by hoarding; you can multiply your happiness only by giving and sharing.’

***END***
📖 From Akhand Jyoti

👉 Happiness प्रसन्नता 😊😊😊

यदि आप जीवन में प्रसन्नता चाहते है तो

जिस के भी संपर्क में आए, उसकी मन ही मन कुछ न कुछ भलाई अवश्य करें।

दयालुता का भाव रखें
भद्र व्यवहार करें
दूसरों की बात समझने की कोशिश करें
दूसरों के प्रति सहायता का भाव रखें
दूसरों को ठेस न पहुंचाए
दूसरों के दोष न उघाड़ना
दूसरों की कमजोरी में उनके प्रति उदार भाव रखे

ऐसे और छोटे छोटे विचार उन्हें मन से देते रहने से आप की खुशी बढ़ती जाएगी।

अगर भगवान को सामने देखते हुए उपरोक्त विचार करें तो आप की खुशी अनेकों गुणा  बढ़ जाएगी।...

मंगलवार, 21 मई 2019

अहंकार नाश ही करता है Ahankar Nash Hi Karta Hai | डॉ चिन्मय पंड्या



Title

👉 Bhagwaan Ki Kripa भगवान् की कृपा.....

किसी स्थान पर संतों की एक सभा चल रही थी, किसी ने एक घड़े में गंगाजल भरकर वहां रखवा दिया ताकि संतजन को जब प्यास लगे तो गंगाजल पी सकें।

संतों की उस सभा के बाहर एक व्यक्ति खड़ा था, उसने गंगाजल से भरे घड़े को देखा तो उसे तरह-तरह के विचार आने लगे। वह सोचने लगा:- "अहा, यह घड़ा कितना भाग्यशाली है, एक तो इसमें किसी तालाब पोखर का नहीं बल्कि गंगाजल भरा गया और दूसरे यह अब सन्तों के काम आयेगा। संतों का स्पर्श मिलेगा, उनकी सेवा का अवसर मिलेगा, ऐसी किस्मत किसी-किसी की ही होती है।

घड़े ने उसके मन के भाव पढ़ लिए और घड़ा बोल पड़ा:- बंधु मैं तो मिट्टी के रूप में शून्य पड़ा था, किसी काम का नहीं था, कभी नहीं लगता था कि भगवान् ने हमारे साथ न्याय किया है। फिर एक दिन एक कुम्हार आया, उसने फावड़ा मार-मारकर हमको खोदा और गधे पर लादकर अपने घर ले गया।

वहां ले जाकर हमको उसने रौंदा, फिर पानी डालकर गूंथा, चाक पर चढ़ाकर तेजी से घुमाया, फिर गला काटा, फिर थापी मार-मारकर बराबर किया। बात यहीं नहीं रूकी, उसके बाद आंवे के अंदर आग में झोंक दिया जलने को। इतने कष्ट सहकर बाहर निकला तो गधे पर लादकर उसने मुझे बाजार में भेज दिया, वहां भी लोग ठोक-ठोककर देख रहे थे कि ठीक है कि नहीं?

ठोकने-पीटने के बाद मेरी कीमत लगायी भी तो क्या- बस 20 से 30 रुपये, मैं तो पल-पल यही सोचता रहा कि:- "हे ईश्वर सारे अन्याय मेरे ही साथ करना था, रोज एक नया कष्ट एक नई पीड़ा देते हो, मेरे साथ बस अन्याय ही अन्याय होना लिखा है।" भगवान ने कृपा करने की भी योजना बनाई है यह बात थोड़े ही मालूम पड़ती थी।

किसी सज्जन ने मुझे खरीद लिया और जब मुझमें गंगाजल भरकर सन्तों की सभा में भेज दिया तब मुझे आभास हुआ कि कुम्हार का वह फावड़ा चलाना भी भगवान् की कृपा थी। उसका वह गूंथना भी भगवान् की कृपा थी, आग में जलाना भी भगवान् की कृपा थी और बाजार में लोगों के द्वारा ठोके जाना भी भगवान् की कृपा ही थी।

अब मालूम पड़ा कि सब भगवान् की कृपा ही कृपा थी।

परिस्थितियां हमें तोड़ देती हैं, विचलित कर देती हैं- इतनी विचलित की भगवान के अस्तित्व पर भी प्रश्न उठाने लगते हैं। क्यों हम सबमें इतनी शक्ति नहीं होती ईश्वर की लीला समझने की, भविष्य में क्या होने वाला है उसे देखने की? इसी नादानी में हम ईश्वर द्वारा कृपा करने से पूर्व की जा रही तैयारी को समझ नहीं पाते। बस कोसना शुरू कर देते हैं कि सारे पूजा-पाठ, सारे जतन कर रहे हैं फिर भी ईश्वर हैं कि प्रसन्न होने और अपनी कृपा बरसाने का नाम ही नहीं ले रहे। पर हृदय से और शांत मन से सोचने का प्रयास कीजिए, क्या सचमुच ऐसा है या फिर हम ईश्वर के विधान को समझ ही नहीं पा रहे?

आप अपनी गाड़ी किसी ऐसे व्यक्ति को चलाने को नहीं देते जिसे अच्छे से ड्राइविंग न आती हो तो फिर ईश्वर अपनी कृपा उस व्यक्ति को कैसे सौंप सकते हैं जो अभी मन से पूरा पक्का न हुआ हो। कोई साधारण प्रसाद थोड़े ही है ये, मन से संतत्व का भाव लाना होगा।

ईश्वर द्वारा ली जा रही परीक्षा की घड़ी में भी हम सत्य और न्याय के पथ से विचलित नहीं होते तो ईश्वर की अनुकंपा होती जरूर है, किसी के साथ देर तो किसी के साथ सवेर। यह सब पूर्वजन्मों के कर्मों से भी तय होता है कि ईश्वर की कृपादृष्टि में समय कितना लगना है।

घड़े की तरह परीक्षा की अवधि में जो सत्यपथ पर टिका रहता है वह अपना जीवन सफल कर लेता है।

👉 Bhagwaan Ko Pane Ke Sutra भगवान को पाने के सूत्र

भगवान को पाने के तीन सूत्र है वो है हमारा भगवान के प्रती समर्पण, विशर्जन और विलय
रामकृष्ण परमहंस के अनुसार इन तीनो साधनाओ को करने के लिए नीचे लिखे पाच भावो में से कोई भी एक अपना कर हम भगवन को पा सकते है इनके द्वारा भक्त, अपने भगवान के प्रती, अपनी प्रीती जाता सकता –

१. दास भाव -
रामकृष्ण परमहंस ने अपनी इस साधना के दौरान जो भाव हनुमान का अपने प्रभु राम से था इसी भाव से उन्होंने साधना की और साधना के अंत में उन्हें प्रभु श्रीराम और माता सीता के दर्शन हुए और वे उनके शरीर में समा गए।

२. दोस्त भाव -
इस साधना में स्वयं को सुदामा मान कर और भगवान को अपना मित्र मानकर की जाती है।

३. वात्सल्य भाव -
1864 में रामकृष्ण एक वैष्णव गुरु जटाधारी के सनिद्य में वात्सल्य भाव की साधना की, इस अवधि के दौरान उन्होंने एक मां के भाव से रामलला के एक धातु छवि (एक बच्चे के रूप में राम) की पूजा की. रामकृष्ण के अनुसार, वह धातु छवि में रहने वाले भगवान के रूप में राम की उपस्थिति महसूस करते थे।

४. माधुर्य भाव -
बाद में रामकृष्ण ने माधुर्य भाव की साधना की. उन्होंने अपने भाव को कृष्ण के प्रति गोपियों और राधा का रखा. इस साधना के दौरान, रामकृष्ण कई दिनों महिलाओं की पोशाक में रह कर स्वयं को वृंदावन की गोपियों में से एक के रूप में माना. रामकृष्ण के अनुसार, इस साधना के अंत में, वह साथ सविकल्प समाधि प्राप्त की।

५ . संत का भाव (शांत स्वाभाव) -
अन्त में उन्होने संत भाव की साधना की. इस साधना में उन्होंने खुद को एक बालक के रूप में मानकर माँ काली की पूजा की और उन्हें माँ काली की दर्शन हुए।

👉 आज का सद्चिंतन दृष्टिकोण बदलो (Drushtikon Badlo)


👉 प्रेरणादायक प्रसंग गुरुनानक जी का सन्देश ( Guru Nanak Vani)


👉 Upasana Ko Apnayen उपासना को अपनायें (भाग 1)

उपासना को समग्र रूप में अपनायें- समुचित लाभ उठायें

आत्मोत्कर्ष के लिए उस महाशक्ति के साथ घनिष्ठता बनाने की आवश्यकता है जिसमें अनन्त शक्तियों और विभूतियों के भण्डार भरे पड़े हैं। बिजली घर के साथ घर के बल्ब, पंखों का सम्बन्ध जोड़ने वाले तारों का फिटिंग सही होते ही वे ठीक तरह अपना काम कर पाते हैं। परमात्मा के साथ आत्मा का सम्बन्ध जितना निकटवर्ती एवं सुचारु होगा, उसी अनुपात से पारस्परिक आदान- प्रदान का सिलसिला चलेगा और उससे छोटे पक्ष को विशेष लाभ होगा। दो तालाबों के बीच में नाली खोदकर उनका सम्बन्ध बना दिया जाय तो निचले तालाब में ऊँचे तालाब का पानी दौड़ने लगेगा। और देखते- देखते दोनों की ऊपरी सतह समान हो जाएगी, पेड़ से लिपटकर बेल कितनी ऊँची चढ़ जाती है इसे सभी जानते हैं। यदि उसे वैसा सुयोग न मिला होता अथवा वैसा साहस न किया होता तो वह अपनी पतली कमर के कारण मात्र जमीन पर फैल भले ही जाती, पर ऊपर चढ़ नहीं सकती थी।

पोले बाँस का निरर्थक समझा जाने वाला टुकड़ा जब वादक के हाथों के साथ तादात्म्य स्थापित करता है तो बाँसुरी वादन का ऐसा आनन्द आता है जिसे सुनकर सांप लहराने और हिरन मन्त्र मुग्ध होने लगते हैं। पतले कागज के टुकड़े से बनी पतंग आकाश को चूमती है, जब उसकी डोर का सिरा किसी उड़ाने वाले के हाथ में रहता है। यह सम्बन्ध शिथिल पड़ने या टूटने पर सारा खेल खतम हो जाता है और पतंग जमीन पर आ गिरती है। यह उदाहरण यह बताते है कि यदि आत्मा को परमात्मा के साथ सघनतापूर्वक जुड़ जाने का अवसर मिल सके, तो उसकी स्थिति सामान्य नहीं रहती। तब उसे नर पामरों जैसा जीवन व्यतीत नहीं करना पड़ता। वरन् ऐसे मानव देखते- देखते कहीं से कहीं जा पहुँचते हैं। इतिहास पुराण ऐसे देव मानवों की चर्चा से भरे पड़े हैं जिनने अपने अन्तराल को निकृष्टता से विरत करके ईश्वरीय महानता के साथ जोड़ा और देखते- देखते कुछ से कुछ बन गए।

उपासना को आध्यात्मिक प्रगति का आवश्यक एवं अनिवार्य अंग माना गया है। उसके बिना वह सम्बन्ध जुड़ता ही नहीं है, जिसके कारण छोटे- छोटे उपकरण बिजली घरों के साथ तार जोड़ लेने पर अपनी महत्त्वपूर्ण हलचलें दिखा सकने में समर्थ होते हैं। घर में हीटर, कूलर, रेफ्रिजरेटर, रेडियो, टेलीविजन, टेलीफोन आदि कितने ही सुविधाजनक उपकरण क्यों न लगे हो, पर उनका महत्त्व तभी है जब उनके तार बिजलीघर के साथ जुड़कर शक्ति भण्डार से अपने लिए उपयुक्त क्षमता प्राप्त करते रहने का सुयोग बिठा लेते हो। उपासना का तत्त्वज्ञान यही है। उसका शब्दार्थ है- उप+आसन, अर्थात् अति निकट बैठना। परमात्मा और आत्मा को निकटतम लाने के लिए ही उपासना की जाती है। विशिष्ट शक्ति के आदान- प्रदान का सिलसिला इसी प्रकार चलता है।

.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 19)

IS PREDICTION OF FUTURE EVENTS POSSIBLE?

At times, yogis having paranormal powers make accurate predictions about the future events. It should not create the misconception that life is strictly bound by rigid predestination. The future course of life undoubtedly depends on past karmas. By virtue of paranormal powers the futurologists and seers are able to foresee the ultimate outcome of the Prarabdha Karmas. In this world, too, we can often predict the probable future on the basis of a comprehensive data. On learning details of legal proceedings an experienced juror may foretell the judgement to be delivered. It does not mean that there is no relevance of prosecutors, defendants, evidence, lawyers and cross-examinations. Foretelling of events also does not mean that certain events can be correlated to some particular past Prarabdha Karmas. In fact, fate and selfeffort (Taqdeer and Tadbeer) are two faces of the same
coin. Self-efforts (karmas) are given the name of destiny when they beer fruit.

We may compare the current karma with any raw fruit, which is going to ripen in future as destiny. The fate of today is the karmas of the past. If karma stands for an infant calf, Prarabdha is the state acquired by it late in life as an aged cow. The word Prarabdha is frequently misunderstood as predestiny though Prarabdha Karmas and Prarabdha (fate) are two names given to the same phenomena- with a time lag in between.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 33

👉 How to Stay Happy? (Part 2)

It is not true that everything is going perfectly well in the life of a happy person. Everybody has to go through his/her share of difficult and challenging situations in life. All of us desire to have a better life, but we should not waste away whatever good things we already have in pursuit for something better. Instead we should utilize what we have to obtain what we desire further.

One might find happiness in the pages of an old book kept in one’s shelf or in something simple that a person cooked, while that recipe may not even be found in the menu of a 5-star restaurant. There could be times when a person might feel happy after keeping a vessel of water for birds to drink on a hot summer day, while he might not be satisfied with Rs. 500/- offering at a temple. In this way, one will realize that happiness is related to the emotions which make the mind happy and contented. Emotions which are disturbing, annoying and unpleasant can never give happiness.

In fact, most of our worries are centered on what others will think or say to what we do. If we want to lead a happy life, psychologists recommend that we stay connected to a goal instead of people and things. Another suggestion is that one should do what one’s conscience propels him to pursue instead of worrying about what others will say or think. It will be his great loss if he does not pursue his dream frightened of what others will think about it. Any worthy step that a person executes in a planned manner not only gives him/her happiness but also contentment. Positive thinking and diligent efforts are the keys to happiness.

To be continued...
📖 From Akhand Jyoti

👉 Krodh Ko Jito क्रोध को जीतो आत्मचिंतन के क्षण

■ क्रोध को क्रोध से जीतने का प्रयास करना बड़ा भारी बिगाड़ पैदा करना है। छोटे-छोटे उलाहने, शब्दों की मार, नुक्ताचीनी, ताने मारना, व्यंग्य करना, प्रतिशोध या घृणावश बुरे नहीं जान पड़ते, पर मन, मस्तिष्क और आत्मा पर इनका विषवत् दुष्प्रभाव पड़ता है। ये दोष शरीर को कमजोर बनाते हैं, मस्तिष्क को खोखला और आत्मा को अपवित्र करते हैं।

◇ मनुष्य यदि सामान्य रूप से सुखी रहना चाहता है तो उसे अपनी परिस्थिति से परे की महत्त्वाकाँक्षाओं का त्याग करना होगा। उसे अपनी सीमा में रहकर आगे के लिए प्रयास करना होगा। उन्हें प्रकृति के इस नियम में आस्था रखनी ही होगी कि मनुष्य का विकास क्रमपूर्वक होता है, सहसा ही कोई कामनाओं के बल पर ऊँचा नहीं उठ जाता। जीवन में सुख-शान्ति के लिए आवश्यक है कि अपनी सीमाओं के अनुरूप ही कामना की जाये, उसी में रहकर धीरे-धीरे विकास की ओर बढ़ा जाये।

★ संसार परमात्मा की लीला भूमि और मनुष्य की कर्मभूमि है। यहाँ  पग-पग पर प्रतियोगिता में-परीक्षा में अपने को डालकर पात्रता प्रमाणित करनी होती है। उसमें विजय प्राप्त करने पर  ही पुरस्कार मिलता है। परीक्षा तथा प्रतियोगिता उत्तीर्ण किए बिना न तो आज तक किसी को सफलता तथा श्रेय मिला है और न आगे ही मिलेगा। जिसे श्रेय एवं सफलता की आकाँक्षा है, वह अपने को प्रतियोगी मानकर इस कर्मभूमि में अपनी कर्मठता तथा कर्त्तव्यशीलता का प्रमाण दे और तब देखे कि उसे मनोवांछित फल मिलता है या नहीं।

□ संसार में बुराइयाँ इसलिए बढ़ रही हैं कि बुरे आदमी अपने बुरे आचरणों द्वारा दूसरों को ठोस शिक्षण देते हैं। उन्हें देखकर यह अनुमान लगा लिया जाता है कि इस कार्य पर इनकी गहरी निष्ठा है, जबकि सद्विचारों के प्रचारक वैसे उदाहरण अपने जीवन में प्रस्तुत नहीं कर पाते। वे कहते तो बहुत कुछ हैं, पर ऐसा कुछ नहीं कर पाते जिससे उनकी निष्ठा की सच्चाई प्रतीत हो।

सोमवार, 20 मई 2019

👉 जीवन साधना के त्रिविध पंचशील (भाग 6)

समाज निर्माणः-

(१) हममें से हर व्यक्ति अपने को समाज का एक अविच्छिन्न अंग मानें। अपने को उसके साथ अविभाज्य घटक मानें। सामूहिक उत्थान और पतन पर विश्वास करें। एक नाव में बैठे लोग जिस तरह एक साथ डूबते या पार होते हैं, वैसी ही मान्यता अपनी रहे। स्वार्थ और परमार्थ को परस्पर गुँथ दें। परमार्थ को स्वार्थ समझें और स्वार्थ सिद्धि की बात कभी ध्यान में आये तो वह संकीर्ण नहीं उदात्त एवं व्यापक हो। मिल जुलकर काम करने और मिल बाँटकर खाने की आदत डाली जाय।

(२)मनुष्यों के बीच सज्जनता, सद्भावना एवं उदार सहयोग की परम्परा चले। दान विपत्ति एवं पिछड़ेपन से ग्रस्त लोगों को पैरों पर खड़े होने तक के लिए दिया जाय। इसके अतिरिक्कत उसका सतत प्रवाह सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन के लिए ही नियोजित हो। साधारणतया मुफ्त में खाना और खिलाना अनैतिक समझा जाय। इसमें पारिवारिक या सामाजिक प्रीति भोजों का जहाँ औचित्य हो, वहाँ अपवाद रूप से छूट रहे। भिक्षा व्यवसाय पनपने न दिया जाय। दहेज, मृतक भोज, सदावर्त धर्मशाला आदि ऐसे दान जो मात्र प्रसन्न करने भर के लिये दिये जाते हैं और उस उदारता के लाभ समर्थ लोग उठाते हैं, अनुपयुक्त माने और रोके जायें। साथ ही हर क्षेत्र का पिछड़ापन दूर करने के लिए उदार श्रमदान और धनदान को अधिकाधिक प्रोत्साहित किया जाय।

(३) किसी मान्यता या प्रचलन को शाश्वत या सत्य न माना जाय, उन्हें परिस्थितियों के कारण बना समझा जाय। उनमें जितना औचित्य, न्याय और विवेक जुड़ा हो उतना ग्राह्य और जो अनुपयुक्त होते हुए भी परम्परा के नाम पर गले बंधा हो, उसे उतार फेंका जाय। समय- समय पर इस क्षेत्र का पर्यवेक्षण होते रहना चाहिये और जो असामयिक, अनुपयोगी हो उसे बदल देना चाहिये। इस दृष्टि से लिंग भेद, जाति भेद के नाम पर चलने वाली विषमता सर्वथा अग्राह्य समझी जाय।

.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन वाणी का संयम (Vani Ka Sanyam)


👉 प्रेरणादायक प्रसंग सेवा भाव ( Seva Bhav)


👉 Achchha Insaan अच्छा इंसान....

एक 6 वर्ष का लडका अपनी 4 वर्ष की छोटी बहन के साथ बाजार से जा रहा था। अचानक से उसे लगा कि, उसकी बहन पीछे रह गयी है। वह रुका, पीछे मुड़कर देखा तो जाना कि, उसकी बहन एक खिलौने के दुकान के सामने खडी कोई चीज निहार रही है।

लडका पीछे आता है और बहन से पूछता है, "कुछ चाहिये तुम्हें?" लडकी एक गुड़िया की तरफ उंगली उठाकर दिखाती है। बच्चा उसका हाथ पकडता है, एक जिम्मेदार बडे भाई की तरह अपनी बहन को वह गुड़िया देता है। बहन बहुत खुश हो गयी।

दुकानदार यह सब देख रहा था, बच्चे का प्रगल्भ व्यवहार देखकर आश्चर्यचकित भी हुआ। अब वह बच्चा बहन के साथ काउंटर पर आया और दुकानदार से पूछा, "सर, कितनी कीमत है इस गुड़िया की ?"

दुकानदार एक शांत और गहरा व्यक्ति था, उसने जीवन के कई उतार देखे थे, उन्होने बड़े प्यार और अपनत्व से बच्चे से पूछा, "बताओ बेटे, आप क्या दे सकते हो ?" बच्चा अपनी जेब से वो सारी सीपें बाहर निकालकर दुकानदार को देता है जो उसने थोड़ी देर पहले बहन के साथ समुंदर किनारे से चुन चुन कर बीनी थी!

दुकानदार वो सब लेकर यूँ गिनता है जैसे कोई पैसे गिन रहा हो।सीपें गिनकर वो बच्चे की तरफ देखने लगा तो बच्चा बोला,"सर कुछ कम हैं क्या?" दुकानदार : "नहीं - नहीं, ये तो इस गुड़िया की कीमत से भी ज्यादा है, ज्यादा मैं वापस देता हूँ" यह कहकर उसने 4 सीपें रख ली और बाकी की बच्चे को वापिस दे दी। बच्चा बड़ी खुशी से वो सीपें जेब मे रखकर बहन को साथ लेकर चला गया।

यह सब उस दुकान का कामगार देख रहा था, उसने आश्चर्य से मालिक से पूछा, "मालिक ! इतनी महंगी गुड़िया आपने केवल 4 सीपों के बदले मे दे दी?" दुकानदार एक स्मित संतुष्टि वाला हास्य करते हुये बोला, "हमारे लिये ये केवल सीप है पर उस 6 साल के बच्चे के लिये अतिशय मूल्यवान है और अब इस उम्र में वो नहीं जानता, कि पैसे क्या होते हैं?

पर जब वह बडा होगा ना.. और जब उसे याद आयेगा कि उसने सीपों के बदले बहन को गुड़िया खरीदकर दी थी। तब उसे मेरी याद जरुर आयेगी, और फिर वह सोचेगा कि, "यह विश्व अच्छे मनुष्यों से भी भरा हुआ है।"

यही बात उसके अंदर सकारात्मक दृष्टिकोण बढानेे में मदद करेगी और वो भी एक अच्छा इंन्सान बनने के लिये प्रेरित होगा।

👉 आत्मचिंतन के क्षण Moments of self-expression

■ मान, बड़ाई, प्रतिष्ठा तथा कार्यों में अभिमान प्राप्त करने की इच्छा खाज की भाँति बड़ा सुहावना रोग है। इसके वश में हो जाने पर मनुष्य सत्कर्मों तक को अभिमान की अग्नि से भस्म कर देता है, प्रमादी बन जाता है। अपने भाग्य पर इतराता है और आत्मा का पतन करता है। अभिमान बड़ी संक्रामक बीमारी है, जो मनुष्य को अधोगति में पहुँचा सकती है।

◆ परिश्रम और केवल उचित परिश्रम ही सफलता का आधार है। इसके लिए परमात्मा की अनायास कृपा पर निर्भर करना अनधिकार चेष्टा है, जो किसी प्रकार पूरी नहीं हो सकती। परमात्मा कृपा करता अवश्य है, किन्तु उन्हीं पर जो पहले स्वयं अपने पर कृपा करते हैं। उस परमात्मा ने मनुष्य को पहले से ही बल, बुद्धि और विशेषताओं से भरा शरीर देकर महती कृपा कर दी है। अपनी योग्यता और पात्रता बढ़ाइए , अपना लक्ष्य निश्चित करिये और एकनिष्ठ होकर पुरुषार्थ में संलग्न हो जाइए। आपको सफलता अवश्य मिलेगी।
★ सामाजिक सुख-शान्ति और मानवता के मंगल के लिए आवश्यक है कि संसार से मांस भोजन की प्रथा को उठा दिया जाये। इसकी विकृति के कारण मनुष्य क्रोधी बनकर असामाजिक बन जाता है। समाज एवं राष्ट्र के उत्थान के लिए जिन सुंदर गुणों, सुकुमार भावनाओं और सद्प्रवृत्तियों की आवश्यकता होती है, मांसाहार के कारण उनका स्निग्ध विकास नहीं हो पाता। मांसाहार से मनुष्य में हिंसा की भावना बढ़ती है, जिससे समाज में अशान्ति और अमंगल की परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं।

शुक्रवार, 17 मई 2019

Gayatri Anushthan Karane Ke Uddeshya गायत्री अनुष्ठान करने के उद्देश्य |...



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👉 जीवन साधना के त्रिविध पंचशील (भाग 5)

(४) पारिवारिक पंचशीलों में श्रमशीलता, मितव्ययिता, सुव्यवस्था, शालीन शिष्टता और उदार सहकारिता की गणना की गयी है। इन पाँच गुणों को हर सदस्य के स्वभाव में कैसे सम्मिलित किया जाय। इसके लिए उपदेश देने से काम नहीं चलता, ऐसे व्यावहारिक कार्यक्रम बनाने पड़ते हैं, जिन्हें करते रहने से वे सिद्धान्त व्यवहार में उतरें।

(५) उत्तराधिकार का लालच किसी के मस्तिष्क में नहीं जमने देना चाहिए, वरन् हर सदस्य के मन मे यह सिद्धान्त जमना चाहिए कि परिवार की संयुक्त सम्पदा में उसका भरण- पोषण, शिक्षण एवं स्वावलम्बन सम्भव हुआ है। इस ऋण को चुकाने में ही ईमानदारी है। बड़ों की सेवा और छोटों की सहायता के रूप में यह ऋण हर वयस्क स्वावलम्बी को चुकाना चाहिए। कमाऊ होते ही आमदनी जेब में रखना और पत्नी को लेकर मनमाना खर्च करने के लिए अलग हो जाना प्रत्यक्ष बेईमानी है। उत्तराधिकार का कानून मात्र कमाने में असमर्थों के लिए लागू होना चाहिए, न कि स्वावलम्बियों की मुफ्त की कमाई लूट लेने के लिए। अध्यात्मवाद और साम्यवाद दोनों ही इस मत के हैं कि पूर्वजों की छोड़ी कमाई को असमर्थ आश्रित ही तब तक उपयोग करें जब तक कि वे स्वावलम्बी नहीं बन जाते।

.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन अनीति नहीं बरते


👉 प्रेरणादायक प्रसंग बुद्धि की परीक्षा


👉 विक्रमादित्य राज्य त्याग में सुख क्यो

राजा विक्रमादित्य के राज्य में एक सदाचारी, सन्तोषी ब्राह्मण रहता था। वह निर्धन था। स्त्री की प्रेरणा से धन प्राप्ति के निमित्ति घर से निकला तो जंगल में एक महात्मा से भेंट हुई उन्होने उसे चिंतित देख आश्वासन दिया और विक्रमादित्य को प्रत्र लिखा कि तुम्हारी इच्छा पूर्ति का अब समय आ गया है। अपना राज्य इस ब्राह्मण को देकर यहाँ चले आओ।

वह पत्र विक्रमादित्य ने पढ़ा तो उन्हें बडी प्रसन्नता हुई और ब्राह्मण को राज्य साँपने की तैयारी की। ब्राह्मण ने राजा को राज्य- त्याग के लिए इतना उत्सुक और अत्यन्त आनन्दविभोर देखा तो सोचने लगा कि जब राजा ही राज्य सुख को लात मारकर योगी के पास जाने में विशेष आनन्द अनुभव कर रहे है तो योगी के पास अवश्य ही कोई राज्य से भी बड़ा सुख है। अत: उसने राजा से कहा कि -- '' महाराज। मै अभी महात्माजी के पास पुन : जा रहा हूँ,लौटकर राज्य लूँगा। '' यह कह कर योगी के पास पहुँचकर बोला कि '' भगवन्। राजा तो राज्य- त्याग कर आपके पास आने के लिए नितान्त उतावला और हर्ष विभोर हो गया। इससे जान पड़ता है कि आपके पास राज्य से भी बड़ी कोई वस्तु है, मुझे वही दीजिए। ''

महात्मा ने प्रसन्नचित्त हो ब्राह्मण देवता को आत्मविद्या सिखाई और उसे वह वैभव दे दिया जो उसे मोक्ष दिला गया। उस सुख की तुलना में सारे सांसारिक सुख नगण्य है।

जो आत्मावलम्बी बहुरंगीय दुनिया के सुख- आकर्षणों को ठुकराता है, अन्तत : वही इस श्रेय का भागी बनता है। जो क्षणिक सुख लाभ के मोह में उन्हीं में लिप्त हो जाते हैं थे अन्तत : त्रास ही पाते हैं, भले ही उन्हें उसमें तात्कालिक दृष्टि से सुख मिलता हो। उनकी उपमा तो उस बालक से ही दी जा सकती है जो खिलौनों से खेलकर सामयिक आनन्द पाने में ही रुचि लेता है। आयु की दृष्टि से बड़े  होने पर भी ऐसे मन्द बुद्धि बालकों का अनुपात जन समुदाय में अधिक ही होता है।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग 1

👉 How to Stay Happy?

Why is it that some people are happy while some others are not? - This question has been eluding even the psychologists of the modern day. According to a recent survey, it has been found that people of Finland are the happiest people in the world. Countries like Denmark, Iceland, Switzerland and Norway are among the Top-5, while India’s position is 133rd in the list of 155 countries. In this survey, every year about 1000 people from each country are asked a few questions and based on their responses, the results are declared on World Happiness Day (20th March).

Being happy is a state of mind. It is not necessary to be rich to be happy. Practically every survey ever done has shown that those who are happy stay in families. Such people get along very well with their friends and family. According to Daniel Gilbert, the Happiness Expert at Harvard University, we are happy when we are with our family. If we have friends, then it is even better. In some way or the other, everything that contributes to our happiness comes through either family or friends. The biggest factor for one’s happiness and fulfillment in life is, basically, love. A scientific study has shown that having someone to rely on helps a person’s nervous system relax, helps his brain stay healthier for a longer time, and reduces both emotional as well as physical pain.

A long-time researcher on this topic, George Vaillant says – ‘What influences life the most is the quality of our relationships with others’. It is these precious relationships that bind us together and hence influence our happiness to a large extent.
It is also evident that material prosperity has made man hollow from within. In fact, man spends his entire life earning money and realizes at the end that the desire for money is never-ending and the joys of life cannot be bought with money. So, to whatever extent possible, we should spend our time in lovingly strengthening our social life and thus making it prosperous.

To be continued...
📖 From Akhand Jyoti

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 18)

PRARABDHA KARMAS
(Karmas done with strong emotional involvement):

It is obvious that this process is not unilateral. Divine justice makes souls of both the sinner and the sinned interact in complementary environment. This complex process at time takes several cycles of life and death. We know that in this world, too, it requires a long time and consideration of numerous factors before two individuals become life partners as husband and wife. (The popular saying that “Marriages are made in heaven” indirectly refers to the coincidence of samsakars of the bride and the groom. The pain of separation in a divorce, too, is a consequence of sinful karmas of past lives.)

We may further try to understand the course of divine justice by an analogy in a natural phenomenon. A shrub in Africa called Venus grows to a height of about three meters. Out of its branches spread out thin threadlike offshoots. These keep on growing and swaying in the air till they meet another shrub and they become mutually intertwined. Sometimes these shrubs meet each other barely after a growth of a few centimeters, whereas the others succeed in doing so after growing for a few meters. This is the way the fruits of karmas ripen for interaction over different spans of time.

The punishment for the exclusively physical sins is physical and is given without much delay. (Consumption of poison results in immediate death.) Mental chastisement, on the other hand, is neither instantaneous nor is it unilateral. For instance, if, because of his cruel nature, someone commits a murder and is caught red-handed, the state awards a death sentence. On the contrary, if the killer commits the offence secretly, the inner conscience does not punish him immediately. It would wait for an environment for creating in his psyche an aversion for violence, by making the sinner feel the same degree of pain, which was felt by his victim. That is why, at times, morally vile persons are found rejoicing and righteous ones suffering in life. The enforcer of Divine Law takes time in preparing an appropriate environment for dispensing just rewards and punishments.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 31

👉 आत्मचिंतन के क्षण 17 May 2019

■ अपने ऊपर आपत्ति व संकट को आया देखकर धैर्य खोना कायरता है। जब संसार के कोई दूसरे लोग दुःख में धैर्य रख सकते हैं, हँसते-खेलते हुए आपत्तियों को पार कर सकते हैं, तो हम ही क्येां उन्हें देखकर रोने-चिल्लाने लगें, जबकि परम पिता परमात्मा ने हमें भी साहस, आशा और धैर्य के साथ बुद्धि एवं विवेक का सम्बल उनकी तरह दे रखा है। अंतर केवल यह है कि जहाँ संसार के सिंह पुरुष अंधकार आते ही अपने गुणों के प्रदीप प्रज्वलित कर लेते हैं, वहाँ कायर पुरुष घबराकर उनको प्रदीप्त करना ही भूल जाते हैं।

◆ खेद का विषय है कि आज लोग संयम की महत्ता को भूलते जा रहे हैं। अधिकांश लोगों की धारणा बन गई है कि संयम अथवा ब्रह्मचर्य जैसे आदर्शों की शिक्षा मात्र कहने-सुनने की बातें हैं। कहना न होगा कि यह एक भयानक धारणा है। किसी बुराई को, किन्हीं विवशताओं के वश करते रहने पर भी जब तक वह बुराई ही मानी जाती है तब तक देर-सबेर सुधार की आशा की जा सकती है, किन्तु जब किसी विकृति अथवा दुर्बलता को स्वाभाविक मान लिया जाता है तब उसके सुधार की आशा धूमिल हो जाती है और दुबुर्द्धि के कारण लोग उसके कुफलगामी बनते हैं।

★ भलाई, शराफत, मृदुता का एक बार किया हुआ सद्व्यवहार वह धन है जो रात-दिन बढ़ता है। यदि दैनिक व्यवहार में आप यह नियम बना लें कि हम जिन लोगों के संपर्क में आयेंगे, उनमें से छोटे-बड़े सबके साथ सद्भावनायुक्त व्यवहार करेंगे, मधुर भाषण करेंगे, कटुता और आलोचना से बचते रहेंगे तो स्मरण रखिए आपके मित्र और हितैषियों की संख्या में उत्तरोत्तर अभिवृद्धि होगी।