सोमवार, 26 नवंबर 2018

👉 इतना तो व्यस्त और विवश होते हुए भी करं सकते हैं

जिनके पास अभीष्ट योग्यता, भावना और सुविधा हो उन्हें इस आपत्तिकाल में मानवता की पुकार सुनकर आगे आना चाहिए और लोभ-मोह की कीचड़ में सड़ते रहने की अपेक्षा उस आदर्शवादी महानता का वरण करना चाहिए जिसे किसी समय इस देश के प्रत्येक नागरिक द्वारा सहज स्वभाव अपनाया जाता था। परिस्थितियाँ, मनोभूमि और प्रवाह प्रचलन बदल जाने से अब इस प्रकार के कदम बढ़ाना दुस्साहस जैसा प्रतीत होता है। किसी समय, जिसमें इतनी भी जीवट न हो, उसे मृतक तुल्य माना जाता था। आज की परिस्थितियों में जो लोग वरिष्ठ अथवा क्लिष्ट वानप्रस्थ का मार्ग अपना सकेंगे विश्व मानव और विश्व-शान्ति के लिए अपना थोड़ा-बहुत भी योगदान दे सकेंगे वे बड़भागी माने जायेंगे। इस घोर अन्धकार में उन छोटे दीपकों का साहस भी भूरि-भूरि सराहने योग्य माना जायगा।

सम्भवतः इस आह्वान को प्रत्येक जीवित और जागृत आत्मा द्वारा सुनने योग्य माना जायगा। सम्भवतः बहुतों की आन्तरिक आकाँक्षा इस दिशा में कदम बढ़ाने की होगी भी किन्तु यह सम्भव है कि वे ऐसी विषम परिस्थितियों में जकड़े हुए हो कि व्यवहारतः कुछ अधिक कर सकना उनके लिए सम्भव न हो। विधि की विडम्बना विचित्र है। कुछ की परिस्थितियाँ बहुत कुछ करने योग्य होती हैं पर मन इतना गिरा मरा होता है कि आदर्शों की तरफ बढ़ने की इच्छा तक नहीं उठती। इसे विपरीत कुछ ऐसे भी होते है कि जिनका अन्तरात्मा महामानवों के चरण-चिन्हों पर चलते हुए कुछ कर गुजरने के लिए निरन्तर छटपटाता रहता है पर परिस्थितियाँ इतनी विपरीत होती हैं कि उन्हें लाँघ सकना किसी जिम्मेदार एवं कर्त्तव्य परायण व्यक्ति के लिए सम्भव ही नहीं होता वरन् उन्हें मन मसोस कर बैठना पड़ता है।

मिशन के लिए भी वह सम्भव नहीं कि वानप्रस्थ कार्यकर्त्ताओं के घर परिवार का आर्थिक उत्तरदायित्व वहन कर सके। अधिक से अधिक इतना ही सम्भव है कि कार्यकर्त्ताओं के भोजन-वस्त्र की व्यवस्था जुटाई जाती रहे। ऐसी दशा में जिन्हें घर से बाहर जाकर कार्य-क्षेत्र में कूदने की सुविधा नहीं है उन्हें स्थानीय क्षेत्र में ही प्रकाश फल का प्रयत्न करना चाहिए। सक्रिय सदस्यों और कर्मठ कार्यकर्ताओं को भी सृजन-सेना के द्वितीय मोर्चे पर लड़ने वाले सैनिक माना जाता है। नियमित रूप से कुछ घण्टे अथवा समय दे सकने वाले और अपनी आजीविका का उपयुक्त अंश इस प्रयोजन के लिए लगाने वाले व्यक्ति भी अपने क्षेत्र में इतना काम कर सकते हैं जिसे अति-महत्वपूर्ण कह कर सराहा जा सके।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 धीरे-धीरे सीख

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...
मुझे हर उस बात पर प्रतिक्रिया नहीं देना चाहिए जो मुझे चिंतित करती है।

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...
जिन्होंने मुझे चोट दी है मुझे उन्हें चोट नहीं देना है।

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...
शायद सबसे बड़ी समझदारी का लक्षण भिड़ जाने के बजाय अलग हट जाने में है।

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...
अपने साथ हुए प्रत्येक बुरे बर्ताव पर प्रतिक्रिया करने में आपकी जो ऊर्जा खर्च होती है वह आपको खाली कर देती है और आपको दूसरी अच्छी चीजों को देखने से रोक देती है।

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...
मैं हर आदमी से वैसा व्यवहार नहीं पा सकूंगा जिसकी मैं अपेक्षा करता हूँ।

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...
किसी का दिल जीतने के लिए बहुत कठोर प्रयास करना समय और ऊर्जा की बर्बादी है और यह आपको कुछ नहीं देता, केवल खालीपन से भर देता है।

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...
जवाब नहीं देने का अर्थ यह कदापि नहीं कि यह सब मुझे स्वीकार्य है, बल्कि यह कि मैं इससे ऊपर उठ जाना बेहतर समझता हूँ।

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...
कभी-कभी कुछ नहीं कहना सब कुछ बोल देता है।

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...
किसी परेशान करने वाली बात पर प्रतिक्रिया देकर आप अपनी भावनाओं पर नियंत्रण की शक्ति किसी दूसरे को दे बैठते हैं।

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...
मैं कोई प्रतिक्रिया दे दूँ तो भी कुछ बदलने वाला नहीं है। इससे लोग अचानक मुझे प्यार और सम्मान नहीं देने लगेंगे। यह उनकी सोच में कोई जादुई बदलाव नहीं ला पायेगा।

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...
जिंदगी तब बेहतर हो जाती है जब आप इसे अपने आसपास की घटनाओं पर केंद्रित करने के बजाय उसपर केंद्रित कर देते हैं जो आपके अंतर्मन में घटित हो रहा है।

आप अपने आप पर और अपनी आंतरिक शांति के लिए काम करिए और आपको बोध होगा कि चिंतित करने वाली हर छोटी-छोटी बात पर प्रतिक्रिया 'नहीं' देना एक स्वस्थ और प्रसन्न जीवन का 'प्रथम अवयव' है।

सच कहें तो
कभी कभी कुछ अपनी ही मूर्खता पूर्ण बातों या कामों से पछतावा भी होता है तो कभी कभी कुछ ईमानदारी भरा ठीक कर पाने की खुशी भी।

अब पता नहीं क्यों दूसरों की निंदा प्रशंसा में कुछ ज्यादा अंतर नहीं सा लगता।

पर जो भी हो ये भरोसा सा है कि अब समझदारी की तरफ सुनिश्चित कदम दर कदम बढ़ रहे हैं,
मन में छाई रहने वाली शांति, खुशी, संतुष्टि इसकी गवाह है कि पथिक की राह ठीक है,
एक दिन मंजिल भी मिल ही जाएगी।
उस मंजिल को तय करने का मजा ही शायद जिंदगी के अनूठे से जगह जगह बिखरे रंग हैं।

👉 Eradication of evil tendencies

Many times, morally sound people are seen indulging in ill-stuffs. The reason for that is, the ill tendencies are deep-rooted somewhere inside them and they pop up as and when they get opportunity.Just like for a person who keeps thinking about stealing things, it's not difficult to do so whenever he gets a chance. A person who might be highly knowledgeable in his physical appearance but has evil tendencies in his mind, would be ultimately considered an immoral person. Because of pressure of social etiquette, even though the physical action did not take place but it was always present in its subtle form in his mind. Thus if opportunity was there, the sin would have been committed.

So continuous efforts must be made to remove bad tendencies hiding in subtle mind. Therefore it is absolutely necessary, that whatever bad tendencies we find in our actions, thoughts and personality, we gather positive thoughts contradictory to these tendencies and do arrangements to make them available to mind again and again.

The eradication of bad thoughts is only possible by current of good thoughts.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Yug Nirman Yojana: Darsana, swarupa va karyakrama 66:2.18

👉 दुर्भावों का उन्मूलन

कई बार सदाचारी समझे जाने वाले लोग आश्चर्यजनक दुष्कर्म करते पाए जाते हैं। उसका कारण यही है कि उनके भीतर ही भीतर वह दुष्प्रवृति जड़ जमाए बैठी रहती है। उसे जब भी अवसर मिलता है, नग्न रूप में प्रकट हो जाती है। जैसे, जो चोरी करने की बात सोचता रहता है, उसके लिए अवसर पाते ही वैसा कर बैठना क्या कठिन होगा। शरीर से ब्रह्मज्ञानी और मन से व्यभिचारी बना हुआ व्यक्ति वस्तुत: व्यभिचारी ही माना जाएगा। मजबूरी के प्रतिबंधों से शारीरिक क्रिया भले ही न हुई हो, पर वह पाप सूक्ष्म रूप से मन में तो मौजूद था । मौका मिलता तो वह कुकर्म भी हो जाता ।

इसलिए प्रयत्न यह होना चाहिए कि मनोभूमि में भीतर छिपे रहने वाले दुर्भावों का उन्मूलन करते रहा जाए। इसके लिए यह नितान्त आवश्यक है कि अपने गुण, कर्म, स्वभाव में जो त्रुटियॉं एवं बुराइयॉ दिखाई दें, उनके विरोधी विचारों को पर्याप्त मात्रा में जुटा कर रखा जाय और उन्हें बार-बार मस्तिष्क में स्थान मिलते रहने का प्रबंध किया जाए। कुविचारों का शमन सद्विचारों से ही संभव है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-वांग्मय 66 पृष्ठ 2.18



👉 आज का सद्चिंतन 26 Nov 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 26 November 2018