शनिवार, 28 अक्तूबर 2017

👉 अपने ब्राह्मण एवं संत को जिन्दा कीजिए (भाग 6 )

🔶 साथियों! हमारे मौन धारण करने का एक और कारण है। आप यह मत सोचिये कि मैं अपना प्याऊ बन्द करने जा रहा हूँ। हमें बच्चों को खिलाने का शौक है। हमें बच्चों को प्यार करना, उन्हें गुब्बारा देना बहुत प्यारा लगता है। स्वयं घोड़ा बन जाना तथा बच्चों को पीठ पर बैठा लेना तथा घुमाना बहुत प्यारा लगता है।
      
🔷 हम जो भी सहायता आपकी कर सकते हैं, वह अवश्य करेंगे, परन्तु आपको भी स्वयं में संवेदना पैदा करनी होगी। हमने कहा है कि आप उपासना करिये, जप करिये ताकि आपको उस समय परा एवं पश्यन्ति वाणी से दिशा दे सकूँ, अन्यथा मैं अपने मौन की शक्ति प्रेषित करूँगा और आपको नुकसान होगा।

🔶 मेरे गुरु के व्याख्यान देने का कार्य बन्द हो गया तो क्या उनकी शक्ति कम हो गई? हम नहीं बोल रहे हैं, हमारा गुरु बोल रहा है। आप भी उनकी शक्ति से बोलेंगे। प्रज्ञापुराण जब आप पढ़ेंगे और लोगों को सुनाएँगे तब वह आपकी वाणी में नहीं, बल्कि मेरे गुरु की वाणी में होगा, जिसमें अधिक ताकत होगी। आपकी वाणी में कोई ताकत नहीं होगी, आप ऐसे ही बकवास करते रहेंगे। हम मौन हो जाएँगे तो हमारी शक्ति बढ़ जाएगी। हमारी परा एवं पश्यन्ति वाणी की ताकत बढ़ जाएगी। आप मेरी उस वाणी को सुनेंगे तो आपके आँखों में पानी आएगा, भाव-संवेदना जगेगी। इससे हम आपकी सहायता ज्यादा कर सकेंगे।

🔷 आप क्या सोचते हैं कि आप लोगों के ऊपर हमारा कोई असर नहीं पड़ता है। यह हमारा मौन ब्राह्मणत्व है। यह तपस्वी की वाणी है। हमने सेवा करने में सन्त की प्रवृत्ति को जिन्दा रखा है कि हम समाज की सेवा करेंगे। आज व्यक्ति की सेवा ज्यादा है, समाज की सेवा गौण हो गयी है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 Yug Nirman Yojana – A Sure Remedy for Present-day Ills

🔶 ‘Yug Nirman Yojana’ (Campaign for Era - Transformation) through the medium of Gayatri Sadhana is the sure remedy prescribed by the Seer-Sage Swami Sarveswaranandji for all the ills of soul-mind-body by which mankind is afflicted in the present age. His disciple – Acharya Sriram Sharma – made Herculean efforts to implement his Master’s Plan and established the global Gayatri Mission, with its headquarters at Gayatri Teerth Shantikunj Hardwar, for the production of this wonder cure-all drug. The followers of Acharyasri, the Gayatri Parijans, are making an all – out effort to distribute this medicine (of Gayatri Sadhana) to one and all. Acharyasri asserted that Gayatri is for everyone; it is a divinely inspired revolution, which is bound to succeed in spite of all the opposition from dogmatic forces of outmoded traditions and beliefs.

🔷 The aim of ‘Yug Nirman’- revolution is to achieve the inner refinement and upliftment of the individual, the family and the society at large; and thus lay a firm foundation for the emergence of the golden era of genuine peace on earth.

🔶 The role of Gayatri Sadhana is to bring about a synthesizing transformation of attitudes, feelings and thoughts. If the existing divisive and ego-driven beliefs / traditions of the masses could be transmuted through spiritual awakening, then people, physically remaining the same, will intuitively experience the underlying Unity and Harmony of all that exists and will be rid of their mis-identity with the body.

🔶 This process of change of the era has already begun. The visible emergence of the bright future of humanity in the twenty-first century is very much linked with the success of Yug Nirman Yojana. Since its fulfillment is divinely ordained, the one thing that the parijans have to do in this transition period is to contribute their mite by uplifting and transmuting themselves through Gayatri Sadhana and then, by example, inspire others to do so. This will have the needed ripple effect, which will steadily build up the needed critical mass for initiating the process of human transformation, resulting in lasting peace and harmony on earth.

👉 आत्मचिंतन के क्षण 28 Oct 2017

🔶 यदि विघ्न बाधाएँ आती हैं, आपको झटका-मारती हैं, तो आप गिर जाते हैं हिम्मत पस्त हो जाते हैं किन्तु इससे काम नहीं चलेगा। गिरकर भी उठिये फिर चलने का प्रयास कीजिए। एक बार नहीं अनेकों बार आपको गिरना पड़े किन्तु गिर कर भी उठिये और आगे बढ़िये। उस छोटे बालक को देखिये जो बार-बार गिरता है किन्तु फिर उठने का प्रयत्न करता है और एक दिन चलना सीख जाता है। आप की सफलता, विकास, उत्थान भी उतना ही सुनिश्चित है। अतः रुकिए नहीं, उठिए। ठोकरें खा कर भी आगे बढ़िये, सफलता एक दिन आपका स्वागत करने को तैयार मिलेगी।

🔷 आने वाले विघ्नों, कठिनाइयों में भी अपना धर्म न छोड़ें। स्मरण रखिये प्रत्येक विघ्न-बाधा का सर्व प्रथम आघात आपके उत्साह आशा और भविष्य के प्रति आकर्षण पर होता है। इनका सीधा वार आपके हृदय पर होता है किन्तु कहीं आपका हृदय टूट नहीं पाये, इसके लिए यह सोच लीजिए कि जिस प्रकार घोर अन्धकार के बाद सूर्य का प्रकाश प्राप्त होता है उसी प्रकार आपका उज्ज्वल भविष्य प्रकाशित होने वाला है। अमावस की काली रात के पश्चात् चन्द्रमा की चाँदनी सहज ही फूट पड़ती है। आज का कठिन समय भी गुजर जाएगा, इसे हृदयंगम कर लीजिए। अपने आशावादी दृष्टिकोण, आकाँक्षाओं, उत्साह की सम्पत्ति को यों ही न खोइये। उनका बचाव कीजिए और प्रगति के पथ पर आशा और उत्साह के साथ आगे बढ़ते ही जाइये।

🔶 मनुष्य दूसरों की दृष्टि में कैसा जँचता है, इसका बहुत कुछ आधार उसके अपने व्यक्तित्व पर निर्भर रहता है। लोग विद्या पढ़ने, धन कमाने, पोशाक और साज सज्जा बनाने पर तो ध्यान देते हैं, पर अपने व्यक्तित्व का निर्माण करने की दिशा में उपेक्षा ही बरतते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि जितना महत्व योग्यता और सम्पदा का है उससे कम मूल्य व्यक्तित्व का नहीं है। व्यक्तित्व का प्रभावशाली होना बड़ी से बड़ी सम्पदा या योग्यता से कम मूल्य का नहीं है। यदि किसी व्यक्ति को किसी से विशेष स्वार्थ या लगाव है तो बात दूसरी है, नहीं तो यदि कोई किसी से प्रभावित होता है तो उसका मूल आधार उसका व्यक्तित्व ही होता है। शरीर का सुडौल या रूपवान् होना, दूसरों को कुछ हद तक प्रभावित करता है, वस्तुतः सच्चा प्रभाव तो उसके उन लक्षणों का पड़ता है जो उसके मन की भीतरी स्थिति के अनुरूप क्रिया और चेष्टाओं से पल-पल पर झलकते रहते हैं।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 यथार्थता को समझें—आग्रह न थोपें

🔷 संसार जैसा कुछ है हमें उसे उसी रूप में समझना चाहिए और प्रस्तुत यथार्थता के अनुरूप अपने को ढालना चाहिए। संसार केवल हमारे लिए ही नहीं बना हैं ओर उसके समस्त पदार्थों एवं प्राणियों का हमारी मनमर्जी के अनुरूप बन या बदल जाना सम्भव नहीं है। तालमेल बिठा कर समन्वय की गति पर चलने से ही हम संतोष पूर्वक रह सकते हैं और शान्ति पूर्वक रहने दे सकते हैं।
  
🔶 यहां रात भी होती है और दिन भी रहता हैं। स्वजन परिवार में जन्म भी होते हैं और मरण भी। सदा दिन ही रहे कभी रात न हो। परिवार में जन्म संख्या ही बढ़ती रहे मरण कभी किसी का न हो। ऐसी शुभेच्छा तो उचित हैं पर वैसी इच्छा पूर्ण नहीं हो सकती। रात को रात के ढंग से और दिन को दिन के ढंग से प्रयोग करके हम सुखी रह सकते हैं ओर दोनों स्थितियों के साथ जुड़े हुए लाभों का आनन्द ले सकते हैं। जीवन को अपनी उपयोगिता है और मरण को अपनी। दोनों का संतुलन मिलाकर सोचा जा सकेगा। तो हर्ष एवं उद्वेग के उन्मत्त विक्षिप्त बना देने वाले आवेशों से हम बचे रह सकते हैं।

🔷 हर मनुष्य की आकृति भिन्न है, किसी की शकल किसी से नहीं मिलती। इसी प्रकार प्रकृति भी भिन्न हैं। हर मनुष्य का व्यक्तित्व अपने ढंग से विकसित हुआ है। उसमंस सुधार परिवर्तन की एक सीमा तक ही सम्भावना है। जितना सम्भव हो उतना सुधार का प्रयत्न किया जाय पर यह आग्रह न रहे कि दुनिया को वैसा ही बना लेंगे जैसा हम चाहते हैं। तालमेल बिठाकर चलना ही व्यवहार कौशल हैं। उसी को अपना कर सुख से रहना ओर शान्ति से रहने देना सम्भव हो सकता है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- मई 1974 पृष्ठ 1

👉 आज का सद्चिंतन 28 Oct 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 28 Oct 2017


👉 दो की लड़ाई तीसरे का लाभ

🔷 एक बार एक सिंह और एक भालू जंगल में अपने शिकार की तलाश में घूम रहे थे। दोनों ही भूख से व्याकुल थे। अचानक उन्हें एक हिरन का बच्चा दिखाई दिया। दोनों ने एक ही बार आक्रमण कर उस हिरन के बच्चे को मार दिया। परंतु बच्चा इतना छोटा था कि वह दोनों में से किसी के लिए भी पर्याप्त भोजन नहीं था।

🔶 बस, फिर क्या था, सिहं और भालू आपस में बुरी तरह लड़ने लगे। दोनों का क्रोध इतना बढ़ा कि बुरी तरह एक दूसरे को नोचने खसोटने लगे। दोनों ही शिकार को अकेले खाना चाहते थे। बंटवारा उन्हें कुबूल नहीं था। इस झगड़े में वे बुरी तरह घायल हो गए और लहूलुहान होकर अपनी-अपनी पीठ के बल लेट गए और एक दूसरे पर गुर्राने लगे। वे इतनी बुरी तरह घायल हो गए थे कि अब उनमें उठने की शक्ति भी नहीं रह गई थी।

🔷 तभी एक होशियार लोमड़ी उधर से गुजरी। उसने उन दोनों को घायल अवस्था में पड़े हुए देखा। उनके बीच एक मरे हुए हिरन के बच्चे को देखकर लोमड़ी सब कुछ समझ गई।

🔶 बस, उसने सीधे उन दोनों के बीच घुस कर हिरन के बच्चे को खींच लिया और झाडि़यों के पीछे चली गई।

🔷 सिंह और भालू तो इतनी दयनीय स्थिति में थे कि अपने हाथ-पैर भी नहीं हिला सकते थे। वे दोनों लाचार से लोमड़ी को अपना शिकार ले जाते देखते रहे।

🔶 अंत में सिंह ने कहा- ”इतनी छोटी सी बात पर इतनी बुरी तरह लड़ना हमारी मूर्खता थी। यदि हमारे भीतर जरा भी बुद्धि होती तो हम समझौता कर लेते। हम चाहते तो शिकार का बंटवारा भी कर सकते थे। लेकिन यह हमारे लालच का परिणाम है कि हम आज इस स्थिति में पहुंच गए हैं कि एक लोमड़ी हमारे शिकार को खींच ले गई।“

🔷 यह सुनकर भालू ने भी सिर हिलाया -”हां दोस्त, तुम ठीक कह रहे हो।“

🔶 निष्कर्ष- दो की लड़ाई का लाभ सदा तीसरा कोई और ही उठाता है।

👉 जीवन की सफलता

जीवन ऊर्जा का महासागर है। काल के किनारे पर अगणित अन्तहीन ऊर्जा की लहरें टकराती रहती हैं। इनकी न कोई शुरुआत है, और न कोई अन्त; बस मध्य है...