मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 15 Feb 2017


👉 आज का सद्चिंतन 15 Feb 2017


👉 माँ के लहूलुहान हाथ

🔴 मेरी धर्मपत्नी ने गुरुदेव के पास रहकर देव कन्याओं का शिविर किया था। विवाह के बाद उनके माध्यम से मैं भी गुरुदेव से जुड़ गया। पत्नी की पहली डिलीवरी के समय हम बहुत परेशान थे, वहाँ हमारे गाँव में न कोई साधन, न सहयोगी थे। उस परिस्थिति में हमारे पास प्रार्थना के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं था। डिलीवरी के दिन पत्नी बहुत तकलीफ में थीं। उनकी हालत देख मैं गुरु देव से प्रार्थना करने लगा। संयोग से समय पर एक नर्स मिल गई। उन्होंने बड़ी सहजता के साथ डिलीवरी करा दी। तब से गुरु देव के प्रति श्रद्धान्वित मैं कोई काम शुरू करने से पहले उनसे अवश्य पूछता हूँ।

🔵 सन् १९९१ में मैं राइस मिल चलाने जा रहा था। माताजी से आशीर्वाद लेने गया। राइस मिल की बात सुनकर माताजी गम्भीर हो गईं। बोलीं- दुकान पर तो बैठ रहा है, क्या दिक्कत है? मैंने कहा- भाई लोगों के पास काम नहीं है इसलिए मिल लगाना चाहता हूँ। माताजी ने अनुमति देते हुए कहा- ठीक है, जा मशीन लगा। मैंने राइस मिल ले ली। ठेका में काम शुरू किया। लेकिन साल भर में लगभग छः महीने मिल बंद रही। उसके बाद बहुत काम भी नहीं हुआ। फिर भी उस साल नुकसान नहीं हुआ।

🔴 दूसरे साल अच्छी तरह मिल चला सकें इसके लिए फिर आशीर्वाद लेने गया तो माताजी ने कहा इस साल चला ले, लेकिन अगले साल मिल मत चलाना। इस साल भी ज्यादा काम तो नहीं हुआ, लेकिन नुकसान भी नहीं हुआ। तीसरे साल यानि १९९३ में मैंने खुद अपने दम पर मिल चलाया। इस बार चार- पाँच गुना अधिक काम होने के बावजूद मेरा बहुत नुकसान हुआ। करीब बीस लाख रुपये का नुकसान हो गया। इसी साल मिल में एक दुर्घटना हुई। राइस मिल बॉयलर फट गया। लगभग २०- २५ मजदूर काम कर रहे थे किसी को कुछ नहीं हुआ। बॉयलर के टुकड़े बिखर कर आस- पास के घरों के ऊपर गिरे; रोड पर गिरे। किन्तु आश्चर्य की बात कि किसी को चोट नहीं आई।
  
🔵 उसी रात माताजी सपने में दिखाई दीं। उन्होंने कहा- मानता नहीं, देख मेरे हाथ लहूलुहान हो गए हैं। मैं देखकर सन्न रह गया। उनकी दोनों हथेलियाँ खून से लथपथ थीं। अब समझ में आया कि इतनी बड़ी दुर्घटना में किसी के हताहत न होने के पीछे माताजी का सक्रिय प्रयास था। मुझे अपनी मनमानी पर अफसोस होने लगा। माताजी ने पहले ही मना किया था। माँ के उस वत्सल रूप को देख मेरा हृदय गदगद हो गया। आज भी उस क्षण को याद करता हूँ तो आँखों में आँसू भर आते हैं।

🌹  पुरुषोत्तम सुल्तानिया  जानकी ज्यापा (छत्तीसगढ़)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से

http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/Wonderfula

👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 38)

🌹 साप्ताहिक और अर्द्ध वार्षिक साधनाएँ    

🔴 अर्द्ध वार्षिक साधनायें आश्विन और चैत्र की नवरात्रियों में नौ-नौ दिन के लिये की जाती हैं। इन दिनों गायत्री मंत्र के २४ हजार जप की परम्परा पुरातन काल से चली आती है। उसका निर्वाह सभी आस्थावान साधकों को करना चाहिये। बिना जाति या लिंगभेद के इसे कोई भी अध्यात्म प्रेमी नि:संकोच कर सकता है। कुछ कमी रह जाने पर भी इस सात्विक साधना में किसी प्रकार के अनिष्ट की आशंका नहीं करना चाहिए। नौ दिनों में प्रतिदिन २७ माला गायत्री मंत्र के जप कर लेने से २४ हजार निर्धारित जप संख्या पूरी हो जाती है। अंतिम दिन कम से कम २४ आहुतियों का अग्निहोत्र करना चाहिए। अंतिम दिन अवकाश न हो तो हवन किसी अगले दिन किया जा सकता है।     

🔵 अनुष्ठानों में कुछ नियमों का पालन करना पड़ता है- (१) उपवास अधिक न बन पड़े तो एक समय का भोजन या अस्वाद व्रत का निर्वाह तो करना ही चाहिए। (२) ब्रह्मचर्य पालन - यौनाचार एवं अश्लील चिंतन का नियमन। (३) अपनी शारीरिक सेवाएँ यथासंभव स्वयं ही करना। (४) हिंसायुक्त चमड़े के उपकरणों का प्रयोग न करना। पलंग की अपेक्षा तखत या जमीन पर सोना। इन सब नियमों का उद्देश्य यह है कि नौ दिन तक विलासी या अस्त-व्यस्त निरंकुश जीवन न जिया जाए। उसमें तप संयम की विधि व्यवस्था का अधिकाधिक समावेश किया जाए। नौ दिन का अभ्यास अगले छह महीने तक अपने आप पर छाया रहे और यह ध्यान बने रहे कि संयमशील जीवन ही आत्मकल्याण तथा लोकमंगल की दुहरी भूमिका संपन्न करता है। इसलिए जीवनचर्या को इसी दिशाधारा के साथ जोड़ना चाहिए।     
                        
🔴 अनुष्ठान के अंत में पूर्णाहुति के रूप में प्राचीन परंपरा ब्रह्मभोज की है। उपयुक्त ब्राह्मण न मिल सकने के कारण इन दिनों वह कृत्य नौ कन्याओं को भोजन करा देने के रूप में भी पूरा किया जाता है। कन्यायें किसी भी वर्ण की हो सकती हैं। इस प्रावधान में नारी को देवी स्वरूप में मान्यता देने की भावना सन्निहित है। कन्यायें तो ब्रह्मचारिणी होने के कारण और भी अधिक पवित्र मानी जाती हैं।       

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 परमार्थ की प्राथमिकता

🔴 जुटफेन का युद्ध-स्थल। सनसनाती हुई गोलियों की आवाज। सेना के प्रधान अधिकारी सर फिलिप सिडनी बडी़ बहादुरी से युद्धरत थे। अनेक सैनिकों को युद्ध-स्थल में उनके द्वारा मार्गदर्शन मिल रहा था। शत्रु की ओर से आई हुई एक गोली उनकी जाँघ में लगी और हड्डी के दो टुकडे़ करके पार निकल गई।

🔵 रक्त की धार फूट पडी, युद्ध करने का उनमें साहस न रहा, बचने की भी कोई आशा न रही। युद्ध में गिरकर प्राण देने की अपेक्षा उन्होंने कैंप में लौटना ज्यादा अच्छा समझा। उनका समझदार घोड़ा उन्हें लेकर पीछे लौट पडा। वह शिविर तक अभी न आ पाए थे कि वह बेहोश होकर जमीन पर गिर पडे जब मूर्छा टूटी तो उन्होंने संकेत से पानी पीने की इच्छा व्यक्त की। दौडा दौडा़ एक सैनिक गया और कहीं दूर की जलाशय से पानी लाया पानी का पात्र होठों से लगाया ही था, तब तक उनके कानों में पास पडे़ दूसरे सैनिक की आवाज आई जो 'पानी पानी' चिल्ला रहा था पर घायल होने के कारण उठकर पानी पीने की स्थिति में न था।

🔴 सिडनी ने सोचा मेरा तो जीवन वैसे ही समाप्त हो रहा है। शरीर से सारा रक्त निकल चुका है यह पानी मुझमें पुन जीवन न डाल सकेगा, मरते दम तक मेरी प्यास भले ही बुझा दे, मगर यह पानी पास का घायल सैनिक पी लेगा तो शायद उसका जीवन बच सके और मातृभूमि की रक्षा में पुनः योगदान दे सके। सिडनी ने पानी का गिलास अपने होठ से हटा दिया और धीरे से कहा-' यह पानी उस सिपाही को पिला दो।' अनेक सैनिकों ने इस बात का आग्रह किया कि आपका महत्त्व एक साधारण सैनिक से कहीं अधिक है आप पहले पानी पी लीजिये उस सैनिक के लिये भी पानी की व्यवस्था की जायेगी।

🔵 सिडनी ने कहा- आप मुझे इसीलिये तो अधिक महत्त्व देते हैं कि मै आप सबकी तकलीफों को अपनी तकलीफ समझता हूँ, और सबको सच्चे हृदय से प्यार करता हूँ। यदि ऐसा कोई गुण आप मुझ में न देखें तो भला मुझे कौन बडा मानेगा और मेरा क्या मूल्य रहेगा, यदि आप सब एक सैनिक से बडा़ मानते हैं तो मेरा बडप्पन भी इसी में है कि यह पानी उस सैनिक को पीने दूँ।

🔴 सिडनी की आज्ञा से यह पानी उस प्यासे सैनिक को पिला दिया गया और दूसरी बार एक अन्य सैनिक उसी जलाशय से पानी लेकर लौटा तब तक सिडनी अपने प्राण त्याग चुके थे। सिडनी इस ससार में आज भले ही न हों पर अपने अधीनस्थ सैनिकों के प्रति उदार व्यवहार के कारण वे आज भी स्मरण किए जाते हैं।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 29, 30

👉 जीवन में त्याग की प्रतिष्ठा ही ‘मोक्ष’



🔵 मोक्ष क्या है? मुक्ति क्या है? यह प्रश्न हर भारतीय संस्कृति के पक्षधर मानव के मन में सहज ही उठता रहा है, सदा से ही, उसके पृथ्वी आविर्भाव के काल से। कई व्यक्ति यह समझते हैं मोक्ष मरने के बाद, शरीर रूपी बंधन के छूटने के बाद ही मिलता है। इसके लिए वे दान-पुण्य आदि अनेकानेक कृत्य करते भी देखे जाते हैं। किन्तु क्या वास्तविक मोक्ष इससे मिल जाता है? ऋषियों की दृष्टि से देखें तो यह एक ऐसी विधा है जिसका अन्तर्चक्षुओं से साक्षात्कार कर समझना होगा।

🔴 ऋषि- मनीषा कहती है कि जो मोह का क्षय करे, वही मोक्ष है। यह सदेह जीवन मुक्त स्थिति किसी को भी प्रयास करने पर मिल सकता है। मोक्ष वस्तुतः जीवन में त्याग की प्रतिष्ठा का नाम है। वासना-तृष्णा-अहंता रूपी त्रिविध बंधनों से मुक्ति प्राप्त कर आत्मतत्त्व की ओर उन्मुख होने का पुरुषार्थ ही मोक्ष है। इस मोक्ष देने वाले ज्ञान का स्वरूप भारतीय दर्शन की विभिन्न विचार धाराओं के अनुसार भिन्न-भिन्न हो सकता है, किन्तु लक्ष्य सभी का एक है-जीव को बंधनों से मुक्त करना। वस्तुतः मानव जीवन मिला ही इसलिए है कि हर व्यक्ति इस परम पुरुषार्थ, जिसे निर्वाण मुक्ति या अपवर्ग कुछ भी नाम दे दें, के लिए कर्म कर व परमतत्त्व की प्राप्ति हेतु इस प्रयोग को सार्थक बनाए। मोक्ष प्राप्ति हेतु किये जाने वाले इस कर्म को यदि जीवन जीने की कला कहा जाय तो अत्युक्ति नहीं होगी।

🔵 गीता में योगेश्वर कृष्ण, इस कला का जिसमें बंधनमुक्ति या मोक्ष प्राप्ति का सन्देश दिया गया है, बड़ा ही सुन्दर शिक्षण धनञ्जय को देते हैं। मोक्ष को गीताकार जीवन के एक सकारात्मक पक्ष के रूप में लेता है। कर्म करते हुए व उन कर्मों को मन से परम सत्ता को अर्पण करते हुए यदि कोई पुरुषार्थ करता है (मयि सन्यस्य मत्परः) तो वह मोक्ष इस जीवन में ही पा लेता है। कर्म करते हुए व्यक्ति को अनेकानेक बन्धनों को काटना पड़ता है, जिनमें लोभ प्रधान, मोह प्रधान व अहं प्रधान ये तीन प्रमुख है। बन्धन सदा दुष्प्रवृत्तियों के ही होते हैं। इनसे छुटकारा पा लेना, ज्ञान द्वारा भवबन्धनों से मुक्ति पा लेना ही मोक्ष है। यदि यह दूरदर्शिता हमारे अन्दर आ जाए तो मोक्ष का तत्त्वज्ञान समझते हुए हम जीवन को सफलता की चरमसीमा तक पहुँचा सकते हैं। यह मार्ग ऋतम्भरा प्रज्ञा के आश्रय के रूप में प्रत्येक के लिए खुला है।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 15

👉 आत्मचिंतन के क्षण 15 Feb 2017

🔵 आत्म-निर्माण के कार्य में सत्संग निःसन्देह सहायक होता है किन्तु आज की परिस्थितियों में इस क्षेत्र में जो विडंबना फैली है, उससे लाभ के स्थान पर हानि अधिक है। सड़े-गले, औंधे-सीधे, रूढ़िवादी, भाग्यवादी, पलायनवादी विचार इन सत्संगों में मिलते हैं। फालतू लोग अपना समुदाय बढ़ाने के लिए सस्ते नुस्खे बताते रहते हैं या किसी देवी देवता के कौतूहल भरे चरित्र सुनाकर उनके सुनने मात्र से स्वर्ग, मुक्ति आदि मिलने की आशा बँधाते रहते हैं। ऐसा विडम्बनापूर्ण सत्संग किसी का क्या हित साधेगा?

🔴 आज सत्संग की आवश्यकता स्वाध्याय से ही पूरी करनी पड़ती है। जहाँ जीवन को प्रेरणाप्रद मार्गदर्शन कर सकने की दृष्टि से उपयुक्त सत्संग मिल सके, वहाँ जाने और लाभ उठाने का प्रयत्न अवश्य करना चाहिए। पर जहाँ व्यर्थ की विडम्बनाओं में समय बर्बाद किया जाता हो, वहाँ जाने में कुछ लाभ नहीं। आज की स्थिति में सरल सत्संग स्वाध्याय ही हो सकता है। आत्मबल बढ़ाने वाला, चरित्र को उज्ज्वल करने वाला, गुणकर्म, स्वभाव में प्रौढ़ता उत्पन्न करने वाला साहित्य उपलब्ध करके नियमित रूप से उसे पढ़ते रहने से भी घर बैठे सत्पुरुषों के साथ सत्संग का लाभ लेने की सुविधा मिल सकती है।

🔵 प्रत्येक मनुष्य को हर घड़ी अपने स्वयं के चरित्र का निरीक्षण करते रहना चाहिए कि उसका चरित्र पशु तुल्य है या सत्पुरुषों जैसा। आत्म-निरीक्षण की प्रणाली का नाम ही स्वाध्याय है। पूर्ण मानव बनने के सद् उद्देश्य से जिनने भी स्वाध्याय का अनुसरण किया है उनकी आत्मा अवश्यमेव परिष्कृत हुई है, उनकी महानता जागृत हुये बिना नहीं रही।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 10)

🌹 विकास और शोध का श्रेय विचार को

🔴 मनुष्य विचार शक्ति को जिस दिशा में प्रयुक्त करता है उधर ही आशाजनक सफलता उपलब्ध होने लगती। चिन्तन की शोध द्वारा अनेकों प्रकार की रहस्यमय प्राकृतिक शक्तियों को जानने और उनको यशवर्ती बनाने में सफलता प्राप्त की गई है, इस शोध-कार्य में सारा श्रेय मानव विचार शक्ति का ही है। ये प्राकृतिक शक्तियां तो अनादि काल से इस सृष्टि में मौजूद थीं पर उनको उपलब्ध कर सकना तभी सम्भव हुआ जब विचार-शक्ति की दौड़ उनके शोध तक पहुंची।

🔵 विचार-शक्ति के विशाल क्षेत्र के द्वारा ही वाणी, भाषा, लिपि, संगीत, अग्नि का उपयोग, कृषि, पशुपालन, जलतरण, वस्त्र निर्माण, धातु प्रयोग, मकान बनाने, संगठित रहने, सामूहिक सुविधा की धर्म-संहिता पर चलने, रोगों की चिकित्सा करने जैसे अनेकों महत्वपूर्ण आविष्कार मनुष्य ने जब तब किये और उनके द्वारा अपनी स्थिति को देवोपम बनाया। मनुष्य अन्य प्राणियों की तुलना में अत्यधिक विभूतिवान है। हम देवताओं के सुखों के बारे में सोचते हैं कि मनुष्य की अपेक्षा उन्हें असंख्य गुने सुख-साधन प्राप्त हैं। धरती के प्राणी भी यदि यह सोच सकें कि उनमें और मनुष्य की सुविधाओं में कितना अन्तर है तो हम उनसे कहीं अधिक सुख-सुविधा से सम्पन्न होंगे जितना कि हम अपनी तुलना में देवताओं को मानते हैं। यह देवोपम स्थिति हमने विचारशक्ति की विशेषता के कारण उसके विकास और प्रयोग के कारण ही उपलब्ध की है।

🔴 पुष्ट विचार-शक्ति को जीवन की जिस दिशा में जितनी मात्रा में लगाना प्रारम्भ कर दिया है, हमें उस दिशा में उतनी ही सफलता मिलने लगती है। विज्ञान की शोध अस्त्र-शस्त्र की सुसज्जा, उत्पादन, राजनीति, शिक्षा चिकित्सा आदि जिन कार्यों में भी हमारा ध्यान लगा हुआ है उनमें तीव्रगति से प्रगति दृष्टिगोचर हो रही है और यदि ध्यान इन कार्यों में केन्द्रीभूत हो इसी प्रकार लगा रहा हो तो भविष्य में उस ओर उन्नति भी आशाजनक होंगी निश्चित है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 18)

🌹 साधनों से भी अधिक सद्गुणों की आवश्यकता

🔵 उदारता, प्रामाणिकता और परमार्थ-परायणता यह तीन ही ऐसे गुण हैं, जिनका उपार्जन-अभिवर्धन करने पर व्यक्ति न केवल अपने को सुखी समुन्नत बना सकता है, वरन् उसके क्रियाकलापों से सम्बद्ध समूचा परिकर ऊँचा उठता, आगे बढ़ता चला जाता है।

🔴 अगली शताब्दी में उज्ज्वल भविष्य की सम्भावनाएँ विनिर्मित करने के लिए क्या सम्पदा जुटानी पड़ेगी? किस प्रकार की योजना और विधि व्यवस्था बनानी जुटानी पड़ेगी? किस स्तर की समृद्धि जुटानी पड़ेगी? इसका ऊहापोह करना समय रहते उचित भी है और आवश्यक भी, किन्तु इतना तो ध्यान रखना ही पड़ेगा कि लोगों की मानसिकता यदि घटिया रही, तो जो इच्छित एवं उपयुक्त है, उसे उपलब्ध कर सकना शताब्दियों सहस्राब्दियों में भी सम्भव न हो सकेगा।  

🔵 साधनों का महत्त्व तो आवश्यक है, पर इतना नहीं कि उन्हें व्यक्तित्व के स्तर से भी ऊँचा माना जा सके। गरीब देशों के लोग सर्वथा निठल्ले-निकम्मे ही रहते हों, ऐसी बात भी नहीं है। शरीर संरचना भी उनकी एक जैसी ही होती है। कई तो उनमें से शिक्षित और समर्थ भी रहते हैं, इतने पर भी गई गुजरी परिस्थितियाँ उनका पीछा नहीं छोड़ती। अभावों, कष्टों, विद्रोहों और संकटों का माहौल कहीं न कहीं से आ ही धमकता है । व्यक्ति को गरिमा सम्पन्न बना सकने में अड़ा रहने वाला अवरोध ही प्रधान इसका कारण होता है, जिसके कारण या तो वे अभीष्ट अर्जन-उत्पादन कर ही नहीं पाते, या फिर से उसे स्वभावगत अस्त-व्यस्तता के कारण ऐसे ही गँवा-उड़ा देते हैं।

🔴 इसके ठीक विपरीत यह भी पाया गया है कि साधु, सज्जन, सद्गुणी, सेवाभावी लोग, नगण्य साधनों से सदाशयता की रीति नीति अपनाए हुए हँसता-हँसाता और खिलता-खिलाता जीवन जी लेते हैं। उन्हीं परिस्थितियों में न केवल स्वयं को वरन् अन्य पिछड़े हुओं को भी ऊँचा उठाने, आगे बढ़ाने में समर्थ होते हैं। ऐसे ही आदर्शवादी, शालीनता सम्पन्नों का अपना पुरातन इतिहास जीवन्त स्थिति में रहा है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌿🌞     🌿🌞     🌿🌞

👉 जीवन कैसे जीयें? (भाग 2)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी

🔴 कार्लमार्क्स मजदूरों से ये कहते थे कि ‘‘मजदूरो! एक हो जाओ, तुम्हें गरीबी के अलावा कुछ खोना नहीं है’’ और मैं ये कहता हूँ कि ‘‘अध्यात्म मार्ग पर चलने वाले विद्यार्थियो! तुम्हें अपनी क्षुद्रता के अलावा और कुछ नहीं खोना है। पाना ही पाना है। आध्यात्मिकता के मार्ग पर पाने के अलावा कुछ नहीं है। इसमें एक ही चीज हाथ से गुम जाती है, उसका नाम है, आदमी की क्षुद्रता और संकीर्णता।’’ क्षुद्रता और संकीर्णता को त्यागने में अगर आपको कोई बहुत कष्ट न होता हो तो मेरी प्रार्थना है कि आप इसको छोड़ दें और आप महानता के रास्ते पर चलें। जीवन में भगवान् को अपना हिस्सेदार बना लें। भगवान् के साथ आप नाता जोड़ लें। जोड़ लेंगे तो ये मुलाकात की हिस्सेदारी आपके बहुत काम आयेगी।

🔵 गंगा ने अपने आपको हिमालय के साथ में जोड़े रखा। गंगा का और हिमालय का तालमेल और उसका रिश्ता-नाता ठीक बना रहा और हमेशा गंगा अपना पानी खर्च करती रही, लेकिन पानी की कमी कभी नहीं पड़ने पाई। हिमालय के साथ रिश्ता हम जोड़ें, भगवान् के साथ रिश्ता हम जोड़ें तो हमारे लिये जीवन में कभी अभावों का, कभी उस तरह के संकटों का अनुभव न करना पड़ेगा, जैसे कि सामान्य लोग पग-पग पर जीया करते हैं।

🔴 गंगा का पानी सूखा नहीं, लेकिन नाली का सूख गया। उसने किसी महान् सत्ता के साथ सम्बन्ध मिलाया नहीं। बाढ़ का पानी आया और उछलने लगा। बाढ़ का पानी सूखा और नाला सूख गया। नौ महीने सूखा पड़ा रहा। बरसाती नाला तीन महीने सूखा पड़ा। लेकिन गंगा युगों से बहती चली आ रही है, कभी भी सूखने का नाम नहीं लिया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/amart_vachan_jivan_ke_sidha_sutra/jivan_kese_jiye

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 104)

🌹 प्रगतिशील जातीय संगठनों की रूपरेखा

🔴 10. आन्दोलन का खर्च:-- हर आन्दोलन कुछ खर्च चाहता है। पैसे के बिना कोई भी काम, संस्थाएं भी अपना काम ठीक नहीं कर पातीं। जातीय-संगठनों का कार्य और आदर्श विवाहों की योजना भी व्ययसाध्य हैं। संगठनकर्त्ता, दफ्तर, पत्र-व्यवहार, मार्गव्यय, प्रचार आदि सभी कार्यों के लिए तो पैसा चाहिये। इसकी पूर्ति हमें निष्ठावान् सदस्यों से मासिक चन्दे के रूप में करना चाहिये। युग-निर्माण योजना के सदस्यों को अपनी आय का एक अंश सामाजिक पुनरुत्थान के लिए अनिवार्य रूप से निकालना होगा। भावनाशील लोगों से यह आशा की जाती है कि वे अपने हृदय की विशालता और उच्च आदर्शवादिता के अनुरूप समय ही नहीं, धन भी उदारतापूर्वक देंगे।

🔵 मासिक चन्दा हर सक्रिय कार्यकर्त्ता को देना चाहिये। इसका आरम्भ अपने लोगों से ही होगा। बाहर के नये लोगों से प्रारम्भ में ही चन्दा मांगने लगने से वे बिचक जाते हैं। जो जितना आस्थावान बनता जाय, उससे उसी अनुपात से आर्थिक सहयोग की भी आशा की जा सकेगी। सम्पन्न एवं दानी लोगों से जो सक्रिय कार्य नहीं कर सकते, पर पैसा दे सकते हैं, उनसे लेना चाहिए। किन्हीं दानी उदार सज्जनों से इन कार्यों के लिए कोई स्थायी जमीन-जायदाद मिल सके तो उसके लिये भी प्रयत्न करना चाहिये। मन्दिरों, धर्मशालाओं की खाली इमारतें संगठन के कार्यालय का काम देने योग्य मिल सकें तो उन्हें लेने का भी प्रयास करना चाहिये, ताकि मकान सम्बन्धी आवश्यकता की पूर्ति बिना खर्च के भी हो सके। धर्म घट रखकर प्रतिदिन एक मुट्ठी अन्न या धर्म पेटी रखकर कुछ पैसे लेने वाला क्रम भी जहां जम सके वहां अवश्य जमाना चाहिये।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 51)

🌹 भावी रूपरेखा का स्पष्टीकरण

🔴 यह तुम्हारे कार्यक्रम का प्रथम चरण है, अपना कर्तव्य पालन करते रहना। यह मत सोचना कि हमारी शक्ति नगण्य है। तुम्हारी कम सही, पर जब हम दो मिल जाते हैं, तब एक और एक मिलकर ग्यारह होते हैं और फिर यह तो दैवी सत्ता द्वारा संचालित कार्यक्रम है। इसमें संदेह कैसा? समय आने पर सारी विधि व्यवस्था सामने आती जाएगी। अभी योजना बनाने और चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। अध्ययन जारी रखो। पुरश्चरण भी करते रहो। स्वतंत्रता सैनिक का काम करो। अधिक आगे की बात सोचने में व्यर्थ ही मन में उद्विग्नता बढ़ेगी। अभी अपनी मातृभूमि में रहो और वहीं से प्रथम चरण के यह तीनों काम करो।

🔵 आगे की बात संकेत रूप में कहे देते हैं। साहित्य प्रकाशन द्वारा स्वाध्याय का और विशाल धर्म संगठन द्वारा सत्संग का, यह दो कार्य मथुरा रहकर करने पड़ेंगे। पुरश्चरण की पूर्णाहुति भी वहीं होगी। प्रेस प्रकाशन भी वहीं से चलेगा। मनुष्य में देवत्व के उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण की प्रक्रिया सुनियोजित ढंग से वहीं से चलेगी। वह प्रयास एक ऐतिहासिक आंदोलन होगा जैसा कि अब तक कहीं भी नहीं हुआ।

🔴 तीसरा चरण इन सूक्ष्म शरीरधारी ऋषियों की इच्छा पूरी करने का है। ऋषि परम्परा का बीजारोपण तुम्हें करना है। इसका विश्वव्यापी विस्तार अपने ढंग से होता रहेगा। यह कार्य सप्त ऋषियों की तपोभूमि सप्त सरोवर हरिद्वार में रहते हुए करना पड़ेगा। तीनों कार्य तीनों जगह उपयुक्त ढंग से चलते रहेंगे अभी संकेत किया है। आगे चलकर समयानुसार इन कार्यों की विस्तृत रूपरेखा हम यहाँ बुलाकर बताते रहेंगे। तीन बार बुलाने के तीन प्रयोजन होंगे।

🔵 चौथी बार तुम्हें भी चौथी भूमिका में जाना है और हमारे प्रयोजन का बोझ इस सदी के अंतिम दशकों में अपने कंधों पर लेना है। तब सारे विश्व में उलझी हुई विषम परिस्थितियों के अत्यंत कठिन और अत्यंत व्यापक कार्य अपने कंधे पर लेने होंगे। पूर्व घोषणा करने से कुछ लाभ नहीं, समयानुसार जो आवश्यक होगा, सो विदित भी होता चलेगा और सम्पन्न भी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/bhavi

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 52)

🔵 सुनहरी धूप ऊंचे पर्वत शिखरों से उतर कर पृथ्वी पर कुछ देर के लिए आ गई थी। मानो अविद्याग्रस्त हृदय में सत्संगवश स्वल्पस्थायी ज्ञान उदय हो गया। ऊंचे पहाड़ों की आड़ में सूरज इधर उधर ही छिपा रहता है केवल मध्यान्ह को ही कुछ घण्टों के लिये उनके दर्शन होते हैं उनकी किरणें सभी सुकुड़ते हुए जीवों में चेतना की एक लहर दौड़ा देती हैं। सभी में गतिशीलता और प्रसन्नता उमड़ने लगती है। आत्म ज्ञान का सूर्य भी प्रायः वासना और तृष्णा की चोटियां के पीछे छिपा रहता है पर जब कभी जहां कहीं वह उदय होगा वहीं उसकी सुनहरी रश्मियां एक दिव्य हलचल उत्पन्न करती हुई अवश्य दिखाई देंगी।

🔴 अपना शरीर भी स्वर्णिम रश्मियों का आनन्द लेने के लिए कुटिया से बाहर निकला और मखमल के कालीन सी बिछी हरी घास पर टहलने की दृष्टि से एक ओर चल पड़ा। कुछ ही दूर रंग-बिरंगे फूलों का एक बड़ा पठार था। आंखें उधर ही आकर्षित हुईं और पैर उसी दिशा में उठ चले।

🔵 छोटे बच्चे अपने सिर पर रंगीन टोपे पहने हुए पास-पास बैठकर किसी खेल की योजना बनाने में व्यस्त हों ऐसे लगते थे वे पुष्प सज्जित पौधे। मैं उन्हीं के बीच जाकर बैठ गया। लगा जैसे मैं भी एक फूल हूं। यदि ये पौधे मुझे भी अपना साथी बनालें तो मुझे भी अपने खोये बचपन पाने का पुण्य अवसर मिल जाय।

🔴 भावना आगे बढ़ी। जब अन्तराल हुलसता है तो तर्कवादी कुतर्की विचार भी ठण्डे पड़ जाते हैं। मनुष्य के भावों में प्रबल रचना शक्ति है वे अपनी दुनिया आप बसा लेते हैं। काल्पनिक ही नहीं शक्तिशाली भी सजीव भी। ईश्वर और देवताओं तक ही रचना उसने अपनी भावना के बल पर की है और उनमें अपनी श्रद्धा को पिरोकर उन्हें इतना महान बनाया है जितना कि वह स्वयं है। अपने भाव फूल बनने को मचले तो वैसा ही बनने में देर न थी। लगा कि इन पंक्ति बनाकर बैठे हुए पुष्प बालकों ने मुझे भी सहचर मान कर मुझे भी अपने खेल में भाग लेने के लिए सम्मिलित कर लिया है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 शहीद भगत सिंह से जुड़ी एक ग़लत जानकारी फैलाने की कोशिश

🔴 शहीद भगत सिंह से जुड़ी एक ग़लत जानकारी फैलाने की कोशिश की गई कि उन्हें 23 मार्च को नहीं, 14 फरवरी को फांसी दी गई थी. पर हकीकत ये है कि 1929 में असेंबली में बम फेंकने के बाद भगत सिंह को अंग्रेजों ने गिरफ्तार किया था. भगत सिंह से जुड़े इस मामले की तेज गति से सुनवाई के लिए तब के वायसराय लॉर्ड इरविन ने एक प्रीवी काउंसिल का गठन किया था. तब एक भारतीय डिफेंस कमेटी ने प्रीवी काउंसिल के खिलाफ पंजाब में अपील की थी, जिसे जज विस्काउंट डुनेडिन ने ठुकरा दिया था।

🔵 इसके बाद 14 फरवरी 1931 को कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष मदन मोहन मालवीय लॉर्ड इरविन के सामने एक यदा याचिका डाली, मगर ये याचिका भी स्वीकार नहीं की गई और भगत सिंह को 23 मार्च 1931 को शाम 7 बजकर 30 मिनट पर लाहौर जेल में फांसी दे दी गई. भगत सिंह के साथ उनके दो साथी राजगुरु और सुखदेव भी थे.


🔴  Freedom fighters Bhagat Singh, Sukhdev Thapar and Shivaram Rajguru were three great sons of India, who breathed their last as 'martyrs'. All three of them were influential revolutionaries, who sacrificed their young lives to make their motherland, free from the shackles of the British rule.

🔵 Bhagat Singh, a Sandhu Jat, became so popular that he had become the symbol of the new awakening among the youths.

🔴  According to facts, Bhagat Singh, Rajguru and Sukhdev were sentenced to death in 'Lahore conspiracy case' and were ordered to be hanged on 24 March, 1931. But, the schedule was moved forward by 11 hours and they were actually executed on 23 March, 1931 at 7:30 pm.

🔵 However, there has been a controversial 'malicious campaign' doing the rounds on social media, about the date of deaths of the three martyrs.

🔴  Whether it is a hoax or a rumuor, some claim that Bhagat Singh and his comrades were hanged on February 14, 1931, a day that is celebrated as Valentine's day.

🔵 When rumours are spread on such sensitive issues, then, it shows that we are not giving sufficient acknowledgement for the sacrifices made by our great freedom fighters. Spreading misinformation about the date of their deaths is not only a mockery on their struggle, but also a conspiracy to spread feelings of hatred, on a day that is meant to spread love. On the social networking site Facebook, many people have mentioned that, "Most of us know 14th Feb as Valentine Day.. but in the morning of 14.02.1931 at Lahore, the legendaries were hanged to their deaths. We only celebrate valentine day.. Let us pass this message to every 1 we know,to salute and pay respect to their sacrifice also.. Let Us Be An Indian First..!!"

🔴  So, it's an appeal to all rumourmongers, please do not spread venomous propoganda by twisting the facts about the freedom fighters' martyrdom.

👉 अपना अपना भाग्‍य

एक राजा के तीन पुत्रियाँ थीं और तीनों बडी ही समझदार थी। वे तीनो राजमहल मे बडे आराम से रहती थी। एक दिन राजा अपनी तीनों पुत्रियों सहित भोज...