शनिवार, 28 जनवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 29 Jan 2017


👉 आज का सद्चिंतन 29 Jan 2017


👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 22) 29 Jan

🌹 व्यावहारिक साधना के चार पक्ष 

🔴 ज्ञान और कर्म के संयोग से ही प्रगतिपथ पर चल सकना, सफलता वरण करने की स्थिति तक पहुँचना सम्भव होता है। अध्यात्म विज्ञान में भी तत्त्वदर्शन का सही स्वरूप समझने के उपरान्त दूसरा चरण यही रहता है कि उसे क्रियान्वित करने की, पूजा-अर्चना की विधि व्यवस्था ठीक बने। अध्यात्म का तत्त्वदर्शन, आत्मपरिष्कार और आत्मविकास को दो शब्दों में सन्निहित समझा जा सकता है। उपासना पक्ष की प्रतीक पूजा का तात्पर्य है-क्रिया एवं साधनों के सहारे आत्मशिक्षण की आवश्यकता पूरी करना। कोई भी कर्मकाण्ड उसकी भावनाओं को हृदयंगम किये बिना पूर्ण नहीं हो सकता। मात्र कर्मकाण्ड को जादू का खेल समझते हुए बड़ी सफलता की आशा नहीं की जा सकती। क्रियायें जब जिसको जिस मात्रा में प्रभावित करेंगी, वह उसी मात्रा में सत्परिणाम प्राप्त कर सकने में सफल होगा।               

🔵 सर्वजनीन सुलभ साधना का स्वरूप प्रस्तुत करते हुए इन पृष्ठों पर प्रज्ञायोग नाम से वह विधान प्रस्तुत किया जा रहा है, जिसके सहारे अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति में अन्यान्य उपाय-उपचारों की अपेक्षा अधिक सरलतापूर्वक कम समय में अधिक सफलता मिल सकती है।  

🔴 प्रज्ञायोग की दो संध्यायें अत्यधिक सरल और अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं। एक सबेरे आँख खुलते ही बिस्तर पर पड़े-पड़े पन्द्रह मिनट ‘‘हर दिन नया जन्म’’ की भावना करने का उपक्रम है। दूसरा रात्रि को सोते समय यह अनुभव करना कि शयन एक प्रकार का दैनिक मरण है। जन्म और मरण यही दो जीवन सत्ता के ओर-छोर हैं। इन्हें सही रखा जाये तो मध्यवर्ती भाग सरलतापूर्वक सम्पन्न हो जाता है। बीजारोपण और फसल काटना, यही दो कृषि कार्य के प्रमुख अंग हैं। शेष तो लम्बे समय तक चलने वाली किसान की सामान्य क्रिया-प्रक्रिया है। उसे तो सामान्य बुद्धि और सामान्य अभ्यास से भी चलाया जा सकता है। जाग्रति को प्रात:काल की संध्या और शयन को रात्रि की संध्या कहा जा सकता है। दो बार संध्यायें सूर्योदय और सूर्यास्त के समय वाली मानी जाती हैं। पर उसके साथ जुड़ी आध्यात्मिक साधना प्रात:काल आँख खुलते समय और रात्रि को सोने, आँख बन्द होने के समय की जा सकती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 तीन मछलियां

🔴 एक सरोवर मे तीन दिव्य मछलिया रहती थी। वहाँ की तमाम मछलिया उन तीनो के प्रति ही श्रध्दा मे बटी हुई थी।

🔵 एक मछली का नाम व्यावहारिक बुद्धि था, दुसरी का नाम मध्यम बुद्धि और तीसरी का नाम अति बुद्धि था।

🔴 अति बुद्धि के पास ज्ञान का असीम भंडार था। वह सभी प्रकार के शास्त्रो का ज्ञान रखती थी। मध्यम बुद्धि को उतनी ही दुर तक सोचने की आदत थी, जिससे उसका वास्ता पड़ता था। वह सोचती कम थी, परंपरागत ढंग से अपना काम किया करती थी। व्यवहारिक बुद्धि न परंपरा पर ध्यान देती थी और न ही शास्त्र पर। उसे जब जैसी आवश्यकता होती थी निर्णय लिया करती थी और आवश्यकता न पड़नेँ पर किसी शास्त्र के पन्ने तक नही उलटती थी।

🔵 एक दिन कुछ मछुआरे सरोवर के तट पर आये और मछलियो की बहुतायत देखकर बाते करनेँ लगे कि यहाँ काफी मछलियाँ है, सुबह आकर हम इसमे जाल डालेगे।

🔴 उनकी बाते मछलियो ने सुनी।

🔵 व्यवहारिक बुद्धि ने कहा-” हमे फौरन यह तालाब छोड़ देना चाहिए। पतले सोतो का मार्ग पकड़कर उधर जंगली घास से ढके हुए जंगली सरोवर मे चले जाना चाहिये।”

🔴 मध्यम बुद्धि ने कहा- ” प्राचीन काल से हमारे पूर्वज ठण्ड के दिनो मे ही वहा जाते है और अभी तो वो मौसम ही नही आया है, हम हमारे वर्षो से चली आ रही इस परंपरा को नही तोड़ सकते। मछुआरो का खतरा हो या न हो, हमे इस परंपरा का ध्यान रखना है।”

🔵 अति बुद्धि ने गर्व से हँसते हुए कहा-” तुम लोग अज्ञानी हो, तुम्हे शास्त्रो का ज्ञान नही है। जो बादल गरजते है वे बरसते नही है। फिर हम लोग एक हजार तरीको से तैरना जानते है, पानी के तल मे जाकर बैठने की सामर्थ्यता है, हमारे पूंछ मे इतनी शक्ति है कि हम जालो को फाड़ सकती है। वैसे भी कहा गया है कि सकटो से घिरे हुए हो तो भी अपने घर को छोड़कर परदेश चले जाना अच्छी बात नही है। अव्वल तो वे मछुआरे आयेगे नही, आयेगे तो हम तैरकर नीचे बैठ जायेगी उनके जाल मे आयेगे ही नही, एक दो फस भी गई तो पुँछ से जाल फाड़कर निकल जायेंगे। भाई! शास्त्रो और ज्ञानियो के वचनो के विरुद्ध मै तो नही जाऊँगी।”

🔴 व्यवहारिक बुद्धि ने कहा-” मै शास्त्रो के बारे मे नही जानती, मगर मेरी बुद्धि कहती है कि मनुष्य जैसे ताकतवर और भयानक शत्रु की आशंका सिर पर हो, तो भागकर कही छुप जाओ।” ऐसा कहते हुए वह अपने अनुयायिओं को लेकर चल पड़ी।

🔵 मध्यम बुद्धि और अति बुद्धि अपने परपरा और शास्त्र ज्ञान को लेकर वही रूक गयीं। अगले दिन मछुआरो ने पुरी तैयारी के साथ आकर वहाँ जाल डाला और उन दोनोँ की एक न चली। जब मछुआरे उनके विशाल शरीर को टांग रहे थे तब व्यवहारिक बुद्धि ने गहरी साँस लेकर कहा-” इनके शास्त्र ज्ञान ने ही धोखा दिया। काश! इनमे थोड़ी व्यवहारिक बुद्धि भी होती।”

🔴 व्यवहारिक बुद्धि से हमारा आशय है कि किस समय हमे क्या करना चाहिए और जो हम कर रहे है उस कार्य का परिणाम निकलने पर क्या समस्याये आ सकती है, यह सोचना ही व्यवहारिक बुद्धि है। बोलचाल की भाषा में हम इसे सामान्य ज्ञान (कॉमन सेंस) भी कहते हैं, और भले ही हम बड़े ज्ञानी ना हों मोटी-मोटी किताबें ना पढ़ीं हों लेकिन हम अपनी व्य्वयहारिक बुद्धि से किसी परिस्थिति का सामना आसानी से कर सकते हैं।

 

👉 आत्मचिंतन के क्षण 29 Jan 2017

🔴 परिवार परमात्मा की ओर से स्थापित एक ऐसा साधन  है, जिसके द्वारा हम अपना आत्म-विकास सहज ही में कर सकते हैं और आत्मा में सतोगुण को परिपुष्ट कर सुखी, समृद्ध जीवन व्यतीत कर सकते हैं। मानव जीवन की सर्वांगपूर्ण सुव्यवस्था के लिए पारिवारिक जीवन प्रथम सोपान है, क्योंकि मनुष्य केवल कर्म, सेवा-साधना द्वारा ही अपना पूर्ण विकास कर सकता है।

🔵 मातृत्व पर-नारीत्व पर सर्वाधिक लानत फेंकने का काम दहेज के राक्षस ने किया है। इसे समझा भी गया तथा उसके निवारण के प्रयास भी बहुत हुए,सामाजिक भर्त्सनाएँ की गई, कानून भी बना। दहेज के प्रतिरोध में सैकड़ों विचारशील व्यक्तियों ने लिखा, भाषण किया, पर पुरानी पीढ़ी अपने स्थान से तिल भर हटने की तैयारी नहीं। दहेज के दानव ने हर किसी का अहित किया है, पर अपनी बाजी से कोई नहीं चूकता। जब कोई साहसपूर्वक प्रतिरोध, संघर्ष एवं आदर्श उपस्थित करने को तैयार होगा, तभी कुछ समस्या हल होगी। यह आशा अब नये रक्त से हीस शेष है।

🔴 शिक्षित नारी को छिछली चमक-दमक की नई पराधीनता से स्वयं मुक्त होकर देवी-देवताओं, भूत-पलीतों, महन्तों, मठाधीशों, रूढ़ियों-कुरीतियों, अंध परम्पराओं, पूर्वाग्रहों-दुराग्रहों की पुरानी पराधीनता से जकड़ी नारी के उद्धार के लिए आगे आना ही चाहिए। यह उसकी सामाजिक, नैतिक तथा मानवीय जिम्मेदारी है। अपनी इस जिम्मेदारी को निभाने की इच्छा तथा संकल्प जिस शिक्षित नारी में जाग्रत् हो उठे वह नई तथा पुरानी दोनों पराधीनताओं से सामूहिक मुक्ति के लिए सक्रिय हो उठेगी।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 38) 29 Jan

🌹 अभियान साधना के नियम
🔴 अभियान साधकों को गुरुवार के दिन प्रमुखतः तीन नियमों का पालन करना होता है उपवास, मौन और ब्रह्मचर्य। इन तीनों का जितनी ही कड़ाई के साथ पालन किया जाय उतना ही उत्तम है। उपवास में हो सके तो दूध, छाछ, रस जैसे पेय पदार्थ ही लिए जाएं तो सर्वोत्तम है। किन्तु इससे काम न चले तो शाकाहार भी लिया जा सकता है। इतना भी कठिन पड़े तो एक समय भोजन किया जा सकता है। उस एक समय के भोजन में अस्वाद व्रत का पालन अनिवार्य रूप से करना चाहिए। नमक और शक्कर दोनों में से एक भी न लिया जाय।

🔵 यह स्वाद संयम जिव्हा संयम का एक पक्ष है। इसका दूसरा पक्ष है—संतुलित और सुसंस्कृत भाषण। इसके लिए पुराने अभ्यास को रोकने और नया अभ्यास आरम्भ करने का मध्यम उपाय मौन है। पूरे दिन मौन रखना तो कामकाजी व्यक्ति के लिए कठिन पड़ता है पर प्रातःकाल अथवा जब भी सुविधा हो दो घण्टे की मौन साधना बिना किसी अड़चन के की जा सकती है। जितने समय मौन रहा जाय, वह समय मनन, चिन्तन में लगाया जाय। मनन का अर्थ है—आत्मचिन्तन, अपनी वर्तमान स्थिति का आलोचक की दृष्टि से विवेचन।

🔴 इस विवेचन से अपने भीतर जो दोष, दुर्गुण दिखाई दें, जो आदतें अनुपयुक्त जान पड़े, उनके निराकरण की योजना बनाना तथा जिन सत्प्रवृत्तियों का अपने में अभाव है, उनके अभिवर्धन की योजना बनाना, इसी का नाम चिन्तन है। अपना आत्म-विवेचन मनन है और त्रुटियों के निराकरण तथा सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन की योजना बनाना चिन्तन कहा जा सकता है। इन्हीं दो कार्यों में चित्त को मौन की अवधि में व्यस्त रहना चाहिए। स्मरण रखा जाय कि मौन का अर्थ मात्र चुपचाप बैठे रहना नहीं है। इस अवधि को एकांत में बिताना चाहिए। मुंह से कुछ न बोलकर जबान बन्द रखकर भी इशारेबाजी की जाती है तो उससे मौन का प्रयोजन पूरा नहीं होता। यह आत्मश्लाघा तो मौन न रखने से भी बुरी है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 37) 28 Jan

🌹 अभियान साधना के नियम

🔴 कहा जा चुका है कि अभियान उन साधकों के लिए है जो अपने सामान्य उपासना क्रम का स्तर बढ़ाकर, उसे ऊंचा उठाकर और अधिक लाभ प्राप्त करना चाहते हों। एक-दो, तीन माला का जप और ध्यान आरम्भिक कक्षा है। यह उपासना आरम्भ करते समय साधक से कहा जाता है कि मन लगने न लगने पर भी ज्यों-त्यों इस अभ्यास को जारी रखा जाए, समय न मिले तो मानसिक जप किसी भी समय किया जा सकता है। लेकिन इतना ध्यान रखना चाहिए कि वह सब नियमित हो। यदि प्रयत्न किया जाय तो ऐसा समय आसानी से निश्चित किया जा सकता है कि उस समय अवकाश रहे और उपासना नियमित रूप से चल सके।

🔵 आरम्भिक कक्षा से आगे बढ़कर उच्च कक्षा में प्रवेश के लिए ही अभियान साधना का उपक्रम है। तितिक्षा, तप आदि नियमानुशासनों का नियमित रूप से पालन हो सके तो अच्छा ही है। पर जिन नियमों का अभ्यास ही नहीं है, उसके लिए आरम्भ छोटे रूप में किया जाना चाहिए और इसी के लिए सप्ताह में एक दिन इन व्रत-नियमों के पालन की बात कही गई है। पूरी दिनचर्या ही अनुशासित नियमबद्ध और तप परायण बन सके तो कहना ही क्या? लक्ष्य वही रखना चाहिए। गुरुवार को अनुष्ठान नियमों का पालन करना इसीलिए आवश्यक रखा गया है कि साधक ये नियमादि याद रखे तथा उनकी प्रेरणा, दिशा निरन्तर नियमित रूप से प्राप्त करता रहे। इन्हें सदैव पालन करना निषिद्ध नहीं है। सप्ताह में एक दिन इस चर्या का पालन न्यूनतम को आवश्यक समझते हुए निर्धारित किया है।

🔴 सर्वविदित है कि अनुष्ठानों में आहार-विहार के दोनों पक्षों पर नियन्त्रण, संयम करना पड़ता है। भोजन में पूरे या अधूरे उपवास की रीति-नीति का यथासम्भव समावेश, ब्रह्मचर्य का पालन, अपनी सेवाएं आप करने का प्राविधान है। तितिक्षा का अभ्यास करने के लिए भूमिशयन जैसी कठोरताएं अपनानी पड़ती हैं। इस तरह के और भी कितने ही तप-साधना, व्रत अनुशासन है जो जप-ध्यान जैसे सामान्य उपासनाक्रम को सशक्त एवं प्रभावोत्मक बनाने में समर्थ है। अभियान-साधना में भी इस प्रकार की कठोरताओं का यथासम्भव पालन करना चाहिए। इसी उद्देश्य से गुरुवार का दिन संयम साधना के लिए निर्धारित है ताकि साधक को अपनी जीवन-नीति का स्मरण ही नहीं अभ्यास भी बना रहे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 पराक्रम और पुरुषार्थ (अन्तिम भाग) 28 Jan

🌹 साहस का शिक्षण—संकटों की पाठशाला में

🔵 यों तो कुछ असामान्य कर जाने की ललक अधिकांश व्यक्तियों में होती है पर विरले होते हैं जो अपनी विशिष्टता का प्रमाण दे पाते हैं। अन्यथा बहुतेरे मात्र काल्पनिक उड़ानें भरते हैं। अभीष्ट स्तर का साहस न जुटा पाने, पुरुषार्थ का परिचय न दे पाने के कारण कुछ दिखाने की मुराद उनकी कभी पूरी नहीं हो पाती। जैसे तैसे वे जीवन के दिन गुजारते और अतृप्त इच्छा लिए हुए इस दुनिया से चल देते हैं।

🔴 कुछ ऐसे भी होते हैं जिन्हें खाने कमाने के ढर्रे का जीवन नहीं रुचता। बिना कुछ असाधारण काम किये चैन नहीं पड़ता। भीतर का जीवन विशेषकर गुजरने के लिए उछाल मारता है। साधनों की प्रतिकूलता में भी वे चल पड़ते हैं, अपने एकाकी बलबूते भी चमत्कारी स्तर की सफलताएं अर्जित कर लेती हैं। उनके प्रचण्ड पुरुषार्थ के समक्ष प्रतिकूलताओं को भी नत मस्तक होना पड़ता हे। उनका प्रयास उस मछली की तरह होता है जो नदी की प्रचण्ड धारा को उल्टी दिशा में चीरती हुई चली जाती है। रोमांचिक साहसिक अभियान ऐसे ही पुरुषार्थी पूरा कर पाने में सफल होते हैं।

🔵 जैकी टेरी नामक एक व्यक्ति ने इंग्लिश चैनल को साइकिल द्वारा पार करने का निश्चय किया। अनेकों व्यक्तियों ने तैरकर तो चैनल का पार किया था, पर साइकिल से पार करना संकटों से भरा हुआ था। थोड़ा भी सन्तुलन गड़बड़ा जाने पर मृत्यु की गोद में जा पहुंचने का खतरा था। उसने विशेष प्रकार की साइकिल बनवाई जिसके पहिये रबर टायर के थे। साइकिल के डूबने का खतरा तो नहीं था सन्तुलन बनाये रखना अत्यन्त कठिन कार्य था। टेरी को डोवर (यू.के.) नामक स्थान से कैलाइस (फ्रांस) तक पहुंचना था। साइकिल लेकर वह चल पड़ा। तीव्र प्रवाह में वह इतनी बार गिरते-गिरते बचा पर उसने हिम्मत नहीं हारी मात्र आठ घण्टे में चैनल के दूसरे किनारे पहुंचकर एक नया और अद्भुत कीर्तिमान स्थापित किया।

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 आप अपने आपको पहचान लीजिये (भाग 9)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी
🔴 रीछ बंदरों का जीवन धन्य हो गया। लंका की पराजय हो गई और रामराज्य स्थापित हो गया। यदि रामराज्य स्थापित न हुआ होता तब रावण की पराजय न हुई होती तब और सीता को वापस नहीं लाया गया होता तब तो जो हम और आप राम नाम लेते हैं कहाँ लेते राम नाम। यो कहते कि उसकी बीबी को तो रावण चुरा ले गया इतनी हिम्मत तो थी नहीं कि बीबी को छुड़ा लाता राम काहे का भगवान् काहे बात का। उन्होंने रीछ बंदरों ने भगवान् बना दिया राम को। रीछ बंदरों ने रामराज्य की स्थापना कर दी। किसने स्थापना की मनुष्यों ने स्थापना की। चेतन में सामर्थ्य होती है जड़ में सामर्थ्य नहीं होती। बन्दूकों में सामर्थ्य नहीं होती तोपों में सामर्थ्य नहीं होती परमाणु बमों में सामर्थ्य नहीं होती मनुष्यों की जीवात्माओं में और मनुष्यों के भीतर जो चेतना समाई हुई है उसमें शक्ति होती है।

🔵 आपके भीतर बहुत शक्ति है और उस शक्ति का ठीक इस्तेमाल इस समय करें और आप सोये नहीं। यह न तो इस बात का समय है कि आप अपने आपको भूल जाये कि आप कौन हैं और न यह इस बात का समय है कि आप यह देखें कि सारी दुनिया का भाग्य लिखा जा रहा है यह ऐसा वक्त है जैसा कि संविधान किसी जमाने में लिखा गया था हिन्दुस्तान का संविधान यह है इसी तरीके से मानव जाति का भविष्य और भाग्य अभी लिखा जा रहा है और उस लिखे हुये भाग्य और भविष्य में आपका कोई योगदान होना चाहिये कि नहीं। होना चाहिये। मेरा ख्याल है कि आपका योगदान जरूर होना चाहिये। और आप योगदान करेंगे तो कोई अच्छी बात है। नहीं साहब तो हम आपका कहना क्यों माने।

🔴 तो आप हमारा कहना इसलिये मानिए कि हम जिम्मेदार आदमी हैं। और हम अपने जीवन में सफल आदमी हैं। जो बात हम कहते हैं जानबूझकर कहते हैं समझ बूझकर कहते हैं अपनी जबान का ख्याल रखते हुए कहते हैं आपकी भलाई का ध्यान रखते हुए कहते हैं और ५०० करोड़ मनुष्य हमारे दिमाग के आसपास घूमते हैं उनके जीवन मरण का प्रश्न देखकर आपसे कहते हैं। कि आप थोड़ा सा समय निकाल दीजिये हमारे लिए हमें बहुत सख्त जरूरत है। काहे की हमें भी साहब बहुत जरूरत है। आपको भी होगी मैं यह थोड़े कहता हूँ कि आपको खेती नहीं करनी मैं यह थोड़े कहता हूँ कि आपके पास दुकान नहीं है। मैं यह थोड़े कहता हूँ कि आप एक साल फैल हो जायेंगे इम्तहान में तो कोई बहुत बड़ी मुसीबत आ जायेगी। नहीं मैं कहा कह रहा हूँ आपसे थोड़ा यह कह रहा हूँ कि आप इस समय के लिए निकाल लीजिये।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/lectures_gurudev/31.4

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 89)

🌹 आदर्श विवाहों के लिए 24 सूत्री योजना

🔴 20. दावत में अधिक संख्या में मिठाइयां न हों?:-- खाद्य संकट और चीनी की कमी का ध्यान रखते हुये मिठाइयां न बनाई जांय और बनानी भी हों तो इनकी संख्या दो तीन से अधिक न हो।

🔵 अधिक संख्या में मिष्ठान्न पकवान बनाने से उनकी तादाद इतनी हो जाती है कि उन सबको खा सकना सम्भव नहीं होता। फलस्वरूप वे बचती और बर्बाद होती हैं। आज ऐसी बर्बादी का समय नहीं। खाने वालों से अनुरोध किया जाय कि वे उतनी वस्तुयें लें जो खा सकें। परोसने वालों से कहा जाय कि वे प्रेम और आतिथ्य तो दिखाएं पर बर्बादी जरा भी न हो इस कला से परसें। अन्न की बर्बादी को देश-द्रोह समझा जाय। अन्न देवता को जूठन के रूप में तिरस्कृत करना धार्मिक दृष्टि से भी अवांछनीय है। मेहतर को जूठन देने की ‘उदारता’ दर्शाने के स्थान पर उसे और भी अधिक उदारता के साथ अच्छा शुद्ध भोजन देना चाहिये।

🔴 उच्छृंखलता एवं अशिष्टता न बरती जाय—हल्दी के थापे लगाना, रंग फेंक कर कपड़े खराब करना, भद्दे मजाक करना जैसे उच्छृंखल अशिष्ट व्यवहार न हों।

🔵 देखा जाता है कि विवाहों के अवसर पर उच्छृंखलता और गन्दे मजाकों का वातावरण बन जाता है। यह अवांछनीय है। इस महंगाई के जमाने में कपड़े खराब कर देना, कहीं पर गुलाल, बूरा आदि वस्तुयें मल कर आंखों को हानि पहुंचाने का खतरा उत्पन्न कर देना अनुचित है। महिलायें अश्लील गीत गाकर अपना गौरव ही घटाती हैं और आगन्तुक अतिथियों का मजाक उड़ना धृष्टता है। ऐसी ओछी बातें सभ्य लोगों के लिये अशोभनीय है, जहां ऐसा कुछ प्रचलित हो उसे रोका जाय।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 36)

🌹  गुरुदेव का प्रथम बुलावा-पग-पग पर परीक्षा

🔴  गुरुदेव द्वारा हमारी हिमालय बुलावे की बात मत्स्यावतार जैसी बढ़ती चली गयी। पुराण की कथा है कि ब्रह्माजी के कमण्डलु में कहीं से एक मछली का बच्चा आ गया। हथेली में आचमन के लिए कमण्डलु लिया तो वह देखते-देखते हथेली भर लम्बी हो गयी। ब्रह्माजी ने उसे घड़े में डाल दिया क्षण भर में वह उससे भी दूनी हो गयी तो ब्रह्माजी ने उसे पास के तालाब में डाल दिया, उसमें भी वह समाई नहीं तब उसे समुद्र तक पहुंचाया गया। देखते-देखते उसने पूरे समुद्र का आच्छादित कर लिया। तब ब्रह्माजी को बोध हुआ। उस छोटी सी मछली में अवतार होने की बात जानी, स्तुति की और आदेश मांगा, बात पूरी होने पर मत्स्यावतार अन्तर्ध्यान हो गये और जिस कार्य के लिए वे प्रकट हुए थे वह कार्य सुचारु रूप से सम्पन्न हो गया।

🔵  हमारे साथ भी घटना क्रम ठीक इसी प्रकार चले हैं। आध्यात्मिक जीवन वहां से आरम्भ हुआ था जहां कि गुरुदेव ने परोक्ष रूप महामना जी से गुरु दीक्षा दिलवायी थी। यज्ञोपवीत पहनाया था और गायत्री मन्त्र की नियमित उपासना करने का विधि-विधान बताया था। छोटी उम्र थी पर उसे पत्थर की लकीर की तरह माना और विधिवत् निबाहा। कोई दिन ऐसा नहीं बीता जिसमें नागा हुई हो। साधना नहीं तो भोजन नहीं। इस सिद्धान्त को अपनाया। वह आज तक ठीक चला है और विश्वास है कि जीवन के अन्तिम दिन तक यह निश्चित रूप से निभेगा।

🔴  इसके बाद गुरुदेव का प्रकाश रूप में साक्षात्कार हुआ। उनने आत्मा को ब्राह्मण बनाने के निमित्त 24 वर्ष की गायत्री पुरश्चरण साधना बताई। वह भी ठीक समय पर पूरी हुई। इस बीच में बैटरी चार्ज कराने के लिए- परीक्षा देने के लिए बार-बार हिमालय आने का आदेश मिला। साथ ही हर यात्रा में एक-एक वर्ष या उससे कम दुर्गम हिमालय में ही रहने के निर्देश भी। वह क्रम भी ठीक प्रकार चला और परीक्षा में उत्तीर्ण होने पर नया उत्तरदायित्व भी कन्धे पर लदा। इतना ही नहीं उसका निर्वाह करने के लिए अनुदान भी मिला, ताकि दुबला बच्चा लड़खड़ा न जाय। जहां गड़बड़ाने की स्थिति आई वहीं मार्गदर्शक ने गोदी में उठा लिया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/gur

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 36)

🌞 हिमालय में प्रवेश (जंगली सेब)

🔵 आज रास्ते में और भी कितने ही यात्रियों का साथ था। उनमें कुछ स्त्रियां भी थीं। रास्तों में बिन्नी के पेड़ों पर लगे हुए सुन्दर फल दीखे। स्त्रियां आपस में पूछने लगीं यह किस-किस के फल हैं। उन्हीं में से एक ने कहा यह जंगली सेब हैं। न मालूम उसने जंगली सेब की बात कहां से सुन रखी थी। निदान यही तय हुआ कि यह जंगली सेब के फल हैं। फल खूब लदे हुए था। देखने में पीले और लाल रंग मिले हुए बहुत सुन्दर लगते थे और प्रतीत होता था यह खूब पके हैं।

🔴 वह झुण्ड रुक गया। सयानी सी लड़की पेड़ पर चढ़ गई, लगता था उसे अपने ग्रामीण जीवन में पेड़ों पर चढ़ने का अभ्यास रहा है। उसने 40-40 फल नीचे गिराये। नीचे खड़ी स्त्रियों ने उन्हें आपा-धापी के साथ बीना। किसी के हाथ ज्यादा लगे किसी के कम। जिसके हाथ कम लगे थे वह उससे लड़ रही थी जिसने ज्यादा बीने थे। लड़ती जाती थी और कहती जाती थी तूने रास्ता रोक कर झपट कर अधिक बीन लिए, मुझे नहीं बीनने दिए। जिसके पास अधिक थे वह कह रही थी मैंने भाग दौड़ कर अपने पुरुषार्थ पर बीने हैं जिसके हाथ पैर चलेंगे वही तो नफे में रहेगा। तुम्हारे हाथ-पैर चलते तो तुम भी अधिक बीनती।

🔵 इन फलों को अगली चट्टी पर भोजन के साथ खायेंगे, बड़े मीठे और सुन्दर यह होते हैं। रोटी के साथ खाने में अच्छे लगेंगे। धोती के पल्लू में बांधकर वे प्रसन्न होती हुईं चल रही थीं कि कीमती फल, इतनी तादाद में उनने अनायास ही पा लिये। लड़ाई झगड़ा तो शान्त हो गया था पर ज्यादा कम बीनने की बात पर मनोमालिन्य जो उत्पन्न हुआ था वह बना हुआ था। एक दूसरे की नाराजी के साथ घूर-घूर का देखती चलती थीं।

🔴 चट्टी आई। सब लोग ठहरे। भोजन बना। फल निकाले गये। जिसने चखे उसी ने थू-थू किया। वे कड़वे थे। इतनी मेहनत से लड़ झगड़ कर लाये हुए सुन्दर दीखने वाले जंगली सेब कड़वे और बेस्वाद थे उसे देखकर उन्हें बड़ी निराशा हुई। सामने खड़ा हुआ पहाड़ी कुली हंस रहा था। उसने कहा ‘‘यह तो विन्नी का फल है। उसे कोई नहीं खाता। इसकी गुठली का तेल भर निकालते हैं।’’ वे समझे बूझे इन्हें बीनने, लाने और खाने की मूर्खता पर वे सभी स्त्रियां संकुचा रही थीं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य