शनिवार, 28 जनवरी 2017

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 89)

🌹 आदर्श विवाहों के लिए 24 सूत्री योजना

🔴 20. दावत में अधिक संख्या में मिठाइयां न हों?:-- खाद्य संकट और चीनी की कमी का ध्यान रखते हुये मिठाइयां न बनाई जांय और बनानी भी हों तो इनकी संख्या दो तीन से अधिक न हो।

🔵 अधिक संख्या में मिष्ठान्न पकवान बनाने से उनकी तादाद इतनी हो जाती है कि उन सबको खा सकना सम्भव नहीं होता। फलस्वरूप वे बचती और बर्बाद होती हैं। आज ऐसी बर्बादी का समय नहीं। खाने वालों से अनुरोध किया जाय कि वे उतनी वस्तुयें लें जो खा सकें। परोसने वालों से कहा जाय कि वे प्रेम और आतिथ्य तो दिखाएं पर बर्बादी जरा भी न हो इस कला से परसें। अन्न की बर्बादी को देश-द्रोह समझा जाय। अन्न देवता को जूठन के रूप में तिरस्कृत करना धार्मिक दृष्टि से भी अवांछनीय है। मेहतर को जूठन देने की ‘उदारता’ दर्शाने के स्थान पर उसे और भी अधिक उदारता के साथ अच्छा शुद्ध भोजन देना चाहिये।

🔴 उच्छृंखलता एवं अशिष्टता न बरती जाय—हल्दी के थापे लगाना, रंग फेंक कर कपड़े खराब करना, भद्दे मजाक करना जैसे उच्छृंखल अशिष्ट व्यवहार न हों।

🔵 देखा जाता है कि विवाहों के अवसर पर उच्छृंखलता और गन्दे मजाकों का वातावरण बन जाता है। यह अवांछनीय है। इस महंगाई के जमाने में कपड़े खराब कर देना, कहीं पर गुलाल, बूरा आदि वस्तुयें मल कर आंखों को हानि पहुंचाने का खतरा उत्पन्न कर देना अनुचित है। महिलायें अश्लील गीत गाकर अपना गौरव ही घटाती हैं और आगन्तुक अतिथियों का मजाक उड़ना धृष्टता है। ऐसी ओछी बातें सभ्य लोगों के लिये अशोभनीय है, जहां ऐसा कुछ प्रचलित हो उसे रोका जाय।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

👉 आपसी मतभेद से विनाश :-

🔵 एक बहेलिए ने एक ही तरह के पक्षियों के एक छोटे से झुंड़ को खूब मौज-मस्ती करते देखा तो उन्हें फंसाने की सोची. उसने पास के घने पेड़ के नीच...