शनिवार, 28 जनवरी 2017

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 36)

🌞 हिमालय में प्रवेश (जंगली सेब)

🔵 आज रास्ते में और भी कितने ही यात्रियों का साथ था। उनमें कुछ स्त्रियां भी थीं। रास्तों में बिन्नी के पेड़ों पर लगे हुए सुन्दर फल दीखे। स्त्रियां आपस में पूछने लगीं यह किस-किस के फल हैं। उन्हीं में से एक ने कहा यह जंगली सेब हैं। न मालूम उसने जंगली सेब की बात कहां से सुन रखी थी। निदान यही तय हुआ कि यह जंगली सेब के फल हैं। फल खूब लदे हुए था। देखने में पीले और लाल रंग मिले हुए बहुत सुन्दर लगते थे और प्रतीत होता था यह खूब पके हैं।

🔴 वह झुण्ड रुक गया। सयानी सी लड़की पेड़ पर चढ़ गई, लगता था उसे अपने ग्रामीण जीवन में पेड़ों पर चढ़ने का अभ्यास रहा है। उसने 40-40 फल नीचे गिराये। नीचे खड़ी स्त्रियों ने उन्हें आपा-धापी के साथ बीना। किसी के हाथ ज्यादा लगे किसी के कम। जिसके हाथ कम लगे थे वह उससे लड़ रही थी जिसने ज्यादा बीने थे। लड़ती जाती थी और कहती जाती थी तूने रास्ता रोक कर झपट कर अधिक बीन लिए, मुझे नहीं बीनने दिए। जिसके पास अधिक थे वह कह रही थी मैंने भाग दौड़ कर अपने पुरुषार्थ पर बीने हैं जिसके हाथ पैर चलेंगे वही तो नफे में रहेगा। तुम्हारे हाथ-पैर चलते तो तुम भी अधिक बीनती।

🔵 इन फलों को अगली चट्टी पर भोजन के साथ खायेंगे, बड़े मीठे और सुन्दर यह होते हैं। रोटी के साथ खाने में अच्छे लगेंगे। धोती के पल्लू में बांधकर वे प्रसन्न होती हुईं चल रही थीं कि कीमती फल, इतनी तादाद में उनने अनायास ही पा लिये। लड़ाई झगड़ा तो शान्त हो गया था पर ज्यादा कम बीनने की बात पर मनोमालिन्य जो उत्पन्न हुआ था वह बना हुआ था। एक दूसरे की नाराजी के साथ घूर-घूर का देखती चलती थीं।

🔴 चट्टी आई। सब लोग ठहरे। भोजन बना। फल निकाले गये। जिसने चखे उसी ने थू-थू किया। वे कड़वे थे। इतनी मेहनत से लड़ झगड़ कर लाये हुए सुन्दर दीखने वाले जंगली सेब कड़वे और बेस्वाद थे उसे देखकर उन्हें बड़ी निराशा हुई। सामने खड़ा हुआ पहाड़ी कुली हंस रहा था। उसने कहा ‘‘यह तो विन्नी का फल है। उसे कोई नहीं खाता। इसकी गुठली का तेल भर निकालते हैं।’’ वे समझे बूझे इन्हें बीनने, लाने और खाने की मूर्खता पर वे सभी स्त्रियां संकुचा रही थीं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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