बुधवार, 1 मार्च 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 02 March 2017


👉 आज का सद्चिंतन 02 March 2017


👉 तीर के वार से भी कुछ नहीं बिगड़ा

🔴 कहते हैं, पहाड़ पर से गिराने, साँपों से कटवाने तथा आग से जलाने का प्रयास भी प्रह्लाद की जीवन लीला समाप्त नहीं कर सका। उसके पिता ने उसे बुलाकर पूछा- तुम्हारी मृत्यु के इतने सारे उपाय किए जाने के बाद भी तुम बच कैसे गये? तब प्रह्लाद ने यही जवाब दिया था, इन भयंकर साँपों में, इस आग में कण- कण में हरि विराजमान हैं। जब मौत मेरे सामने खड़ी थी, उस समय मैं भी उन्हें ही स्मरण कर रहा था। इसलिए मेरे चित्त में भी वही विराज रहे थे। दोनों एकधर्मा होने के कारण ये एक- दूसरे को नष्ट नहीं कर सकते थे।  

🔵 कुछ ऐसी ही घटना है जो जीवट नगर के मुकेश सोनी के १८ वर्षीय बेटे अनमोल के साथ पिछले दिनों घटित हुई। वसंत पर्व का समय था। जन्म शताब्दी वर्ष की निर्धारित कार्यक्रम श्रृंखला के तहत ६ से ८ फरवरी तक गुरुदेव के विचारों को प्रत्येक गाँव में पहुँचाने के लिए संकल्पित युवा भाई- बहनों की टोली पूर्व निर्धारित क्षेत्रों की ओर चल चुकी थी।  

🔴 आदिवासी अंचल का यह इलाका उपजोन बड़वानी में पड़ता है जिसमें छह जिले आते हैं- खरगौन, खंडवा, बड़वानी, बुरहानपुर, अलीराजपुर और झाबुआ। उत्साही परिजनों द्वारा इन सभी स्थानों में गायत्री यज्ञ कराए जाने के कारण पूरा परिवेश ही गायत्रीमय हो चुका था। सरकार की विभिन्न प्रगतिशील परियोजनाओं के बावजूद जहाँ आज तक आधुनिक संसाधन और सुविधाएँ नहीं पहुँच सकीं, वहाँ ये प्राणवान युवा परिजन पूज्य गुरुदेव के विचारों को जन- जन तक पहुँचा रहे थे।  

🔵 उपजोन के चार हजार गाँवों में, छह हजार स्थलों पर दीपयज्ञ का आयोजन कर ऋषिवर को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। २०० स्थानों पर मंगल कलश यात्रा निकाली गई। अखण्ड जप सम्पन्न किए गए। ७ फरवरी की शाम को सभी धर्मों के लोगों ने लाखों दीप जलाकर नवयुग के आगमन का स्वागत किया। हर्षोल्लास के वातावरण में यह दीपोत्सव सम्पन्न हुआ। देशवाराय से दीपयज्ञ सम्पन्न कराकर अनमोल और उसके पिता मुकेश सोनी अपनी टोली के साथ लौट रहे थे। रास्ते में राजमलिया फाटक के पास चौराहा पार करते समय अचानक ८- १० आदिवासियों ने हमला कर दिया। नीयत लूटपाट की थी।  

🔴 हमलावरों के पास तीर कमान थे, जबकि ये सभी निहत्थे थे। यज्ञायोजन के लिए जा रही पुरोहितों की टोली में हथियार का क्या काम? सभी परिजन मोटर साइकिल पर सवार थे। छह मोटर साइकिलों में सबसे आगे अनमोल अपने ममेरे भाई संकेत के साथ था। संकेत मोटर साइकिल चला रहा था। अनमोल पीछे बैठा भव्य आयोजन की सफलता के श्रेय को लेकर मन ही मन परम पूज्य गुरुदेव के प्रति कृतज्ञता व्यक्त कर रहा था।  

🔵 हमलावर सड़क के किनारे तीर कमान लिए घात लगाकर बैठे थे। मोटर साइकिल सवारों पर तीरों की बौछार होने लगी। एक तीर सनसनाता हुआ आया और अनमोल के सिर के पिछले हिस्से में जा लगा। पूरी ताकत से चलाया गया तीर सिर को भेदकर अन्दर घुस गया। अनमोल ने बाएँ हाथ से मोटर साइकिल की सीट को जोर से पकड़ा, दाहिने हाथ से तीर लगे हिस्से को दबाया और भाई संकेत को मोटर साइकिल तेजी से भगाने का इशारा किया।  

🔴 संकेत ने गाड़ी की रफ्तार तेज कर दी। तीस किलोमीटर दूर, जाबेर पहुँचकर उसने प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र में गाड़ी रोकी। टोली के सभी भाई साथ ही थे। रात के साढ़े दस बज चुके थे। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए डॉक्टरों ने तत्काल गुजरात के सबसे बड़े अस्पताल, दाहौद हास्पिटल के लिए रेफर कर दिया। राजन सोनी उसे लेकर दाहौद हॉस्पिटल पहुँचे। वहाँ डॉक्टरों ने रात में ही ऑपरेशन करने का निर्णय लिया। सारी तैयारियाँ तेजी से होने लगीं। २० मिनट के बाद ही ऑपरेशन शुरू हो गया।

🔵 जब ऑपरेशन से नुकीला तीर निकाला गया तो सभी डॉक्टर तीर की हालत देखकर आश्चर्यचकित रह गए। तीर माथे के पिछले हिस्से में आधा इंच अन्दर घुस जाने के बाद आश्चर्यजनक ढंग से मुड़ गया था।     नुकीला तीर मस्तिष्क को कोई नुकसान नहीं पहुँचा सका था, मानो वह मानव मस्तिष्क नहीं वरन् किसी वज्र का बना हो।  

🔴 ऑपरेशन के बाद सभी डॉक्टर देर तक इसी घटना पर चर्चा करते रहे। सबने यही कहा कि ऐसी विचित्र घटना पहली बार देखी है। तीर जैसी नुकीली वस्तु कपाल की कठोरता को भेदकर अंदर तो चली जाये, पर सुकोमल मानव मस्तिष्क को न भेद सके, इससे बड़ा आश्चर्य और क्या होगा? अनमोल ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया- मैं गुरुजी का काम कर रहा था, इसलिए मेरा नुकसान हो ही नहीं सकता था। इस साधारण तीर की क्या बिसात कि गुरुजी का काम रोक दे।   

🔵 सभी डॉक्टर अनमोल की बातें सुनकर सहमति सूचक शैली में जोर- जोर से सिर हिलाने लगे। एक सीनियर डॉक्टर ने कहा- अपने गुरुदेव के प्रति तुम्हारे इस अटल विश्वास ने ही तुम्हें बचाया है। भक्त का विश्वास अटल हो तो भगवान उसे किसी भी आसन्न खतरे से बचा ही लेते हैं और कठिन से कठिन परिस्थिति में भी अविचल बनाये रखते हैं।  

🌹 महेन्द्र भावसार ,अंजड़, बड़वानी (म.प्र.)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Wonderful/tir.1

👉 महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण (भाग 9)

🌹 प्रतिभा से बढ़कर और कोई समर्थता है नहीं    

🔴 बुद्ध को मार डालने का षड्यन्त्र अंगुलिमाल महादस्यु ने बनाया। वह तलवार निकाले बुद्ध के पास पहुँचा और आक्रमण करने पर उतारू ही था कि सामने पहुँचते-पहुँचते पानी-पानी हो गया। तलवार फेंक दी और प्रायश्चित के रूप में न केवल उसने दस्यु-व्यवसाय छोड़ा, वरन् बुद्ध का शिष्य बनकर शेष जीवन को धर्मधारणा के लिए समर्पित कर दिया।            

🔵 ऐसा ही कुचक्र अम्बपाली नामक वेश्या रचकर लाई थी। पर सामने पहुँचते-पहुँचते उसका सारा बना-बनाया जाल टूट गया, वह चरणों पर गिरकर बोली-पिता जी मुझ नरक के कीड़े को किसी प्रकार पाप-पंक से उबार दें। बुद्ध ने उसके सिर पर हाथ फिराया और कहा कि ‘तू आज से सच्चे अर्थों में मेरी बेटी है। अपना ही नहीं, मनुष्य जाति के उद्धार का कार्यक्रम मेरे वरदान के रूप में लेकर जा।’ सभी जानते हैं कि अम्बपाली के जीवन का उत्तरार्ध किस प्रकार लोकमंगल के लिए समर्पित हुआ।   

🔴 नारद कहीं अधिक देर नहीं ठहरते थे; पर उनके थोड़े-से सम्पर्क एवं परामर्श से ध्रुव, प्रह्लाद, रत्नाकर आदि कितनों को ही, कितनी ऊँचाई तक चढ़-दौड़ने का अवसर मिला।  

🔵 वेदव्यास का साहित्य-सृजन प्रख्यात है। उनकी सहायता करने गणेशजी लिपिक के रूप में दौड़े थे। भगीरथ का पारमार्थिक साहस धरती पर गंगा उतारने का था। कुछ अड़चन पड़ी, तो शिवजी जटा बिखेरकर उनका सहयोग करने के लिए आ खड़े हुए। विश्वामित्र की आवश्यकता समझते हुए हरिश्चन्द्र जैसों ने अपने को निछावर कर दिया। माता गायत्री का सहयोग उस महा-ऋषि को जीवन भर मिलता रहा। प्रसिद्ध है कि तपस्विनी अनुसूया की आज्ञा पालते हुए तीनों देवता उनके आँगन में बालक बनकर खेलते रहने का सौभाग्य-लाभ लेते रहे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 प्रथम आहुति-पूर्णाहुति

🔴 डचों का आक्रमण अप्रत्याशित था। इंडोनेशियाई सैनिक उसके लिए बिलकुल भी तैयार नहीं थे। अब दो ही विकल्प सामने थे-एक तो डचों के आगे आत्मसमर्पण कर दिया जाए अन्यथा जो भी शक्ति है, उसे ही लेकर सकट का संपूर्ण साहस के साथ सामना किया जाए।

🔵 कोई भी स्वाभिमानी जाति अपने सम्मान, संस्कृति और स्वाधीनता की रक्षा के लिये जो निर्णय ले सकती है, वही निर्णय इडोनेशियाई सैनिकों ने लिया अर्थात् उन्होंने जीवन की अंतिम साँस तक लडने और डचों का सामना करने का संकल्प ठान लिया।

🔴 कमांडरों की बैठक हुई और योजना बनाई गई कि सेना को कई छोटी-छोटी टुकडि़यों में बाँटकर छापा मार युद्ध किया जाए।

🔵 सीमित शक्ति से असीमित का मुकाबला साहस और शौर्य का ही परिचायक होता है।

🔴 इधर जिन सैनिको को, जिस टोली में जाने का आदेश मिलता, वह आनन-फानन मे तैयार होकर चल पडता ऐसा शौर्य इंडोनेशियायियों में इससे पहले कभी देखने को नहीं मिला था।

🔵 जब यह सब हो रहा था, सेना का एक जवान जिसका नाम था सुवर्ण मार्तंडनाथ। मिलिटरी हेड क्वार्टर में लगाइ गई पहली टोली में जाने वालों के नामों की सूची बडे ध्यान से पढ़ रहा था। सब नाम पढ लिए और जब उसे अपना नाम नहीं मिला तो उसकी आँखे भर आई, पहली टोली में नाम न पाने का बडा दुर्भाग्य मनाया उसने। क्या किया जाए ? अभी वह यह सोच ही रहा था कि ''फील्ड सर्विस मार्चिग आडर'' (युद्ध की पूर्ण सज्जित वेष-भूषा) में उसके बडे भाई ने पीछे से उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा-क्यों सुवर्ण अपना नाम न पाकर तुम दुःख कर रहे हो, इसमे दुःख की क्या बात बलिदान सबको होना है, क्या आगे-क्या पीछे ?

🔴 मार्तंडनाथ की भरी आँखें बरस पडी, हृदय का गुबार कपोलो से बह निकला-उसने अपने भाई के पाँव पकड लिए और रुँधे गले से कहा-भैया! आप यह सौभाग्य मुझे नही दे सकते क्या ? मेरा हठ आपको स्वीकार करना ही होगा छोटा हूँ तो क्या ? उत्सर्ग का प्रथम अधिकार मुझे मिलना चाहिए।

🔵 बडे भाई ने बडे स्नेह से सुवर्ण के आँसू पोंछते हुए कहा-तात! मोमबत्ती के सभी कण पहले जलने के लिये उलझ पडे तो फिर मोमबत्ती के लिए देर तक प्रकाश दे सकना कहाँ संभव रह जाए ? वह उलझकर बुझ न जायेगी। जिद न करो आज नहीं तो कल तुम्हारी बारी आनी ही है।

🔴 उत्सर्ग का सुख जानने वाले सुवर्ण मार्तंडनाथ के लिए और सारे शब्द शूल से लग रहे थे वह तो पहली टोली से स्वयं जाने की आशा मात्र का अभिलाषी था। आखिर कमांडरों को उसकी जिद के आगे झुकना पड़ा। उसका नाम पहली टोली में चढा दिया गया।

🔵 बडे भाई का नाम अंतिम टुकडी में आया। कई दिन के घनघोर युद्ध के बाद विजय इंडोनेशिया की रही। स्वाधीनता के लिए शहीद होने वालो की सूची निकाली गई। युवक सुवर्ण मार्तंडनाथ ने उसे लेकर जैसे ही दृष्टि डाली कि उसमें पहला ही नाम उसके बड़े भाई का मिला। "पूर्णाहुति का सौभाग्य आखिर आपको ही मिला" इतना कहते-कहते एकबार सुवर्ण मार्तंडनाथ की आँखें भर आई, उससे पूरी लिस्ट पढी नही गई।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 58, 59

👉 वरदान

🔵 एक बार पाँच असमर्थ और अपंग लोग इकट्ठे हुए और कहने लगे, यदि भगवान ने हमें समर्थ बनाया होता तो बहुत बड़ा परमार्थ करते। अन्धे ने कहा— यदि मेरी आँखें होतीं तो जहाँ कहीं अनुपयुक्त देखता वहीं उसे सुधारने में लग जाता। लंगड़े ने कहा— पैर होते तो दौड़-दौड़ कर भलाई के काम करता। निर्बल ने कहा— बल होता तो अत्याचारियों को मजा चखा देता। निर्धन ने कहा— धनी होता तो दीन दुखियों के लिए सब कुछ लुटा देता। मूर्ख ने कहा— विद्वान होता तो संसार में ज्ञान की गंगा बहा देता।

🔴 वरुण देव उनकी बातें सुन रहे थे। उनकी सचाई को परखने के लिए उनने आशीर्वाद दिया और इन पाँचों को उनकी इच्छित स्थिति मिल गई। अन्धे ने आँखें, लंगड़े ने पैर, निर्बल ने बल, निर्धन ने धन और मूर्ख ने विद्या पाई और वे फूले न समाये। परिस्थिति बदलते ही उनके विचार भी बदल गये। अन्धा सुन्दर वस्तुएँ देखने में लगा रहता और अपनी इतने दिन की अतृप्ति बुझाता। लंगड़ा सैर-सपाटे के लिए निकल पड़ा। धनी ठाठ-बाठ जमा करने में लगा। बलवान ने दूसरों को आतंकित करना शुरू कर दिया। विद्वान ने अपनी चतुरता के बल पर जमाने को उल्लू बना दिया। बहुत दिन बाद वरुण देव उधर से लौटे और उन असमर्थों की प्रतिज्ञा निभी या नहीं, यह देखने के लिए रुक गये। पता लगाया तो वे पाँचों अपने-अपने स्वार्थ सिद्ध करने में लगे हुए थे।

🔵 वरुण देव बहुत खिन्न हुए और अपने दिये हुए वरदान वापिस ले लिए। वे फिर जैसे के तैसे हो गये। अन्धे की आँखों का प्रकाश चला गया। लँगड़े के पैर जकड़ गये। धनी निर्धन हो गया। बलवान को निर्बलता ने जा घेरा। अब उन्हें अपनी पुरानी प्रतिज्ञायें याद आईं और पछताने लगे कि पाये हुए सुअवसर को उन्होंने इस प्रकार प्रमाद में क्यों खो दिया। समय निकल चुका था, अब पछताने से बनता भी क्या था?

🌹 अखण्ड ज्योति अगस्त 1964

👉 काश! मनुष्य ‘‘जीवन देवता’’ के स्वरूप को समझ पाता

🔵 मनुष्य जीवन ईश्वरीय सत्ता की एक बहुमूल्य धरोहर है, जिसे सौंपते समय उसकी सत्पात्रता पर विश्वास करके ही, उसे यह दिया गया है। मनुष्य के साथ और जीवधारियों की तुलना में यह कोई पक्षपात नहीं है, वरन् ऊँचे अनुदान देने के लिए यह एक प्रयोग परीक्षण मात्र है। अन्य जीवधारी शरीर भर की बात सोचते और क्रिया करते हैं, किन्तु मनुष्य को स्रष्टा का उत्तराधिकारी युवराज होने के नाते अनेकानेक कर्त्तव्य और उत्तरदायित्त्व निबाहने पड़ते हैं। उसी में उसकी गरिमा और सार्थकता है। यदि पेट-प्रजनन तक, लोभ-मोह तक उसकी गतिविधियाँ सीमित रहें, तो उसे नर-पशु के अतिरिक्त और कहा भी क्या जा सकता है?

🔴 लोभ-मोह के साथ अहंकार और जुड़ जाने पर तो बात और भी अधिक बिगड़ती है। महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए उभरी अहमन्यता अनेकों प्रकार के कुचक्र रचती और पतन-पराभव के गर्त में गिराती है, अहंता से प्रेरित व्यक्ति अनाचारी बनता है और आक्रामक भी। ऐसी दशा में उसका स्वरूप और भी भयंकर हो जाता है। दुष्ट-दुरात्मा एवं नर-पिशाच स्तर की आसुरी गतिविधियाँ अपनाता है। इस प्रकार मनुष्य जीवन जहाँ श्रेष्ठ सौभाग्य का प्रतीक था, वहाँ वह दुर्भाग्य और दुर्गति का कारण ही बनता है। उसी को कहते हैं वरदान को अभिशाप बना लेना। दोनों ही दिशाएँ हर किसी के लिए खुली हैं। जो इनमें से जिसे चाहता है, उसे चुन लेता है। मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप जो है।

🔵 मनुष्य ने अपने लिए इष्ट-उपास्य भी बहुत से चुन रखे हैं। किन्तु यदि वह एक ही देवता-इष्ट उपास्य जीवन देवता की अभ्यर्थना सही रूप में करले तो इस कल्पवृक्ष के नीचे वह सब कुछ उसे प्राप्त हो सकता है, जिसकी कहीं अन्यत्र प्राप्त होने की आशा लगायी जाती है। जीवन देवता को परिष्कृत आत्मा या परमात्मा की अनुकृति भी कह सकते हैं। परब्रह्म की सारी क्षमताएँ ऋद्धि-सिद्धियाँ इस काय-कलेवर में समायी हैं। यदि उन्हें जगाया जा सके, तो मनुष्य योगी, ऋषि मनीषी, महापुरुष, सिद्ध पुरुष जैसी विभूतियों से सम्पन्न हो सकता है। इस जीवन देवता की साधना से मनुष्य को सभी महासिद्धियाँ प्राप्त हो सकती हैं।

🔴 कस्तूरी के लिए हिरण की तरह मनुष्य अपने आप को महानता के मूल केन्द्र (नाभिक) को बाहर खोजता फिरता है। एक बार वह अपने भीतर झाँककर उसे अपने अन्तःकरण में देख ले, तो उसे इस इष्ट सत्ता का दिव्य दर्शन हो जाएगा, जो उसे महानता की श्रेष्ठतम ऊँचाइयों तक ले जा सकता है। जिस दिन यह हो जाता है, उस दिन मनुष्य के सौभाग्य का द्वार खुल जाता है। इसी दिन की प्रतीक्षा सतत भगवान को भी बनी हुई है।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 20

👉 आत्मचिंतन के क्षण 2 March

🔴 आत्म-ज्ञान का सम्पादन और आत्म केन्द्र में स्थिर रहना मनुष्य मात्र का पहला और प्रधान कर्तव्य है। आत्मा का ज्ञान चरित्र के विकास से मिलता है। अपनी बुराइयों को छोड़कर सन्मार्ग की ओर चलने की प्रेरणा इसी से दी जाती है कि आत्मा का आभास मिलने लगे। आत्म सिद्धि का एक मात्र उपाय पारमार्थिक भाव से जीव मात्र की सेवा करना है। इन सद्गुणों का विकास न हुआ तो आत्मा की विभूतियाँ मलिनताओं में दबी हुई पड़ी रहेंगी।

🔵 क्रोध अन्धा होता है। वह केवल उस ओर देखता है जिसे दुख का कारण समझता है, या अपनी कामनाओं का बाधक मानता है। और उसका नाश हो, उसे हानि, दुःख पहुँचे, क्रोधी का यही लक्ष्य होता है। क्रोधी व्यक्ति कभी अपने बारे में नहीं सोचता। मेरी भी कोई भूल है, कुछ मैंने भी किया है, या जो मैं करने जा रहा हूँ, उसके क्या परिणाम होंगे? इनके बारे में कुछ भी नहीं सोचता। इसके कारण बड़े-बड़े अनर्थ हो जाते हैं।

🔴 परिस्थितियों पर विचार करने के लिये मनुष्य को सदैव गंभीरता से काम लेना चाहिये। आज जैसी स्थिति कल भी रहेगी यह सोचना अबुद्धिमत्तापूर्ण है। हम साहस, शौर्य और कर्मठता से काम करें तो असफलता को सफलता में, निर्धनता को धन प्राप्ति में, अस्वस्थता को उत्तम स्वास्थ्य में क्यों नहीं बदल सकते? थोड़ा समय ही तो लगेगा। एक दिन में किसी को सफलता मिली भी हैं? फिर आप ही उतावले क्यों होते है। धैर्य रखिये और कठिनाइयों से लड़ पड़िये। आपका खराब समय जरूर टल जायेगा। गरीबी दूर होगी। जरूर आपके स्वास्थ्य में परिवर्तन होगा।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 25)

🌹 विचारशील लोग दीर्घायु होते हैं
🔴 इस स्थिति को देखते हुए तो यही समझ में आता है कि या तो मनुष्य प्रसन्नता के वास्तविक स्वरूप को नहीं पहचाना अथवा वह अपनी वांछित वस्तु को पाने के लिए जिस दिशा में प्रयत्न करता है वह ही गलत है। इस पर गहराई से विचार करने की आवश्यकता है।

🔵 लोगों में अधिकतर एक सामान्य धारणा यह रहा करती है कि यदि उनके पास अधिक पैसा हो, साधन-सुविधायें हों तो वे प्रसन्न रह सकते हैं। ऐसी धारणाओं वाले लोग सदैव साधन सुविधाओं के लिए रोते रिरियाते रहने के बजाय एक बार दृष्टि उठाकर उन लोगों की ओर क्यों नहीं देखते कि प्रचुरता से परिपूर्ण होने पर भी क्या वे सुखी हैं, प्रसन्न और सन्तुष्ट हैं? यदि धन दौलत तथा साधन सुविधायें ही प्रसन्नता की हेतु होतीं तो संसार का हर धनवान अधिक से अधिक सुखी और सन्तुष्ट होता किन्तु ऐसा कहां है। इससे स्पष्ट सिद्ध है कि वैभव और विभूति वास्तविक प्रसन्नता का कारण नहीं है। प्रसन्नता प्राप्ति का हेतु मानकर इन विभूतियों के लिए रोते-मरते रहना बुद्धिमानी नहीं हैं।

🔴 बल, बुद्धि और विद्या को भी प्रसन्नता का हेतु मानने की एक सभ्य प्रथा है। किन्तु यह ऐश्वर्य भी वास्तविक प्रसन्नता का वाहक नहीं है। यदि ऐसा होता तो हर शिक्षित प्रसन्न दिखाई देता और अशिक्षित अप्रसन्न। ऐसा भी देखने में नहीं आता। जिस प्रकार अनेक धनवान अप्रसन्न और निर्धन प्रसन्न देखे जा सकते हैं इसी प्रकार अनेक विद्वान क्षुब्ध तथा पढ़े-लिखे लोग प्रसन्न मिल सकते हैं। बड़े-बड़े बलवान आहें भरते और साधारण सामर्थ्य वाले व्यक्ति हंसी खुशी से जीवन बिताते मिल सकते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 3)

🌹 चेतना की सत्ता एवं उसका विस्तार

🔵 इस सम्मिश्रण का जहाँ भी अपेक्षाकृत अधिक विस्तृत स्वरूप दिखाई पड़ता है, उसे प्रतिभा कहते हैं। सदुद्देश्यों के लिये प्रयुक्त किये जाने पर यही प्रतिभा देव-स्तर की बन जाती है और अपना परिचय महामानवों जैसा देती है, किंतु साथ ही यदि मनुष्य अपनी उपलब्ध स्वतंत्रता का उपयोग अनुचित कामों में करने लगे तो वह दुरुपयोग ही दैत्य बन जाता है। दैत्य अपने और अपने संपर्क वालों के लिये विपत्ति का कारण ही बनते है; जबकि देवता पग-पग पर अपनी शालीनता और उदारता का परिचय देते हुए अपने प्रभाव-क्षेत्र में सुख, शांति एवं प्रगति का वातावरण बनाते रहते हैं। दैत्य-स्तर के अभ्यास बन जाने पर तो पतन और पराभव ही बन पड़ता है। उसमें तात्कालिक लाभ दीखते हुए भी अंतत: दुर्गुणों का दुष्परिणाम ही प्रत्यक्ष होता है।       

🔴 सृष्टि के नियम में कर्म और फल के बीच कुछ समय लगने का विधान है। बीज बोने पर उससे वृक्ष बनने में कुछ समय लग जाता है। गर्भाधान के कई मास बाद बच्चा उत्पन्न होता है। आज का दूध कहीं कल जाकर दही बनता है। अभक्ष्य खा लेने पर दस्त-उल्टी आदि होने का सिलसिला कुछ समय बाद आरंभ होता है। मनुष्यों मेें यह बालबुद्धि देखी जाती है कि वे तत्काल कर्मफल चाहते हैं, देर लगने पर अधीर हो जाते हैं और यह चाहते हैं कि हथेली पर सरसों जमे; कल तक उसमें पौधे जमने की प्रतीक्षा न करनी पड़े।     

🔵 उतावली आतुरता उत्पन्न करती है और मन:स्थिति प्राय: अर्धविक्षिप्त की-सी बना देती है, जिसमें तात्कालिक लाभ भर दीख पड़ता है; चाहे वह कितना ही क्षणिक या दु:खदाई ही क्यों न हो। वह विवेकवान् दूरदर्शिता न जाने कहाँ चली जाती है जिसे अपनाकर विद्यार्थी विद्वान्, दुबले पहलवान, मंदबुद्धि तीव्रबुद्धि एवं निर्धन और पिछड़े धनवान् बनते हैं। यह एक मनुष्य की प्रधान भूल है, जिसके कारण वह अपने जीवन का उद्देश्य, स्वरूप और वरिष्ठता तक भूल जाता है-मार्ग से भटककर झाड़-झंखाड़ों में मारा-मारा फिरता है। इस भूल को देखकर कई बार यह भी स्वीकारना पड़ता है कि ‘‘मनुष्य वस्तुत: ईश्वर की संतान तो है ही नहीं वरन् डार्विन के कथनानुसार वह बंदर की ही अनगढ़ औलाद है।’’  

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 दीक्षा और उसका स्वरूप (भाग 7)

🌹 दीक्षा क्या? किससे लें?
🔴 व्यक्तिगत रूप से (गुरु बनकर) दीक्षा देना भी सम्भव है  लेकिन वह हर आदमी का काम नहीं है। जिस आदमी के पास इतना प्राण तत्त्व और इतना उत्कृष्ट जीवन और इतना अटूट आत्मबल न हो; जो अपने आत्मबल की सम्पदा में से, अपने तप की पूँजी में से, अपने ज्ञान की राशि में से, दूसरों को महत्त्वपूर्ण अंश देने में समर्थ न हो, ऐसे आदमी को दीक्षा नहीं देनी चाहिए और न ऐसों से किसी को दीक्षा लेनी चाहिये। यदि उनसे  लिया गया है, तो उससे हानि भी हो सकती है। मान लीजिए कोई पति तपेदिक का बीमार है या सिफिलिस का बीमार है या सुजाक का बीमार है, उसके साथ में बीबी ब्याह कर ले, तो जहाँ पति रोटी कमाकर के खिला सकता है, वहाँ उसकी वह बीमारियाँ भी उसकी पत्नी में आ जायेगी और उसका जीवन चौपट हो जायेगा।

🔵 बिना समझे-बूझे कोई भी आदमी आजकल दीक्षा देने लगते हैं, ताकि रुपया-अठन्नी का ही लाभ होने लग जाय और पैर पुजाने का लाभ होने लगे और अपना गुजारा चलने लगे और फोकट का सम्मान भी मिलने लगे। ये बहुत ही बेहूदी बात है और इस तरह  की हिम्मत जो आदमी करते हैं, वे बहुत ही जलील आदमी हैं। ऐसे जलील आदमियों को इस समाज में से  एक कोने में उठाकर फेंक देना चाहिए। दीक्षा के लिए कोई आवश्यक नहीं है कि किसी व्यक्ति से ही दीक्षा ली जाए। कोई जरूरी नहीं है। दीक्षा का अर्थ प्रतिज्ञा है। दीक्षा का अर्थ वह होता है कि किसी आदमी के साथ जुड़कर के उसकी तपश्चर्या, उसका ज्ञान और उसके आत्मबल की सम्पदा का व्यक्तिगत रूप से लाभ उठाया जाए, ये भी एक तरीका है; लेकिन मैं देखता हूँ  कि आज ऐसे आदमी दुनिया में लगभग नहीं हैं।  

🔴 योग विशेष से सैकड़ों वर्ष पीछे कोई-कोई ही ऐसे आदमी पैदा होते हैं। वह पैदा होते हैं, जिनके पास वशिष्ठ जैसा ज्ञान और विश्वामित्र जैसा तप दोनों का समुचित रूप से समन्वय हो और यदि इन दो आवश्यकताओं को पूरा करने वाला नहीं है, तो निरर्थक है। उसकी दीक्षा से कोई फायदा नहीं है, बल्कि और भी अज्ञान फैल सकता है। दूसरे और भी आदमियों को चालाकी और धूर्तता करने का मौका मिल सकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Diksha/8

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 65)

🌹 प्रवास का दूसरा चरण एवं कार्य क्षेत्र का निर्धारण

🔴 गुरुदेव की आत्मा और हमारी आत्मा साथ-साथ चल रही थीं। दोनों एक दूसरे को देख रहे थे। साथ में उनके चेहरे पर भी उदासी छाई हुई थी। हे भगवान, कैसा विषम समय आया कि किसी ऋषि का कोई उत्तराधिकारी नहीं उपजा। सबका वंश नाश हो गया। ऋषि प्रवृत्तियों में से एक भी सजीव नहीं दीखती। करोड़ों की संख्या में ब्राह्मण हैं और लाखों की संख्या में संत पर उनमें से दस-बीस भी जीवित रहे होते, तो गाँधी और बुद्ध की तरह गजब दिखाकर रख देते, पर अब क्या हो गया? कौन करे? किस बलबूते पर करे?

🔵 राजकुमारी की आँखों से आँसू टपकने पर और कहने पर कि ‘‘को वेदान् उद्धरस्यसि?’’ अर्थात् ‘‘वेदों का उद्धार कौन करेगा?’’ इसके उत्तर में कुमारिल भट्ट ने कहा था कि-‘‘अभी एक कुमारिल भट्ट भूतल पर है। इस प्रकार विलाप न करो।’’  तब एक कुमारिल भट्ट जीवित था। उसने जो कहा था, सो कर दिखाया, पर आज तो कोई नहीं। न ब्राह्मण है, न संत। ऋषियों की बात तो बहुत आगे की है। आज तो छद्म वेशधारी ही चित्र-विचित्र रूप बनाए रंगे सियारों की तरह पूरे वन प्रदेश में हुआ -हुआ करते फिर रहे हैं|

🔴 दूसरे दिन लौटने पर हमारे मन में इस प्रकार के विचार दिन भर उठते रहे। जिस गुफा में निवास था, दिन भर यही चिंतन चलता रहा। लेकिन गुरुदेव उन्हें पूरी तरह पढ़ रहे थे, मेरी कसक उन्हें भी दुःख दे रही थी। उनने कहा-‘‘तब फिर ऐसा करो! अब की बार उन सबसे मिलने फिर से चलते हैं। कहना-आप लोग कहें तो उसका बीजारोपण तो मैं कर सकता हूँ। खाद-पानी आप देंगे, तो फसल उग पड़ेगी। अन्यथा प्रयास करने से अपना मन तो हल्का होगा ही।’ ‘‘साथ में यह भी पूछना कि शुभारम्भ किस प्रकार किया जाए, इसकी रूपरेखा बताएँ। मैं कुछ न कुछ अवश्य करूँगा। आप लोगों का अनुग्रह बरसेगा तो इस सूखे श्मशान में हरीतिमा उगेगी।’’

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 66)

🌹 हमारी जीवन साधना के अन्तरंग पक्ष-पहलू
🔵 आरम्भिक दिनों मे हमें उपहास और भर्त्सना सहनी पड़ी। घर परिवार के लोग ही सबसे अधिक आड़े आये। उन्हें लगने लगा कि इसकी सहायता से जो भौतिक लाभ हमें मिलते हैं या मिलने वाले हैं उनमें कमी आ जायेगी, सो वे अपनी हानि जिसमें समझते, उसे भारी मूर्खता बताते थे, पर यह बात देर तक नहीं चली। अपनी आस्था ऊँची और सुदृढ़ हो, तो झूठ, विरोध देर तक नहीं टिकता, कुमार्ग पर चलने के कारण जो विरोध, तिरस्कार उत्पन्न होता है वही स्थिर रहता है। नेकी अपने आप में एक विभूति है, जो स्वयं का ही नहीं सभी का हित साधती है, इसीलिए स्थिर रहती भी है। विरोधी और निंदक कुछ ही दिनों में अपनी भूल समझ जाते हैं और रोड़ा अटकाने के बजाय सहयोग देने लगते हैं।

🔴 आस्था जितनी ऊँची और जितनी मजबूत होगी, प्रतिकूलता उतनी ही जल्दी अनुकूलता में बदल जाती है। परिवार का विरोध देर तक नहीं सहना पड़ा, उनकी शंका- कुशंका वस्तु स्थिति समझ लेने पर दूर हो गई। आत्मिक जीवन में वस्तुत: घाटे की कोई बात नहीं है। बाहरी दृष्टि से गरीब दीखने वाला व्यक्ति आत्मिक दृष्टि शान्ति और सन्तोष के कारण बहुत प्रसन्न रहता है। यह प्रसन्नता और सन्तुष्टि हर किसी को प्रभावित करती है। जो विरोधियों को सहयोगी बनाने में बहुत सहायक सिद्ध होती है। अपनी कठिनाई ऐसे ही हल हुई।

🔵 बड़प्पन का लोभ- मोह, वाहवाही की- तृष्णा की हथकड़ी- बेड़ी और तौक कटी तो लगा कि भव- बंधनों से मुक्ति मिल गयी। इन्हीं तीन जंजीरों में जकड़ा हुआ प्राणी इस भवसागर में औंधे मुँह घसीटा जाता रहता है और अतृप्ति, उद्विग्नता कि व्यथा वेदना से कराहता रहता है। इन तीनों की तुच्छता समझ ली जाय और लिप्सा को श्रद्धा में बदल दिया जाय, तो समझना चाहिए कि माया के बंधन टूट गए और जीवित रहते ही मुक्ति पाने का प्रयोजन पूरा हो गया। "नजरें तेरी बदलीं कि नजारा बदल गया" वाली उक्ति के अनुसार अपनी भावनाएँ, आत्मज्ञान होते ही समाप्त हो गईं और जीवन लक्ष्य पूरा करने की आवश्यकता अँगुली पकड़ कर मार्गदर्शन करने लगी, फिर अभाव रहा न असंतोष।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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