सोमवार, 12 मार्च 2018

👉 उपकार का प्रत्युपकार

🔷 बेंजामिन फ्रेंकलिन ने एक अखबार निकाला। आर्थिक कठिनाई में पड़कर उसने अपने एक मित्र से बीस डालर लिये। जब उसकी स्थिति ठीक हो गई तो वह मित्र की वह रकम लौटाने लगा। मित्र ने कहा- वह रकम तो मैंने आपको सहायता में दी थी। फ्रेंकलिन ने कहा- सो ठीक है पर जब मैं लौटाने की स्थिति में हूँ तो आपकी सहायता का ऋणी क्यों बनूँ?

🔶 झगड़े का अन्त इस प्रकार हुआ कि मित्र ने वह रुपये फ्रेंकलिन के पास इस उद्देश्य से जमा किये कि जब कोई जरूरतमंद उधार माँगे तक इसे उसी शर्त पर दे दें कि वह भी स्थिति ठीक होने पर उन रुपयों को अपने पास जमा रखेगा और फिर किसी जरूरतमंद को इसी प्रकार इसी शर्त पर दे देगा।

🔷 आवश्यकता के समय दूसरों से सहायता ली जा सकती है पर यह ध्यान रखना चाहिए कि समर्थ होते ही वह सहायता किसी अन्य जरूरत मन्द को लौटा दी जाय। सहायता के साथ जो दान वृत्ति जुड़ी हुई है वह दुहरा कर्ज है। उसका चुकाना एक विशिष्ट नैतिक कर्तव्य है।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 13 March 2018


👉 आज का सद्चिंतन 13 March 2018


👉 गीता के ये नौ सूत्र याद रखें, जीवन में कभी असफलता नहीं मिलेगी

👉 सूत्र नं० 2

🔷 श्लोक-
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
न चाभावयत: शांतिरशांतस्य कुत: सुखम्।।

अर्थ-
🔶 योगरहित पुरुष में निश्चय करने की बुद्धि नहीं होती और उसके मन में भावना भी नहीं होती। ऐसे भावनारहित पुरुष को शांति नहीं मिलती और जिसे शांति नहीं, उसे सुख कहां से मिलेगा।

सूत्र –
🔷 हर मनुष्य की इच्छा होती है कि उसे सुख प्राप्त हो, इसके लिए वह भटकता रहता है, लेकिन सुख का मूल तो उसके अपने मन में स्थित होता है। जिस मनुष्य का मन इंद्रियों यानी धन, वासना, आलस्य आदि में लिप्त है, उसके मन में भावना ( आत्मज्ञान) नहीं होती। और जिस मनुष्य के मन में भावना नहीं होती, उसे किसी भी प्रकार से शांति नहीं मिलती और जिसके मन में शांति न हो, उसे सुख कहां से प्राप्त होगा। अत: सुख प्राप्त करने के लिए मन पर नियंत्रण होना बहुत आवश्यक है।

👉 क्षमताओं का सदुपयोग-प्रगति का राजमार्ग (भाग 4)

🔷 चिन्तन और आचरण के समन्वय से ही व्यक्तित्व बनता है। स्वभाव संस्कार इसी प्रक्रिया को अपनाने से विनिर्मित होते हैं। इसके लिए अपनी कार्य पद्धति इस प्रकार की निर्धारित करनी होती है जिसमें आदर्शवादी गतिविधियों में संलग्न रहना पड़े, साथ ही निर्वाह का उपक्रम भी बनता रहे। क्षमता संवर्धन भी इसी प्रक्रिया का एक अंग है। शारीरिक और मानसिक योग्यताएँ जितनी बढ़ती हैं उसी अनुपात से कुछ अधिक महत्त्वपूर्ण कार्य बन पड़ते हैं। इस दृष्टि से आत्म-निर्माण के लिए परिस्थितियों के अनुरूप ऐसी विधि व्यवस्था बनानी पड़ती है जिसमें उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व के लिए उपयुक्त अवसर नियमित रूप से मिलता रहे।

🔶 ईश्वर ने जिस आकांक्षा से इतनी बड़ी धरोहर सौंपी है उसका निर्वाह भी परमार्थ प्रयोजनों के सहारे ही सधता है। उज्ज्वल भविष्य के निर्माण में दान-पुण्य ही काम आते हैं। इन्हीं की परिणति सुयोग सौभाग्यों के रूप में सामने आती है। इसी प्रकार सीमित ‘स्व’ को असीम ब्रह्म के साथ जोड़ने की परम सिद्धि विराट् के साधन से ही सम्भव होती है। वसुधैव कुटुम्बकम् और आत्मवत् सर्वभूतेषु की दो कसौटियों पर खरा सिद्ध होने के लिए मनुष्य को परमार्थ परायण बनना पड़ता है। गुण, कर्म, स्वभाव में उत्कृष्टता का अनुपात बढ़ाते चलने के लिए सेवा धर्म अपनाने की अनिवार्य आवश्यकता पड़ती है। ऐसे-ऐसे अनेक कारण हैं जो जीवन क्रम में आत्मोत्कर्ष की तरह लोक मंगल का समुचित समावेश करने के लिए बाधित करते हैं।

🔷 उपरोक्त दोनों ही उच्चस्तरीय प्रयोजनों की पूर्ति के लिए मात्र सोचते या पढ़ते सुनते रहने से ही काम नहीं चलता। भजन भाव से भी उसकी आंशिक पूर्ति ही होती है। समग्रता तब मिलती है जब उन्हें दिनचर्या में सम्मिलित किया जाय और विधि व्यवस्था ऐसी बनाई जाय जिसमें निर्वाह प्रयोजनों के साथ-साथ इन महान निर्धारणों का भी सुयोग बनता रहे। स्पष्ट है कि इसके लिए समय और श्रम लगाना पड़ेगा। व्यक्ति और समाज की, आत्मा और परमात्मा की मध्यवर्ती कड़ी परिवार है। यह जब छोटा रहता है तो उसे कुटुम्ब कहते हैं और जब बढ़ता है तब विश्व परिवार के रूप में सुविस्तृत बनकर सामने आता है। परिवार ही वह प्रयोगशाला, पाठशाला एवं कर्मशाला है जिसमें पौरुष को प्रकट करने और अभ्यासों को परिपक्व करने का अवसर मिलता है। अस्तु उत्कृष्टता की साधना के साथ श्रम और मनोयोग का समन्वय सत्प्रवृत्तियों के संवर्धन में लगा रहे। इसके लिए निजी जीवनचर्या में एक समन्वित कार्य पद्धति का निर्धारण करना पड़ता हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 How long can we go on tolerating vulgarly and extravagant weddings? (Part 6)

What can we do?

🔷 We have to think of a solution to this. We should conduct debates on this topic in the entire country. We have to awaken the people. If required, we have to resort to an organized campaign against it. Wherever there is a display of vulgar extravagance in weddings, awakened youth should express their disagreement through silent satyagraha. In a country where millions of people sleep on hungry stomach, how can we tolerate the wanton wastage of food and frivolous spending? We could stand with large flexi banners at the venue. Through the use of placards, we can hold a rally or take out a procession to spread awareness in people.

🔶 The placards should display that each day is auspicious so that the myth about muhurat is broken. We should create awareness for simple weddings and ideal life. Young men and women should be made to take an oath for weddings without dowry. We should meet their parents and relatives and request them to read Yug Sahitya. We should request them to spend a part of their savings to help the couple in setting up their home and give as ‘Streedhan’; while some part could be spent for activities related to social welfare.

✍🏻 Pranav Pandya
📖 From Akhand Jyoti

👉 प्रायश्चित क्यों? कैसे? (भाग 3)

🔷 हिन्दू धर्म में पाप प्रायश्चित का ही नाम है। गंगा में स्नान के बारे में जो कहा गया है, उसका मतलब केवल यह है कि उससे हमारी पाप करने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगे, हमारा पाप करने को जो मन चलता है, वह न चले, भविष्य में हम वह सब काम न करें, जिससे हमारे अहम् को प्रेरणा मिल जाए, प्रोत्साहन मिल जाए, वातावरण मिल जाए, यह मतलब है। यह मतलब नहीं है कि आप भूतकाल में जो कर चुके हैं, उसके दण्डों से आपको राहत मिल जाएगी। ऐसा नहीं हो सकता। आपके ऊपर जो बुरे कामों का किया हुआ कर्ज है, उससे भी निपटिए और जिन बुरे कर्मों का वातावरण बना रखा है, जरा उसको भी ठीक कीजिए। आपने जो-जो गलतियाँ कर रखी हैं, जरा उनको भी फिर से एक बार सुधारिए। नहीं सुधार पायेंगे, तो भावी उन्नति का दरवाजा बन्द है।

🔶 मैं आपसे यह कह रहा था कि आप आध्यात्मिक उन्नति के लिए पूजा करते हैं, तो आपको मुबारक, आप उपवास रखते हैं, बहुत अच्छी बात, आप यहाँ अनुष्ठान करते हैं, इससे अच्छी बात क्या हो सकती है? लेकिन इसके साथ-साथ यह मत भूलिए कि इनके जो मुनासिब लाभ हैं, वह आपको उस समय तक नहीं मिल सकेंगे जब तक कि पिछले वाले दबाव आप पर पड़े हुए हैं। पिछले वाले पाप एक ऐसा वातावरण बनाते हैं, जिससे न आपकी पूजा सफल हो सकती है, न उपासना सफल हो सकती है, न आपका मन लग सकता है, न ध्यान लग सकता है। क्यों? क्योंकि आपको दण्ड मिल रहे हैं। दण्ड नहीं मिलेंगे तो आपका ध्यान लग जाएगा। ध्यान लग जाएगा फिर पाप का दण्ड कहाँ जाएगा?

🔷 इसीलिए वह आसुरी शक्तियाँ शुभ-कर्मों में बराबर विघ्न उपस्थित करती रहती है। आसुरी शक्तियों से क्या मतलब है? आसुरी शक्तियों से कोई मतलब नहीं है, आपका किसी से वैर नहीं है, फिर कोई आपको बेकार ही हैरान नहीं कर सकता। आसुरी शक्तियाँ बेकार ही हैरान क्यों करेंगी? केवल आपके पाप कर्म ही वह आसुरी शक्तियाँ हैं, जो आपको हैरान कर देती हैं और आपको अच्छे कर्म में सफलता मिलने पर अवरोध खड़ा कर देती हैं, उनसे आपको लड़ना ही पड़ेगा। भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए आप जप करते हैं, तप करते हैं, अनुष्ठान करते हैं—भगवान को प्राप्त करने के लिए, मनोकामनाएँ पूरी करने के लिए तो फिर उज्ज्वल भविष्य में रुकावट डालने वाले जो पिछले वाले पाप कर्म हैं, वही हैं, आसुरी शक्तियाँ उन्हीं का नाम है। उन आसुरी शक्तियों से निपटने की भी कोशिश नहीं करेंगे, तो वह हमला करके आपके अच्छे प्रयासों को मटियामेट करके रख देंगी। खेती आपने की है।

🔶 जंगली जानवर जो हमला करते हैं, तो रातभर में सारी-की फसल को खा-पी करके बराबर कर देते हैं। आप जानवरों को रोकेंगे नहीं? कृपा करके रोकिए, नहीं तो फिर यह हो जाएगा कि आप चाहे जितना पानी लगाते रहिए, खाद लगाते रहिए, बीज बोते रहिए, फसल के नाम पर आपको कोई भी चीज हाथ लगने वाली नहीं है। तब? तब मैं यही कह रहा था आपसे कि आपको इस महत्त्वपूर्ण बात के ऊपर गौर करना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 63)

👉 चेतना के रहस्यों का जानकार होता है सद्गुरु

🔷 गुरुगीता अध्यात्मविद्या का परम दुर्लभ शास्त्र है। इस परम शास्त्र के प्रवर्तक भगवान् शिव का कथन है कि अध्यात्म साधना में परम अनिवार्य तत्त्व है ‘गुरुभक्ति का जागरण’। साधक में यदि गुरुभक्ति का विकास हो जाए, तो अध्यात्म साधना सहज ही विकसित एवं फलित होने लगती है। साधक की निर्मल एवं निष्कपट भावनाएँ उसमें परिष्कृत चिन्तन को जन्म देती हैं। चिन्तन का परिष्कार होने से उसके कर्मों में उदात्तता आती है। तत्त्वकथा यही कहती है कि यदि भावनाएँ सँवरती हैं, तो ज्ञान एवं कर्म भी सँवर जाते हैं। गुरुभक्ति यदि अन्तःकरण में पनप सके, तो गुरुकृपा भी सहज ही अवतरित होती है। इस सद्गुरु कृपा के बल पर सहज ही आध्यात्मिक विभूतियों एवं यौगिक ऐश्वर्यों का स्वामी बन जाता है।
  
🔶 पिछले मंत्रों में यह बताया गया है कि परम पूज्य गुरुदेव की दिव्यमूर्ति ध्यान का मूल है। उनके चरण पूजा के मूल हैं। उनके वचन मंत्र मूल है। उनकी कृपा मोक्ष का मूल है। गुरुदेव ही आदि एवं अनादि हैं, उनसे बढ़कर और कुछ भी नहीं। यहाँ तक कि गुरुदेव के पाद प्रक्षालन के जल बिन्दु में सभी तीर्थों का सार समावेश है। भगवान् शिव स्वयं कहते हैं कि मेरे रूठने पर तो सद्गुरु अपने शिष्य का त्राण करने में सक्षम हैं; परन्तु यदि वही रूठ जाएँ, तो फिर कहीं भी त्रिलोकी में रक्षा नहीं हो सकती। इसलिए शिष्य को सदा अपने सद्गुरु की शरण में रहना चाहिए। उन्हीं की सब भाँति अर्चना-आराधना करनी चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 101

👉 लेडी डॉक्टर ने 'स्वच्छ भारत' के लिए दान किए 45 लाख रुपये

🔶 जम्मू-कश्मीर में  एक 33 वर्षीय महिला डॉक्टर ने स्वच्छ भारत अभियान के लिए 45 लाख रुपये की भारी भरकम राशि दान कर दी है. उस डॉक्टर का नाम मेघा महाजन है. जानकारी के मुताबिक मेघा को ये पैसे पति से तलाक के बाद गुजारा भत्ते के तौर पर मिले थे. मेघा ने कहा कि वह अभी काफी यंग हैं और डॉक्टर भी हैं तो अभी काफी पैसा कमा सकती हैं. वह कहती हैं कि हमें जिंदगी एक बार ही मिलती है उसे समाज की सेवा में लगा देना चाहिए. इसी वजह से उन्होंने अपने गुजारे भत्ते के लिए मिले पैसे स्वच्छ भारत अभियान के लिए दान कर दिए.

👉 लोगों में आई है जागरुकता
🔷 आपको बता दें कि इस देश में जब पीएम नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी तो उनका सबसे पहला बड़ा कदम भारत को साफ-सुथरा बनाना था. इसी उद्देश्य से उन्होंने स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत की थी. कई शहरों में इस मुहिम का असर दिखा है और लोगों में भी साफ-सफाई को लेकर काफी जागरुकता आई है.

👉 इसलिए दान किया अपना गुजारा भत्ता
🔶 मेघा ने बताया, "पिछले साल नवंबर में पति से तलाक लेने के बाद मुझे गुजारा भत्ते के तौर पर 45 लाख रुपये मिले थे. मैंने इन पैसों को स्वच्छ भारत अभियान फंड में देने का फैसला किया. आपको बता दें कि मेघा जम्मू के I.G.G.D.C हॉस्पिटल में बतौर डेंटल सर्जन काम कर रही हैं. उन्होंने कहा कि आमतौर पर जब पत्नी को तलाक के बाद गुजारा भत्ता मिलता है तो लोग यह सोचते हैं कि महिलाएं गलत नीयत से और पति का शोषण करने के लिए गुजारा भत्ता मांगती हैं. मेघा ने कहा कि वह ऐसे लोगों को जवाब दे उन्हें गलत साबित करना चाहती थीं.

👉 दान किए गए पैसों का नहीं है अफसोस
🔷 मेघा ने आगे कहा, "मैं चाहती तो इतने सारे पैसों का कुछ भी कर सकती थी. चाहती तो अपने लिए भी खर्च कर सकती थी. लेकिन, मैंने उन लोगों को जवाब देना जरूरी समझा." मेघा ने बताया, "मेरे परिवार वालों ने मुझे अच्छी शिक्षा और संस्कार दिए हैं. मुझे दान किए गए पैसों का कोई अफसोस नहीं है." उन्होंने कहा कि स्वच्छ भारत अभियान भारत सरकार का एक अच्छा और जरूरी कदम है. मेघा ने दान देने के साथ ही पानी और साफ हवा के लिए चलने वाले प्रॉजेक्ट के बारे में भी सरकार को लिखा है.

👉 बुरी आदत:-

एक अमीर आदमी अपने बेटे की किसी बुरी आदत से बहुत परेशान था। वह जब भी बेटे से आदत छोड़ने को कहते तो एक ही जवाब मिलता, “अभी मैं इतना छोटा ह...