बुधवार, 12 दिसंबर 2018

👉 आत्मचिंतन के क्षण 12 Dec 2018

आज आदमी खुशी के लिए तरस रहा है। जिन्दगी की लाश इतनी भारी हो गई है कि वजन ढोते-ढोते आदमी की कमर टूट गई है। वह खुशी ढूँढने के लिए सिनेमा, क्लब, रेस्टारेंट, कैबरे डांस सब जगह जाता है, पर वह कहीं मिलती नहीं। खुशी जबकि दृष्टिकोण है, जिसे  ज्ञान की संपदा कहना चाहिए। वही व्यक्ति  ज्ञानवान्  है, जिसे खुशी तलाशना-बाँटना आता है।

आज हर आदमी यही सोचता है कि अनैतिक रहने में उसका भौतिक लाभ है। इसलिए वह बाहर से नैतिकता का समर्थन करते हुए भी भीतर ही भीतर अनैतिक रहता है। हमें मानसिक स्वच्छता का वह पहलू जनता के सामने प्रस्तुत करना होगा, जिसके अनुसार यह भली प्रकार समझा जा सके कि अनैतिकता व्यक्तिगत स्वार्थपरता की दृष्टि से भी घातक है।

अपने समाज के सुधार पर ध्यान देना उतना ही आवश्यक है, जितना अपना स्वास्थ्य एवं उपार्जन की समस्याओं का सुलझाना। समाजगत पापों से हम निर्दोष होते हुए भी पापी बनते हैं। भूकम्प, दुर्भिक्ष, युद्ध, महामारी आदि के रूप में ईश्वर भी हमें सामूहिक दण्ड दिया करता है और सचेत करता है कि हम अपने को ही नहीं, सारे समाज को भी सुधारें। स्वयं ही सभ्य न बनें, सारे समाज को भी सभ्य बनायें।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

विजय-गीत (kavita)

तुम न घबराओ,न आंसू ही बहाओ अब,और कोई हो न हो पर मैं तुम्हारा हूं।
मैं खुशी के गीत गा-गा कर सुनाऊंगा॥

मानता हूं, ठोकरें तुमने सदा खाईं, जिन्दगी के दांव में हारें सदा पाईं, बिजलियां दुख की,
निराशा की,सदा टूटीं, मन गगन पर वेदना की बदलियां छाईं,

पोंछ दूंगा मैं तुम्हारे अश्रु गीतों से, तुम सरीखे बेसहारों का सहारा हूं।
मैं तुम्हारे घाव धो मरहम लगाऊंगा। मैं विजय के गीत गा-गा कर सुनाऊंगा॥

खा गई इंसानियत को भूख यह भूखी, स्नेह ममता को गई पी प्यास यह सूखी,
जानवर भी पेट का साधन जुटाते हैं,‘जिन्दगी का हक’ नहीं है रोटियां रूखी,

और कुछ मांगो, हंसी मांगो, खुशी मांगो, खो गये हो, दे रहा तुमको इशारा हूं।
आज जीने की कला तुमको सिखाऊंगा। जिन्दगी के गीत गा-गा कर सुनाऊंगा ॥

दान बड़ा या ज्ञान (kahani)

विवाद यह चल रहा था कि दान बड़ा या ज्ञान। दान के पक्षधर थे वाजिश्रवा और ज्ञान के समर्थक थे याज्ञवल्क्य।
निर्णय हो नहीं पा रहा था। दोनों प्रजापति के पास पहुँचे। वे बहुत व्यस्त थे सो निर्णय कराने के लिए शेष जी के पास भेज दिया।

दोनों ने अपने-अपने पक्ष प्रस्तुत किये। शेष जी ने कहा मैं बहुत थक गया हूं। सिर पर रखा पृथ्वी का बोझ बहुत समय से लदा है। थोड़ी राहत पाऊँ तो विचारपूर्वक निर्णय करूं। आप में से कोई एक मेरे बोझ को एक घड़ी अपने सिर पर रख लें। इसी बीच निर्णय हो जायेगा।

वाजिश्रवा आगे आये। अपनी दानशीलता को दाँव पर लगाकर उनके धरती के बोझ को अपने सिर पर रखने का प्रयत्न किया। पर वे उसमें तनिक भी सफल न हुए।

याज्ञवल्क्य को आगे आना पड़ा। उनने अपने ज्ञान बल का प्रयोग किया और देखते-देखते भू-भार कन्धों पर उठा लिया।
निर्णय हो गया। शेष भगवान बोले- ज्ञान बड़ा है। उस अकेले के बलबूते भी अपना और असंख्यों का उद्धार हो सकता है जबकि दान अविवेक पूर्वक दिया जाने पर कुपात्रों के हाथ पहुँच सकता है और पुण्य के स्थान पर पाप बन सकता है।

👉 आज का सद्चिंतन 12 Dec 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 12 Dec 2018


👉 बुरी आदत:-

एक अमीर आदमी अपने बेटे की किसी बुरी आदत से बहुत परेशान था। वह जब भी बेटे से आदत छोड़ने को कहते तो एक ही जवाब मिलता, “अभी मैं इतना छोटा ह...