गुरुवार, 28 अप्रैल 2016

आध्यात्मिक शिक्षण क्या है? भाग 4


मित्रो! हमने दीपक जलाया और कहा कि ऐ दीपक! जल और हमको भी सिखा। ऐ कम हैसियत वाले दीपक, एक कानी कौड़ी की बत्ती वाले दीपक, एक छटाँक भर तेल लिए दीपक, एक मिट्टी की ठीकर में पड़े हुए दीपक! तू अंधकार में प्रकाश उत्पन्न कर सकता है। मेरे जप से तेरा संग ज्यादा कीमती है। तेरे प्रकाश से मेरी जीवात्मा प्रकाशवान हो, जिसके साथ में खुशियों के इस विवेक को मूर्तिवान बना सकूँ। शास्त्रों में बताया गया है तमसो मा ज्योतिर्गमय’’। ऐ दीपक! हमने तुझे इसलिए जलाया कि तू हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले चले तमसो मा ज्योतिर्गमय अंतरात्मा की भूली हुई पुकार को हमारा अंतःकरण श्रवण कर सके और इसके अनुसार हम अपने जीवन को प्रकाशवान बना सकें।

अपने मस्तिष्क को प्रकाशवान बना सकें।दीपक जलाने का यही उद्देश्य है। सिर्फ भावना का ही दीपक जलाना होता, तो भावना कहती कि दीपक जला लीजिए तो वही बात है, मशाल जला लीजिए तो वही बात है, आग जला लीजिए तो वही बात है। स्टोव को जला लीजिए, बड़ी वाली अँगीठी, अलाव जलाकर रख दीजिए। इससे क्या बनने वाला है और क्या बिगड़ने वाला है? आग जलाने से भगवान् का क्या नुकसान है और दीपक जलाने से भगवान् का क्या बनता है? अतः ऐ दीपक! तू हमें अपनी भावना का उद्घोष करने दे।

साथियो! हम भगवान् के चरणारविन्दों पर फूल चढ़ाते हैं। हम खिला हुआ फूल, हँसता हुआ फूल, सुगंध से भरा हुआ फूल, रंग बिरंगा फूल ले आते हैं। इसमें हमारी जवानी थिरक रही है और हमारा जीवन थिरक रहा है। हमारी योग्यताएँ प्रतिभायें थिरक रही हैं। हमारा हृदयकंद कैसे सुंदर फूल जैसे है। उसे जहाँ कहीं भी रख देंगे, जहाँ कहीं भी भेज देंगे, वहीं स्वागत होगा। उसे कुटुम्बियों को भेज देंगे, वे खुश। जब लड़का कमा कर लाता है। आठ सौ पचास रुपये कमाने वाला इंजीनियर पैसा देता है, तो सोफासेट बनते हुए चले जाते हैं। माया घर में आती हुई चली जाती है।


क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/lectures_gurudev/44

शिष्य संजीवनी (भाग 38) : जैविक प्रवृत्तियों को बदल देती है सदगुरु की चेतना

शोर का रूपान्तरण शान्ति में- यह शिष्य की श्रद्धा का सुफल है। यह उसकी भक्ति का सत्परिणाम है। जो इस नीरवता में अविचल भाव से अपने सद्गुरु को पुकारता रहता है। उसे ही मार्ग की सिद्धि मिलती है। यह मार्ग बाहरी दुनिया का मार्ग नहीं है। यह अन्तजर्गत की यात्रा का पथ है। यह ऐसा मार्ग है, जो शिष्य की चेतना को सद्गुरु की चेतना से जोड़ता है। बड़ा दुर्लभ पथ है यह। जिसे मिल चुका है, वे परम सौभाग्यशाली हैं क्योंकि वे सतत्- निरन्तर अपने सद्गुरु के सम्पर्क में रहते हैं। उनकी कृपा वर्षा को अनुभव करते हैं।

इस मार्ग को उपलब्ध करने वाले साधकों का अनुभव यही कहता है कि उनके सद्गुरु इस लोक में हों, या फिर किसी सुदूर लोक में, कोई अन्तर नहीं पड़ता। जिसे मार्ग मिल सका है, उसके कई चिह्न उनके जीवन में प्रकट हो जाते हैं। इन चिह्नों में सबसे महत्त्वपूर्ण चिह्न है, देहभाव का विलीन हो जाना। आचार्य शंकर कहते हैं देहादिभाव परिवर्तयन्त, परिवर्तित हो गए हैं देहभाव जिसके। इसका सार अर्थ इतना ही है कि उस पर बरसने वाली सद्गुरु की कृपा चेतना उसकी जैविक प्रवृत्तियों को आमूल- चूल बदल देती है। सच्चे शिष्य की देह दिखने में तो जस की तस बनी रहती है, पर उसकी प्रवृत्तियाँ घुल जाती हैं, धुल जाती हैं।

जैविक प्रवृत्तियों के रूपान्तरण के साथ ही शिष्य सतत् और निरन्तर अपने सद्गुरु की चेतना के लिए ग्रहणशील होता है। उसमें प्रकट होता है अडिग विश्वास, प्रबल निश्चय और व्यापक आत्मबोध। गुरुदेव उसे अपनी आत्मचेतना में स्वीकार लेते हैं। शिष्य उनकी सर्वव्यापी चेतना का अभिन्न अंश बन जाता है। उसके व्यक्तित्व से ऐसा प्रकाश फूटता है, जिससे कि उससे मिलने वालों का जीवन प्रकाशित हो जाता है। जिन्हें भी इसकी प्राप्ति हो सकी है, उन सभी के अन्तःकरण शान्ति से आप्लावित हो उठते हैं। इस सत्य के भेद और भी हैं। अगला सूत्र इस सत्य के नए आयाम उद्घाटित करेगा। 

क्रमशः जारी
डॉ. प्रणव पण्डया
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Devo/jaivic

माया क्या है ?

शरीर सुख के लिए अन्य मूल्यवान पदार्थों को खर्च कर देते हैं कारण यही है कि वे मूल्यवान पदार्थ शरीर सुख के मुकाबले में कमतर जँचते हैं। लोग शरीर सुख की आराधना में लगे हुए हैं परन्तु एक बात भूल जाते हैं कि शरीर से भी ऊँची कोई वस्तु है। वस्तुत: आत्मा शरीर से ऊँची है। आत्मा के आनन्द के लिए शरीर या उसे प्राप्त होने वाले सभी सुख तुच्छ हैं। अपने दैनिक जीवन में पग- पग पर मनुष्य 'बहुत के लिये थोड़े का त्याग' की नीति को अपनाता है, परन्तु अन्तिम स्थान पर आकर यह सारी चौकड़ी भूल जाता है। जैसे शरीर सुख के लिए पैसे का त्याग किया जाता है वैसे ही आत्म - सुख के लिए शरीर सुख का त्याग करने में लोग हिचकिचाते हैं, यही माया है।

पाठक इस बात को भली भाँति जानते हैं कि अन्याय, अनीति, स्वार्थ, अत्याचार, व्यभिचार, चोरी, हिंसा, छल, दम्भ, पाखण्ड, असत्य, अहंकार, आदि से कोई व्यक्ति धन इकट्ठा कर सकता है, भोग पदार्थों का संचय कर सकता है, इन्द्रियों को कुछ क्षणों तक गुदगुदा सकता है, परन्तु आत्म-सन्तोष प्राप्त नहीं कर सकता।

-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
धर्म तत्त्व का दर्शन और मर्म
वांग्मय 53 पृष्ठ- 3.14


Maya - know it to know It

To obtain sense pleasures we spend away our riches, because we value this experience of pleasure more than the possession of material wealth. We are so driven by these desires, running after these sense pleasures that we forget that there exists an entity even greater than our gross body. In reality Atman (soul) is even greater, more special than our body. When compared to the bliss we can experience in our soul all other sense pleasures appear inferior and trivial.

In our day-to-day life we follow the motto of - "give up as little as possible and get as much as possible", but when presented with the ultimate test, we abandon it. We are ready to give up our hard earned wealth when it is for the sake of sense pleasures, but we hesitate to give up our sense pleasures (which are little things) for the bliss of our soul (which is the greatest joy there is) - This is MAYA.

It is a well established fact that any one can obtain wealth, amass material possessions, give the senses some temporary satisfaction by indulging in tyranny, immorality, selfishness, oppression, adultery, theft, violence, deceit, arrogance, hypocrisy, lies, ego, etc. But one can never taste the bliss of self-satisfaction this way.

-Pt. Shriram Sharma Acharya
Dharma Tatwa ka Darshan aur Marm Vangmay 53 Page
-3.14

प्रभु से प्रार्थना (Kavita)

प्रभु जीवन ज्योति जगादे! घट घट बासी! सभी घटों में, निर्मल गंगाजल हो। हे बलशाही! तन तन में, प्रतिभापित तेरा बल हो।। अहे सच्चिदानन्द! बह...