शनिवार, 7 जनवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 8 Jan 2017


👉 आज का सद्चिंतन 8 Jan 2017


👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 1) 8 Jan

🌹 भूमिका

🔴 ईश्वर छोटी- मोटी भेंट- पूजाओं या गुणगान से प्रसन्न नहीं होता। ऐसी प्रकृति तो क्षुद्र लोगों की होती है। ईश्वर तो न्यायनिष्ठ और विवेकवान है। व्यक्तित्त्व में आदर्शवादिता का समावेश होने पर जो गरिमा उभरती है, उसी के आधार पर वह प्रसन्न होता और अनुग्रह बरसाता है।          

🔵 प्रतीक पूजा की अनेक विधियाँ हैं, उन सभी का उद्देश्य एक ही है, मनुष्य के विकारों को हटाकर, संस्कारों को उभारकर, दैवी अनुग्रह के अनुकूल बनाना।   

🔴 साधना से सिद्धि का सिद्धान्त सर्वमान्य है। प्रश्न है- साधना किसकी की जाय? उत्तर है- जीवन को ही देवता मानकर चला जाय। यह इस हाथ दे, उस हाथ ले का क्रम है। इसी आधार पर आत्मसन्तोष, लोक सम्मान और देव अनुग्रह जैसे अमूल्य अनुदान प्राप्त होते हैं। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Krantidharmi_shahitya/Jivan_Devata_Ki_Sadhana_Aaradhana

👉 अध्यात्म का उपदेश

🔵 प्रसन्नता, अप्रसन्नता, आत्मरक्षा, संघर्ष, जिज्ञासा, प्रेम, सामूहिकता, संग्रह, शरीर पोषण, क्रीड़ा, महत्व प्रदर्शन, भोगेच्छा यह मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्तियाँ है। शरीर और मन परिस्थितियों के अनुसार इन परिस्थितियों के क्षेत्र में विचरण करते रहते है। उसकी एक अध्यात्मिक विशेषता भी है जिसे महानता, धार्मिकता, आस्तिकता, दैवी सम्पदा आदि नामों से पुकारते है। उसके द्वारा मनुष्य दूसरों को सुखी बनाने के लिए अपने आपको कष्ट में डाल कर भी प्रसन्नता अनुभव करता है। दूसरों के सुख में अपना सुख और दूसरों के दुःख में अपना दुःख मानता है। जिस प्रकार अपने सुख को बढ़ाकर और दुःख को घटाकर प्रसन्नता का अनुभव होता है इसी प्रकार दूसरों में आत्मीयता का आरोपण करके उनके हित साधन में भी संतोष और सुख का अनुभव होता है।

🔴 यह उदारता एवं सेवा की वृत्ति तभी प्रस्फुटित होती है जब मनुष्य अपने आपको संयमित करता है। अपने लिए सीमित लाभ में संतोष करने से ही दूसरों के प्रति कुछ उदारता प्रदर्शित करना संभव होता है। इसलिए इस सर्वतोमुखी संयम को नैतिकता या धर्म के नाम से पुकारा जाता है। इसी का अभ्यास करने के लिए नाना प्रकार के जप, तप, व्रत अनुष्ठान किये जाते है। शास्त्र श्रवण, स्वाध्याय और सत्संग का उद्देश्य भी इन्हीं प्रवृत्तियों को विकसित करना है। चरित्र निर्माण और नैतिकता भी इसी प्रक्रिया का नाम है। पुण्य, परमार्थ भी इसी को कहते है और स्वर्ग तथा मुक्ति इसके फल माने गये है। ईश्वर उपासना के महात्म्य से यह आत्म-निर्माण का कार्य अधिक सरलता से पूर्ण होता है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति 1961 जून Page 21

👉 आत्मचिंतन के क्षण 8 Jan 2017

🔴 चलते रहो-चलते रहो, इसका तात्पर्य विस्तृत है। इसका एक अर्थ यह भी है कि कुछ न कुछ कार्य करते रहो। आलस्य में निष्क्रिय जीवन व्यतीत न करो। एक कार्य के पश्चात् दूसरा कोई नवीन कार्य आरंभ करो। मानसिक कार्य के पश्चात् शारीरिक, शारीरिक श्रम के पश्चात् मानसिक कार्य-यह क्रम रखने से मनुष्य निरन्तर कार्यशीलता का जीवन व्यतीत कर सकता है। आलसी व्यक्ति परिवार तथा समाज का शत्रु है।

🔵 सुसंस्कार किसी पूजा-पाठ या कर्मकाण्ड से नहीं जम सकते। कथा-कीर्तन से लेकर तीर्थयात्रा तक के क्रिया-कृत्यों से भी वह प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। योगाभ्यास और तप-साधना की शारीरिक, मानसिक कसरतें भी उस आवश्यकता की पूर्ति नहीं करतीं। इन समस्त आचरणों का मूल उद्देश्य एक ही है-उच्च स्तरीय आस्थाओं, आकाँक्षाओं, आदर्शों की अंतःकरण में इतनी सघन स्थापना जिसकी प्रेरणा से अपनी गतिविधियाँ केवल श्रेष्ठ सत्कर्मों की दिशा में ही गतिशील रह सकें।

🔴 खेद का विषय है कि हम नित्य प्रति के जीवन में विचार शक्ति का बड़ा अपव्यय करते हैं। जितनी शक्ति फिजूद बर्बाद होती है उसके थोड़े से भाग को यदि उचित रीति से इस्तेमाल करें तो स्वभाव तथा आदतें आसानी से बदली जा सकती है। जिस समय विचारधारा नीचे से ऊपर को चढ़ती है तो मनुष्य स्वयं अपना मित्र बन जाता है। जब विचारधारा ऊपर से नीचे को गिरती है तो वह अपने आप ही अपना शत्रु बन जाता है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 17) 8 Jan

🌹 साधना में त्रुटि

🔴 गायत्री उपासना के क्रिया-कृत्यों में कोई त्रुटि रहने पर किसी प्रकार के अनिष्ट की आशंका तो नहीं है? इस आशंका को मन से पूरी तरह निकाल देना चाहिए। सौम्य उपासना में ऐसा कोई खतरा नहीं है। गायत्री उपासना सौम्य स्तर की है। उसे मातृभक्ति के समतुल्य समझना चाहिए। माता से भी शिष्टाचार बरतना चाहिए, यह उचित है। पर किसी लोकाचार में कमी रह जाने पर भी संतान के मन में मातृभक्ति रहती है और माता के मन में वात्सल्य बना रहने पर किसी अप्रिय घटना की कोई सम्भावना नहीं है। माता के मन में बच्चों के प्रति जो असीम वात्सल्य रहता है उसे देखते हुए कल्पना भी नहीं की जा सकती कि वे मात्र क्रिया-कृत्य में कोई भूल या कमी रहने पर अपने उपासक का कुछ अहित करने की बात सोचेंगी भी। त्रुटि रहने पर इतना ही हो सकता है कि सत्परिणाम में कुछ कमी रह जाय।

🔵 गीता के अनुसार सौम्य उपासना में ‘प्रत्यवाय’ अर्थात् उल्टा परिणाम कभी नहीं हो सकता। उसका थोड़ा-सा अवलम्बन भी ‘त्रायते महतो भयात्’ अर्थात् अनिष्ट से रक्षा करता है। भगवान का नाम रुग्ण अवस्था में, विस्तर पर, अशुद्ध स्थिति में पड़े हुए भी लेते रहते हैं। भगवान इतना निष्ठुर नहीं है कि भक्त की भावना का ध्यान न रखे और विधि-विधान में कोई कमी रह जाने से रुष्ट होकर अपने भक्तजनों की ही हानि करने पर उतारू हो जाय। ऐसा तो कोई सर्प, बिच्छु, सिंह, व्याघ्र ही कर सकता है—भक्त वत्सल भगवान नहीं।

🔴 यह आशंका तांत्रिक विधानों में गलती करने पर उत्पन्न होने वाले दुष्परिणामों की बात के आधार पर की गई है। तांत्रिक विधानों में भावना का उपयोग नहीं होता। वे भौतिक उद्देश्यों के लिए किये जाते हैं। उनमें शरीर की हठ-साधना और प्रयोग सामग्री के उपचार ही प्रधान होते हैं। एक प्रकार से उन्हें भौतिक क्रिया-कृत्य कह सकते हैं। तांत्रिक देवी-देवताओं की उपासना इसी स्तर की है। तेजाब के रख-रखाव में बहुत सावधानी बरतनी पड़ती है, तनिक भी भूल होने से खतरे का डर रहता है। आग या बिजली के उपयोग में भी सावधानी न बरतने पर हानि हो सकती है। किन्तु गौदुग्ध के प्रयोग में कोई खतरा नहीं है। इसमें पूरे लाभ की सम्भावना है। किन्तु किसी को भी यह आशंका नहीं करनी चाहिए कि त्रुटि रहने पर माता के कोप का—प्रयोग के दुष्परिणाम का कोई संकट हो सकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 पराक्रम और पुरुषार्थ (भाग 11) 8 Jan

🌹 कठिनाइयों से डरिये मत, जूझिये
 
🔵 यदि एक ही प्रकार की परिस्थितियां सदा बनी रहें तो यहां सभी कुछ रूखा और नीरस लगने लगेगा। सदा दिन ही रहे रात कभी न हो, सदा मिठाई ही खाने को मिले, नमकीन के दर्शन ही न हों, सबकी उम्र एक सी ही रहे, न कोई छोटा और न बड़ा हो, सर्दी या गर्मी की एक ऋतु रहे, दूसरी बदले ही नहीं तो फिर इस संसार की क्या सुन्दरता रह जायेगी? सारी शोभा-सुषमा ही नष्ट हो जायेगी। सदा प्रिय अनुकूल और सुखद परिस्थितियां ही बनी रहें, कभी अप्रिय और प्रतिकूल स्थिति न आये तो कुशलता, कर्मठता और सहकारिता की जरूरत ही न पड़ेगी। लोग आलसी, निकम्मा और नीरस जीवन जीते हुए किसी प्रकार मृत्यु की प्रतीक्षा करते रहेंगे।

🔴 अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण सुविधायें उत्पन्न होना स्वाभाविक है। प्रश्न यह नहीं है कि उसकी क्या प्रतिक्रिया होती है। महत्व पूर्ण तो यह है कि प्रतिकूलताओं और अनुकूलताओं के चढ़ाव-उतार से मनुष्य में कई ऐसे गुण उत्पन्न होते हैं जो उसके व्यक्तित्व की गरिमा को बढ़ाते हैं। प्रतिकूलताओं में पुरुषार्थ, साहस, धैर्य, सन्तुलन, दूरदर्शिता जैसे सद्गुणों का विकास होता है। बल्कि कहा जाना चाहिए कि इन्हीं परिस्थितियों में ये सद्गुण उत्पन्न होते हैं। आवश्यकता केवल इस बात की है कि इन प्रतिकूलताओं में अपना सन्तुलन न खोया जाये। यदि सन्तुलन बना रहे तो जीवन के ऐसे विविध और उपयोगी अनुभव होते हैं जो व्यक्तित्व की शोभा-सुषमा में चार-चांद लगाते हैं। वे अनुभव व्यक्तित्व को गुण सम्पन्न-समृद्ध बनाते हैं।

🔵 प्रतिकूलताओं के सम्बन्ध में विधेयात्मक दृष्टि अपनाने की आवश्यकता और उपयोगिता बताते हुए किसी विचारक ने लिखा है, अगर कोई व्यक्ति अपने आपको अन्धेरे कमरे में बन्द करके यह सोचे कि प्रकाश का कोई अस्तित्व ही नहीं है तो यह उसकी भूल है। अन्धकार तो सिर्फ उसके छोटे कमरे में बन्द है बाहर उजाला ही उजाला है। बेहतर यह है कि आपने अपने इर्द-गिर्द भ्रम भ्रान्तियों की जो दीवारें खड़ी कर ली हैं, उन्हें गिराकर अंधेरे बन्द कमरे से बाहर निकलें और सर्वव्यापी प्रकाश से साक्षात्कार करें।’’

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌿🌞     🌿🌞     🌿🌞

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 65)

🌹 युग-निर्माण की आध्यात्मिक पृष्ठभूमि

🔴 99. अविच्छिन्न दान परम्परा— नित्य कुछ समय और कुछ धन परमार्थ कार्यों के लिये देते रहने का कार्यक्रम बनाना चाहिए। दान हमारे जीवन की एक अविच्छिन्न आध्यात्मिक परम्परा के रूप में चलता रहे। इस प्रकार अपनी आजीविका का एक अंश नियमित रूप से परमार्थ के लिये लगाया जाता रहे। इसके लिये कोई धर्मपेटी या धर्मघट में अन्न या पैसा डालते रहा जाय। यह धन केवल सद्भावना प्रसार के यज्ञ में ही खर्च हो, युग-निर्माण का आधार यही तो है।

इसी प्रकार धर्म प्रचार के लिये, जन सम्पर्क के लिये कुछ समय भी नित्य दिया जाय। नित्य न बन पड़े तो साप्ताहिक अवकाश के दिन अधिक समय दे करके दैनिक क्रम की पूर्ति की जाय। सद्भावनाओं के प्रसार और जागरण के लिए जन सम्पर्क ही प्रधान उपाय है। इसमें झिझक या संकोच करने की, अपमान अनुभव करने की तनिक भी आवश्यकता नहीं है।

🔵 100. सत्याग्रही स्वयंसेवक सेना— सामाजिक कुरीतियों एवं नैतिक बुराइयों को मिटाने के लिये राग-द्वेष से रहित, संयमी, मधुर व्यवहार वाले और दृढ़ चरित्र व्यक्तियों की एक ऐसी सत्याग्रही सेना गठित की जानी है, जो दूसरों को बिना कष्ट पहुंचाये अपने ही त्याग, तप से बुराइयां छुड़ाने के लिये कष्ट सहने को तैयार हों। सत्याग्रह कहां, किस प्रकार किया जाय यह एक बहुत ही दूरदर्शिता का प्रश्न है। अन्यथा सुधार के स्थान पर द्वेष फैल सकता है। इन सब बातों का ध्यान रखते हुए सत्याग्रही स्वयंसेवक सेना का गठन और उसके द्वारा बुराइयों के उन्मूलन की व्यवस्था भी करनी ही पड़ेगी। इसके लिये उपयुक्त व्यक्तियों को अपना नाम स्वयं सेवकों की श्रेणी में लिखाना चाहिये। शक्ति को देखते हुये वैसे ही कार्यक्रम आरम्भ किये जावेंगे और पहले उन्हें प्रशिक्षित भी करना पड़ेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 पराक्रम और पुरुषार्थ (भाग 10) 7 Jan

🌹 कठिनाइयों से डरिये मत, जूझिये

🔵 जेम्स ऐलेन ने अपनी पुस्तक ‘फ्रॉम प्रॉपर्टी टू प्रॉस्पर्टी’ की शुरुआत इन पंक्तियों से की है, ‘वेदना दुख और अपवाद जीवन की परछाइयां हैं। संसार में एक भी हृदय ऐसा नहीं मिलेगा, जिसे दुःख ने स्पर्श न किया हो। एक भी मन ऐसा नहीं होगा जिस पर कोई न कोई घाव न लगा हो, एक भी आंख ऐसी नहीं होगी, जिसने कभी न कभी खून के आंसू न टपके हों। संसार में एक भी परिवार ऐसा नहीं है, जिसमें मृत्यु ने प्रवेश न किया हो और जो रोग और मृत्यु से त्रस्त न रहा हो, जिसने सगे-सम्बन्धियों का विछोह न देखा हो। बिल्ली जिस प्रकार चूहे को दबोचती है, दुख का मजबूत पंजा मनुष्य को उसी प्रकार अचानक आ दबोचता है। तो क्या दुःख और विषाद से बचने का कोई मार्ग नहीं?

🔴 क्या विपदा की जंजीरों को तोड़ फेंकने का कोई उपाय नहीं? क्या स्थाई समृद्धि शक्ति और आनन्द के स्वप्न देखना मूढ़ता पूर्ण है? नहीं मुझे यह कहते हुए हर्ष होता है कि विपदा को समाप्त कर देना सम्भव है। ऐसा एक उपाय, ऐसी एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा रोग दरिद्रता अथवा विपरीत परिस्थितियों को हमेशा के लिए समाप्त करके स्थाई समृद्धि लाई जा सकती है और मनुष्य विपदा तथा दरिद्रता के दोबारा लौट आने के भय से मुक्ति प्राप्त करके स्थाई आनन्द और शान्तिमय जीवन जी सकता है। ऐसे सुख और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करने का एक मात्र उपाय यह है कि मनुष्य दुःख के वास्तविक स्वरूप को भलीभांति समझ ले।

🔵 क्या है दुःख का वास्तविक स्वरूप? दुख और कुछ नहीं सुख के अभाव का ही नाम है। प्रकाश के अभाव का नाम अन्धकार है। प्रिय परिस्थितियां नहीं होतीं तो अप्रिय की अनुभूति होती है। अनुकूलता के अभाव में प्रतिकूलता भासती है। इन दोनों स्थितियों में सामंजस्य स्थापित किया जा सके तो प्रत्येक परिस्थिति में प्रसन्न और प्रफुल्ल रहा जा सकता है। प्रश्न उठता है कि यह सामंजस्य किस प्रकार स्थापित किया जाये? उत्तर एक ही है, तथ्यों के प्रति सन्तुलित और समझ पूर्ण दृष्टिकोण अपनाया जाय। यह मान्यता बनाकर चला जाये कि दिन और रात की तरह मनुष्य के जीवन में प्रिय और अप्रिय घटनाक्रम आते-जाते रहते हैं। इन उभयपक्षी अनुभूतियों से ही जीवन की सार्थकता और शोभा है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌿🌞     🌿🌞     🌿🌞

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 64)


🌹 युग-निर्माण की आध्यात्मिक पृष्ठभूमि

🔴 99. अविच्छिन्न दान परम्परा— नित्य कुछ समय और कुछ धन परमार्थ कार्यों के लिये देते रहने का कार्यक्रम बनाना चाहिए। दान हमारे जीवन की एक अविच्छिन्न आध्यात्मिक परम्परा के रूप में चलता रहे। इस प्रकार अपनी आजीविका का एक अंश नियमित रूप से परमार्थ के लिये लगाया जाता रहे। इसके लिये कोई धर्मपेटी या धर्मघट में अन्न या पैसा डालते रहा जाय। यह धन केवल सद्भावना प्रसार के यज्ञ में ही खर्च हो, युग-निर्माण का आधार यही तो है।

इसी प्रकार धर्म प्रचार के लिये, जन सम्पर्क के लिये कुछ समय भी नित्य दिया जाय। नित्य न बन पड़े तो साप्ताहिक अवकाश के दिन अधिक समय दे करके दैनिक क्रम की पूर्ति की जाय। सद्भावनाओं के प्रसार और जागरण के लिए जन सम्पर्क ही प्रधान उपाय है। इसमें झिझक या संकोच करने की, अपमान अनुभव करने की तनिक भी आवश्यकता नहीं है।

🔵 100. सत्याग्रही स्वयंसेवक सेना— सामाजिक कुरीतियों एवं नैतिक बुराइयों को मिटाने के लिये राग-द्वेष से रहित, संयमी, मधुर व्यवहार वाले और दृढ़ चरित्र व्यक्तियों की एक ऐसी सत्याग्रही सेना गठित की जानी है, जो दूसरों को बिना कष्ट पहुंचाये अपने ही त्याग, तप से बुराइयां छुड़ाने के लिये कष्ट सहने को तैयार हों। सत्याग्रह कहां, किस प्रकार किया जाय यह एक बहुत ही दूरदर्शिता का प्रश्न है। अन्यथा सुधार के स्थान पर द्वेष फैल सकता है। इन सब बातों का ध्यान रखते हुए सत्याग्रही स्वयंसेवक सेना का गठन और उसके द्वारा बुराइयों के उन्मूलन की व्यवस्था भी करनी ही पड़ेगी। इसके लिये उपयुक्त व्यक्तियों को अपना नाम स्वयं सेवकों की श्रेणी में लिखाना चाहिये। शक्ति को देखते हुये वैसे ही कार्यक्रम आरम्भ किये जावेंगे और पहले उन्हें प्रशिक्षित भी करना पड़ेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 16)

🌞 जीवन के सौभाग्य का सूर्योदय
🔴 पूजा की कोठरी में प्रकाश-पुंज उस मानव ने कहा-‘‘तुम्हारा सोचना सही है। देवात्माएँ जिनके साथ सम्बन्ध जोड़ती हैं, उन्हें परखती हैं। अपनी शक्ति और समय खर्च करने से पूर्व कुछ जाँच-पड़ताल भी करती हैं। जो भी चाहे उसके आगे प्रकट होने लगे और उसका इच्छित प्रयोजन पूरा करने लगें, ऐसा नहीं होता। पात्र-कुपात्र का अंतर किए बिना चाहे जिसके साथ सम्बन्ध जोड़ना किसी बुद्धिमान और सामर्थ्यवान के लिए कभी कहीं सम्भव नहीं होता। कई लोग ऐसा सोचते तो हैं कि किसी सम्पन्न महामानव के साथ सम्बन्ध जोड़ने में लाभ है, पर यह भूल जाते हैं कि दूसरा पक्ष अपनी सामर्थ्य किसी निरर्थक व्यक्ति के निमित्त क्यों गँवाएँगे?’’

🔵 ‘‘हम सूक्ष्म दृष्टि से ऐसे सत्पात्र की तलाश करते रहे, जिसे सामयिक लोक-कल्याण का निमित्त कारण बनाने के लिए प्रत्यक्ष कारण बताएँ। हमारा यह सूक्ष्म शरीर है। सूक्ष्म शरीर से स्थूल कार्य नहीं बन पड़ते। इसके लिए किसी स्थूल शरीर धारी को ही माध्यम और शस्त्र की तरह प्रयुक्त करना पड़ता है। यह विषम समय है। इसमें मनुष्य का अहित होने की अधिक सम्भावनाएँ हैं। उन्हीं का समाधान करने के निमित्त तुम्हें माध्यम बनाना है। जो कमी है, उसे दूर करना है। अपना मार्गदर्शन और सहयोग देना है। इसी निमित्त तुम्हारे पास आना हुआ है। अब तक तुम अपने सामान्य जीवन से ही परिचित थे। अपने को साधारण व्यक्ति ही देखते थे। असमंजस का एक कारण यह भी है। तुम्हारी पात्रता का वर्णन करें, तो भी कदाचित तुम्हारा संदेह निवारण न हो। कोई किसी बात पर अनायास ही विश्वास करे, ऐसा समय भी कहाँ है? इसीलिए तुम्हें पिछले तीन जन्मों की जानकारी दी गई।’’

🔴 सभी पूर्व जन्मों का विस्तृत विवरण जन्म से लेकर मृत्यु पर्यंत तक का दर्शाने के बाद उन्होंने बताया कि किस प्रकार वे इन सभी में हमारे साथ रहे और सहायक बने।

🔵 वे बोले-‘‘यह तुम्हारा दिव्य जन्म है। तुम्हारे इस जन्म में भी सहायक रहेंगे और इस शरीर से वह कराएँगे, जो समय की दृष्टि से आवश्यक है, सूक्ष्म शरीरधारी प्रत्यक्ष जन-संपर्क नहीं कर सकते और न घटनाक्रम स्थूल शरीरधारियों द्वारा ही सम्पन्न होते हैं, इसलिए योगियों को उन्हीं का सहारा लेना पड़ता है।।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/jivana.2

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 16)

🌞  हिमालय में प्रवेश

पीली मक्खियाँ

🔵 पर इन बेचारी मक्खियों को ही क्यों कोसा जाये? उन्हीं को मूर्ख क्यों कहा जाये? जबकि आज हम मनुष्य भी इसी रास्ते पर चल रहे हैं। इस सृष्टि में जो विपुल उपभोग सामग्री परमात्मा ने पैदा की है, वह उसके सभी पुत्रों के लिए मिलकर- बाँटकर खाने और लाभ उठाने के लिए है पर हममें से हर कोई जितना हड़प सके, उतने पर कब्जा जमाने के लिए उतावला हो रहा है। यह भी नहीं सोचा जाता कि शरीर की कुटुम्ब की आवश्यकता थोड़ी ही है उतने तक सीमित रहें, आवश्यकता से अधिक वस्तुओं पर कब्जा जमाकर दूसरों को क्यों कठिनाई में डालें और क्यों मालिकी का व्यर्थ बोझ सिर पर लादे, जबकि उस मालिकी को देर तक अपने कब्जे में रख नहीं सकते। 

🔴 पीली मक्खियों की तरह मनुष्य भी अधिकार लिप्सा के स्वार्थ और संग्रह में अन्धा हो रहा है। मिल- बाँटकर खाने की नीति उसकी समझ में ही नहीं आती, जो कोई उसे अपने स्वार्थ में बाधक होते दीखता है, उसी पर आँखें दिखाता है, अपनी शक्ति प्रदर्शित करता है और पीली मक्खियों की तरह टूट पड़ता है, इससे उनके इस व्यवहार से कितना कष्ट होता है इसकी चिन्ता किसे है?  

🔵 पीली मक्खियाँ नन्हें- नन्हें डर मारकर आधा मील पीछा करके वापिस लौट गई, पर मनुष्य की अधिकार लिप्सा, स्वार्थपरता और अहंकार से उद्धत होकर किये जाने वाले आक्रमणों की भयंकरता को जब सोचता हूँ  तो बेचारी पीली मक्खियों को ही बुरा- भला कहने में जीभ सकुचाने लगती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books/sunsaan_ke_shachar/himalaya%20_me_pravesh/pili_makhiya

👉 आत्मचिंतन के क्षण 7 Jan 2017

🔴 यों युग शिल्पियों की संख्या एक लाख के लगभग है, पर उनमें एक ही कमी है, संकल्प में सुनिश्चितता का-दृढ़ता का-अनवरतता का अभाव। अभी उत्साह उभरा तो उछलकर आकाश चूमने लगे और दूसरे दिन ठंडे हुए तो झाग की तरह बैठ गये। इस अस्थिरता में लक्ष्यवेध नहीं हो सकता। उसके लिए अर्जुन जैसी तन्मयता होनी चाहिए जो मछली की आंख भर ही देखें। इसके लिए एकलव्य जैसी निष्ठा होनी चाहिए, जो मिट्टी के पुतले को निष्णात अध्यापक बना ले।

🔵 परिजनो! अपनी आज की मनोदशा पर हमें विचार करना ही है। अपनी अब तक की गतिविधियों पर हमें शान्त चित्त से ध्यान देना है। क्या हमारे कदम सही दिशा में चल रहे हैं? यदि नहीं, तो क्या यह उचित न होगा कि हम ठहरें, रुकें, सोचें और यदि रास्ता भूल गये हैं, तो पीछे लौटकर सही रास्ता पर चलें। इस विचार मन्थन की वेला में आज हमें यही करना चाहिए—यही सामयिक चेतावनी और विवेकपूर्ण दूरदर्शिता का तकाजा है।

🔴 उपदेश तो बहुत पा चुके हो, किन्तु उसके अनुसार क्या तुम कार्य करते हो? अपने चरित्र का संशोधन करने में अभी भी क्या किसी अन्य की राह देख रहे हो? तुम तो अब श्रेष्ठ कार्य करने की योग्यता प्राप्त करो। विवेक बुद्धि की किसी प्रकार अब उपेक्षा न करो। अपने चरित्र का संशोधन करने में लापरवाही करोगे या प्रयत्न में ढिलाई करोगे तो उन्नति कैसे हो सकती है? अपने शुभ अवसरों को न खोकर जीवन रणक्षेत्र में प्रबल पराक्रम से निरन्तर अग्रसर होकर विजयी प्राप्त करने के लिए सदैव तत्पर रहना सीखो।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 16) 7 Jan

🌹 गुरु की आवश्यकता

🔴 गायत्री को गुरु-मंत्र कहा गया है। इसका एक अर्थ यह भी है कि इसकी उच्च स्तरीय उपासना के लिए अनुभवी मार्गदर्शक एवं संरक्षक आवश्यक है। कुछ शिक्षाएं ऐसी होती हैं, जो पुस्तकों के सहारे एकाकी भी प्राप्त की जा सकती हैं। पर कुछ ऐसी होती हैं जिनमें अनुभवी व्यक्ति के सान्निध्य सहयोग एवं मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है। संगीत, शिल्पकर्म, अक्षरारम्भ, उच्चारण जैसे कार्यों में दूसरों का प्रत्यक्ष सहयोग आवश्यक है। गायत्री-उपासना की नित्यकर्म विधि तो सरल है, किन्तु उच्चस्तरीय साधना में व्यक्ति की विशेष स्थिति के अनुरूप अनेकों उतार-चढ़ाव आते हैं और उसमें अनुभवी मार्गदर्शक की वैसी ही आवश्यकता रहती है जैसी कि रोग उपचार में चिकित्सक की। रोगी का अपने सम्बन्ध में लिया गया निर्णय प्रायः सही नहीं होता। इसलिए चिकित्सक का परामर्श एवं अनुशासन आवश्यक होता है। वही बात उपासना की उच्चस्तरीय प्रगति के सम्बन्ध में भी है।

🔵 गुरु की नियुक्ति अनिवार्य तो नहीं पर आवश्यक अवश्य है। इस आवश्यकता की पूर्ति मात्र उच्च चरित्र, साधन-विधान में निष्णान्त व्यक्ति ही कर सकते हैं। जब तक वैसा मार्गदर्शन न मिले तब तक प्रतीक्षा ही करनी चाहिए। उतावली में जिस-तिस को गुरु बना लेने से लाभ के स्थान पर हानि ही होती है। एक कक्षा पूरी करके दूसरी में प्रवेश करने पर नये अधिक अनुभवी अध्यापक के सम्पर्क में जाना पड़ता है।

🔴 इसी प्रकार सामान्य मंत्र दीक्षा लेते समय यदि सामान्य स्तर के गुरु का वरण किया गया हो तो उच्चस्तरीय साधना में अधिक योग्य गुरु का वरण भी हो सकता है। एक व्यक्ति के कई गुरु हो सकते हैं। संगीत, व्यापार शिल्प, शिक्षा आदि के लिए जिस प्रकार एक ही समय में कई गुरुओं की सहायता लेनी पड़ती है, उसी प्रकार एक व्यक्ति के कई गुरु भी हो सकते हैं। भगवान राम के वशिष्ठ और विश्वामित्र दो गुरु थे, दत्तात्रय के चौबीस थे।

🔵 शिक्षा प्राप्त करने में नर-नारी दोनों को ही अध्यापक की सहायता आवश्यक होती है। उसी प्रकार अध्यात्म क्षेत्र के प्रगति प्रशिक्षण में भी बिना लिंग भेद के हर साधक को मार्गदर्शक का सहयोग लेना होता है। व्यवहार-व्यवस्था में स्त्रियों का गुरु पति-सास आदि भी हो सकते हैं, पर आत्मिक प्रगति में सहायता तो वही करेगा जो स्वयं उस विषय का निष्णान्त पारंगत हो। ऐसा व्यक्ति पति आदि भी हो सकता है, बाहरी भी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 7 Jan 2017


👉 बुरी आदत:-

एक अमीर आदमी अपने बेटे की किसी बुरी आदत से बहुत परेशान था। वह जब भी बेटे से आदत छोड़ने को कहते तो एक ही जवाब मिलता, “अभी मैं इतना छोटा ह...