शनिवार, 7 जनवरी 2017

👉 पराक्रम और पुरुषार्थ (भाग 11) 8 Jan

🌹 कठिनाइयों से डरिये मत, जूझिये
 
🔵 यदि एक ही प्रकार की परिस्थितियां सदा बनी रहें तो यहां सभी कुछ रूखा और नीरस लगने लगेगा। सदा दिन ही रहे रात कभी न हो, सदा मिठाई ही खाने को मिले, नमकीन के दर्शन ही न हों, सबकी उम्र एक सी ही रहे, न कोई छोटा और न बड़ा हो, सर्दी या गर्मी की एक ऋतु रहे, दूसरी बदले ही नहीं तो फिर इस संसार की क्या सुन्दरता रह जायेगी? सारी शोभा-सुषमा ही नष्ट हो जायेगी। सदा प्रिय अनुकूल और सुखद परिस्थितियां ही बनी रहें, कभी अप्रिय और प्रतिकूल स्थिति न आये तो कुशलता, कर्मठता और सहकारिता की जरूरत ही न पड़ेगी। लोग आलसी, निकम्मा और नीरस जीवन जीते हुए किसी प्रकार मृत्यु की प्रतीक्षा करते रहेंगे।

🔴 अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण सुविधायें उत्पन्न होना स्वाभाविक है। प्रश्न यह नहीं है कि उसकी क्या प्रतिक्रिया होती है। महत्व पूर्ण तो यह है कि प्रतिकूलताओं और अनुकूलताओं के चढ़ाव-उतार से मनुष्य में कई ऐसे गुण उत्पन्न होते हैं जो उसके व्यक्तित्व की गरिमा को बढ़ाते हैं। प्रतिकूलताओं में पुरुषार्थ, साहस, धैर्य, सन्तुलन, दूरदर्शिता जैसे सद्गुणों का विकास होता है। बल्कि कहा जाना चाहिए कि इन्हीं परिस्थितियों में ये सद्गुण उत्पन्न होते हैं। आवश्यकता केवल इस बात की है कि इन प्रतिकूलताओं में अपना सन्तुलन न खोया जाये। यदि सन्तुलन बना रहे तो जीवन के ऐसे विविध और उपयोगी अनुभव होते हैं जो व्यक्तित्व की शोभा-सुषमा में चार-चांद लगाते हैं। वे अनुभव व्यक्तित्व को गुण सम्पन्न-समृद्ध बनाते हैं।

🔵 प्रतिकूलताओं के सम्बन्ध में विधेयात्मक दृष्टि अपनाने की आवश्यकता और उपयोगिता बताते हुए किसी विचारक ने लिखा है, अगर कोई व्यक्ति अपने आपको अन्धेरे कमरे में बन्द करके यह सोचे कि प्रकाश का कोई अस्तित्व ही नहीं है तो यह उसकी भूल है। अन्धकार तो सिर्फ उसके छोटे कमरे में बन्द है बाहर उजाला ही उजाला है। बेहतर यह है कि आपने अपने इर्द-गिर्द भ्रम भ्रान्तियों की जो दीवारें खड़ी कर ली हैं, उन्हें गिराकर अंधेरे बन्द कमरे से बाहर निकलें और सर्वव्यापी प्रकाश से साक्षात्कार करें।’’

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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