सोमवार, 22 अक्तूबर 2018

👉 विरोध का सामना कैसे करें?

🔷 गंगा के तट पर एक संत अपने शिष्यों को शिक्षा दे रहे थे, तभी एक शिष्य ने पुछा..., “ "गुरू जी, यदि हम कुछ नया… कुछ अच्छा करना चाहते हैं परंतु समाज उसका विरोध करता है तो हमें क्या करना चाहिए?”

🔶 गुरु जी ने कुछ सोचा और बोले..., ”इस प्रश्न का उत्तर मैं कल दूंगा।”

🔷 अगले दिन जब सभी शिष्य नदी के तट पर एकत्रित हुए तो गुरु जी बोले..., “आज हम एक प्रयोग करेंगे… इन तीन मछली पकड़ने वाली डंडियों को देखो, ये एक ही लकड़ी से बनी हैं और बिलकुल एक समान हैं।”

🔶 उसके बाद गुरु जी ने उस शिष्य को आगे बुलाया जिसने कल प्रश्न किया था। गुरु जी ने निर्देश दिया..., “ पुत्र, ये लो इस डंडी से मछली पकड़ो।” शिष्य ने डंडी से बंधे कांटे में आटा लगाया और पानी में डाल दिया। फ़ौरन ही एक बड़ी मछली कांटे में आ फंसी…

🔷 गुरु जी बोले..., ”जल्दी…पूरी ताकत से बाहर की ओर खींचो।“ शिष्य ने ऐसा ही किया, उधर मछली ने भी पूरी ताकत से भागने की कोशिश की…फलतः डंडी टूट गयी। गुरु जी बोले...,  “कोई बात नहीं; ये दूसरी डंडी लो और पुनः प्रयास करो…।”  शिष्य ने फिर से मछली पकड़ने के लिए काँटा पानी में डाला।

🔶 इस बार जैसे ही मछली फंसी, गुरु जी बोले..., “आराम से… एकदम हल्के हाथ से डंडी को खींचो।” शिष्य ने ऐसा ही किया, पर मछली ने इतनी जोर से झटका दिया कि डंडी हाथ से छूट गयी।

🔷 गुरु जी ने कहा..., “ओह्हो, लगता है मछली बच निकली, चलो इस आखिरी डंडी से एक बार फिर से प्रयत्न करो।” शिष्य ने फिर वही किया। पर इस बार जैसे ही मछली फंसी गुरु जी बोले...,

🔶 “सावधान! इस बार न अधिक जोर लगाओ न कम.. बस जितनी शक्ति से मछली खुद को अंदर की ओर खींचे उतनी ही शक्ति से तुम डंडी को बाहर की ओर खींचो.. कुछ ही देर में मछली थक जायेगी और तब तुम आसानी से उसे बाहर निकाल सकते हो”

🔷 शिष्य ने ऐसा ही किया और इस बार मछली पकड़ में आ गयी। “क्या समझे आप लोग?” गुरु जी ने बोलना शुरू किया…

🔶 ”ये मछलियाँ उस समाज के समान हैं जो आपके कुछ करने पर आपका विरोध करता है। यदि आप इनके खिलाफ अधिक शक्ति का प्रयोग करेंगे तो आप टूट जायेंगे, यदि आप कम शक्ति का प्रयोग करेंगे तो भी वे आपको या आपकी योजनाओं को नष्ट कर देंगे… लेकिन यदि आप उतने ही बल का प्रयोग करेंगे जितने बल से वे आपका विरोध करते हैं तो धीरे-धीरे वे थक जाएंगे… हार मान लेंगे… और तब आप जीत जायेंगे… इसलिए कुछ उचित करने में जब ये समाज आपका विरोध करे तो समान बल प्रयोग का सिद्धांत अपनाइये और अपने लक्ष्य को प्राप्त कीजिये।”

👉 आज का सद्चिंतन 22 October 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 22 October 2018


👉 परिवर्तन के महान् क्षण (भाग 27)

👉 आश्वासन एवं अनुरोध  
    
🔷 सन् ९० की इसी वसन्त पंचमी से एकान्त स्तर की समूचे समय चलने वाली-समग्र अध्यात्म साधना के हमारे भावी कार्यक्रम की जानकारी प्राप्त करने के उपरान्त उन लोगों में कुछ हड़बड़ी उभरी दीख पड़ती है, जो युग निर्माण की अभिनव योजनाओं में अभी-अभी लगे हैं। इन्हें कठिनाई यह दीखती है कि समर्थ सेनानायक का सीधा सम्पर्क रहने पर जो प्रयास सफलतापूर्वक चल रहे थे, वे आगे किस प्रकार चल पाएँगे? साधन कैसे जुटेंगे? प्रोत्साहन और सहयोग कहाँ से मिलेगा? ऐसे सभी लोगों तक सन्देश पहुँचा दिया गया है कि सूक्ष्म स्तर की गतिविधियाँ अपना लेने पर भी हम अपने प्रत्यक्ष उत्तरदायित्वों को निभा सकने में भी समर्थ रहेंगे। वह कार्य स्थूल शरीर द्वारा अपनाई जाने वाली प्रत्यक्ष गतिविधियों जैसा भले ही न हो, पर सूक्ष्म चेतना में इतनी क्षमता मानी ही जानी चाहिए कि वह मात्र सूक्ष्म जगत तक ही सीमाबद्ध नहीं रह जाती, प्रत्यक्ष जगत को प्रभावित करने में भी उसकी सशक्त भूमिका निभती रह सकती है।
  
🔶 शान्तिकुञ्ज हमारे प्रत्यक्ष शरीर के रूप में विद्यमान है, तो फिर उससे सम्बन्धित लोगों को आवश्यक प्रेरणाएँ और प्रकाश किरणें भी मिलती रहेंगी, जिनकी ऊर्जा और आभा से संसार भर के महत्त्वपूर्ण प्रयोजन गतिशील बने रहेंगे। अगले दिनों सम्भवत: किसी को हमारी अनुपस्थिति अखरेगी नहीं वरन् वह दृश्य दृष्टिगोचर होगा, जिसमें एक बीज वृक्ष बनकर नए हजारों-लाखों बीज उत्पन्न करता है। प्रत्यक्ष भूमिका निभाने की कमी को कोई यह न माने कि मृत्यु हो गई। दिव्य तत्त्व कभी मरते नहीं। शरीर बदल लेने पर आत्मसत्ता का अस्तित्त्व नहीं बदल जाता। यदि वह सशक्त हो, तो स्थूल शरीर का भार एवं बन्धन हट जाने से वह और भी अधिक गतिशीलता का परिचय देने लगता है। यही कारण है कि भारतीय परम्परा में मात्र जन्मदिवस मनाए जाते हैं। मृत्यु दिवस की तो आश्विन पितृपक्ष में ही एक हल्की-फुल्की चर्चा होती हैं।
  
🔷 स्वामी रामतीर्थ ने मरने के कुछ ही समय पूर्व ‘‘मौत के नाम खत’’ नाम से एक दस्तावेज लिखा है। वह है तो लम्बा और मार्मिक पर उसका सारांश इतना ही है कि ‘‘शरीर का भार लदा रहने से मैं वह नहीं कर पा रहा हूँ, जो कर सकता था। इसलिए इस वजन के अपने ऊपर से हटते ही हवा के साथ, चाँदनी के साथ, किरणों के साथ, वसन्त वर्षा के साथ मिलकर बहुत उपयोगी बन सकूँगा और अधिक प्रसन्नता भरे उल्लास का रसास्वादन कर सकूँगा।’’ 

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 30

👉 Significance of Symbolism & Customs of Indian Culture (Part 1)

🔷 Indian Culture is often criticized for its ‘unmindful rituals’ of worshiping everything – rivers, trees, mountains, rocks, soil, animals, birds, etc, and its ‘vague imaginations’ and ‘philosophical ideas’ that associate auspiciousness and mystic faith with specific symbols. The critics should pay attention to the fact that this culture emanates from the Vedas that are regarded as most ancient and comprehensive source of knowledge on transcendental as well as manifested realms of eternal Consciousness-Force, and all forms and dimensions of life, Nature, and its material existence.

Symbolism in Indian Culture:
🔶 Symbolism has been a part of human life since the inception of human culture and civilization e.g. to mark conceptualization of unknown forces of the universe, identification of natural objects, ‘syllables’ of sign-language, etc. Every religion has some sacred symbols – e.g. the holy stone at Kaaba (al-Ka’bah) in Mecca for Muslims, holy Cross for Christians, etc. National flag is a symbol of patriotic dignity, sovereignty and pride for every country.

🔷 The Vedic spiritual philosophy — the essence of supreme knowledge, advocates formless, non-dual, omnipresent, eternal Consciousness Force (Brahm) as the ultimate reality of The Supreme Being (God). However, considering the difficulties of most people in realization of the formless infinity, the teachings of the Vedic religion and cultural texts emphasized the importance and necessity of the devotion and worship of God in some ‘visible’ symbolic form for the psychological and spiritual upliftment of humankind. The specific forms (idols) of deities worshiped under Vedic (Indian) Culture symbolize specific divine qualities and powers of the manifestations of God and also incorporate ethical teachings. Because of its spiritual origin, the Indian Culture also emphasizes several symbols linked with the science and philosophy of spirituality.

To be continued...

👉 जीवन का सबसे बड़ा पुरुषार्थ और संसार का सबसे बड़ा लाभ (भाग 3)

🔷 व्यक्तित्व क्या है- आस्था। मनुष्य क्या है- श्रद्धा। चेष्टाएँ क्या हैं- आकांक्षा की प्रतिध्वनि। गुण, कर्म स्वभाव अपने आप ने बनते हैं न बिगड़ते हैं। आस्थाएँ ही आदतें बनकर परिपक्व हो जाती हैं तो उन्हें स्वभाव कहते हैं। अभ्यासों को ही गुण कहते हैं। कर्म आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए शरीर और मन को संयुक्त रूप से जो श्रम करना पड़ता है, उसी को कर्म कहते हैं। इन तथ्यों को समझ लेने के उपरान्त यह स्पष्ट हो जाता है कि व्यक्तित्व के स्तर और उसकी प्रतिक्रिया के रूप में आने वाले सुख-दुःखों की अनुभूति होती रहती है।

🔶 प्रसन्नता और उद्विग्नता को यों परिस्थितियों के उतार-चढ़ावों से जोड़ा जाता है, पर वस्तुतः वे मनःस्थिति के सुसंस्कृत और अनगढ़ होने के कारण सामान्य जीवन में नित्य ही आती रहने वाली घटनाओं से ही उत्पन्न अनुभूतियाँ भर होती हैं। कोई घटना न अपने आप में महत्वपूर्ण है और न महत्व हीन। यहाँ सब कुछ अपने ढर्रे पर लुढ़क रहा है। सर्दी-गर्मी की तरह भाव और अभाव का, जन्म-मरण और हानि-लाभ का क्रम चलता रहता है। हमारे चिन्तन का स्तर ही उनमें कभी प्रसन्नता अनुभव करता और कभी उद्विग्न हो उठता है। अनुभूतियों में परिस्थितियाँ नहीं, मनःस्थिति की भूमिका ही काम करती है।

🔷 जीवन के सफेद और काले पक्ष को समझ लेने के उपरान्त, सहज ही यह प्रश्न उठता है कि- क्या ऐसा सम्भव नहीं है कि परिस्थितियों के ढाँचे में ढले- लोक-प्रवाह में बहते हुए, संग्रहीत कुसंस्कारों से प्रेरित, वर्तमान अनगढ़ जीवन को; अपनी इच्छानुसार- अपने स्तर का फिर से गढ़ा जाय और प्रस्तुत निकृष्टता को उत्कृष्टता में बदल दिया? उत्तर ‘ना’ और ‘हाँ’ दोनों में दिया जा सकता है। ‘ना’ उस परिस्थिति में जब आन्तरिक परिवर्तन की उत्कट आकांक्षा का अभाव हो और उसके लिए आवश्यक साहस जुटाने की उमंगें उठती न हों। दूसरों की कृपा सहायता के बलबूते उज्ज्वल भविष्य के सपने तो देखे जा सकते हैं, पर वे पूरे कदाचित ही कभी किसी के होते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 माँसाहार का पाप पूर्व को भी पश्चिम न बना दे। (भाग 3)

🔷 हाथी माँस नहीं खाता, बैल और भैंसे माँस नहीं खाते, साँभर नील गाय शाकाहारी जीव हैं, यह शक्ति में किसी से कम नहीं होते। भारतवर्ष संसार के देशों में एक ऐसा देश है जिसमें अधिकाँश लोग अभी भी शाकाहार करते हैं यह प्रत्यक्ष उदाहरण है कि भारतीयों जैसा शौर्य संसार की किसी भी जाति में नहीं है। यदि किसी में है भी तो वह चील−झपट्टे जैसा है। आकस्मिक प्रहार तो एक बच्चे का भी प्राण घातक हो सकता है, उसे शौर्य कभी नहीं कहा जा सकता। वीरता आत्मा की पवित्रता का गुण है और वह माँसाहार से कदापि विकसित नहीं हो सकता।

🔶 किन्हीं अंशों में ऐसा न भी हो तो भी मनुष्य का पाचन संस्थान माँसाहारी प्राणियों के पाचन संस्थान की तरह कठोर और बलवान् नहीं होता। वह कम अम्लीय प्रकृति (एसिडिक नेचर) का ही आहार पचा सकता है। माँस में क्लिष्ट प्रोटीनों (काम्प्लेक्स प्रोटीन्स) की मात्रा अधिक होती है, अधिक प्रोटीन युक्त भोजन वैसे ही रक्त को अधिक अम्लीय बना देते हैं। माँसाहारी जन्तुओं का पाचन संस्थान काफी शक्तिशाली होता है। इनका माँस पचता है, तब काफी मात्रा में एमीनो एसिड बन जाता है, उसी एमीनो एसिड को यकृत (लिवर) प्रोटीन्स में बदल देते हैं। इसीलिये लगता है माँसाहार में शक्ति अधिक है।

🔷 किन्तु एमीनो एसिड में यूरिया (मूत्र) की मात्रा भी कम नहीं होती। सार्कोलैक्टिक एसिड भी माँसाहार से बनता है। यह दोनों पदार्थ रक्त में उसी मात्रा में शोषित (आब्जर्व) हो जाते हैं। ऐसा दूषित रक्त जब मस्तिष्क में परिभ्रमण करते हुये पहुँचता है, तब अधिक अम्लीय होने के कारण नाड़ी संस्थान (नर्वस सिस्टम) के नियंत्रक मस्तिष्क (पिट्युटरी ग्लैंड) में थकावट (फटीग) और अशुद्धता उत्पन्न करता है। इस थकावट और अशुद्धता को दूर करने के लिये अधिक रक्त की आवश्यकता आ पड़ती है, फलस्वरूप हृदय की धड़कन गति बढ़ जाती है और मस्तिष्क को ज्यादा खून पहुँचने लगता है। इसी कारण रक्त चाप (ब्लड प्रेशर) की बीमारी उठ खड़ी होती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1970 पृष्ठ 27
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1970/January/v1.27

👉 बुरी आदत:-

एक अमीर आदमी अपने बेटे की किसी बुरी आदत से बहुत परेशान था। वह जब भी बेटे से आदत छोड़ने को कहते तो एक ही जवाब मिलता, “अभी मैं इतना छोटा ह...