शुक्रवार, 25 नवंबर 2016

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 26 Nov 2016


👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 26 Nov 2016


👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 28)

🌹 जन-मानस को धर्म-दीक्षित करने की योजना

🔵 34. पर्व और त्यौहारों का सन्देश— जिस प्रकार व्यक्तिगत नैतिक प्रशिक्षण के लिये संस्कारों की उपयोगिता है उसी प्रकार सामाजिक सुव्यवस्था की शिक्षा पर्व और त्यौहारों के माध्यम से दी जाती है। हर त्यौहार के साथ महत्वपूर्ण आदर्श और संदेश सन्निहित हैं जिन्हें हृदयंगम करने से जन साधारण को अपने सामाजिक कर्तव्यों का ठीक तरह बोध हो सकता है और उन्हें पालन करने की आवश्यक प्रेरणा मिल सकती है।

🔴 त्यौहारों के मनाये जाने के सामूहिक कार्यक्रम बनाये जाया करें, और उनके विधान, कर्मकाण्ड ऐसे रहें जिनमें भाग लेने के लिये सहज ही आकर्षण हो और इच्छा जगे। सब लोग इकट्ठे हों, पुरोहित लोग उस पर्व का संदेश सुनाते हुए प्रवचन करें और उस संदेश में जिन प्रवृत्तियों की प्रेरणा है उन्हें किसी रूप से कार्यान्वित भी किया जाया करे।

🔵 संस्कारों और त्यौहारों को कैसे मनाया जाया करे और उपस्थित लोगों को क्या सिखाया जाया करे इसकी शिक्षा व्यवस्था हम जल्दी ही करेंगे। उसे सीख कर अपने संबद्ध समाज में इन पुण्य प्रक्रियाओं को प्रचलित करने का प्रयत्न करना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य 

👉 गृहस्थ-योग (भाग 15) 26 Nov

🌹 गृहस्थ धर्म तुच्छ नहीं है

🔵  पाठकों को हमारा आशय समझने में भूल न करनी चाहिए। हम ब्रह्मचर्य की अपेक्षा विवाहित जीवन को अच्छा बताने का प्रयत्न नहीं कर रहे हैं। ब्रह्मचर्य एक अत्यन्त उपयोगी और हितकारी साधना है इसके लाभों की कोई गणना नहीं हो सकती। इन पंक्तियों में हम मानसिक असंयम और विवाहित जीवन की तुलना कर रहे हैं। जो व्यक्ति ब्रह्मचर्य की साधना में अपने को समर्थ न पावें, जो मानसिक वासना पर काबू न रख सकें उनके लिए यही उचित है कि विवाहित जीवन व्यतीत करें। होता भी ऐसा ही है सौ में से निन्यानवे आदमी गृहस्थ जीवन बिताते हैं। इस स्वाभाविक प्रक्रिया में कोई अनुचित बात भी नहीं है।

🔴  यह सोचना ठीक नहीं कि गृहस्थाश्रम में बंधने से आध्यात्मिक उन्नति नहीं हो सकती। आत्मा को ऊंचा उठाकर परमात्मा तक ले जाना यह पुनीत आत्मिक साधना अन्तःकरण की भीतरी स्थिति से सम्बन्ध रखती है। बाह्य जीवन से इसका कुछ भी सम्बन्ध नहीं है। जिस प्रकार ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ या संन्यासी आत्म-साधना द्वारा जीवन लक्ष की प्राप्ति कर सकते हैं वैसे ही गृहस्थ भी कर सकता है। सदा सनातन काल से ऐसा होता आया है। अध्यात्म साधकों में गृहस्थ ही हम अधिक देखते हैं। 

🔵  प्राचीन काल के ऋषिगण आज के गैर जिम्मेदार और अव्यवस्थित बाबाजीओं से सर्वथा भिन्न थे। धनी बस्ती न बसाकर स्वच्छ वायु को दूर-दूर घर बनाना, पक्के मकान न बनाकर छोटी झोंपड़ियों में रहना, वस्त्रों से लदे न रहकर शरीर को खुला रखना आदि उस समय की साधारण प्रथायें थीं। उस समय के राजा तथा देवताओं के जो चित्र मिलते हैं उससे वे सब भी कटि वस्त्र के अतिरिक्त और कोई कपड़ा पहने नहीं दीखते। यह उस समय की परिपाटी थी। आज जिस वेश-भूषा की नकल करके लोग अपने को साधु मान लेते हैं वह पहनाव-उढ़ाव, रहन-सहन उस समय में सर्व साधारण का था।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
🌿🌞     🌿🌞     🌿🌞

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 15) 26 Nov

🌹 विवेक ही हमारा सच्चा मार्गदर्शक

🔵  कर्म करने में मनुष्य पूर्ण स्वतन्त्र है, पर परिणाम भुगतने के लिए वह नियोजक सत्ता के पराधीन है। हम विष पीने में पूर्ण स्वतन्त्र हैं, पर मृत्यु का परिणाम भुगतने से बच जाना अपने हाथ में नहीं है। पढ़ना, न पढ़ना विद्यार्थी के अपने हाथ में है, पर उत्तीर्ण होने, न होने में उसे परीक्षकों के निर्णय पर आश्रित रहना पड़ता है। कर्मफल की पराधीनता न रही होती तो फिर कोई सत्कर्म करने के झंझट में पड़ना स्वीकार ही न करता। दुष्कर्मों के दण्ड से बचना भी अपने हाथ में होता तो फिर कुकर्मों में निरत रहकर अधिकाधिक लाभ लूटने से कोई भी अपना हाथ न रोकता।

🔴  अदूरदर्शी इसी भूल-भुलैयों में भटकते देखे जाते हैं, वे तत्काल का लाभ देखते हैं और दूरगामी परिणाम की ओर से आंख बन्द किये रहते हैं। आटे के लोभ में गला फंसाने वाली मछली और दाने के लालच में जाल पर टूट पड़ने वाले पक्षी अपनी आरम्भिक जल्दबाजी पर प्राण गंवाते समय तक पश्चाताप करते हैं। आलसी किसान और आवारा विद्यार्थी आरम्भ में मौज करते हैं, पर जब असफलताजन्य कष्ट भुगतना पड़ता है तो पता चलता है कि वह अदूरदर्शिता कितनी महंगी पड़ी।

🔵  व्यसन-व्यभिचार में ग्रस्त मनुष्य भविष्य के दुष्परिणाम को नहीं देखते। अपव्यय आरम्भ में सुखद और अन्त में कष्टप्रद होता है—यह समझ यदि समय रहते उपज पड़े तो फिर अपने समय-धन आदि को बर्बाद करने में किसी को उत्साह न हो। दुष्कर्म करने वाले अनाचारी लोग भविष्य में सामने आने वाले दुष्परिणामों की कल्पना ठीक तरह नहीं कर पाते और कुमार्ग पर चलते रहते हैं। सिर धुनकर तब पछताना पड़ता है जब दण्ड व्यवस्था सिर पर बेहिसाब बरसती और नस-नस को तोड़कर रखती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

👉 *आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 26 Nov 2016*

🔴  दुनिया की तीन मूर्खताएँ उपहासास्पद होते हुए भी कितनी व्यापक हो गई हैं यह देखकर आश्चर्य होता है-

- पहली यह कि लोग धन को शक्ति मानते हैं।
-दूसरी यह कि लोग अपने को सुधारे बिना दूसरों को धर्मोपदेश देते हैं।
-तीसरी यह कि कठोर श्रम से बचे रहकर भी लोग आरोग्य की आकाँक्षा  करते हैं।

🔵  संयम शरीर में अवस्थित भगवान् है। सद्विचार मस्तिष्क में निवास करने वाला परमेश्वर है। अंतरात्मा में  ईश्वर की और भी ऊँची झाँकी देखनी हो तो सद्भावनाओं के रूप में देखनी चाहिए। ईश्वर दर्शन के लिए कहीं बाहर जाने की आवश्यकता नहीं, उसे अपने भीतर ही देखा जाना चाहिए। उसे प्राप्त करने के लिए संयम, सद्विचार और सद्भाव का विकास करना चाहिए। यही है यथार्थ सत्ता और चैतन्य-चित्त, परिष्कृत आत्मा-परमात्मा की उपलब्धि। इसी भक्तियोग का साधक सच्चे अर्थों में जीवन लाभ व सच्च आनंद प्राप्त करता है।

🔴  धर्म पर श्रद्धा रखो, नीति को आचरण में उतारो, अपना उद्धार आप करो, हँसी और मुस्कराहट बिखेरो। जो कार्य करना पड़े उसमें दूसरों की भलाई के तत्त्व जोड़े रखो। अपनी रीति-नीति ऐसी बनाओ जिस पर स्वयं को संतोष मिले और दूसरों को प्रेरणा-यह आत्म कल्याण का मार्ग है।

🌹 *~पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

👉 मन पर लगाम लगे तो कैसे? (भाग 2)

🔴  मन का वश में करने के अनेकानेक लाभ हैं। वह शक्तियों और विभूतियों का पुँज है। जिस काम में भी लगता है उसे जादुई ढंग से पूरा करके रहता है। कलाकार, वैज्ञानिक, सिद्धपुरुष, महामानव, सफल सम्पन्न सभी को वे लाभ मन की एकाग्रता, तन्मयता के आधार पर मिले हुए होते हैं। इस तथ्य को जानने वाले इस कल्पवृक्ष को दूर रखे रहना नहीं चाहते। इस दुधारू गाय को, तुर्की घोड़े को पालने का जी सभी का होता है। पर वह हाथ आये तब न?

🔵  आमतौर से कामुकता, जिह्वा स्वाद, सैर-सपाटे विलास वैभव, यश, सम्मान पाने की सभी की इच्छा होती है। उन्हीं को खोजने की मन कल्पनाएँ होती हैं। उन्हीं को खोजने की मन कल्पनाएँ करता और उड़ाने उड़ता रहता है। विकल्प जब दूसरा नहीं दिखता तो उसी कुचक्र में उलझे रहना पड़ता है। जहाज के मस्तूल पर बैठे कौवे को कोई और गन्तव्य भी तो नहीं दीखता। मन को कहीं कोई ऐसा स्थान या ऐसा काम जो उसकी रुचि का हो, सुहाये, मिलना चाहिए।

🔴 रुचियाँ बदलती रहती हैं या बदली जा सकती हैं छोटे बच्चे खिलौनों के लिए मचलते हैं। कुछ बड़े होने पर सामर्थ्यों के साथ खेल खिलवाड़ के लिए उत्सुक रहते हैं। युवक होने पर अच्छे नम्बरों से उत्तीर्ण होने की लगन लगती है। तरुण होने पर धन कमाने-गृहस्थ बनने की इच्छा होती है। बूढ़े भजन करते और कथा सुनते हैं। बचपन में बढ़ी हुई स्फूर्ति हर घड़ी कुछ न कुछ करते रहने की उमंग करती रहती थी पर बूढ़े होने पर विश्राम करना और चैन से दिन काटना सुहाता है। यह परिवर्तन बताते हैं कि मन का कोई एक निश्चित रुचि केन्द्र नहीं है। व्यक्तित्व के विकास और परिस्थितियों के परिवर्तन के साथ वह अपना रुझान बदलता रहता है। जमीन के ढलान के अनुरूप नदी-नाले अपनी दिशा मोड़ते और चाल बदलते रहते हैं। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
🌹 अखण्ड ज्योति 1990 नवम्बर

👉 मैं क्या हूँ? What Am I? (भाग 39)

🌞  तीसरा अध्याय

🔴  लोग समझते हैं कि मन ने हमें ऐसी स्थिति में डाल दिया है कि हमारी वृत्तियाँ हमें बुरी तरह काँटों में घसीटे फिरती हैं और तरह-तरह से त्रास देकर दुखी बनाती हैं। साधक इन दुखों से छुटकारा पा जावेंगे, क्योंकि वह उन सब उद्गमों से परिचित हैं और यहाँ काबू पाने की योग्यता सम्पादन कर चुके हैं। किसी बड़े मिल में सैकड़ों घोड़ों की ताकत से चलने वाला इंजन और उसके द्वारा संचालित होने वाली सैकड़ों मशीनें तथा उनके असंख्य कल-पुर्जे किसी अनाड़ी को डरा देंगे। वह उस घर में घुसते ही हड़बड़ा जाएगा। 

🔵  किसी पुर्जे में धोती फँस गई, तो उसे छुटाने में असमर्थ होगा और अज्ञान के कारण बड़ा त्रास पावेगा। किन्तु वह इँजीनियर जो मशीनों के पुर्जे-पुर्जे से परिचित है और इंजन चलाने के सारे सिद्धान्त को भली भाँति समझा हुआ है, उस कारखाने में घुसते हुए तनिक भी न घबरायेगा और गर्व के साथ उन दैत्याकार यन्त्रों पर शासन करता रहेगा, जैसे एक महावत हाथी पर और सपेरा भयंकर विषधरों पर करता है। उसे इतने बड़े यंत्रालय का उत्तरदायित्व लेते हुए भय नहीं अभिमान होगा। वह हर्ष और प्रसन्नतापूर्वक शाम को मिल मालिक को हिसाब देगा, बढ़िया माल की इतनी बड़ी राशि उसने थोड़े समय में ही तैयार कर दी है। 

🔴  उसकी फूली हुई छाती पर से सफलता का गर्व मानो टपका पड़ रहा है। जिसने अपने 'अहम्' और वृत्तियों का ठीक-ठीक स्वरूप और सम्बन्ध जान लिया है, वह ऐसा ही कुशल इंजीनियर, यंत्र संचालक है। अधिक दिनों का अभ्यास और भी अद्भुत शक्ति देता है। जागृत मन ही नहीं, उस समय प्रवृत्त मन, गुप्त मानस भी शिक्षित हो गया होता है और वह जो आज्ञा प्राप्त करता है, उसे पूरा करने के लिए चुपचाप तब भी काम किया करता है, जब लोग दूसरे कामों मे लगे होते हैं या सोये होते हैं। गुप्त मन जब उन कार्यों को पूरा करके सामने रखता है, तब नया साधक चौंकता है कि यह अदृष्ट सहायता है, यह अलौकिक करामात है, परन्तु योगी उन्हें समझाता है कि वह तुम्हारी अपनी अपरिचित योग्यता है, इससे असंख्य गुनी प्रतिभा तो अभी तुम में सोई पड़ी है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

👉 आत्मचिंतन के क्षण 15 Dec 2018

प्रतिभा किसी पर आसमान से नहीं बरसती, वह अंदर से ही जागती है। उसे जगाने के लिए केवल मनुष्य होना पर्याप्त है। वह अन्य कोई प्रतिबन्ध नहीं...