गुरुवार, 25 अप्रैल 2019

👉 आज का सद्चिंतन 25 April 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 April 2019


👉 आत्मचिंतन के क्षण 25 April 2019

★ इस दानशील देश में हमें पहले प्रकार के दान के लिए अर्थात आध्यात्मिक ज्ञान के विस्तार के लिए साहसपूर्वक अग्रसर होना होगा! और यह ज्ञान-विस्तार भारत की सीमा में ही आबद्ध नहीं रहेगा, इसका विस्तार तो सारे संसार में करना होगा! और अभी तक यही होता भी रहा है! जो लोग कहते हैं कि भारत के विचार कभी भारत से बाहर नहीं गये, जो सोचते हैं कि मैं ही पहला सन्यासी हूँ जो भारत के बाहर धर्म-प्रचार करने गया, वे अपने देश के इतिहास को नहीं जानते! यह कई बार घटित हो चुका है! जब कभी भी संसार को इसकी आवश्यकता हुई, उसी समय इस निरन्तर बहनेवाले आध्यात्मिक ज्ञानश्रोत ने संसार को प्लावित कर दिया!
~ स्वामी विवेकानन्द

◆ श्रेष्ठ मनुष्यों की मित्रता पत्थर के समान सुदृढ़, मध्यम मनुष्यों की बालू के समान और निकृष्ट मनुष्यों की पानी की लकीर जैसी क्षणिक होती है। इसके विपरीत श्रेष्ठ जनों का बैर पानी की लकीर जैसा, मध्यमों का बालू जैसा और निकृष्ट जनों का बैर पत्थर जैसा होता है।
~ भर्तृहरि

◇ मेहन्दी स्त्रियों का श्रृंगार, जिसके हाथ में लग जाता है, उसे अपने रंग में रंग देता है। हमारे यहाँ ये परम्परा है, विवाहों पर, अन्य कई अवसरों पर, इस मेहन्दी को ऐसे किसी पात्र में रखा जाता है, कि महिलाओं में बाँटा जा सके, परन्तु क्या ज्ञात है कि मेहन्दी का रंग सबसे अधिक किन हाथों पर चढ़ता है? इस मेहन्दी का रंग सबसे अधिक उन हाथों पर चढ़ता है, जो सबसे अधिक इसको बाँटते हैं। प्रेम , प्रसन्नता, आनन्द , ये भी मेहन्दी की भाँति ही हैं, जितना दूसरों में बाँटोगे उतना स्वयं पर चढ़ेगा। तो यदि आप जीवन में प्रसनन्ता पाना चाहते हैं, तो प्रसन्नता को सबमें बाँटना सीखिये। जैसे ये हाथ मेहन्दी को सबमें बाँट रहे थे। अपना सुख, अपना वैभव, अपना प्रेम, सबमें बाँटते रहिये। आपके जीवन में कभी आपको इसकी कमी नहीं होगी।

■ मनके की माला आपने कई लोगों के पास देखी होगी, ये माला घुमाते जाते हैं, ईश्वर को स्मरण करते जाते हैं, और निकलते हर मोती के साथ एक पुण्य अर्जित करते हैं। परन्तु क्या यही सबके साथ होता है ? नहीं। आपने ये भी देखा होगा, कई लोग वर्षों तक इस माला को घुमाते जाते हैं, किन्तु फिर भी कुछ नहीं होता। वही क्रोध, वही अहंकार, वही लालच, वही बाधाएँ वैसी की वैसी रहती हैं। किन्तु सारा परिश्रम व्यर्थ गया। कभी सोचा है ऐसा क्यों होता है? ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि माला के मनके फेरते-फेरते कई लोग अक्सर एक मनका फिराना भूल ही जाते हैं। मनका मन। इसलिए अगली बार इस माला को फेरने से पूर्व सर्वप्रथम अपने मन को फेरना सीख लीजिये। जितने भी दुष्विचार हैं आपके मन में, निकाल फेंकिये, अंत कर दीजिये इन दुष्विचारों का। तभी आयेगी शांति, तभी मिलेगा संतोष, और तभी आयेगा प्रेम।

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 9)

THE SECRET OF UNEXPECTED GOOD FORTUNE AND MISFORTUNE

There is a saying in the scriptures that the factors responsible for mental-physical agonies and natural disasters (Daivik-Daihik Bhautik Dukha) are selfgenerated. We often come across phenomena, which appear quite contradictory to the known laws of nature, creating doubts about the impartiality of divine justice. For instance, an honest, duty conscious, morally superior person is suddenly struck with a great misfortune in life as though he/she was being punished by God for a great sin. On the other hand, we find persons engaged in worst type of corrupt practices living in peace and prosperity. An idler wins a jackpot or inherits a fortune from unexpected quarters, whereas a hard working intelligent person is found suffering endlessly for want of basic necessities. One person achieves great success with little effort, whereas another does not succeed in spite of his best efforts.

Such phenomena are popularly ascribed to the role of the fate (prarbdh, bhagya, etc). Similarly, unprecedented natural calamities like famine, epidemics, tornadoes, deluge, damage by lightning and eqrthquake and ‘untimely death’are commonly attributed to the ‘Will of God’ and known as predestination (bhagya). Such unexpected happenings as financial loss, accidents, sudden mental / physical disability and physical separation from a dear one are also attributed to fate.

Such unexpected adversities are rare, but they do occur in life. At times, they leave such deep imprints on the psyche, that it is not possible to ignore them. Those who are not familiar with the mysteries of divine justice become very much perplexed by such phenomena and  form opinions, which are extremely dangerous for life. Many become resentful towards God, blame and abuse Him for an unjust injustice. A few even become atheists, considering the fuitility of worshiping God who does not respond to
prayers in distress, despite their prolonged adherences to religiosity. Then there is a class of devotees who serve the saints and worship deities in expectation of some material gains. However, it they are visited with some unfavourable phenomena coincidentally, their adoration changes to contempt or disbelief.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 17

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग 33)

युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव ऐसे ही आध्यात्मिक चिकित्सक थे। मानवीय चेतना के सभी दृश्य- अदृश्य आयामों की मर्मज्ञता उन्हें हासिल थी। जब भी कोई...