बुधवार, 6 मार्च 2019

👉 प्रपंच की माया

प्रपंच की माया जादुई है। इसके सम्मोहक-आकर्षण से बिरले बच पाते हैं। ज्यादातर इसमें उलझकर भ्रमित होते हैं। उन्हें पता भी नहीं चल पाता कि वे भ्रम में भटके हुए हैं। जीवन के बहुमूल्य क्षणों को खो रहे हैं, जीवन लक्ष्य से दूर हो रहे हैं। प्रपंच की मायावी मुस्कानों में, इससे उपजे हंसी ठहाकों में जीवन ठगा जाता है। जिन्दगी की उजली सम्भावनाएँ कब पतन के अंधेरों में समा जाती हैं, पता ही नहीं चलता।
  
इसकी पहचान आसान नहीं है। परचर्चा से इसकी शुरुआत होती है। परनिन्दा का रस इसमें घुलने से इसके नशे का नशीलापन गाढ़ा, मायावी और जादुई बनता है। परचर्चा और परनिन्दा का घुला-मिला रूप ही प्रपंच है। इसकी मायावी चकाचौंध में सबसे पहले जीवन की विवेक दृष्टि खोती है। जीवन लक्ष्य की स्मृति विलीन होती है। फिर अनायास ही द्वेष दुर्मति एवं दुर्बुद्धि पनप जाते हैं। इसके मायावी जादू से मित्र, शत्रु नजर आते हैं और भटकाने वाले प्रपंची जन सगे-सम्बन्धी लगने लगते हैं।
  
प्रपंच के अंकुर कभी भी, कहीं भी, किसी में भी फूट निकलते हैं। बस इसके विषय बीजों के लिए परचर्चा और परनिन्दा का खाद-पानी चाहिए। इसकी विषवल्लरी के उपजते, पनपते और पल्लवित होते ही व्यक्ति आत्मविमुख व ईश्वर विमुख हो जाता है। अन्तःकरण में इसके जन्मते ही ईश्वर और आत्मा केवल दो शब्द बनकर रह जाते हैं। इनका अर्थ खो जाता है। प्रपंच की इस माया में सामान्य जन ही नहीं, साधक भी उलझकर भ्रमित होते और भटकने लगते हैं।
  
उनकी साधना बातों और कर्मकाण्ड तक सिमट जाती है। साधना की आकृति फलती-फूलती रहती है, पर उसकी प्रकृति के प्राण प्रंपच चूसता रहता है। इन साधकों की ऐसी स्थिति के बारे में सन्त कवियों ने कहा है- ‘ब्रह्मज्ञान बिनु बात न करहीं। परनिन्दा करि विष रस भरही॥’ ब्रह्मज्ञान के बिना कोई बात नहीं करते, लेकिन अन्तःकरण को परनिन्दा के विष रस से भरते रहते हैं। इनका उद्धार वेदान्त वचनों को पढ़ने, सुनने और प्रवचन करने से नहीं, प्रपंच के मायापाश से छूटने में है। सन्त कवि तुलसी के वचनों में सभी के लिए सीख है- ‘परचर्चा, परनिन्दा तजि, भजुहरि’ अर्थात् परचर्चा और परनिन्दा को छोड़कर हरि को भजो। तभी प्रपंच की जादुई माया से छुटकारा मिलेगा। मोक्ष की तात्त्विक अनुभूति होगी।

✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 112

👉 आज का सद्चिंतन 6 March 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 6 March 2019


👉 ज्ञान-यज्ञ इस युग का महानतम अभियान

मनुष्य की मूल शक्ति विचारणा है। उसी के आधार पर इतनी प्रगति कर सकना उसके लिए सम्भव हुआ है। समस्याएँ विचारों की विकृति से उत्पन्न होती हैं और उनका समाधान दृष्टिकोण बदलने से निकलता है। सचमुच जो जैसा सोचता है, वह वैसा ही बनकर रहता है। सोचने की दिशा में ही क्रिया बनती है और उसी की परिणति परिस्थितियों के रूप में सामने आती है। परिस्थितियों का अपने आप में कोई स्वतंत्र आधार नहीं है। वे हमारे कर्तृत्व का परिणाम मात्र हैं। इसी प्रकार कर्तृत्व भी अपने आप नहीं बन जाता है, विचारों की प्रेरणा ही हमारी कार्य पद्धति के लिये पूरी तरह उत्तरदायी होती है। इस तथ्य को समझ लेने पर ही आज की मानवीय समस्याओं का कारण और निवारण ठीक तरह समझा जा सकता है।

खेद है कि अब तक इस प्रकार का चिन्तन नहीं के बराबर हुआ है जो हुआ है उसको महत्त्व नहीं दिया गया। हमारे मूर्धन्य व्यक्ति इतना भर सोचते रहे है कि शासनतंत्र के माध्यम से सुविधा-साधन बढ़ा देने से मनुष्य सुखी रहने लगेगा और अपनी उलझनें सुलझा लेगा। पर देखते हैं कि वह मान्यताएँ गलत सिद्ध होती चली जा रही हैं। शासन तंत्र को सुधारने के लिये जितने हाथ-पैर पीटे जाते हैं उतनी ही उससे विकृतियाँ उत्पन्न होती चली जा रही हैं। अर्थ-तंत्र से नि:संन्देह कई प्रकार की सुविधाएँ उत्पन्न की हैं पर परिणाम उलटा ही रहा है। तथाकथित प्रगति की जड़ें बिलकुल खोखली हैं, किसी भी धक्के में वह लडख़ड़ा सकती है। स्थायी प्रगति और सुदृढ़ समर्थता के लिए चरित्र बल होना चाहिए और वह उत्कृष्ट विचारणा की भूमि पर ही उग सकता है।

ज्ञान-यज्ञ देखने-सुनने में छोटी बात लगती है, पर उसकी सम्भावनाएँ उतनी विशाल हैं कि यदि ठीक तरह इस अभियान को चलाया जा सका तो विश्वास है कि लोक-मानस में विवेकशीलता और सत्प्रवृत्तियों की गहरी स्थापना सम्भव हो सकेगी और नये युग के अवतरण का स्वप्न साकार किया जा सकेगा।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-66 (4.44-46)

👉 Gyan Yagya The greatest movement of the present Era

The core power of the human beings is the thought process. This has made it possible for the mankind to make so much of progress accomplished until now. Problems arise as a result of abnormalities or anomalies in thoughts and can be resolved by changing the way of thinking. A person really becomes the way he/she thinks. The direction of thoughts defines the deeds and the deeds give rise to relevant situations or circumstances we come across. The circumstances do not have any independent existence. They are merely the product of our deeds. Similarly, the actions do not take place automatically, they are driven by our thoughts which are totally responsible for our deeds. The true understanding of this fundamental truth can help us find the causes and solutions of all the present day problems.

It is very unfortunate that a very little thinking of this kind has ever been done so far and that too hasn’t been accorded much significance it deserves. The leaders kept on thinking that improving comforts and facilities (the standards of living) would make people happy and at ease, enabling them to solve their problems themselves.But it is well evident that this kind of misconceptions have proven wrong. The efforts made to improve the material standards of the administration have ended up with even more irregularities being committed.

The improved economy has no doubt yielded more facilities and conveniences but the ultimate outcome has always been the opposite.Such progress is superficial and fragile and can easily fall to pieces. A long-lasting progress and powerful capabilities need a very powerful character which can only develop on the solid foundation of eminent thinking.

The Gyan-yagya# can nurture with such thoughts. It may seemingly appear to be trivial campaign but has so much immense potential that if it can be run and managed properly, it could facilitate sound establishment of prudent thinking and noble deeds among the masses which can ultimately make the dream of a new era come true.

#A selfless work or campaign of disseminating life-elevating thoughts or knowledge

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Yug Nirman Yojna-Philosophy,structure and Planning-66(4.44-46)

👉 अवसर का प्रतीक चित्र:-

एक बार एक कलाकार ने अपने चित्रों की प्रदर्शनी लगाई। उसे देखने के लिए नगर से सैकड़ों धनी- मानी व्यक्ति भी पहुँचे। एक लड़की भी उस प्रदर्शनी को देखने आई। उसने देखा सब प्रतीक- चित्र टँगा है जिसके मुँह को बालों से ढक दिया गया है और जिसके पैरों पर पंख लगे थे। चित्र के नीचे बड़े अक्षरों में लिखा था ''अवसर''। चित्र कुछ भद्दा सा था इसलिए लोग उस पर उपेक्षित दृष्टि डालते और आगे बढ़ जाते।

लड़की का ध्यान प्रारम्भ से ही इस चित्र की ओर था। जब वह उसके पास पहुँची तो चुपचाप बैठ कलाकार से पूछ ही लिया- 'श्रीमान् जी यह चित्र किसका है? आपने इसका मुँह क्यों ढक रखा है तथा उसके पैरों में पंखों का क्या रहस्य है?' कलाकार ने जवाब दिया- 'बेटी। यह ''अवसर'' का चित्र है। चूँकि साधारण व्यक्ति इसे पहचान नहीं पाते।'' अत: मैंने इसका मुँह ढक रखा है ताकि इसे देखकर जिज्ञासा तो उठे। पैरों में पंख इसलिए कि यह अवसर जो आज  चला गया, कल फिर आयेगा नहीं। इसलिए इसे उड़ने से पहले ही थाम लो। इसका सदुपयोग कर लो।'' लड़की ने मर्म को समझा और तत्क्षण ही अपने जीवन निर्माण में जुट गयी।

काल ही जीवन है। काल पर वस्तुत: किसी का बस नहीं।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग १

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1)

अवतार का लीला-संदोह

बुद्ध के बुद्धवाद का स्वरूप 'विचार क्रान्ति' था। पूर्वार्द्ध में धर्म चक्र का प्रवर्तन हुआ था। धर्म धारणा का सम्मान करते हुए लाखों व्यक्तियों ने उसमें भाव भरा योगदान दिया था। आनन्द जैसे मनीषी, हर्षवर्धन जैसे श्रीमन्त, आम्ब्रपाली जैसी कलाकार, अंगुलिमाल जैसे प्रतिभाशाली बड़ी संख्या में उस अभियान के अंग बने थे। इससे पिछले अवतारों का कार्यक्षेत्र सीमित रहा था, क्योंकि समस्यायें छोटी और स्थानीय थीं। बुद्ध-काल तक समाज का विस्तार बडे क्षेत्र में हो गया था। इसलिए बुद्ध का अभियान भी भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं रहा और उन दिनों जितना व्यापक प्रयास सम्भव था, उतना अपनाया गया। धर्मचक्र प्रवर्तन भारत से एशिया भर में फैला और उससे भी आगे बढ़कर उसने अन्य महाद्वीपों तक अपना आलोक बाँटा।

प्रज्ञावतार-बुद्धावतार का उत्तरार्ध है। बुद्धि प्रधान युग की समस्यायें भी चिन्तन प्रधान होती हैं। मान्यतायें, विचारणायें, इच्छायें ही प्रेरणा केन्द्र होती हैं और उन्हीं के प्रवाह में सारा समाज बहता है। ऐसे समय में अवतार का स्वरूप भी तदनुरूप ही हो सकता है। लोकमानस को अवांछनीयता, अनैतिकता एवं मूढ़मान्यता से विरत करने वाली ही अपने समय की समस्याओं का समाधान कर सकती है।

आज आस्था संकट के कारण मनुष्य सुख-समृद्धि से सम्पन्न होने के बावजूद जिस जंजाल में स्वयं फँसा हुआ है एवं अन्यों के लिए विपत्ति का कारण बना हुआ है, उसका निवारण आस्था, प्रज्ञारूपी अस्त्र द्वारा ही सम्भव है।

परस्पर सम्वाद में वर्तमान स्थिति का विश्लेषण कर भगवान् इसीलिए प्रज्ञावतार के प्रकटीकरण की परिस्थितियाँ देवर्षि को समझौते हैं और पिछले अव्रतारों का स्मरण दिलाते हुए इस बार भी विभाषिका निवारण हेतु अपनी शक्तियों को सन्तुलन स्थापना के लिए आवश्यक प्रतिपादित करते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 15

👉 अपना अपना भाग्‍य

एक राजा के तीन पुत्रियाँ थीं और तीनों बडी ही समझदार थी। वे तीनो राजमहल मे बडे आराम से रहती थी। एक दिन राजा अपनी तीनों पुत्रियों सहित भोज...