शनिवार, 9 दिसंबर 2017

👉 सबके दिलों में प्रेम

🔶 एक बार गुरु नानक पानीपत गए, जहां शाहशरफ नामक एक प्रसिद्ध सूफी फकीर रहते थे। गुरु नानक से शाहशरफ ने पूछा, 'फकीर होकर आपने गृहस्थों वाले कपड़े क्यों पहन रखे हैं और संन्यासियों की तरह आपने अपना सिर क्यों नही मुंडा रखा है?' नानक ने उत्तर दिया, 'मूंड़ना मन को चाहिए, सिर को नहीं और मिट्टी की तरह नम्र होकर ही मन को मूंड़ा जा सकता है। जो मनुष्य परमेश्वर के दर पर अपने सुख, स्वाद और अहंकार को त्यागकर गिर पड, वह जो भी वस्त्र धारण करे, परमात्मा उसे स्वीकार करता है। दरवेश का चोगा और टोपी यही है कि वह ईश्वरीय ज्ञान को अपनी आत्मा में बसा ले। जो कोई मन जीत ले, सुख-दुख में एक समान रहे और हर समय सहजावस्था में विचरण करे, उसके लिए हर तरह का वेश शोभनीय है।'

🔷 शाहशरफ ने पूछा, 'आप की जाति क्या है, आप का मत क्या है, गुजर कैसे होती है?' इस पर गुरुजी बोले, 'मेरा मत है सत्यमार्ग, मेरी जाति वही है जो अग्नि और वायु की है, जो शत्रु-मित्र को एक समान समझती है। मेरा जीवन वृक्ष और धरती की तरह है। नदी की तरह मुझे इस बात की चिंता नहीं है कि मुझ पर कोई धूल फेंकता है या फूल और मैं जीवित उसी को समझता हूं, जिसका जीवन चंदन के समान दूसरों के लिए घिसता हुआ संसार में अपनी सुगंध फैला रहा है।

🔶 यह सुन कर शाहशरफ ने कहा- दरवेश कौन है? नानक ने कहा, 'जो जिंदा ही मरे की तरह अविचल रहे। जागते हुए सोता रहे, जान बूझकर अपने आप को लुटाता रहे। जो क्रोध में न आए, अभिमान न करे। न स्वयं दुखी हो, न किसी को दुख दे। जो हमेशा ईश्वर में मग्न रहे और वही सुने जो उसके अंदर से ईश्वर बोलता है और उसी अंतर्यामी परमात्मा को हर व्यक्ति, हर स्थान में देखे। यह सुनकर शाहशरफ काफी प्रसन्न हुए।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 9 Dec 2017


👉 आज का सद्चिंतन 9 Dec 2017


👉 विधाता के बहुमूल्य उपहार

🔷 एक सच्चे मित्र की तरह जीवन का हर प्रभात तुम्हारे लिए अभिनव उपहार लेकर आता है। वह चाहता है कि आप उसके उपहारों को उत्साहपूर्वक ग्रहण करें। उससे उज्ज्वल भविष्य का शृंगार करें। उसकी प्रतीक्षा रहती है कि कब नया दिन गया है, उसका महत्व समझें और आदर पूर्वक ग्रहण करें।    

🔶 किन्तु जो दिया गया है, उसका मूल्य नहीं समझा जाता और कूड़े करकट की तरह फेंक दिया जाता है, तो निराश होकर लौट जाता है। बार- बार अवज्ञा होने पर पुनः अपरिचित राही की तरह आता है और निराश होकर लौट जाता है।

🔷 ईश्वर ने मनुष्य को अपार सम्पदाओं से भरा- पूरा जीवन दिया है, पर वह पोटली बाँधकर नहीं, एक- एक खण्ड के रूप में गिन- गिन कर। नया खण्ड देने से पहले पुराने का  ब्यौरा पूछता है कि उसका क्या हुआ? जो उत्साह भरा ब्यौरा बताते हैं, वे नये मूल्यवान खण्ड पाते हैं। दानी मित्र तब बहुत निराश होता है, जब देखता है कि उसके पिछले अनुदान धूल में फेंक दिये गये।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सुख की आकांक्षा को बुरी मन कहिए (भाग 1)

🔶 इस संसार के सभी लोगों को सुख की आकांक्षा होती है। धन, स्वास्थ्य, पद, प्रशंसा की कामना सभी करते हैं और इन्हें सुख का आधार मान कर लोग अपनी-अपनी तरह से इन्हें प्राप्त करने का प्रयत्न भी करते हैं। तरीके भिन्न हो सकते हैं, किन्तु सुख प्राप्ति की आकांक्षा सभी की एक जैसी ही होती है। धन—सुख का प्रधान साधन माना जाता है। इसे कमाने और प्राप्त करने के लिए लोग कड़ी मेहनत, उद्योग-धन्धे, खेती, दुकान, नौकरी आदि करते हैं। कई लोग इसके लिए अनैतिक कर्म भी करते हैं। इस साधनों में कितनी ही भिन्नता हो, किन्तु धन कमाने का मूल-उद्देश्य जीवन का सुख प्राप्त करना ही है।
   
🔷 यह आकांक्षा बुरी नहीं, आत्म-विकास में इससे सुविधा प्राप्त कर सकते हैं। किन्तु यह तभी संभव है, जब सुख प्राप्ति की भावना का व्यतिक्रमण न हो। संसार में जो कुछ भी परमात्मा ने बनाया है, उसका उचित रीति से उपभोग करें, तो यहां की कोई भी वस्तु मानवीय-विकास और आत्मिक प्रगति में बाधा उत्पन्न न करेगी। कामेच्छा आध्यात्मिक विकास के मार्ग में प्रमुख शत्रु मानी गई है। किन्तु इसका एक विशिष्ट महत्व भी है। काम की चेष्टा मनुष्य में न रही होती तो सृष्टि संचालन का क्रम कहां से चलता? राम, कृष्ण, गौतम, गान्धी, तिलक, मालवीय आदि महापुरुष कहां से आते? जीवन संचार का क्रम इसी भांति आगे भी चलने देने की दृष्टि से कामोपभोग बुरी वस्तु नहीं कही जा सकती। बुराई तो तब उत्पन्न होती है, जब केवल वासना पूर्ति और क्षणिक सुख की आकांक्षा से अपने शरीर का सार-तत्व अनुपयुक्त मात्रा में निचोड़ते रहते हैं।

🔶 क्रोध को ही लीजिए—यह न हो तो संग्राम में लड़ने वाले जवान दुश्मनों का सफाया कैसे करें? गुण्डे बदमाश आततायी व्यक्तियों पर क्रोध आये, उन्हें दण्ड दिया जाय तो यह बुरी बात नहीं। भगवान् राम ने रावण पर, कृष्ण ने कौरवों पर क्रोध किया। सत्य और संस्कृति की रक्षा के लिए क्रोध भी धर्म है। लोभ का भावी-जीवन की आकस्मिक घटनाओं के समय संचित द्रव्य के उपयोग का महत्व है। मोह का तो महत्व और भी अधिक है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- दिसंबर 1964 पृष्ठ 26

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1964/December/v1.26

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.2

👉 Upasana, Sadhana & Aradhana

🔶 Three stages have been ordained for God realization- they are Upasana, Sadhana & Aradhana. Generally people take them as synonymous but they mean respectively as follows-

🔷 Upasana- namely seating near. How? By withdrawing one’s consciousness from mundane objects and directing it towards God & communicate immotionally with Him. When this process of communication starts, man beging to acquire Divine power.

🔶 Sadhana- It means moulding one-self according to divine discipling, to own, awaken & augment truthful tendencies, virtues & true efforts with full determination by means of inner inspiration, study, satsang ect. in conformity with bright future.

🔷 Aradhana- This means an effort to serve God through one’s own power. Now the question arises as to how at all man can be capable of serving the Almighty God? He is Formless & Bodyless.  How does He at all require the service of corporeal being? If at all, He requires, it what service can an ordinary being render to Him?

🔶 It is known that this universe is His gross visible form. God pervades every corner of this universe. An effort to make this beautiful orchard of his still more beautiful is true service to Him?

🔷 Upasana gives strangth to man, Sadhana develops this strength and Aradhana makes it properly useful. One, who follows this process in a prayerful mood, facilitates his path to God realization.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 युग निर्माण योजना और उसके भावी कार्यक्रम (अन्तिम भाग)

🔶 पिछले दिनों से ही आप लोगों को समझाया जाता रहा है कि भगवान् पूजा-पाठ का भूखा है। उसकी थोड़ी-सी प्रार्थना कर दी जाए, स्तुति कर दी जाए या भोग-प्रसाद जैसी छोटी-छोटी रिश्वतें खिला दी जाएँ तो हमारी मनोकामना पूर्ण करने के लिए वह तैयार रहता है। ये कितनी गन्दी और घृणित भावना थी? युगनिर्माण योजना ने यह प्रयास किया कि हर व्यक्ति को यह बताया जाय कि भगवान् कोई व्यक्ति नहीं है, बल्कि एक समग्र ब्रह्माण्ड ही भगवान् हैं और इस विश्व-ब्रह्माण्ड की पूजा करना और सेवा करना यही भगवान् की वास्तविक सेवा और पूजा है। इसका प्रभाव-परिणाम यह हुआ कि असंख्य व्यक्ति जो पूजा-भजन में ही सारा समय खर्च कर देने के लिए तैयार थे, उन्होंने सेवा को अपना धर्म मानना स्वीकार किया और पूजा-भजन एक सीमित मात्रा में सेवा कार्यों को अपने हाथ में ले लिया।
                 
🔷 धर्ममंच को सेवा-शिक्षा में मोड़ने का यह प्रयास एक बहुत अच्छा और बड़ा उपयोगी प्रयास था। उसने इस देश के नागरिकों में भावनात्मक नवनिर्माण करने की दिशा मे बहुत सफलता पायी। धर्म-क्षेत्र में जो सम्पत्ति लगी हुई है, जो पूँजी लगी हुई है, युगनिर्माण योजना का यह प्रयास है कि इस पूँजी को केवल पंंच-पुजारियों के कार्यों में खर्च न होने दिया जाए, बल्कि ऐसे उपयोगी कार्यों में लगाया जाए, जिससे कि उसे जन कल्याण के प्रयोजनों में प्रयोग किया जा सके। अकेले मथुरा-वृन्दावन में ही कई मन्दिर ऐसे हैं, जिनमें कि एक-एक लाख रुपया मासिक भोग-प्रसाद में खर्च कर दिया जाता है। वैसे मथुरा-वृन्दावन में ५००० मन्दिर हैं। ५००० मन्दिरों की आमदनी और खर्चे का क्या ब्यौरा दिया जाय?
    
🔶 दो मन्दिर एक से ही हैं मथुरा का द्वारकाधीश मन्दिर और वृन्दावन का रंगजी का मन्दिर। दोनों मन्दिर ऐसे हैं जिसमें कि भगवान् के भोग और प्रसाद पर एक-एक लाख रुपया खर्च होता है। (सन 1986 में) एक लाख रुपये के हिसाब से सालभर का खर्च हुआ बारह-बारह लाख रुपया। बारह लाख रुपये में साल में एक बढ़िया विश्वविद्यालय चलाया जा सकता है और उस विश्वविद्यालय के द्वारा ऐसे प्रशिक्षित व्यक्ति तैयार किये जा सकते हैं, स्नातक बनाये जा सकते हैं, जो विश्व की शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक समस्याओं का अध्ययन करने के बाद सारे विश्व में भारत माता का सन्देश और भारतीय संस्कृति का सन्देश पहुँचाने में समर्थ हों। ऐसे कार्यकर्ताओं को तैयार करना इस विश्वविद्यालय के लिए क्या कठिन होगा?

🔷 इन्जीनियर बनाने वाले विश्वविद्यालय अपना काम करते हैं, चिकित्सक डॉक्टर बनाने वाले विश्वविद्यालय अपना काम करते हैं। धर्मप्रचारक और लोकसेवी पैदा करने वाले विश्वविद्यालय कहीं भी नहीं हैं। अगर एक मन्दिर चाहे तो अपनी आमदनी का बारह लाख रुपया साल भर में खर्च कर सकता है और जाने क्या समाज की सेवा कर सकता है? गायत्री तपोभूमि का मासिक व्यय दो हजार रुपया मासिक है। (सन 1986 में) इसका अर्थ हुआ चौबीस हजार साल। कहाँ बारह लाख रुपया सालभर का खर्च एक मन्दिर का, कहाँ चौबीस रुपया? ऐसे एक मन्दिर की आमदनी से गायत्री तपोभूमि जैसी संस्थाएँ ४८ बनाई जा सकती हैं। यही वह आधार है जो नव निर्माण का, युगनिर्माण का संकल्प पूरा कर सकेंगे।
 
आज की बात समाप्त।
ॐ शान्ति।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)