गुरुवार, 6 फ़रवरी 2020

👉 सम्मान

एक  वृद्ध माँ रात को 11:30 बजे रसोई में बर्तन साफ कर रही है, घर में दो बहुएँ हैं, जो बर्तनों की आवाज से परेशान होकर अपने पतियों को सास को उल्हाना देने को कहती हैं

वो कहती है आपकी माँ को मना करो इतनी रात को बर्तन धोने के लिये हमारी नींद खराब होती है साथ ही सुबह 4 बजे उठकर फिर खट्टर पट्टर शुरू कर देती है सुबह 5 बजे पूजा

आरती करके हमे सोने नही देती ना रात को ना ही सुबह जाओ सोच क्या रहे हो जाकर माँ को मना करो

बड़ा बेटा खड़ा होता है और रसोई की तरफ जाता है रास्ते मे छोटे भाई के कमरे में से भी वो ही बाते सुनाई पड़ती जो उसके कमरे हो रही थी वो छोटे भाई के कमरे को खटखटा देता है छोटा भाई बाहर आता है।

दोनो भाई रसोई में जाते हैं, और माँ को बर्तन साफ करने में मदद करने लगते है, माँ मना करती पर वो नही मानते, बर्तन साफ हो जाने के बाद दोनों भाई माँ को बड़े प्यार से उसके कमरे में ले जाते है, तो देखते हैं पिताजी भी जागे हुए हैं

दोनो भाई माँ को बिस्तर पर बैठा कर कहते हैं, माँ सुबह जल्दी उठा देना, हमें भी पूजा करनी है, और सुबह पिताजी के साथ योगा भी करेंगे

माँ बोली ठीक है बच्चों, दोनो बेटे सुबह जल्दी उठने लगे, रात को 9:30 पर ही बर्तन मांजने लगे, तो पत्नियां बोलीं माता जी करती तो हैं आप क्यों कर रहे हो बर्तन साफ, तो बेटे बोले हम लोगो की शादी करने के पीछे एक कारण यह भी था कि माँ की सहायता हो जायेगी पर तुम लोग ये कार्य नही कर रही हो कोई बात नही हम अपनी माँ की सहायता कर देते है

हमारी तो माँ है इसमें क्या बुराई है, अगले तीन दिनों में घर मे पूरा बदलाव आ गया बहुएँ जल्दी बर्तन इसलिये साफ करने लगी की नही तो उनके पति  बर्तन साफ करने लगेंगे साथ ही सुबह भी वो भी पतियों के साथ ही उठने लगी और पूजा आरती में शामिल होने लगी

कुछ दिनों में पूरे घर के वातावरण में पूरा बदलाव आ गया बहुएँ सास ससुर को पूरा सम्मान देने लगी ।

कहानी का सार।
माँ का सम्मान तब कम नही होता जब बहुवे उनका सम्मान नही करती, माँ का सम्मान तब कम होता है जब बेटे माँ का सम्मान नही करे या माँ के कार्य मे सहयोग ना करे ।

जन्म का रिश्ता हैं।
माता पिता पहले आपके हैं।  

👉 आप निराश मत हूजिए (भाग १)

आनन्दकंद परमेश्वर की यह विशाल सृष्टि आनन्द मूलक है। सच्चिदानन्द भगवान ही सर्वत्र प्रकट हो रहे हैं उस आनंदघन का आनंदमय ज्ञान प्रत्येक वस्तु से विकसित हो रहा है। भगवान अपने आनन्दमय स्वरूप का सर्वत्र प्रसार कर रहे हैं। जब इस जगत के निर्माणकर्ता का प्रधान गुण आनंद का प्रसार करना है तो संसार में आनंद के अतिरिक्त अन्य क्या हो सकता है। प्रातःकाल हंसता हुआ सूर्य उदित होकर संसार को स्वर्ण रश्मियों से स्नान करा देता है। शीतल सुगंधित वायु मस्ती बिखेरती फिरती है, पक्षीवृन्द आनंद से सने गीत गा गा कर सृष्टिकर्त्ता की उत्कृष्ट कला का प्रकटीकरण करते हैं। विशाल नदियाँ कल कल शब्द कर आनंद बढ़ाती हैं। पुष्पों पर गुँजते हुए मदमाते भ्रमर आनंद के गीत सुना कर हृदय शान्त करते हैं। पृथ्वी का अणु-अणु सुख, ऐक्य, समृद्धि और प्रेम की शक्ति को प्रवाहित कर रहा है। प्रत्येक वस्तु जीवन को स्थायी सफलता और पूर्ण विजय से विभूषित करने को प्रस्तुत है। ऐसी सुँदर सृष्टि में जन्म पा लेना सचमुच बड़े भाग्य की बात है। सतत् तप, पुण्य इत्यादि के उपहार स्वरूप यह दुर्लभ मानव जीवन इसलिए प्राप्त होता है कि हम इसमें पूर्ण आनंद का उपभोग कर जन्म जन्म की थकान मिटा सकें, फिर बतलाइए आप निराश क्यों हैं?

निराशावाद उस महाभयंकर राक्षस के समान है जो मुँह फाड़े हमारे इस परम आनंद जीवन के सर्वनाश की ताक में रहता है, जो हमारी समस्त शक्तियों का हास किया करता है, जो हमें आध्यात्मिक पथ पर अग्रसर नहीं होने देता और जीवन के अंधकारमय अंश हमारे सम्मुख प्रस्तुत करता है। हमें पग-पग पर असफलता ही असफलता दिखाता है और विजय द्वार में प्रविष्ट नहीं होने देता।

इस बीमारी से ग्रस्त लोग उदास खिन्न मुद्रा लिए घरों के कोने में पड़े दिन रात मक्खियाँ मारने का काम करते हैं। ये व्यक्ति ऐसे चुम्बक है जो उदासीन विचारों को निरंतर अपनी ओर आकर्षित किया करते हैं और दुर्भाग्य की कुत्सित डरपोक विचारधारा में निमग्न रहा करते हैं। उन्हें चारों ओर कष्ट ही कष्ट दीखते हैं कभी यह, कभी वह, एक से एक भयंकर विपत्ति आती हुई दृष्टिगोचर होती हैं। वे जब बातें करते हैं तो अपनी यातनाओं, विपत्तियों और क्लेशपूर्ण अभद्र प्रसंग छेड़ा करते हैं। हर व्यक्ति से वह यही कहा करते हैं कि भाई हम क्या करें, हम कमनसीब हैं, हमारा भाग फूटा हुआ है, देव हमारे विपरीत है, हमारी किस्मत में विधि ने ठोकरों का ही विधान रखा है। तभी तो हमें थोड़ी-थोड़ी दूर पर लज्जित और परेशान होना, अशान्त, क्षुब्ध और विक्षिप्त होना पड़ता है।’ उनकी चिंतित मुख-मुद्रा देखने पर यही विदित होता है मानों उन्होंने उस पदार्थ से गहरा संबंध स्थिर कर लिया हो जो जीवन की सब मधुरता नष्ट कर रहा हो, उनके सोने जैसे जीवन का समस्त आनंद छीन रहा हो, उन्नति के मार्ग को कंटकाकीर्ण कर रहा हो। मानों समस्त संसार की दुःख विपत्ति उन्हीं के सर पर आ पड़ी हो और उदासी की अंधकारमय छाया उनके हृदय पटल को काला बना दिया है।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1950 पृष्ठ 12

👉 QUERIES ABOUT ANUSTHANS (Part 1)

Q.1. What is the difference between daily Upasana, Anusthan and Purascharan?

Ans. Daily worship is a part of routine day to day living. Anusthan is a worship of a higher order in which the devotee is bound by many restrictions and has to follow specified rules and regulations. Consequently, in the latter case, special benefits accrue. Purascharan, however, is a still higher specialised form of Sadhana. For Purascharan a number of specific Mantras and rituals are to be followed. Thus, only an individual with an advance of training is capable of performing a Purascharan. For a layman, therefore, Anusthans are recommended, which are easy to perform.

Q.2. What are the types of Anusthans? How much time is required for each?

Ans. There are three types of Anusthans small (Laghu) medium (madhyam) and Big (Uchch). The counts are as follows :
1) Small Anusthan: 24000 Japs to be completed in 9 days at the rate of 27 cycles of rosary per day. Time taken: on an average, 3 hours per day (with about 10 to 11 Malas per hour).
2) Medium Anusthan: 1,25000 Japs to be completed in 40 days at the rate of 33 Malas per day. Time taken: 3-4 hours per day.
3) Major Anusthan: 24,00,000 Japs to be completed in a year at the rate of 66 Malas per day. Time taken: about 6 hours per day.

Q.3. What are the pre-requisites for an Anusthan?

Ans. Cleansing of body, clothes and implements of worship; the six rituals; ‘Panchopchar’; Jap; Meditation ; ‘Suryarghdan’; (A small Kalash with water and incense are kept along with a photograph or idol of the deity.) Oblations of : water, ‘Akchat’, ‘Chandan’, ‘Flowers’ and ‘Naivedya’. ‘Avahan’ and ‘Visarjan’ at the beginning and end are associated with Gayatri Mantra; Yagya and Brahmbhoj.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 71

👉 सहनशीलता

सहनशीलता में अद्भुत शक्ति है। इसमें आत्मचेतना की अजेयता है, अमरत्व है। जिसमें सहनशीलता नहीं है, वह जल्दी टूट जाता है। जबकि जिसने सहनशीलता के अभेद्य सुरक्षाकवच को ओढ़ लिया है, उसे जीवन में प्रतिक्षण पड़ती चोटें और भी मजबूत और दृढ़ करती है।
  
सन्त तिलोपा अपने शिष्यों को एक सच्ची घटना सुनाते थे; एक युवक किसी लुहार के घर के पास से गुजरता था। उसने निहाई पर पड़ते हथौड़ों की चोटों की आवाज सुनी। कौतुकवश उसने लुहार के घर के भीतर झाँक कर देखा। उसे दिखाई दिया कि एक कोने में बहुत से हथौड़े टूटकर विकृत होकर पड़े हैं। उसे थोड़ा अचरज तो हुआ, फिर भी उसने सोचा कि समय और उपयोग ने उनकी ऐसी गति बनायी होगी। उस युवक ने जिज्ञासावश लुहार से पूछा; इतने सारे हथौड़ों को इस दशा तक पहुँचाने के लिए आपको कितनी निहाइयों की जरूरत पड़ी?
  
इस सवाल के जवाब में लुहार जोर से हँस पड़ा और बोला; अरे भाई, एक ही निहाई केवल एक ही। अब तो वह युवक और भी गहरे अचरज में डूब गया। उसके गणितीय मन में सवालों के अनेकों समीकरण उभरे। निहाई एक और वह भी सर्वथा अविजित और सुरक्षित। जबकि हथौड़े अनेक और वे सबके सब टूटे हुए। आखिर इस अचरज भरे सच का रहस्यात्मक आधार क्या है? युवक अभी कुछ और सोच पाता इतने में वह लुहार बोल पड़ा, ऐसा इसलिए है मित्र क्योंकि हथौड़े चोट करते हैं और निहाई धैर्य से, सर्वथा अविचलित भाव से सभी चोटों को सहती है। इसीलिए एक ही निहाई सैकड़ों हथौड़ों को तोड़ डालती है।
  
इस कथा का समापन करते हुए सन्त तिलोपा ने अपने शिष्यों से कहा; जीवन का सत्य सहनशीलता है। अन्त में वही जीतता है जो चोटों को धैर्यपूर्वक सहता और स्वीकार करता है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १८१