शनिवार, 6 जनवरी 2018

👉 भगवान सद्बुद्धि दें

🔷 एक संत थे। वह प्रातः काल अपने शिष्यों के बीच बैठकर प्रभु से प्रार्थना किया करते थे। वह सबसे पहले पूरी मानव जाति के कल्याण की प्रार्थना करते और इसके बाद हाथ जोड़कर कहते कि, हे प्रभु मेरे परमपिता, आप गलत कार्य करने वाले लोगों को सद्बुद्धि दें। उनको सही रास्ता दिखाएं ताकि वो गलत कामों को छोड़कर दया का भाव जाग्रत करें।

🔶 उनकी यह प्रार्थना एक शिष्य रोज सुनता एक दिन उसने पूछा, संत तो अच्छे लोगों के कल्याण के लिए भगवान से प्रार्थना करते हैं। गुरुदेव इस प्रार्थना का क्या अर्थ है?

🔷 संत मुस्कुराए और बोले, 'वत्स अच्छे काम करने वाले लोग तो स्वतः भगवान की दया और स्नेह के अधिकारी बन जाते हैं।' अच्छे लोग अच्छे कर्म करके औरों को भी अच्छा बनाते रहते हैं।

🔶 प्रार्थना तो बुरे लोगों को सद्बुद्धि प्रदान करने के लिए करनी चाहिए, जिससे वे गलत कामों को छोड़कर ईश्वर भक्ति में मन लगाएं और लोगों पर दया करें।

👉 आत्मा, महात्मा और परमात्मा का विकास

🔷 महात्मा वह है, जिसके सामान्य शरीर में असामान्य आत्मा निवास करती है। काया की वेशभूषा और चित्र-विचित्र आवरणों का धारण महात्मा होने का न तो आधार है और न लक्षण। सामान्य वेष और सामान्य रहन-सहन के बीच महात्मा के स्तर तक पहुँचा जाना सम्भव है और पहुँचाया जाता भी रहा है।
  
🔶 मर्यादाओं से आबद्ध रह कर नागरिक कर्तव्यों का पालन करते रहना उद्धत आचरणों से बचना, शील और सौजन्य को निबाहना यह मनुष्यता का आवश्यक उत्तरदायित्व है। जिन्होंने अपने भीतर आत्मा को समझा है और उसकी गौरव-गरिमा को ध्यान में रखा है। उसे संयम, सदाचार और कर्तव्यनिष्ठïा से जुड़ा हुआ शालीन जीवन जीना ही पड़ेगा।
  
🔷 महात्मा की गरिमा इससे अगली मंजिल है। महान का अर्थ है- विशाल व्यापक। जो आत्मा अपने शारीरिक, मानसिक और पारिवारिक कर्तव्यों से आगे बढक़र विश्व मानव के उत्तरदायित्वों को वहन करने के लिए अग्रसर होती है, मानवीय कर्तव्यों से आगे के देव कर्तव्यों को वहन करने के लिए तत्पर होती है वह महात्मा है। महात्मा अपने लिए नहीं सोचता, विराट्ï के लिए सोचता है, अपने लिए नहीं करता, विराट्ï के लिए करता है, अपने लिए जीवित नहीं रहता, विराट्ï के लिए जीता है।
  
🔶 अपना शरीर हर छिद्र से मलीनता निष्कासित करता है, पर इसलिए कौन उसे घृणास्पद और त्याज्य ठहरता हैं कि इनमें गन्दगी विद्यमान है। घृणा की आवश्यकता नहीं समझी जाती और शरीर को स्वच्छ करने पर ही ध्यान रहता है। अपनी ही तरह दूसरों की विविध मलीनताओं के रहते जो हेय, घृणास्पद, पतित और त्याज्य नहीं ठहराता वरन्ï अपनी सहज ममता से प्रेरित होकर उसे निर्मल बनाने का श्रम करता है, वह महात्मा है। अपना छोटा बच्चा दिनभर गलती करता रहता है, उसका बहिष्कार नहीं करते और देख-भाल, डाँट-डपट, तोड़-फोड़ के अवसरों की रोकथाम करके जितना सम्भव होता है उस क्षति का बचाव करते हैं। इस पर भी जो हानि होती रहती है उसे सहन करते हैं। छोटे बालकों और अभिभावकों के बीच यह चिर अतीत से चला आ रहा है। दिग्भ्रान्त जन समाज के अनाचरणों के प्रति आक्रोश उत्पन्न किये बिना जो धैर्य और शान्तिपूर्वक विग्रह की रोकथाम पर ध्यान देता है उस उदारमना व्यक्ति को महात्मा कहना चाहिए।
  
🔷 हम अपने और अपने प्रियजनों के दु:खों से दु:खी होते हैं। इस क्षेत्र में सुख संवर्धन का प्रयत्न करते हैं। हमें अपना सुख, यश, वैभव, उत्कर्ष प्रिय लगता है और जिन्हें अपना समझते हैं उन्हें भी इसी सुखद स्थिति में रखने के लिए प्रयत्न करते हैं, यह परिधि जब बड़ी हो जाती है और प्यार-दुलार का, ममता-आत्मीयता का क्षेत्र बढ़ जाता है तो वैसी ही अनुभूति हर किसी के साथ जुड़ जाती है। दूसरों का कष्ट अपना कष्टï लगता है; अपने को सुखी बनाने के लिए जिस प्रकार अपना स्वभाव और चिन्तन सक्रिय रहता है वैसी ही सक्रियता यदि जन साधारण के लिए विकसित हो चले तो समझना चाहिए कि आत्मा ने महात्मा का रूप धारण कर लिया। परायों में जब अपनापन प्रतिभासित होने लगे तो समझना चाहिए कि दिव्य नेत्र खुल गए। जिसका अहन्ता ग्रीष्म की हिम बनकर पिघल जाय, जो पवन जैसा सक्रिय और आकाश जैसा शान्त दिखाई पड़े समझना चाहिए यह महात्मा का ही विग्रह है।
  
🔶 जब तक स्व, पर ऊहा-पोह चलता रहता है तब तक आत्मा और महात्मा का प्रेम-प्रसंग, आदान-प्रदान, परिहास, मनुहार चल रहा समझा जाना चाहिए। जब द्वैत की समाप्ति हो जाय और केवल एक ही शेष रहे स्व, पर का अन्तर सोचने की गुंजाइश ही न रहे तब समझना चाहिए उसी काय कलेवर में परमात्मा का अवतार हो गया।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन 7 Jan 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 7 Jan 2018


👉 स्वाध्याय और मनन मानसिक परिष्कार के दो साधन (भाग 1)

🔷 मन बैसाखी गधे की तरह है जिसे नहला धुला देने पर भी मलीनता प्रिय लगती है और दूसरे ही दिन धूलि में लौटकर फिर पहले जैसी गंदगी में लिपट जाता है। हाथी की आदत भी ऐसी ही होती है। नदी तालाब में बैठा स्वच्छ होता रहेगा पर जब बाहर निकलेगा तो सूँड़ में रेत भर कर सारे बदन पर डाल लेगा। न जाने गंदगी में इन्हें क्या मजा आता है?

🔶 मन की आदत भी ऐसी ही गंदी है। स्वाध्याय और सत्संग के सम्पर्क में आकर कुछ समय के लिए ऐसा सज्जन बन जाता है मानो सन्त हो। रामायण गीता सुनते समय आँखों में आँसू आते हैं। नरक की पीड़ायें जानकर पश्चाताप भी होता है और मृत्यु की जब याद दिलाई जाती है जब डर भी लगता है कि मौत के दिन समीप आ पहुँचे। जिंदगी बीत चली। अब बचे कूचे दिनों का तो सदुपयोग कर ले। पर यह ज्ञान देर तक नहीं ठहरता किसी मुर्दे की जलाने जाते हैं तब मरघट में श्मशान वैराग्य’ उठता है। काया नाशवान् होने की बात सूझती है और लगता है इस क्षणभंगुर जीवन के लिए क्या बुराइयाँ ओढ़नी क्या पाप करने। क्या अहंकार करना- किस बात पर इतराना। उस समय तो यही ज्ञान जंचता है पर घर आते आते वह वैराग्य न जाने कहाँ हवा में उड़ जाता है और उसी पुराने ढर्रे पर गाड़ी के पहिये लुढ़कने लगते हैं।

🔷 यही स्थिति सदा बनी रहे तो ज्ञान, परमार्थ की बात बेकार है। चिकने घड़े की तरह यदि श्रेष्ठता भीतर घुसे ही नहीं तो बाहर की लीपा-पोती से क्या काम चलेगा। ज्ञान की सार्थकता तो तब है जब उसका प्रभाव अन्तः करण पर पढ़े और जीवन की रीति- नीति बदले। ऐसा न हो सका तो पढ़ने सुनने के - पोथी के बेंगने भूख को कहाँ बुझाते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- जनवरी 1973 पृष्ठ 44
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1973/January/v1.44

👉 मन का भार हल्का रखिये (अन्तिम भाग)

🔷 काम करते समय आपको जब भी निराशा, बोझ या घबराहट लगा करे, उस समय अपने आत्म-विश्वास को जगाने का प्रयत्न किया कीजिये। आध्यात्मिक चिन्तन किया कीजिये। आप यह सोचा करिये कि आप भी दूसरों की तरह एक बलवान् आत्मा हैं, आपके पास शक्तियों का अभाव नहीं है। अभी तक उनका प्रयोग नहीं किया है इसीलिये भय, संकोच या लज्जा आती है। पर अब आपने जान लिया है कि आपकी भी सामर्थ्य कम नहीं है। आप निर्धन परिवार के सदस्य नहीं, वरन् परमात्मा के वंश में उसकी उत्कृष्ट शक्तियाँ लेकर अवतरित हुए हैं फिर आपको घबराहट किस लिये होनी चाहिये?

🔶 जब भी कभी आपको कोई मानसिक भय, उलझन या निराशा उत्पन्न हो, आप कुछ देर के लिये एकान्त में चले जाया कीजिये। कल्पना में शुभ और पौरुष पूर्ण चित्र बनाया कीजिये। असफलता की बात मन से जितनी दूर भगा देंगे, उतनी ही आपके अन्दर रचनात्मक प्रवृत्तियाँ जागृत होंगी और आपका जीवन सुख-सुविधाओं से पूर्ण होता चलेगा।

🔷 प्रत्येक कार्य शान्ति और स्थिरतापूर्वक किया कीजिये आप महान् आत्मा हैं, आपका जन्म किन्हीं महान् उद्देश्य की पूर्ति के लिये हुआ है। बड़ी सफलता के लिये बड़ा साहस चाहिये। वह साहस आप में सोया है, उसे जागृत करना आपका काम है। आप इस लक्ष्य को समक्ष रखकर शुभ कल्पनाएं किया कीजिये और मन को भय घबराहट तथा निराशा आदि के बोझ से मुक्त रखा कीजिये आपका मन हल्का रहे तो उसमें से रचनात्मक स्रोत फूट पड़ें और आपको सब तरह की सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण कर दें ऋषि की इस प्रार्थना में बड़ा बल हैः—

🔶 अपेहि मनसस्पतेऽप क्राम परश्चर। परो निऋत्या आ चक्ष्व बहुधाजीवनोमनः॥

🔷 अर्थात्- “मन को अपवित्र करने वाले बुरे विचारों वाले बोझ मुझसे दूर रहें। मेरा चित्त कभी मलिन न हो। मेरी अन्तरात्मा निर्भय और मेरा मन शुभ विचारों वाला हो।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.7

👉 Building a Person, his Family and his Society (Last Part)

🔶 The body is not all in all. The requirements of body alone are not all about. Sense-organs are not all about. Yearning & desire of mind alone is not all about. Somewhere a soul is also within and if it is so then believe this ingredient of life too has some demands to be fulfilled, kindly pay your attention to that also. The soul too has a hunger and a thirst but immense & infinite are its compliments. Plants, trees provide us greenery, shadow and air needed for life.

🔷 They also provide us fruits and flowers; but don’t they require fertilizer, water and care? What will you expect of them if you do not bother about care, water and fertilizer needed by them? In the same way ZIWATMA too is like a plant and tree requiring its dose. What kind of dose it demands?

🔶 Didn’t I request you that you must run activities associated with person building, family building and society building in a progressive manner heading onwards. Yes it is what the soul requires. Finished, today’s session

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 ध्यान का दार्शनिक पक्ष ( भाग 1)

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

🔷 साधना स्वर्ण जयंती वर्ष में हम आपको गायत्री उपासना के साथ-साथ विशेष रूप से जो शिक्षण देते हैं, वह ध्यान का शिक्षण है। उपासनाएँ दो हैं- नाम और रूप की उपासनाएँ। नाम और रूप के बिना उपासना हो नहीं सकती। यह दो यूनीवर्सल उपासनाएँ हैं। किसी भी मजहब में चले जाइए व्यक्ति नाम जरूर ले रहा होगा। मुसलमान तसबीह पर नाम ले रहा होगा। ईसाई पादरियों को आप माला जपते हुए देखेंगे। आर्यसमाजी प्रकाश का ध्यान कर रहे होंगे। अन्य अमुक तरह का ध्यान कर रहे होंगे। नादयोग वाले कान में आने वाली आवाज का ध्यान कर रहे होंगे। बहरहाल ध्यान जरूर करना पड़ता है।

🔶 ध्यान के बिना गति किसी की नहीं है। इसीलिए हमने कहा है कि जप के साथ-साथ आप ध्यान किया कीजिए। स्थूल ध्यान मूर्तिपूजा के माध्यम से होता है, तसवीरों के माध्यम से होता है, क्योंकि मनुष्य का मानसिक विकास इतना नहीं हो पाया है कि वह बिना किसी फोटोग्राफ के, बिना किसी मूर्ति के किसी चीज का ध्यान कर सके, लेकिन जब वह विषय पक्का हो जाता है, तब फिर मूर्ति की कोई खास जरूरत नहीं रह जाती। तब हम अपने भीतर बैठे हुए भगवान का साक्षात्कार कर सकते हैं। उसका ध्यान कर सकते हैं।
 
🔷 ध्यान का क्या मतलब है? ध्यान का मतलब है कि हमारे जीवन के दो पक्ष हैं। एक पक्ष वह है जो बाहर फैला हुआ पड़ा है। हमारे कानों के सूराख बाहर को हैं और हमारी आँखों के सूराख बाहर को हैं। हम बाहर को चीजों को देख सकते हैं और बाहर कौन बैठा हुआ है, कौन जा रहा है, यह भी बता सकते हैं। बाहर की चीजें हमको दिखाई पड़ती हैं किंतु भीतर की चीजें हमको बिलकुल दिखाई नहीं पड़ती। तो क्या भीतर कोई चीज नहीं है? बेटे असल में जो कुछ भी चीज है, वह भीतर ही है बाहर नहीं है बाहर केवल दिखाई पड़ती हैं, पर असल में हर चीज भीतर है। जिन्दगी कहाँ है?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 10)

👉 परमसिद्धि का राजमार्ग

🔷 गुरुगीता के महामन्त्र साधना जीवन के महासूत्र हैं। इन्हें अपनाकर, इनकी साधना करके साधक का अध्यात्म राज्य में प्रवेश सुनिश्चित है। पर ध्यान रहे गुरुगीता के इन महामन्त्रों की साधना करने का मतलब कतिपय क्रियाओं अथवा कर्मकाण्डों को कर लेना भर नहीं है। इनकी साधना करने का अर्थ है—उस भावदशा में अपनी सम्पूर्णता एवं समग्रता से जीना, जिसका कि ये महामन्त्र बोध कराते हैं। पिछले मंत्र में गुरुतत्त्व के बारे में बताया गया है कि परम गुरु भगवान् सदाशिव के उन वचनों को किस तरह आत्मसात् किया जाए, जिसमें उन्होंने कहा था कि गुरुतत्त्व ही साधक के जीवन का सार सर्वस्व है। इसके अभाव में यज्ञ, व्रत, तप, दान, जप और तीर्थ अपना अर्थ खो देते हैं। यही नहीं अपनी प्रबुद्ध आत्मा और सद्गुरु भिन्न नहीं हैं। ये दोनों एक ही हैं, इसमें तनिक भी संशय नहीं है। इस तत्त्व के सत्य को जानने से ही साधक के जीवन में सत्य ज्ञान का उदय होता है।

🔶 गुरुतत्त्व की इस कथा को आगे बढ़ाते हुए देवाधिदेव भगवान् महादेव आदिमाता पार्वती से कहते हैं-

सर्वपापविशुद्धात्मा श्रीगुरोः पादसेवनात्।
देहीब्रह्मभवेद् यस्मात् त्वत् कृपार्थं वदामि ते॥ ११॥
  
🔷 सद्गुरु के चरणों की सेवा से साधक सारे पापों से मुक्त होकर विशुद्धात्मा हो जाता है। (भगवान् शिव, माता पार्वती से कहते हैं, यही नहीं देवि!) मैं तुम्हें कृपापूर्वक बता रहा हूँ, देहधारी जीव ब्रह्मभाव को उपलब्ध हो जाता है।

🔶 गुरुचरणों की महिमा के बारे में कहे गए, भगवान् महादेव के ये वचन साधकों के जीवन का सम्पूर्ण सत्य है। समस्त सृष्टि का आध्यात्मिक इतिहास साक्षी है कि अनेकों बार इस महामन्त्र में निहित सत्य को अपने साधना जीवन में खरा प्रमाणित किया है। महान् साधकों ने दुर्लभतम ब्रह्मतत्त्व का बोध इस महामन्त्र की साधना से पाया है। ऐसी सैकड़ों, हजारों और लाखों घटनाओं में हम यहाँ केवल एक घटना की चर्चा कर रहे हैं। इसकी चर्चा विश्वविख्यात महान् योगी स्वामी योगानन्द ने ‘योगीकथामृत’ में भी की है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 21

👉 बुरी आदत:-

एक अमीर आदमी अपने बेटे की किसी बुरी आदत से बहुत परेशान था। वह जब भी बेटे से आदत छोड़ने को कहते तो एक ही जवाब मिलता, “अभी मैं इतना छोटा ह...