गुरुवार, 23 जनवरी 2020

👉 "जीवन चलने का नाम"

सरला नाम की एक महिला थी। रोज वह और उसके पति सुबह ही काम पर निकल जाते थे। दिन भर पति ऑफिस में अपना टारगेट पूरा करने की ‘डेडलाइन’ से जूझते हुए साथियों की होड़ का सामना करता था। बॉस से कभी प्रशंसा तो मिली नहीं और तीखी-कटीली आलोचना चुपचाप सहता रहता था। पत्नी सरला भी एक प्रावेट कम्पनी में जॉब करती थी। वह अपने ऑफिस में दिनभर परेशान रहती थी। ऐसी ही परेशानियों से जूझकर सरला लौटती है। खाना बनाती है। शाम को घर में प्रवेश करते ही बच्चों को वे दोनों नाकारा होने के लिए डाँटते थे पति और बच्चों की अलग-अलग फरमाइशें पूरी करते-करते बदहवास और चिड़चिड़ी हो जाती है। घर और बाहर के सारे काम उसी की जिम्मेदारी हैं।

थक-हार कर वह अपने जीवन से निराश होने लगती है। उधर पति दिन पर दिन खूंखार होता जा रहा है। बच्चे विद्रोही हो चले हैं। एक दिन सरला के घर का नल खराब हो जाता है। उसने प्लम्बर को नल ठीक करने के लिए बुलाया। प्लम्बर ने आने में देर कर दी। पूछने पर बताया कि साइकिल में पंक्चर के कारण देर हो गई। घर से लाया खाना मिट्टी में गिर गया, ड्रिल मशीन खराब हो गई, जेब से पर्स गिर गया...। इन सब का बोझ लिए वह नल ठीक करता रहा।

काम पूरा होने पर महिला को दया आ गई और वह उसे गाड़ी में छोड़ने चली गई। प्लंबर ने उसे बहुत आदर से चाय पीने का आग्रह किया। प्लम्बर के घर के बाहर एक पेड़ था। प्लम्बर ने पास जाकर उसके पत्तों को सहलाया, चूमा और अपना थैला उस पर टांग दिया। घर में प्रवेश करते ही उसका चेहरा खिल उठा। बच्चों को प्यार किया, मुस्कराती पत्नी को स्नेह भरी दृष्टि से देखा और चाय बनाने के लिए कहा।

सरला यह देखकर हैरान थी। बाहर आकर पूछने पर प्लंबर ने बताया - यह मेरा परेशानियाँ दूर करने वाला पेड़ है। मैं सारी समस्याओं का बोझा रातभर के लिए इस पर टाँग देता हूं और घर में कदम रखने से पहले मुक्त हो जाता हूँ। चिंताओं को अंदर नहीं ले जाता। सुबह जब थैला उतारता हूं तो वह पिछले दिन से कहीं हलका होता है। काम पर कई परेशानियाँ आती हैं, पर एक बात पक्की है- मेरी पत्नी और बच्चे उनसे अलग ही रहें, यह मेरी कोशिश रहती है। इसीलिए इन समस्याओं को बाहर छोड़ आता हूं। प्रार्थना करता हूँ कि भगवान मेरी मुश्किलें आसान कर दें। मेरे बच्चे मुझे बहुत प्यार करते हैं, पत्नी मुझे बहुत स्नेह देती है, तो भला मैं उन्हें परेशानियों में क्यों रखूँ। उसने राहत पाने के लिए कितना बड़ा दर्शन खोज निकाला था...!

यह घर-घर की हकीकत है। गृहस्थ का घर एक तपोभूमि है। सहनशीलता और संयम खोकर कोई भी इसमें सुखी नहीं रह सकता। जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं, हमारी समस्याएं भी नहीं। प्लंबर का वह ‘समाधान-वृक्ष’ एक प्रतीक है। क्यों न हम सब भी एक-एक वृक्ष ढूँढ लें ताकि घर की दहलीज पार करने से पहले अपनी सारी चिंताएं बाहर ही टाँग आएँ।

👉 वासन्ती हूक, उमंग और उल्लास यदि आ जाए जीवन में (भाग २)

शंकराचार्य ने फैसला कर लिया कि मम्मी का कहना नहीं मानना है। एक दिन वह पानी में घुस गया और चिल्लाने लगा—मम्मी क्या करूँ, अब मेरे मरने का समय आ गया। मुझे शंकर भगवान दिखाई पड़ते हैं और कहते हैं कि अगर इस बच्चे को मेरे सुपुर्द कर दोगी तो हम मगर से इसे बचा सकते हैं। मम्मी चिल्लाई—अच्छा बेटे जिन्दा तो रहेगा, मुझे मंजूर है और मैंने तुझे भगवान को दे दिया। बस शंकराचार्य ने उछाल मारी और किनारे आ गए। वे बोले देखो मगर ने छोड़ दिया, अब मैं शंकर भगवान् का हूँ।

बहुत-सी शृंखला मैंने देखी हैं। उसी शृंखला में एक और कड़ी शामिल हो जाती है वसन्त पंचमी की। यही दिन थे, पचपन वर्ष पहले एक आया? कौन आया? मेरा सौभाग्य आया। वसन्त पंचमी के दिन हर एक का सौभाग्य आता है, एक उमंग आती है, एक तरंग आती है। मेरे ऊपर भी एक तरंग आई सौभाग्य के दिन मेरे गुरु के रूप में, मास्टर के रूप में। मेरा गुरु प्रकाश के रूप में आया। जब कोई महापुरुष आता है तो कुछ लेकर के आता है। कोई महाशक्ति आती है तो कुछ लेकर के आती है, बिना लिए नहीं आती। मेरा भी गुरु, मेरा भी बॉस, मेरा भी मास्टर और भी सौभाग्य की धारा और लहर मेरे पास आई थी, काश! आपके पास भी आ जाती तो आप धन्य हो जाते।

जब आती है हूक, जब आती है उमंग तो फिर क्या हो जाता है? रोकना मुश्किल हो जाता है और जो आग उठती है, ऐसी तेजी से उठती है कि इन्तजार नहीं करना पड़ता। जब वक्त आता है तो आँधी-तूफान के तरीके से आता है। मेरी जिन्दगी में भी आँधी-तूफान के तरीके से वक्त आया। मेरे गुरु आए और आकर के उन्होंने आत्म-साक्षात्कार कराया, पूर्वजन्मों का हाल दिखाया और जाते वक्त कहा कि हम दो चीजें देकर जाते हैं। दोनों चीजें जिनको हम शक्तिपात और कुण्डलिनी जागरण कहते हैं, दोनों की दोनों सेकण्डों में पूरी हो गई और मैं कुछ से कुछ हो गया। मेरी आँखों में कुछ और चीज दिखाई पड़ने लगी। नशा पीकर आदमी को कुछ का कुछ दिखाई पड़ता है। ऐसे ही मुझे दुनिया किसी और तरीके से दिखाई पड़ने लगी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 QUERIES ABOUT JAP AND DAILY UPASANA (Part 8)

Q.17. What are the restrictions on Upasana during the inauspicious days (birth or death in family etc.)?

Ans. On such occasions, although regular chanting of Mantra with rosary and standard rituals are forbidden, mental Jap and meditation may be done. The objective is two-fold. On the one hand, it protects the devotee from mental and physical exertion, On the other, a quarantine (Sootak) has to follow this rule. Members of such families should avoid touching the idols of the deity, rosary, implements of Sadhana etc. and do only mental recitations of the Mantra. 

Q.18.  Should women discontinue Upasana during  menstrual periods?           
Ans. While undergoing menstrual cycles, women are both mentally and physically under exertion. Besides, they are unable to maintain the required degree of physical cleanliness. As such, they are recommended to do mental Jap only. This rule is also applicable to other states of cleanliness (when there are discharges through sweat, nose, eyes, boils etc.). Proper cleanliness is a pre-requisite for any spiritual exercise.

Q.19. What is the posture recommended for turning the rosary (Mala) during Jap?

Ans. 1. For Jap, select a secluded, noiseless place beneath a tree, in a temple, or at the bank of a river.

2. Be seated in an upright position with crossed-legs (Sukhasan) or on a raised platform if there is some discomfort on sitting on ground. For sitting use a cotton or woollen spread.  Animal hides are prohibited. Let the spine be straight and relaxed. Now keep the left hand on the palm turned upwards on the right lap.

3. Hold the rosary in the right hand so that it hangs like a garland across the bridge formed by joining the thumb and ring finger.

4. Keeping the elbow of the right hand on the palm of the left hand and the arm in a vertical position, turn the beads of the rosary inwards (towards yourself) with the help of middle finger-beginning from the main knot (Brahma Granthi). (Use of little finger and index finger is forbidden).

5. On completion of each cycle of rosary, turn it backwards so that the main knot is not crossed, i.e. the Jap in the rosary is “unidirectional”. It can be done with the help of same fingers which are used for turning the rosary. Keep the body still. There is no harm in changing position if discomfort is felt after some time.

6. Pronounce the Mantra in whispers, so that it is audible to you only.

7. If there is difficulty in using a rosary, fixed time for Jap may be maintained with the help of a clock.
As far as practicable, uniformity of fixed time, duration and place should be maintained. 

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 62

👉 राष्ट्रीय कर्त्तव्य

स्वाधीनता प्राप्ति की घड़ी में भारत माता की आँखें छलक पड़ी थीं। इस सच की अनुभूति उस समय सभी ने की थी, परन्तु इस तथ्य को कम ही लोग अनुभव कर पाये थे कि भारत माँ की एक आँख में खुशी के आँसू छलक रहे थे, जबकि उसकी दूसरी आँख दुःख के आँसुओं से डबडबायी हुई थी। खुशी स्वाधीनता की थी और दुःख विभाजन का था। अपनी ही संतानों ने माता के अस्तित्व एवं अस्मिता के हिस्से को काटकर अलग कर दिया था। विभाजन की यह पीड़ा बड़ी दारुण थी और यातना बड़ी असहनीय। फिर भी उम्मीद थी कि स्वाधीन देशवासी सम्भवतः समझदार हो जायेंगे और अपनी माँ को अब यह दर्द न देंगे।
  
परन्तु दुर्देव और दुर्भाग्य-स्वाधीनता प्राप्ति के वर्ष पर वर्ष बीतते गये और विभाजन के नये-नये रूप सामने आते गये। भूमि तो नहीं बँटी पर भावनाएँ बँटती गयीं। भूगोल तो वही रहा, परन्तु उसमें खिंची संवेदनाओं की लकीरें मिटती गयीं। संवेदनाओं की सरिता को सोखने वाले, इसे दूषित-कलुषित करने वाले विभाजनों के कितने ही रूप सामने आते गये। विभाजन धर्म के नाम पर, विभाजन जाति के नाम पर, विभाजन भाषा के, विभाजन साम्प्रदायिकता और क्षेत्रीयता के। अब तो इनकी संख्या इतनी ज्यादा बढ़ गयी है कि इन्हें ठीक से गिन पाना भी मुश्किल है।
  
स्वाधीनता की हर वर्षगाँठ पर भारत माता की आँखें छलकती तो जरूर हैं, परन्तु यह अनुभूति गिने-चुने लोग ही कर पाते हैं कि अब उसकी दोनों आँखों में खुशी के आँसू नहीं दुःख के आँसू डबडबा रहे हैं। इस वर्ष की स्थिति तो और बदतर है। आज स्वाधीनता दिवस पर भारत माता की आँखें फिर से आँसुओं से भरी हुई हैं। लेकिन ये आँसू खून के आँसू हैं। इनमें जातीयता के संघर्ष का खून है। अब उससे सही नहीं जा रही इन नित-नये विभाजनों की पीड़ा।
  
पता नहीं उसकी अपनी संतानों में से कौन और कितने माँ की इस पीड़ा की अनुभूति कर पायेंगे? क्योंकि यह अनुभूति तो राष्ट्रीयता की अनुभूति से जुड़ी हुई है। जबकि आज के इस दौर में यह पवित्र अनुभूति न तो सरकारें कर पा रही हैं और न ही राजनीतिक दल। हालाँकि यह अनुभूति प्रत्येक भारतवासी का राष्ट्रीय कर्त्तर्व्य है। उसे अपनी इसी कर्त्तव्य निष्ठा में अपने धर्म, जाति एवं क्षेत्रीयता को विलीन कर देना चाहिए।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १६९