सोमवार, 8 मई 2017

👉 गुरुदेव भी रो पड़े

🔵 मध्य प्रदेश में यज्ञ चल रहा था। गुरुदेव के साथ मैं भी वहाँ गया हुआ था। एक दिन एक हॉल में तीन- चार सौ बहिनें उनके साथ बैठी थीं। बातचीत के साथ- साथ हँसी के फव्वारे छूट रहे थे। गुरुदेव बात- बात में हँसाते जाते थे। सभी बहिनें उनकी बातों पर हँस रही थीं। एक बहिन उन सबमें गुमसुम बैठी थी। उसे हँसी नहीं आ रही थी। उसे दुखी देख गुरुदेव ने पास बुलाया और पूछा- बेटी तुझे क्या दुःख है?

🔴 वहाँ बैठी सभी बहिनें सज- धज कर आई थीं, अच्छे- अच्छे कपड़े- जेवर पहने हुए थीं और वह लड़की सिर्फ सफेद धोती पहनी थी। गुरुदेव की बात का उसने कोई जवाब नहीं दिया, केवल सिर झुका लिया। गुरुदेव ने फिर दुलारते हुए पूछा- बेटी क्या कष्ट है तुझे, तू हँस भी नहीं रही है। उसे निरुत्तर देख गुरुदेव उसे अलग ले गए। मैं भी उनके साथ चला गया। मैं हमेशा उनकी हरेक बातचीत सुनने का प्रयास करता। उनसे काफी कुछ सीखने को मिलता था।

🔵 अलग ले जाकर उन्होंने उससे पूछा- बेटी बता तुझे क्या दु:ख है? तेरे सारे दु:ख दूर कर दूँगा। उसने लम्बी साँस ली। फिर बोली- गुरुदेव, मुझे कोई दु:ख नहीं है। उसकी आँखें आँसुओं से डबडबा आईं। गुरुदेव के बहुत दबाव डालने पर उसने बताया कि उसकी शादी बहुत बचपन में ही हो गई थी। उसके पति का स्वर्गवास हो चुका है। और अब वह स्वनिर्भर जीवन जी रही है। एक विद्यालय में शिक्षिका है और अपना सब काम स्वयं करती है।

🔴 विधवा होने का दु:ख तो वह झेल ही रही थी मगर समाज की बेरुखी से वह बुरी तरह टूट चुकी थी। वह कह रही थी ‘‘मैं 100 अखण्ड ज्योति मँगाती हूँ। उसे लेकर सुबह किसी के घर जाती हूँ तो सभी मुझसे नाराज होते हैं कि तू विधवा है। सुबह- सुबह आकर मुँह दिखला दिया, न जाने आज का दिन कैसा बीतेगा। सब गाली भी देते हैं, मैं चुप होकर सुन लेती हूँ और वापस चली आती हूँ। शाम को अखण्ड ज्योति बाँटने जाती हूँ, तब भी वे यही कहते हैं कि शाम को आकर मुँह दिखला दिया। कल से हमारे घर मत आया कर।’’ वह सिसकते हुए कह रही थी- जहाँ जाती, वहीं सब मुझसे नफरत करते हैं। पत्रिका बाँटने घरों में न जाऊँ तो उनके पैसे अपने वेतन से भरने पड़ते हैं। अपने खर्च में कटौती करनी पड़ती है। समाज की इस नफरत को लेकर जीने की इच्छा नहीं होती। कभी- कभी सोचती हूँ कि आत्महत्या कर लूँ, पर आप कहते हैं आत्महत्या पाप है। मगर मैं जीऊँ तो कैसे?

🔵 बोलते- बोलते वह फूट- फूट कर रोने लगी। उसके साथ- साथ गुरुदेव भी रोने लगे। मेरे भी आँसू नहीं रुक रहे थे। गुरुदेव ने उससे कहा- चल बेटी मेरे साथ चल। फिर हॉल में सबके बीच आकर वे कहने लगे ‘‘बेटी मैं अपनी बात नहीं कहता, वेद की बात कहता हूँ। तू तो पवित्र गंगा जैसा जीवन जीती है। श्रम करती है, लोक मंगल का कार्य करती है, ब्रह्मचर्य से रहती है। तू साक्षात् गंगा है। जो तेरे दर्शन करेगा- सीधे स्वर्ग को जाएगा और जो यह सब बैठी हैं शृंगार करती हैं, फैशन करती हैं, बच्चे पैदा करती हंै, देश के सामने अनेक प्रकार की समस्याएँ पैदा करती हैं- जो भी इनके दर्शन करेगा, सीधे नरक को जाएगा।’’

🔴 गुरुदेव को इतना क्रोधित होते मैंने कभी नहीं देखा था। वे कह रहे थे ‘‘जो दुखी है उसको और दु:ख देना पाप है। जो यह कहता है कि विधवा को देखने से पाप लगता है वह सबसे बड़ा पापी है। बेटी! तू तो शुद्ध और पवित्र है। उनकी इस बात पर वहाँ बैठी सभी बहिनों ने गर्दन नीची कर ली। थोड़ी देर बाद गुस्सा ठण्डा होने पर उन्होंने उनसे कहा- कहो बेटियों, आपको क्या कहना है? इस पर किसी ने कुछ नहीं कहा। सभी शान्त होकर बैठी रहीं। थोड़ी देर बाद जब उठकर जाने लगीं तो मैंने दरवाजे तक जाकर उनसे कहा- बहनों, गुरुदेव की बातों का बुरा नहीं मानना, वे गुस्से में हैं। लेकिन उनकी बातों पर विचार करना। वे लज्जित होकर बोलीं- भाई साहब, गुरुदेव की बातों का बुरा क्यों मानेंगे। उन्होंने तो सही बात कही है। विधवा तो शुद्ध पवित्र जीवन जीती है। आज उन्होंने हमारी आँखें खोल दीं। आज से हम जब भी किसी विधवा का दर्शन करेंगे, उसमें गंगा माता का दर्शन करेंगे और उसे कोई कष्ट हो, तो उसकी मदद करेंगे। हम दूसरों को भी बताएँगे कि विधवा का दर्शन करने से पाप नहीं होता।

🔵 वे कह रही थीं कि गुरुदेव ने हमारी आँखें खोल दीं। हम सौभाग्यशाली हैं कि ऐसे गुरु हमें मिले। ऐसे गुरु हों तो देश में फैला हुआ अज्ञान शीघ्र ही दूर हो जाए। वह दुखी बहिन भी वहीं खड़ी ये सब बातें सुन रही थी। उसके मुख पर सन्तोष के भाव थे। दु:ख के बादल छँट चुके थे। हल्की सी धूप झिलमिला रही थी।
  
🌹  पं. लीलापत शर्मा की यादोंके झरोख, मथुरा (उ.प्र.)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/won/gw

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 97)

🌹 तीसरी हिमालय यात्रा-ऋषि परम्परा का बीजारोपण

🔴 युग शिल्पी विद्यालय के माध्यम से सुगम संगीत की शिक्षा हजारों व्यक्ति प्राप्त कर चुके हैं और अपने-अपने यहाँ ढपली जैसे छोटे से माध्यम द्वारा संगीत विद्यालय चलाकर युग गायक तैयार कर रहे हैं।

🔵  पृथ्वी अन्तर्ग्रही वातावरण से प्रभावित होती है। उसकी जानकारी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। हर पाँच वर्ष पीछे ज्योतिष गणित को सुधारने की आवश्यकता होती है। आर्यभट्ट की इस विधा को नूतन जीवन प्रदान करने के लिए प्राचीनकाल के उपकरणों वाली समग्र वेधशाला विनिर्मित की गई है और नेपच्यून प्लेटो, यूरेनस ग्रहों के वेध समेत हर वर्ष दृश्य गणित पंचांग प्रकाशित होता है। यह अपने ढंग का एक अनोखा प्रयोग है।

🔴 अब प्रकाश चित्र विज्ञान का नया कार्य हाथ में लिया गया है। अब तक सभी संस्थानों में प्रोजेक्टर पहुँचाए गए थे। उन्हीं से काम चल रहा था। अब वीडियो क्षेत्र में प्रवेश किया गया है। इनके माध्यम से कविताओं के आधार पर प्रेरक फिल्में बनाई जा रही हैं। देश के विद्वानों, मनीषियों, मूर्धन्यों, नेताओं के दृश्य प्रवचन टेप कराकर उनकी छवि समेत संदेश घर-घर पहुँचाए जा रहे हैं। भविष्य में मिशन के कार्यक्रमों का उद्देश्य, स्वरूप और प्रयोग समझाने वाली फिल्में बनाने की बड़ी योजना है, जो जल्दी ही कार्यान्वित होने जा रही है।

🔵 शान्तिकुञ्ज मिशन का सबसे महत्त्वपूर्ण सृजन है ‘‘ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान।’’ इस बहुमूल्य प्रयोगशाला द्वारा अध्यात्म और विज्ञान का समन्वय करने के लिए बहुमूल्य यंत्र उपकरणों वाली प्रयोगशाला बनाई गई है। कार्यकर्ताओं में आधुनिक आयुर्विज्ञान एवं पुरातन आयुर्वेद विधा के ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट हैं। विज्ञान की अन्य विधाओं में निष्णात उत्साही कार्यकर्ता हैं, जिनकी रुचि अध्यात्म परक है। इसमें विशेष रूप से यज्ञ विज्ञान पर शोध की जा रही है। इस आधार पर यज्ञ विज्ञान की शारीरिक, मानसिक रोगों की निवृत्ति में, पशुओं और वनस्पतियों के लिए लाभदायक सिद्ध करने में, वायुमण्डल और वातावरण के संशोधन में इसकी उपयोगिता जाँची जा रही है, जो अब तक बहुत ही उत्साहवर्धक सिद्ध हुई।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/3.4

👉 निराशा एक प्रकार की-नास्तिकता है।

🔴 जो व्यक्ति संध्या के डूबते हुए सूर्य को देखकर दुखी होता है और प्रातःकाल के सुन्दरी अरुणोदय पर विश्वास नहीं करता, वह नास्तिक है। जब रात के बाद दिन आता है, मरण के बाद जीवन होता है, पतझड़ के बाद बसन्त आता है, ग्रीष्म के बाद वर्षा आती है। सुख के बाद दुख आता है, तो क्या कारण है कि हम अपनी कठिनाईयों को स्थायी समझें? जो माता के क्रोध को स्थायी समझता है और उसके प्रेम पर विश्वास नहीं करता, वह नास्तिक है और उसे अपनी नास्तिकता का दण्ड रोग, शक्ति विपत्ति, जलन, असफलता और अल्पायु के रूप में भोगना पड़ता है।

🔵 लोग समझते हैं कि कष्टों के कारण निराशा आती है, परन्तु यह भ्रम है। वास्तव में निराशा के कारण कष्ट आते हैं। जब विश्व में चारों ओर प्रसन्नता, आनन्द, प्रफुल्लता, आनन्द और उत्साह का समुद्र लहलहा रहा है, तो मनुष्य क्यों अपना सिर धुने और पछताये? मधु-मक्खी के छत्ते में से लोग शहद निकाल ले जाते हैं, फिर भी वह निराश नहीं होती। दूसरे ही क्षण वह पुनः शहद इकट्ठा करने का कार्य आरम्भ कर देती है। क्या हम इन मक्खियों से कुछ नहीं सीख सकते? धन चला गया, प्रियजन मर गये, रोगी हो गये, भारी काम सामने आ पड़ा, अभाव पड़ गये, तो हम रोये क्यों? कठिनाइयों का उपचार करने में क्यों न लग जावें।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 ~अखण्ड ज्योति - नव. 1947 पृष्ठ 1
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1947/November/v1.1

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 9 May 2017


👉 आज का सद्चिंतन 9 May 2017


👉 गुरु नानक की सज्जनोचित उदारता

🔵 सिक्ख संप्रदाय के आदि गुरु- गुरु नानक प्रारंभ से ही बडे उदार और दयावान् थे। किसी को कष्ट देना तो वे जानते ही न थे। संतों की सेवा और उनके सत्संग में उन्हें बडा आनंद आता था। जब कभी भी उन्हें इसका अवसर मिलता था तो उसका लाभ अवश्य उठाते थे। उनके इन्हीं गुणों ने उन्हें एक उच्च कोटि का महात्मा बना दिया। उन्होंने अपना सारा जीवन लोगों को सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देने मे लगा दिया।

🔴 एक अच्छे ज्ञानी और संत होने पर भी गुरु नानक ने अपने आवश्यक कर्तव्यों से कभी मुँह नहीं मोडा। उन्हें जो भी काम दिया जाता था उसे करने में कभी संकोच नहीं करते थे। एक बार उनके पिता ने उन्हें खेती का काम करने के लिए नियुक्त किया। गुरु नानक ने उसे खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया। उन्होंने अपने हाथ से खेती का सारा काम करके बडी अच्छी फसल तैयार की। पकने तक फसल की रखवाली करने का काम भी उन्हें सौंपा गया और वे फसल की रखवाली भी करने लगे।

🔵 एक बार कुछ गाएँ आकर फसल खाने लगीं नानक ने उन्हें डाँटा, फटकारा और ललकारा लेकिन गायों ने एक न सुनी और वे सारा खेत खा गई। पिता को पता चला तो वे नानक से बडे नाराज हुए-बोले "तूनै गायों को भगाया क्यों नहीं" नानक ने कहा-"मैंने तो उन्हें बहुत मना किया, डाँटा-ललकारा भी, लेकिन वे इतनी भूखी थीं कि मानी ही नहीं।" पिता ने और डाँटा और कहा-"बेवकूफ अगर वे ललकारने से नहीं भागी तो चार-चार डंडे क्यों नहीं जड दिए" नानक ने तुरंत उदास होकर उत्तर दिया- भला मैं भूखी गौ माताओं को डंडे से मारने का पाप कैसे करता, वे बेचारी खुद तो खेती करती नहीं। आदमियों के ही सहारे रहती हैं। हमारी खेती में भगवान् ने उनका भी अंश रखा होगा तभी तो आकर खा गई।

🔴 पिता ने नानक की अटपटी बातों में एक सार देखा और फिर उसके बाद कुछ नहीं कहा।

🔵 एक बार गुरु नानक खेत रखाते हुए एक पेड की छाया में लेटे हुए थे। लेटे-लेटे उनकी आँख लग गई। तभी  ऊपर से गाँव का एक परिचित व्यक्ति निकला। वह क्या देखता है कि गुरु नानक सो रहे है और उनके सिर पर एक सर्प फन फैलाए पास ही जड़ पर बैठा है। वह इस कौतुक को देखने के लिये थोडा आगे बढ़ा तो आहट पाकर सर्प चला गया। उस आदमी ने नानक को जगाया और सर्प वाली बात नहीं बतलाई, लेकिन इतना जरूर कहा बेटा! ऐसी वैसी जगह बेखबर मत सो जाया करो।

🔴 उस व्यक्ति ने इस पिषय में सुन रक्खा था कि जिसके सिर पर सर्प फन की छाया कर देता है, वह बडा भाग्यवान् और भविष्य में बडा़ आदमी होता है। उसने यह घटना नानक के पिता को बतलाकर कहा- ''भाई अपने लड़के से ऐसे-वैसे काम न लिया करो। यह बडा नक्षत्री आदमी है। संसार में बडा यश पायेगा। इसे किसी अच्छे काम में लगाओ।''

🔵 नानक के पिता ने उन्हें रुपये दिए और कहा- 'तू बडा़ नक्षत्री बतलाया जाता है। आ कुछ कार-रोजगार करके धन कमा तो जानूँ कि तू नक्षत्री है। भाग्यवान् होगा तो खूब दौलत कमाकर बड़ा आदमी बन जायेगा। गुरुनानक पैसा लेकर रोजगार करने चले तो रास्ते में सबसे पहले उनकी भेंट भूखे-नंगे भिखमगों से हो गई। नानक को उनकी दशा पर बड़ी दया आई और उन्होंने उन गरीबों को भोजन कराया और कपड़े मोल ले दिए। जो कुछ पैसा बचा उसे लेकर आगे बढे तो अनेक साधु-संतों का साक्षात्कार हो गया। उन्होंने उनका सत्संग किया और उनकी बातों तथा शिक्षण में बडा सार पाया। नानक ने बहुत समय तक जी भर उनका सत्संग किया और सारा पैसा उनकी सेवा में खर्च कर दिया। जब नानक सत्संग का लाभ उठाकर घर लौटे तो बिल्कुल खाली हाथ थे।

🔴 पिता ने पूछा- 'बता क्या रोजगार किया! लाभ की आशा है या नहीं ?'' नानक ने बडे विश्वास से और हर्ष के साथ उत्तर दिया-रोजगार तो मैंने किया जिसका अवसर जल्दी-जल्दी किसी को मिलता नहीं और अगर मिलता भी है तो दुर्भाग्य से उसका साहस नहीं पडता। जहाँ तक लाभ की बात है, सो तो लोक से परलोक तक और जन्म से जन्मांतर तक लाभ ही लाभ है।

🔵 पिता की कुछ समझ में नहीं आया बोले- साफ-साफ बतला क्या कमाई की, और ला कमाई कहाँ है ?" नानक ने सारी घटना बतला दी तो पिता ने हताश होकर कहा-राम जाने तू कैसा नक्षत्री है, नानक के इन्हीं गुणों ने उन्हें एक विख्यात संत बनाकर संसार से तार दिया।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 159, 160

👉 प्रज्ञावतार की पुण्य-वेला

🔵 अन्धकार जब गहराता चला जाए, तो इसकी सघनतम स्थिति के अतिसमीप ही प्रभातकाल की ब्रह्मवेला भी जुड़ी रहती है। गर्मी की अतिशय तपन बढ़ चलने पर वर्षा की संभावना का अनुमान लगाया जा सकता है और वह सार्थक भी होता है। चारों ओर झुलस गयी धरती हरियाली के कवच से भर जाती है, मानो एक अप्रत्याशित चमत्कार-सा हुआ हो। दीपक जब बुझने को होता है, तो उसकी लौ जोर-जोर से चमकती है, लपलपाने लगती है। मरण की वेला अतिनिकट होने पर भी रोगी में हलकी-सी चेतना अवश्य लौट आती है और वह असामान्य रूप से लम्बी-लम्बी साँसे लेने लगता है। सभी जानते हैं कि मृत्यु की वेला समीप आ गयी। मरण के पूर्व कुछ ही पहले चींटी के पर निकलने लगते हैं।

🔴 उपर्युक्त उदाहरण आज की युग-सन्धि की वेला एवं प्रज्ञावतार के आगमन के पुण्य-प्रयोजन की व्याख्या हेतु दिए गए हैं। इन दिनों असुरता जीवन-मरण का संघर्ष कर रही है। उसे समाप्त होना ही है, मात्र उसका अंतिम चरण ‘‘हताशा की स्थिति में एक उग्र रूप और’’-इस परिप्रेक्ष्य में ही देखा जाना चाहिए। अनीति की थोड़ी मात्रा नीतिवानों के सामने चुनौती बनकर पहुँचती और उन्हें अनौचित्य से लड़ पड़ने की उत्तेजना एवं पौरुष प्रदान करती है। जन-जन को दुष्टता का पराभव देखने का अवसर मिलता है। जागरूकता, आदर्शवादिता और साहसिकता का उभार होता ही तब है जब अन्याय के असुर की दुरभिसंधियाँ देवत्व में आक्रोश का आवेश भरती हैं। इस दृष्टि से अन्याय का अस्तित्व दुखदायी होते हुए भी अन्ततः उत्कृष्टता के प्रखर बने रहने की संभावनाएँ प्रशस्त बनाए रखता है।
  
🔵 किन्तु यदा-कदा परिस्थितियाँ ऐसी भी आती हैं, जब संत, सुधारक और शहीद अपने पराक्रम-पराभव का परिमाण भारी देखते हैं एवं विपन्नता से लड़ते-लड़ते भी सत्परिणाम की संभावना को धूमिल देखते हैं। ऐसे अवसरों पर अवतार का पराक्रम उभरता है और ऐसी परिस्थितियाँ विनिर्मित करता है, जिससे पासा पलटने, परिस्थिति उलटने का वर्तमान में इसके महातथ्य का प्रत्यक्ष स्पष्टीकरण सामने है। युग परिवर्तन की इस पुण्य-वेला में प्रज्ञावतार की प्रखर भूमिका संपादित होते हुए ज्ञानवानों की पैनी दृष्टि सरलतापूर्वक देख सकती है।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 62

👉 आत्मचिंतन के क्षण 9 May

🔴 लोग कहें कि तुम्हारे गुरु से बड़ा कोई ज्ञानी है, तो मान लेना। यदि कोई कहे कि तुम्हारे गुरु से बड़ा कोई दूसरा तपस्वी  और सिद्ध-समर्थ हैं, तो भी मान लेना; पर यदि कोई कहे कि तुम्हारे गुरु से ज्यादा प्यार करने वाला है, तो कभी मत मानना। मेरा प्यार तुम लोगों के साथ हमेशा रहेगा, मेरे शरीर के रहने पर और शरीर के न रहने के बाद भी।                           

🔵 यदि ढीले मन के, अस्थिर विचारों के, अधूरे विष्वास के अपने परिजन हैं; तो वे आसानी से बहक जायेंगे। मति भ्रम में उलझकर इस युग निर्माण के अलभ्य अवसर से हाथ खींच लेंगे। कोई-कोई तो सहयोग छोड़कर विरोधी भी बन जायेंगे; किन्तु जो सच्चे परिजन होंगे, वे आड़े वक्त में काम आने वाले सच्चे मित्रों की तरह अन्त तक मोर्चे पर डटे रहेंगे।                                                           

🔴 मैं उन्हें ढूँढ़ रहा हूँ और हमेशा ही उनको ढूँढ़ता रहूँगा, जिनमें प्रकाश के लिए प्यास है। जो अपने जीवन के अधूरेपन को आनन्द से भर देना चाहते हैं। जो झूठेपन से थक और ऊब चुके हैं और सत्य को पाना चाहते हैं। जो मृत जीवन से निराश हैं और अमृत को पाना एवं पीना चाहते हैं। उन सभी को मैं आमंत्रण देता रहता हूँ, बुलावा भेजता रहता हूँ। उन्हें पुकारता और तलाशता रहता हूँ। उनके प्राणों को झकझोरता हूँ, नींद से जगाता हूँ। उनसे कहता हूँ कि अरे ! तुम इस कदर परेशान क्यों हो? मैं तुम्हें निमंत्रित करता हूँ आलोक के लिए, आनन्द के लिए और अमृत के लिए। मेरे इस निमंत्रण को स्वीकार कर लो। मैं तुम्हें वह सब कुछ अनायास ही दे दूँगा, जिसे तुम्हारी जीवात्मा जन्म-जन्मांतर से तलाश रही है।      

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 समय का सदुपयोग करें (भाग 25)

🌹  समय-संयम सफलता की कुञ्जी है

🔴 सुख-शान्ति, सन्तोष, सफलता एवं स्वास्थ्य आदि के पारितोषिक असामयिक जीवन-क्रम वालों से कोसों दूर रहा करते हैं। जिन्दगी जीने के लिए मिली है खो डालने के लिये नहीं। समय-सम्मत व्यवस्था के अभाव में इस परम दुर्लभ मानव-जीवन को न तो ठीक से किया जा सकता है और न इसका कोई लाभ ही उठाया जा सकता है। यह सम्भव तभी हो सकता है जब जीवन का प्रत्येक क्षण किसी निश्चित कर्त्तव्य के लिये निर्धारित एवं जागरुक हों।

🔵 असमय सोने-जागने, खाने-पीने और काम करने वाले आजीवन आरोग्य के दर्शन नहीं कर सकते। वे सदा सर्वदा शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक अथवा आध्यात्मिक किसी न किसी व्याधि से पीड़ित रहेंगे। उनकी शक्ति में से कुछ को तो उनकी अव्यवस्था नष्ट कर देगी और शेष का व्याधियां शोषण कर लेंगी।

🔴 समय-संयम के साथ अपना हर काम करने वाले मनुष्यों का जीवन कभी असफल नहीं हो सकता है। भले ही परिस्थितिवश वे संसार में कोई अनुकरणीय कार्य न भी कर पायें, तब भी उनका जीवन असफल नहीं कहा जा सकता। सुख-शांति पूर्वक एक प्रिय जिन्दगी जी लेना स्वयं ही एक बड़ी सफलता है। सफलता का मान-दंड कोई बड़ा काम ही नहीं है, उनका सच्चा मानदण्ड है—जीने की कला जो सन्तोषपूर्वक जिन्दगी को कथनीयता के साथ जी सका है, वह निःसन्देह अपने जीवन में सफल हुआ है। एक छोर से दूसरे छोर तक जिसका जीवन एक व्यवस्थित कार्यक्रम की तरह स्निग्ध गति से न चल कर ऊबड़-खाबड़ गिरता-पड़ता और उलझता सुलझता चलता है, उसके जीवन को असफल मान लेना ही न्याय-संगत होगा।

🔵 समय पर हर काम करने वालों की सारी शक्तियां उपभोग में आने पर भी अक्षय बनी रहती हैं। समय पर काम करने का अभ्यास एक सजग प्रहरी की तरह ही होता है, जो किसी भी परिस्थिति में मनुष्य को अपने कर्त्तव्य का विस्मरण नहीं होने देता। समय आते ही सिद्ध किया हुआ अभ्यास उसे निश्चित कार्य की याद दिला देता है और प्रेरणापूर्वक उसमें लगा भी देता है? समय आते ही उक्त कार्य योग्य शक्तियों में जागरण एवं सक्रियता आ जाती है, जिससे मनुष्य निरालस्य रूप से अपने काम से लगकर उसे निर्धारित समय में ही पूरा कर लेता है। कार्य एवं कर्त्तव्यों की पूर्णता ही जीवन की पूर्णता है, जो कि बिना समय, संयम, एवं व्यवस्थित और क्रियाशीलता के प्राप्त नहीं हो सकती।

🌹 अगले अंक में समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आत्म-ज्ञान को प्राप्त करो। (भाग 1)

🔵 हे सौम्य! हे सत्यकाम! ‘मैं कौन हूँ’ यह मालूम कर। अपने भीतर टटोल। इस संसार व शरीर की वास्तविकता को बूझ। जैसे ही तू जाग जाता है तेरा स्वप्न झूठा हो जाता है। इसी प्रकार जब तुझे आत्म ज्ञान हो जायगा तब यह संसार असत्य हो जायगा- अदृश्य हो जायगा। संसार केवल मन की उपज है। इसका अस्तित्व केवल सम्बन्ध रखता हुआ, परिवर्तनशील एवं परतन्त्र तथा दृष्टि विषयक और निर्भर रहने वाला है। यह ब्रह्म से निकला है, उसी में रहता है तथा अन्त में उसी में मिल जाता है।

🔴 हे सत्यकाम! तेरा प्रथम कर्त्तव्य अपनी आत्मा को पहचानना है। यह आत्मा अनन्त है तथा आत्मप्रकाश है। इस तुच्छ अपनेपन को नष्ट कर दें और सच्चिदानन्द आत्म से संपर्क रख। शरीर, स्त्री, सन्तान, तथा धन में जो आसक्ति है उसका त्याग कर दे। इच्छाओं स्वार्थ व ‘अपनेपन’ को तिलाँजलि दे दे तथा उस पूर्णज्ञान ‘निर्विकल्प समाधि’ को प्राप्त कर जिसमें न कोई विषय है, न उद्देश्य, न प्रसन्नता है, न दुःख, न सर्दी है न गर्मी, न भूख है न प्यास। तब तू सर्वश्रेष्ठ आनन्द, अनन्त शान्ति, असीम ज्ञान तथा अमर गति का भोग करेगा।

🔵 तू अज्ञान के आवरण से कृत्रिम निद्रा के वशीभूत है। तू आत्म ज्ञान द्वारा कृत्रिम निद्रा से जाग और ‘अमर गति’ को जान। तू कब तक माया के फन्दे में फंसा रहना चाहता है। बहुत हो चुका। अब तू इन बन्धनों को तोड़। अविधा की जंजीर को तोड़ दे-उन पाँच पर्दों को फाड़ दे और इस हाड़-माँस के पिंजरे से विजयी होकर निकल आ। मेमने की भाँति ‘मैं-मैं’ न कर, बल्कि ओऽम्-ओऽम्-ओऽम् की गर्जना कर, ओऽम्-ओऽम्-ओऽम् का स्मरण कर, स्वीकार कर, सिद्ध कर और पहचान। अपनी आत्मा को पहचान और इसी क्षण बन्धन से मुक्त हो जा। तू ही सम्राटों का सम्राट है- तू ही सर्वश्रेष्ठ है। उपनिषदों के अन्तिम शब्द ध्यान में ला। ‘तत् त्वं असि’- ‘तू’ ही ‘वह’ है। मेरे प्रिय सत्यकाम! ‘उसे’ जान- ‘उसे’ जानना ही ‘वह’ बन जाना है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 स्वामी शिवानन्द जी
🌹 अखण्ड ज्योति सितम्बर 1942 पृष्ठ 2
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1949/September/v1.2