बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

👉 आज का सद्चिंतन 23 Feb 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 23 Feb 2017


👉 तुम सदा रहते साथ हमारे

🔴 आज से करीब आठ वर्ष पहले की बात है। मैं झारखण्ड राज्य के भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा की जिला संयोजक थी। भा.सं.ज्ञा.परीक्षा सम्पादित कराने हेतु मुझे अक्सर झारखण्ड के कई जिलों का दौरा करना पड़ता था। एक बार मैं झींकपानी चाईबासा होकर वापस जमशेदपुर आ रही थी। अचानक एक जगह आकर हमारी बस रुक गई। आगे का रास्ता जाम था। बस कण्डक्टर ने बताया गाड़ी आगे नहीं जाएगी। आप लोगों को जाना हो, तो निजी वाहन, ऑटो रिक्शा आदि से जा सकते हैं। पता चला आज सरहूल है। यह इस क्षेत्र का प्रसिद्ध त्योहार है, जिसमें हजारों- हजार नर- नारी इकट्ठे होकर नाचते- गाते, खुशियाँ मनाते हैं। देखा, सड़क के दोनों ओर लगभग पाँच- सात हजार लोग अपने पारम्परिक वेश- भूषा में पंक्तिबद्ध खड़े होकर एक दूसरे की कमर पकड़कर नृत्य कर रहे हैं। सभी का शरीर एक साथ एक ताल पर आगे- पीछे, दाएँ- बाएँ झुक रहे थे।

🔵 झारखण्ड की संस्कृति की झाँकी को प्रस्तुत करता नृत्य- उत्सव का वह अपूर्व दृश्य भी मुझे बाँध न सका। बार- बार घिरती हुए साँझ की ओर देखती और मन कहता जल्दी घर पहुँचना है। बहुत लोग बस से उतर- उतर कर पैदल ही अपने रास्ते की ओर चल दिए। बस के कर्मचारी वहीं विश्राम की तैयारी करने लगे। हमें बता दिया गया कि यह कार्यक्रम अभी तीन- चार घण्टे तक चलेगा। मजबूर होकर मुझे भी उतर जाना पड़ा।

🔴 मुझे उस स्थान के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। लोगों से पूछताछ करने पर पता चला कि उस स्थान को हाता के नाम से जाना जाता है। मुझे किसी ने बताया जमशेदपुर जाने के लिए पश्चिम की ओर चलना होगा। इसी आधार पर मैं अपने गन्तव्य की ओर बढ़ने लगी। धीरे- धीरे अँधेरा घिर आया। सुनसान सड़क पर इक्के- दुक्के लोग ही चल रहे थे। सड़क के दोनों ओर क्या है, आगे वाले रास्ते में खाई है या खन्दक, रोड़ा है या कीचड़ यह भी नहीं दीखता। मैं अनायास कदम बढ़ाती जा रही थी। बगल की कँटीली झाड़ियों से कई बार पाँव भी जख्मी होते जा रहे थे, मगर मेरे मन में केवल एक बात आ रही थी कि समय रहते घर पहुँचना है। एक अनजाना सा भय मुझे दबाए जा रहा था। अकेली औरत, सुनसान सड़क, क्या कुछ नहीं हो सकता था। लेकिन मुझे घर पहुँचने की जल्दी थी।
  
🔵 अचानक मैंने ख्याल किया कि मेरे आगे- आगे सफेद धोती पहने लम्बे कद के कोई पुरुष चल रहे हैं। उनके कमर के ऊपर का हिस्सा नहीं दीख रहा। मुझे भय भी लग रहा था मगर उन्हीं के साथ- साथ कदम मिलाती हुई पीछे- पीछे चली जा रही थी। मुझे लग रहा था आगे वाले व्यक्ति के कदम तीन- तीन फीट पर पड़ रहे हैं। पता नहीं मैं कैसे उस गति से चल रही थी। उस समय यह सब सोचने के लिए भी समय नहीं था। जैसे मेरे कदम हवा में पड़ रहे थे। कष्ट की अनुभूति भी नहीं हो रही थी। करीब आधे- पौन घण्टे तक इसी तरह चलती गई। इसके बाद शहरी इलाका दीखने लगा। दुकानों की झिलमिल रोशनी देख मन में साहस आया। इसके बाद वह व्यक्ति भी न जाने कब आँखों से ओझल हो गया।

🔴 एक टेलीफोन बूथ पर जाकर मैंने फोन किया। घर में सूचना दी। विलम्ब होने का कारण बताया। वहीं पूछने पर पता चला उस स्थान का नाम परसूडीह है। वहाँ से ऑटो रिक्शा लेकर मैं बस स्टैण्ड गई, जहाँ से साकची की बस मिलने वाली थी।

🔵 जब घर पहुँची और सब हाल बताया, तो सभी विस्मय से अवाक रह गए। कहा- हाता से परसूडीह तुम इतनी जल्दी पहुँची कैसे? वह तो २५- ३० किलोमीटर का रास्ता है। मुझे आगे- आगे चलने वाले उस मार्गदर्शक की याद आई। श्रद्धा से नतमस्तक हो गई मैं। गुरुदेव कई बार कहा करते थे- बेटा, तुम मेरे काम में एक कदम भर बढ़ाओ, मैं तुम्हें सफलता के रास्ते दस कदम बढ़ा दूँगा।

🌹 सुषमा पात्रो टाटानगर (झारखण्ड)    
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/Wonderfula

👉 महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण (भाग 2)

🌹 सर्वोपरि उपलब्धि-प्रतिभा  

🔴 मनुष्य ने सृष्टि के समस्त प्राणियों की तुलना में वरिष्ठता पाई है। शरीर-संरचना और मानसिक-मस्तिष्कीय विलक्षणता के कारण उसने सृष्टि के समस्त प्राणियों की तुलना में न केवल स्वयं को सशक्त, समुन्नत सिद्ध किया है; वरन् वह ऐसी सम्भावनाएँ भी साथ लेकर आया है, जिनके सहारे अपने समुदाय को, अपने समग्र वातावरण एवं भविष्य को भी शानदार बना सके। यह विशेषता प्रयत्नपूर्वक उभारी जाती है। रास्ता चलते किसी गली-कूचे में पड़ी नहीं मिल जाती। इस दिव्य विभूति को प्रतिभा कहते हैं। जो इसे अर्जित करते हैं, वे सच्चे अर्थों में वरिष्ठ-विशिष्ट कहलाने के अधिकारी बनते हैं, अन्यथा अन्यान्य प्राणी तो, समुदाय में एक उथली स्थिति बनाए रहकर किसी प्रकार जीवनयापन करते हैं।        

🔵 मनुष्य, गिलहरी की तरह पेड़ पर नहीं चढ़ सकता। बन्दर की तरह कुलाचें नहीं भर सकता। बैल जितनी भार वहन की क्षमता भी उसमें नहीं है। दौड़ने में वह चीते की तुलना तो क्या करेगा, खरगोश के पटतर भी अपने को सिद्ध नहीं कर सकता। पक्षियों की तरह आकाश में उड़ना उसके लिए सम्भव नहीं, न मछलियों की तरह पानी में डुबकी ही लगा सकता है। अनेक बातों में वह अन्य प्राणियों की तुलना में बहुत पीछे है; किन्तु विशिष्ट मात्रा में मिली चतुरता, कुशलता के सहारे वह सभी को मात देता है और अपने को वरिष्ठ सिद्ध करता है।

🔴 व्यावहारिक जीवन में मनुष्य अन्य प्राणि-समुदाय की तुलना में अनेक दृष्टियों से कहीं आगे है, वह उसी की नियति है। अधिकांश मनुष्यों को अन्य प्राणियों की अपेक्षा अधिक सुविधा-सम्पन्न जीवन-यापन करते हुए देखा जाता है। इतने पर भी सम्भावना यह भी है कि वह इन उपलब्धियों की तुलना में और भी अधिक समर्थता और महत्ता प्राप्त कर सके। पर शर्त एक ही है कि उस अभिवर्धन के लिए वह स्वयं अतिरिक्त प्रयास करे। कमियों को दूर करें और जिसकी नितान्त आवश्यकता है, उसे पाने-कमाने के लिए अधिक जागरूगतापूर्वक, अधिक तत्परता एवं तन्मयता बरते।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सत्य मेरा जीवन-मंत्र

🔴 दादा मावलंकर जिस अदालत के वकील थे उसका मजिस्ट्रेट उनका कोई घनिष्ठ मित्र था। यों वकालत के क्षेत्र में उन्हें पर्याप्त यश और सम्मान भी बहुत मिला था। संपत्ति भी उनके पास थी, पर यह सब कुछ उनके लिये तब तक था, जब तक उनके सांच को आँच न आने पाती थी। वे कोई झूठा मुकदमा नहीं लेते थे और सच्चाई के पक्ष में कोई भी प्रयत्न छोड़ते नहीं थे।

🔵 यह उदाहरण उन सबके लिए आदर्श है जो यह कहते हैं कि आज का युग ही ऐसा है झूठ न बोलो, मिलावट न करो तो काम नहीं चलता। सही बात तो यह है कि झूठे, चापसूस और अपना स्वार्थ सिद्ध करने वाले के जीवन सदैव टकराते रहते है।

🔴 विषाद, क्षोभ, ग्लानि, अपमान, अशांति और पश्चाताप की परिस्थितियाँ बनावटी लोगों के पास ही आती हैं। सच्चे व्यक्तियों के जीवन में बहुत थोडी अशांति, अव्यवस्था और तंगी रहती है। अधिकांश तो शान और स्वाभिमान का ही जीवन जीते है।

🔵 वैसे ही मावलंकर जी भी थे। एक बार उनके पास बेदखली के लगभग ४० मुकदमे आए। मुकमे लेकर पहुँचने वाले लोग जानते थे कि कलक्टर साहब मावलंकर जी के मित्र है। इसलिये सुनिश्चित जीत की आशा से वे भारी रकम चुकाने को तैयार थे। मावलंकर चाहते तो वैसा कर भी सकते थे, किंतु उन्होंने पैसे का रत्तीभर भी लोभ न कर सच्चाई और मनुष्यता का ही बडप्पन रखा।

🔴 सभी दावेदारों को बुलाकर उन्होंने पूछा देखो भाई आज तो आप लोगों ने सब कुछ देखसमझ लिया। आप लोग घर जाओ। कल जिनके मुकदमे सही हों वही मेरे पास आ जाना।

🔵 दूसरे दिन कुल एक व्यक्ति पहुँचा। मावलंकर जी ने उस एक मुकदमे को लिया और ध्यान देकर उसकी ही पैरवी की। वह व्यक्ति विजयी भी हुआ। शेष ने बहुत दबाव डलवाया पर उन्होंने वह मुकदमे छुए तक नहीं।

🔴 आप जानते होंगे कि गाँधी जी भी प्रारंभ में बैरिस्टर थे। उनका जीवनमंत्र था- "सच्चाई का समर्थन और उसके लिए लड़ना।" झूठ और छल से जिस तरह औरों को घृणा होती है, उन्हें भी घृणा थी पर ऐसी नहीं कि स्वार्थ का समय आए तो उनकी निष्ठा डिग जाए। सत्य वही है जो जीवन में उतरे तो अपने पराये, हानि-लाभ, मान-अपमान का ध्यान किये बिना निरंतर सखा और मित्र बना रहे।

🔵 जब गांधी जी अफ्रीका मे थे तब उन्हें एक मुकदमा मिला। लाखों की संपत्ति का मुकदमा था। मुकदमा चलाने वाला पक्ष जीत गया। गांधी जी के काफी बडी रकम फीस में मिली।

🔴 इस बीच गाँधी जी को पता चल गया कि मुकदमा झूठा था तब वे एक बडे वकील के साथ मुकदमा करते थे। उन्होंने जाकर कहा- मुकदमा गलत हो गया है। सच्चे पक्ष को हम लोगों ने बुद्धि-चातुर्य से हराया, यह मुझे अच्छा नहीं लगता न यह मानवता के सिद्धंतों के अनुरूप ही है। जिसकी संपत्ति है उसी के मिले, दूसरा अनधिकार चेष्टा क्यों करे ''

🔵 वकील बहुत गुस्सा हुआ और बोला यह वकालत है महाशय इसमें सच्चाई नहीं चलती। सच्चाई ढूँढो़गे तो भूखों मरोगे।"

🔴 गाँधी जी न अपनी बात से डिगे न भूखे मरने की नौबत आई। उनकी निष्ठ ने उन्हें उपर ही उठाया। सारी दुनिया का नेता बना दिया। उन्होंने वह मुकदमा फिर अदालत में पेश कर दिया। सारी बात जज को समझायी। जज ने मामला पलट दिया और अंत में सत्य पक्ष की ही जीत हुई। आर्थिक लाभ भले ही न हुआ हो पर उससे उनकी प्रतिष्ठा को आँच न आई।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 42, 43

👉 सच्चा जन नेता

🔴 रुस के जन नेता लेनिन पर एक बार उनके शत्रुओं ने घातक आक्रमण किया और वे घायल रोग शय्या पर गिर पड़े। अभी ठीक तरह अच्छे भी नहीं हो पाये थे कि एक महत्वपूर्ण रेलवे लाइन टूट गई। उसकी तुरंत मरम्मत किया जाना आवश्यक था। काम बड़ा था फिर भी जल्दी पूरा हो गया। 
 
🔵 काम पूरा होने पर जब हर्षोत्सव हुआ तो देखा कि लेनिन मामूली कुली-मजदूरों की पंक्ति में बैठे हैं। रुग्णता के कारण दुर्बल रहते हुए भी लट्ठे ढोने का काम बराबर करते रहें और अपने साथियों में उत्साह की भावना पैदा करते रहे।
 
🔴 आश्चर्यचकित लोगों ने पूछा-''आप जैसे जन-नेता को अपने स्वास्थ्य की चिंता करते हुए इतना कठिन काम नहीं करना चाहिए था।'' लेनिन ने हँसते हुए कहा-"जो इतना भी नहीं कर सके उसे जन-नेता कौन कहेगा?''

🌹 प्रज्ञा पुराण भाग 2 पृष्ठ 16

👉 महानता से नाता जोड़ने की सूझबूझ

🔴 महानता के साथ सम्पर्क साधकर उस सहयोग का सुयोग पा लेना एक ऐसा अप्रत्याशित सौभाग्य है, जो कभी-कभी मनुष्य को मिलता है। ऐसे अवसर सदा-सर्वदा किसी को नहीं मिलते। पारस पत्थर को स्पर्श कर काले कुरूप और सस्ते मोल वाले लोहे का सोने जैसी गौरवास्पद बहुमूल्य धातु में बदल जाना सम्पर्क का परिणाम है। स्वाति की बूँदों से लाभान्वित होने पर सीप जैसी उपेक्षित इकाई को मूल्यवान मोती प्रसव करने का श्रेय मिलता है। पेड़ से लिपट कर चलने वाली बेल उसी के बराबर ऊँची जा पहुँचती और अपनी उस प्रगति पर गर्व करती है।

🔵 अपने बलबूते वह मात्र जमीन पर थोड़ी दूर रेंग ही सकती थी, किन्तु उसकी दुर्बल काया को देखकर इतने ऊँचे चढ़ जाने की बात साधारण बुद्धि की समझ में नहीं आती। पेड़ का सान्निध्य और लिपट पड़ने का पुरुषार्थ जब सोना में सुहागा जैसे समन्वय बनाता है, तो उससे महान पक्ष की कोई हानि नहीं होती, पर दुर्बल पक्ष को अनायास ही दैवी वरदान जैसा लाभ मिल जाता है। समर्पण के सामीप्य को महानता के साथ जुड़ने के ये कुछ उदाहरण हैं जो बताते हैं कि व्यक्ति के लिए वरेण्य क्या है।

🔴 दैवी प्रयोजनों में यदि क्षुद्र से जीव भी तनिक सा सहयोग करें तो दैवी सहायता अपरिमित परिमाण में पाते हैं। बन्दरों की समुद्र पर पुल बनाने की उदार श्रमशीलता एवं गिलहरी की बालू से समुद्र को पाटने की निष्ठा ने उन्हें ऐतिहासिक बना दिया। सुग्रीव के सहयोगी खोह-कन्दरा में आश्रय हेतु भटकने वाले हनुमान जब श्रीराम के सहयोगी बन गये तो पर्वत उठाने, समुद्र लांघने, लंका जलाने जैसा असम्भव पराक्रम दिखाकर युद्ध में जीत का निमित्त बन राम पंचायतन का एक अंग बन गए। अर्जुन-भीम वे ही थे, जिनने द्रौपदी को निर्वसन होते आँखों से देखा व वनवास के समय पेट भरने और जान बचाने के लिए जिन्हें बहुरूपिए बन कर दिन गुजारने पड़े थे। श्रीकृष्ण रूपी महान् सत्ता को अपनाने वाली उनकी बुद्धिमता ने उन्हें महाभारत के, विराट भारत के निर्माण का श्रेयाधिकारी बना दिया।

🔵 यह सुनिश्चित तथ्य है कि जिस किसी पर भगवत्कृपा बरसती है, वह महानता से अपना नाता जोड़ने की सूझबूझ-सत्प्रेरणा के रूप में ही बरसती है। आज की विषम परिस्थितियों में यदि यह तथ्य हम सब भी सीख-समझ कर महानता को अपना सकें, तो निश्चित उस श्रेय को प्राप्त करेंगे, जो प्रज्ञावतार की सत्ता इस सन्धिकाल की विषमवेला में अनायास ही हमें देना चाहती है।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 19

👉 आत्मचिंतन के क्षण 23 Feb 2017

🔴 बुराई, भ्रष्टाचार, अपराधों के सम्बन्ध में हमारी शिकायतें दिनों दिन बढ़ती जा रही हैं। प्रतिदिन एक बँधे हुए ढर्रे की तरह हम नित्य ही इस सम्बन्ध में टीका टिप्पणी करते हैं, तरह-तरह की आलोचनायें करते हैं। कभी सरकार को दोष देते हैं तो कभी प्रशासन व्यवस्था की छीछालेदार करते हैं। कभी किन्हीं व्यक्तियों को इसके लिए जिम्मेदार ठहराते हैं। इस तरह की शिकायतें एक सामान्य व्यक्ति से लेकर उच्च-स्थिति के लोगों तक से भी सुनी जा सकती हैं। इनमें बहुत कुछ ठीक भी हो सकती हैं। लेकिन कभी हमने यह भी सोचा है कि इनके लिए हम स्वयं कितने जिम्मेदार हैं।

🔵 बुराइयों को मिटाने के लिए हमारा सर्व-प्रथम कर्तव्य है-हम दूसरों के साथ ऐसा व्यवहार न करें, जिसे हम स्वयं अपने लिए न चाहते हों। भगवान मनु ने इसी तथ्य का प्रतिपादन करते हुए अपनी प्रजा को बताया था- “आत्मनः प्रतिकूलिति परेषाँ न समाचरेत्” जिस बात को तुम अपने लिए नहीं चाहते, उसे दूसरों के लिए मत करो।

🔴 स्मरण रहे, सहज मौन ही हमारे ज्ञान की कसौटी है। “जानने वाला बोलता नहीं और बोलने वाला जानता नहीं।” इस कहावत के अनुसार जब हम सूक्ष्म रहस्यों को जान लेते हैं तो हमारी वाणी बन्द हो जाती है। ज्ञान की सर्वोच्च भूमिका में सहज मौन स्वयमेव पैदा हो जाता है। स्थिर जल बड़ा गहरा होता है। उसी तरह मौन मनुष्य के ज्ञान की गम्भीरता का चिन्ह है। वाचालता पांडित्य की कसौटी नहीं है, वरन् गहन गम्भीर मौन ही मनुष्य के पण्डित, ज्ञानी होने का प्रमाण है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 18)

🌹 विचारों का व्यक्तित्व एवं चरित्र पर प्रभाव

🔴 बहुत बार देखने में आता है कि डॉक्टर रोगी के घर जाता है, और उसे खूब अच्छी तरह देख-भाल कर चला जाता है। कोई दवा नहीं देता। तब भी रोगी अपने को दिन भर भला-चंगा अनुभव करता रहता है। इसका मनोवैज्ञानिक कारण यही होता है कि वह बुद्धिमान डॉक्टर अपने साथ रोगी के लिए अनुकूल वातावरण लाता है और अपनी गतिविधि से ऐसा विश्वास छोड़ जाता है कि रोगी की दशा ठीक है, दवा देने की कोई विशेष आवश्यकता नहीं है। इससे रोगी तथा रोगी के अभिभावकों का यह विचार दृढ़ हो जाता है कि रोग ठीक हो रहा है। विचारों का अनुकूल प्रभाव जीवन तत्व को प्रोत्साहित करता है और बीमार की तकलीफ कम हो जाती है।

🔵 कुछ समय पूर्व कुछ वैज्ञानिकों ने इस सत्य का पता लगाने के लिए कि क्या मनुष्य के शरीर पर आन्तरिक भावनाओं का कोई प्रभाव पड़ता है, एक परीक्षण किया। उन्होंने विभिन्न प्रवृत्ति के आदमियों को एक कोठरी में बन्द कर दिया। उसमें से कोई क्रोधी, कोई विषयी और कोई नशों का व्यसनी था। थोड़ी देर बाद गर्मी के कारण उन सबको पसीना आ गया। उनके पसीने की बूंदें लेकर अलग-अलग विश्लेषण किया गया और वैज्ञानिकों ने उसके पसीने में मिले रासायनिक तत्वों के आधार पर उसके स्वभाव घोषित कर दिये जो बिल्कुल ठीक थे।

🔴 मानसिक दशाओं अथवा विचार-धाराओं का शरीर पर प्रभाव पड़ता है, इसका एक उदाहरण बड़ा ही शिक्षा-प्रद है— एक माता को एक दिन किसी बात पर बहुत क्रोध हो गया। पांच मिनट बाद उसने उसी आवेश की अवस्था मैंने अपने बच्चे को स्तनपान कराया और एक घण्टे के भीतर ही बच्चे की हालात खराब हो गई और उसकी मृत्यु हो गई। शव परीक्षा के परिणाम से विदित हुआ कि मानसिक क्षोभ के कारण माता का रक्त तीक्ष्ण परमाणुओं से विषैला हो गया और उसके प्रभाव से उसका दूध भी विषाक्त हो गया था, जिसे पी लेने से बच्चे की मृत्यु हो गई।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 26)

🌹 उदारता अपनाई ही जाए  

🔵 सभ्यता, अनुशासन के परिपालन में है। अपने को नीतिमत्ता से अनुबन्धित किये रहें और दूसरों के साथ उदार व्यवहार बरतें, यही है मानवी गरिमा के साथ जुड़ा हुआ शालीन शिष्टाचार। इसके अन्तर्गत यह लोकाचार भी आता है कि घर में बालकों, वृद्धों असमर्थों की व्यवस्था पहले बनाई जाये, इसके उपरान्त अपनी ललक लिप्सा को आगे बढ़ने दिया जाये।      

🔴 जिन्हें अपना ही पेट सब कुछ दीखता है, वे उदारता बरतना तो दूर, बुरे लोगों की तरह निष्ठुरता बरतने में भी नहीं चूकते। ऐसों को दूसरों का अधिकार हरण करते हुये लज्जा, संकोच, भय जैसा भी कुछ अनुभव नहीं होता। ऐसी जड़ता अपनाने पर तो, किसी को मानवी गरिमा के क्षेत्र में भी प्रवेश करने का अवसर कभी नहीं मिलता।      

🔵 इन दिनों दैत्य की तूती हर क्षेत्र में बोलती हैं। हर किसी को खाने की ही नहीं, कुरतने-बर्बाद करने की भी सनक चढ़ी है। साधनों की आपाधापी में, पौराणिक सुन्द-उपसुन्द की तरह पारस्परिक मारकाट मची है। यदि गर्हित दृष्टिकोण बदला जा सका होता और पिछड़ों को प्रमुखता देते हुये उनका हक उन्हें स्वेच्छापूर्वक लौटा दिया गया होता, तो अपनी इसी दुनियाँ में कितनी प्रसन्नता और सुसम्पन्नता बिखरी पड़ी होती?

🔴 आत्मानुशासन रखा गया होता, संयम बरता जाता और अनिवार्य आवश्यकताएँ पूरी करके काम चला लिया जाता, तो इसका प्रभाव सार्वजनीन होता। मनुष्य सत्प्रवृत्ति-सम्वर्धन में अपनी बचत को, विभूतियों को नियोजित करने के निर्णय पर पहुँचता और ऐसे सृजन में, जिसे सतयुगी या स्वर्गीय कहने में किसी को कोई आपत्ति न होती।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 पूजा-उपासना के मर्म (भाग 3)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी

🔴 मेरी उपासना का क्रम पूजा-उपासना तक सीमित नहीं है। 24 घण्टे मैंने उपासना की है, 24 घण्टे अपने आपको परिशोधन और संशोधन करने के लिये आग में तपाया है। मैंने हर बार अपनी मनोवृत्तियों की परख की है और मैंने हर बार मन की सफाई की है। इस लायक अपने मन को बनाया है कि अगर भगवान् अपने भीतर आये तो नाखुश होकर के नहीं चला जाये, परेशान होकर के नहीं चला जाये। यहाँ से नफरत लेकर के नहीं चला जाये। मन की सफाई करने की जरूरत है।

🔵 भगवान् को आदमी की मक्कारियों और आदमी की लिप्साओं से बहुत नफरत है। भगवान् खुशामद से मानने वाले नहीं हैं। भगवान् को नाम के अक्षर के उच्चारण करने की जरूरत नहीं है। भगवान् की औकात और भगवान् ऐसे नहीं हैं कि आप उसकी तारीफ करें, खुशामद करें, बार-बार नाम लें, बार-बार उसके गुणों को गायें, उसके बाद में उसको अपने काबू में कर लें, कब्जे में कर लें। इतना कमजोर दिल, इतना कमजोर प्रकृति का भगवान् नहीं हो सकता। हम इन्सान उनको इतना कमजोर समझते हैं कि कोई आदमी खुशामद करके जो कुछ चाहे, चाहे जब उनसे वसूल कर ले जाये वह भगवान् कैसे हो सकता है?

🔴 जो व्यक्ति खुशामद करें, तारीफ करें, जो कुछ भी चाहें, वही हमको मिल जाये। ये मुमकिन है? ये नामुमकिन है। भगवान् तुम बड़े अच्छे हो, तुम्हारी नाक बड़ी अच्छी है, तुमने महिषासुर को मार डाला, तुमने फलाने को मार डाला, तुमने कंस को मार डाला, तुमने वृत्रासुर को मार डाला, अब लाओ। उल्लू कहीं का। आज इसी का नाम पूजा, इसी का नाम उपासना, इसी का नाम ध्यान, इसी का नाम जप।

🔵 सारा विश्व अज्ञान के अंधकार में डूबा हुआ; भ्रम के जंजाल में फँसता हुआ और अपना वक्त और अपना समय बरबाद करता हुआ; अध्यात्म को बदनाम करता चला जाता है और शिकायत करता हुआ चला जाता है कि हमने भगवान् का नाम लिया था, पूजा की थी, खुशामद की थी, मिठाई खिलायी थी, चावल खिलाया था, धूपबत्ती खिलायी थी, आरती जलायी थी, और हमें कोई फायदा नहीं हुआ, कैसे हो सकता है फायदा?  फायदा होना चाहिए। उसका लाभ उठाने के लिये आदमी को अपने जीवन में आध्यात्मिकता का समावेश करना होगा। जीवन में आध्यात्मिकता का समावेश है-पूजा-उपासना का शिक्षण।  

🌹 आज की बात समाप्त।
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 59)

🌹 अनगढ़ मन हारा, हम जीते

🔴 उपासना, साधना और आराधना में ‘‘साधना’’ ही प्रमुख है। उपासना का कर्मकाण्ड कोई नौकरी की तरह भी कर सकता है। आराधना-पुण्य परमार्थ को कहते हैं। जिसने अपने को साध लिया है, उसके लिए और कोई काम करने के लिए बचता ही नहीं। उत्कृष्टता सम्पन्न मन अपने लिए सबसे लाभदायक व्यवसाय-पुण्य परमार्थ ही देखता है। इसी में उसकी अभिरुचि और प्रवीणता बन जाती है। हिमालय के प्रथम वर्ष में हमें आत्म-संयम की, मनोनिग्रह की साधना करनी पड़ी। जो कुछ चमत्कार हाथ लगे हैं, उसी के प्रतिफल हैं। उपासना तो समय काटने का एक व्यवसाय बन गया है।

🔵 घर चार घण्टे नींद लिया करते थे। यहाँ उसे बढ़ाकर छः घण्टे कर दिया। कारण कि घर पर तो अनेक स्तर के अनेक काम रहते हैं, पर यहाँ तो दिन का प्रकाश हुए बिना मानसिक जप के अतिरिक्त और कुछ कर सकना ही सम्भव न था। पहाड़ों की ऊँचाई में प्रकाश देर से आता है और अन्धेरा जल्दी हो जाता है। इसलिए बारह घण्टे के अँधेरे में छः घण्टे सोने के लिए, छः घण्टे उपासना के लिए पर्याप्त होने चाहिए। स्नान का बंधन वहाँ नहीं रहा। मध्याह्न को ही नहाना और कपड़े सुखाना सम्भव होता था। इसलिए परिस्थिति के अनुरूप दिनचर्या बनानी पड़ी। दिनचर्या के अनुरूप परिस्थितियाँ तो बन नहीं सकती थीं।

🔴 ‘‘प्रथम हिमालय यात्रा कैसी सम्पन्न हुई?’’ इसके उत्तर में कहा जा सकता हे कि परिस्थितियों के अनुरूप मन को ढाल लेने का अभ्यास भली प्रकार कर लिया। इसे यों भी कह सकते हैं कि आधी मञ्जिल पार कर ली। इस प्रकार प्रथम वर्ष में दबाव तो अत्यधिक सहने पड़े, तो भी कच्चा लोहा तेज आग की भट्टी में ऐसा लोहा बन गया, जो आगे चलकर किसी भी काम आ सकने के योग्य बन गया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 60)

🌹 लक्षपूर्ति की प्रतीक्षा

🔵 शिला की आत्मा बिना रुके कहती ही रही। उसने आत्म विश्वास पूर्वक कहा—मुझे देख। मैं भी अपनी हस्ती को उस बड़ी हस्ती में मिला देने के लिए यहां पड़ी हूं। अपने इस स्थूल शरीर को—विशाल शिला खण्ड को—सूक्ष्म, अणु बना कर उस महासागर में मिला देने की साधना कर रही हूं। जल की प्रत्येक लहर से टकरा कर मेरे शरीर के कुछ कण टूटते हैं और वे रज कण बनकर समुद्र की ओर बह जाते हैं। इस तरह मिलन की बूंद-बूंद स्वाद ले रही हूं, तिल-तिल अपने को घिस रही हूं। इस प्रकार प्रेमी के प्रति आत्मदान का आनन्द कितने अधिक दिन तक लेने का रस ले रही हूं। यदि उतावले अन्य पत्थरों की तरह बीच जलधारा में पड़कर लुढ़कने लगती तो सम्भवतः कब की में लक्ष तक पहुंच जाती। फिर यह तिल-तिल अपने को प्रेमी के लिये घिसने का जो आनन्द है उससे तो वंचित ही रह गई होती?’’

🔴 ‘‘उतावली न कर, उतावली में जलन है, खोज है, निराशा है, अस्थिरता है, निष्ठा की कमी है, क्षुद्रता है। इन दुर्गुणों के रहते कौन महान् बना है? और कौन लक्ष तक पहुंचा है? साधक का पहला लक्षण है—धैर्य! धैर्य की परीक्षा ही भक्ति की परीक्षा है। जो अधीर हो गया सो असफल हुआ। लोभ और भय के, निराशा और आवेश के—जो अवसर साधक के सामने आते हैं उनमें और कुछ नहीं, केवल धैर्य परखा जाता है। तू कैसा साधक है जो अभी इस पहले पाठ को भी नहीं पढ़ पाया?’’

🔵 शिला की आत्मा ने बोलना बन्द कर दिया। मेरी तंद्रा टूटी। इस उपालम्भ ने अन्तःकरण को झकझोर डाला ‘‘पहला पाठ भी अभी नहीं पढ़ा, और लगा है बड़ा साधक बनने।’’ लज्जा और संकोच से सिर नीचा हो गया अपने को समझाता और धिक्कारता रहा। शिर ऊपर उठाया तो देखा, ऊषा की लाली उदय हो रही है। उठा और नित्य कर्म की तैयारी करने लगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य