रविवार, 19 अप्रैल 2020

👉 विद्वता और मानवता

एक बहुत बड़ा मंदिर था। उसमें हजारों यात्री दर्शन करने आते थे। सहसा मंदिर का प्रबंधक प्रधान पुजारी मर गया। मंदिर के महंत को दूसरे पुजारी की आवश्यकता हुई और उन्होंने घोषणा करा दी कि जो कल सवेरे पहले पहर आकर यहां पूजा संबंधी जांच में ठीक सिद्ध होगा, उसे पुजारी रखा जाएगा।

बहुत से विद्वान सवेरे पहुंचने के लिए चल पड़े। मंदिर पहाड़ी पर था। एक ही रास्ता था। उस पर भी कांटे और कंकड़-पत्थर थे। विद्वानों की भीड़ चली जा रही थी मंदिर की ओर। किसी प्रकार कांटे और कंकड़ों से बचते हुए लोग जा रहे थे।

सब विद्वान पहुंच गए। महंत ने सबको आदरपूर्वक बैठाया। सबको भगवान का प्रसाद मिला। सबसे अलग-अलग कुछ प्रश्र और मंत्र पूछे गए। अंत में परीक्षा पूरी हो गई। जब दोपहर हो गई और सब लोग उठने लगे तो एक नौजवान वहां आया। उसके कपड़े फटे थे। वह पसीने से भीग गया था और बहुत गरीब जान पड़ता था।

महंत ने कहा- ‘‘तुम बहुत देर से आए।’’

वह बोला- ‘‘मैं जानता हूं। मैं केवल भगवान का दर्शन करके लौट जाऊंगा।’’

महंत उसकी दशा देखकर दयालु हो रहे थे। बोले- ‘‘तुम जल्दी क्यों नहीं आए?’’

उसने उत्तर दिया- ‘‘घर से बहुत जल्दी चला था। मंदिर के मार्ग में बहुत कांटे थे और पत्थर भी थे। बेचारे यात्रियों को उनसे कष्ट होता। उन्हें हटाने में देर हो गई।’’

महंत ने पूछा- ‘‘अच्छा, तुम्हें पूजा करना आता है?’’

उसने कहा- ‘‘भगवान को स्नान कराके चंदन-फूल चढ़ा देना, धूप-दीप जला देना तथा भोग सामने रखकर पर्दा गिरा देना और शंख बजाना तो जानता हूं।’’

महंत ने पूछा- ‘‘और मंत्र?’’

वह उदास होकर बोला- ‘‘भगवान से नहाने-खाने को कहने के लिए मंत्र भी होते हैं, यह मैं नहीं जानता।’’

अन्य सब विद्वान हंसने लगे कि यह मूर्ख भी पुजारी बनने आया है। महंत ने एक क्षण सोचा और कहा- ‘‘पुजारी तो तुम बन गए। अब मंत्र सीख लेना, मैं सिखा दूंगा। मुझसे भगवान ने स्वप्न में कहा है कि मुझे मनुष्य चाहिए।’’

‘‘हम लोग मनुष्य नहीं हैं?’’ दूसरे आमंत्रितों ने पूछा।

वे लोग महंत पर नाराज हो रहे थे। इतने पढ़े-लिखे विद्वानों के रहते महंत एक ऐसे आदमी को पुजारी बना दे जो मंत्र भी न जानता हो, यह विद्वानों को अपमान की बात जान पड़ती थी।

महंत ने विद्वानों की ओर देखा और कहा- ‘‘अपने स्वार्थ की बात तो पशु भी जानते हैं। बहुत से पशु बहुत चतुर भी होते हैं लेकिन सचमुच मनुष्य तो वही है जो दूसरों को सुख पहुंचाने का ध्यान रखता है, जो दूसरों को सुख पहुंचाने के लिए अपने स्वार्थ और सुख को छोड़ सकता है।’’

विद्वानों के सिर नीचे झुक गए। उन लोगों को बड़ी लज्जा आई। वे धीरे-धीरे उठे और मंदिर में भगवान को और महंत जी को नमस्कार करके उस पर्वत से नीचे उतरने लगे।

दोस्तों!! सोचने की बात है कि हममें से कौन मनुष्य है?

👉 Aaj Ka Sadchintan आज का सद्चिंतन 20 April 2020


👉 Prernadayak Prasang प्रेरणादायक प्रसंग 20 April 2020


👉 युग ऋषि का आश्वासन

कालक्षेत्र के नियमों का भी सीमा बंधन नहीं रहेगा। इसलिए जो काम अभी हाथ में हैं, वे अन्य शरीरों के माध्यम से चलते रहेंगे। लेखन हमारा बड़ा काम है, वह अनवरत रूप से  चलेगा। यह दूसरी बात है कि कलम जो हाथ में जिन अंगुलियों द्वारा पकड़ी हुई है वे ही कागज काला करेंगी या दूसरी। वाणी हमारी रुकेगी नहीं। यह प्रश्न अलग है जो जीभ इन दिनों बोलती चालती है, वही बोलेगी या किन्हीं अन्यों को माध्यम बनाकर काम करने लगेगी। अभी हमारा कार्य क्षेत्र मथुरा, हरिद्वार रहा है और हिन्दू धर्म के क्षेत्र में कार्य चलता रहा है। आगे वैसा देश, जाति, लिंग, धर्म, भाषा आदि का कोई बन्धन न रहेगा जहाँ जब जैसी उपयोगिता आवश्यकता प्रतीत होगी वहाँ इन इन्द्रियों की क्षमताओं से समयानुकूल कार्य लिया जाता रहेगा।

सहकार और अनुदान क्रम भी चलता रहेगा। हमारे मार्गदर्शक की आयु 600 वर्ष से ऊपर है। उनका सूक्ष्म शरीर ही हमारी रूह में है। हर घड़ी पीछे और सिर पर उनकी छाया विद्यमान है। कोई कारण नहीं कि ठीक इसी प्रकार हम अपनी उपलब्ध सामर्थ्य का सत्पात्रों के लिए सत्प्रयोजनों में लगाने हेतु वैसा ही उत्साह भरा उपयोग न करते रहें। पाठकों-आत्मीय परिजनों को सतत् हमारे विचार ‘ब्रह्मवर्चस’ नाम से पत्रिकाओं पुस्तिकाओं फोल्डरों के माध्यम से मिलते रहेंगे।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- जुलाई 1984 पृष्ठ 2

👉 Enrich Your Heart

Great personalities do not accumulate wealth, neither do they desire for it; because, they have a generous heart full of a treasure that is bigger than that of Kuber (the God of wealth). It is said that there is no place for the one who is poor (miser) at heart; if there is no compassion in one’s heart, he will have no abode (of peace) – neither in this world, nor in the sublime world beyond… A materialistically poor man may have many chances of getting wealthy but the one whose heart is merciless will remain a beggar who will get scorn from everywhere.

Who can be a follower of truth and sainthood? Who is worthy of seeing God? The one, whose heart pulsates with generosity and love… Harsh, dry-hearted, cruel ones are infirm, they are impaired despite having healthy body, mind and resourceful life; they won’t be able to enjoy even the nectar kept in their closed vicinity. ‘O’ tyrants, just think before terrorizing others! What will happen the day when you will be in the place of your victims? Why be blinded by selfish passions, ego and follow apathy? You will have to bear the painful retribution life after life…Mother earth is a witness to this law of eternity; sooner or later the sinners have to face the dreadful punishments of the hell right here. Therefore, be gentle, sensitive, kind and helpful to others.

Those who possess the light of compassion in their hearts will never wander in the dark. So open your eyes to look inside and illumine your heart with the glow of kindness. Be considerate and compassionate to every one around you.

📖 Akhand Jyoti, Feb. 1942

👉 आत्मचिंतन के क्षण 20 April 2020

हम प्रथकतावादी न बनें। व्यक्तिगत बड़प्पन के फेर में न पड़ें। अपनी अलग से प्रतिभा चमकाने का झंझट मोल न लें। समूह के अंग बनकर रहें। सबकी उन्नति में अपनी उन्नति देखें और सबके सुख में अपना सुख खोजें। यह मानकर चलें कि उपलब्ध प्रतिभा, सम्पदा एवं गरिमा समाज का अनुदान है और उसका श्रेष्ठतम उपयोग समाज को सज्जनतापूर्वक लौटा देने में ही है।

क्षमा न करना और प्रतिशोध लेने की इच्छा रखना दुःख और कष्टों के आधार हैं। जो व्यक्ति इन बुराइयों से बचने की अपेक्षा उन्हें अपने हृदय में पालते-बढ़ाते रहते हैं वे जीवन के सुख और आनंद से वंचित रह जाते हैं। वे आध्यात्मिक प्रकाश का लाभ नहीं ले पाते। जिसके हृदय में क्षमा नहीं, उसका हृदय कठोर हो जाता है। उसे दूसरों के प्रेम, मेलजोल, प्रतिष्ठा एवं आत्म-संतोष से वंचित रहना पड़ता है।

दुष्कर्म करना हो तो उसे करने से पहले कितनी ही बार विचारों और उसे आज की अपेक्षा कल-परसों पर छोड़ो, किन्तु यदि कुछ शुभ करना हो तो पहली ही भावना तरंग को क्रियान्वित होने दो। कल वाले काम को आज ही निपटाने का प्रयत्न करो। पाप तो रोज ही अपना जाल लेकर हमारी घात में फिरता रहता है, पर पुण्य का तो कभी-कभी उदय होता है, उसे निराश लौटा दिया तो न जाने फिर कब आवे।

दोष दिखाने वाले को अपना शुभ चिंतक मानकर उसका आभार मानने की अपेक्षा मनुष्य जब उलटे उस पर कु्रद्ध होता है, शत्रुता मानता और अपना अपमान अनुभव करता है, तो यह कहना चाहिए कि उसने सच्ची प्रगति की ओर चलने का अभी एक पैर उठाना भी नहीं सीखा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आध्यात्मिक जीवन

आध्यात्मिक जीवन अस्वस्थ होने में नहीं, स्वस्थ होने में है। यह रोग में नहीं आरोग्य में है, पीड़ा में नहीं प्रसन्नता में है, दमन में नहीं रूपान्तरण में है। लेकिन इस मुखर सच को समझने वाले लोग कम है। संख्या उनकी ज्यादा है जो दमन को, स्वयं के प्रति अनाचार को अध्यात्म समझते हैं। ऐसे लोग स्वयं को भले कितना ही समझदार समझें लेकिन हैं सिरे से नासमझ।
  
स्वामी विवेकानन्द के पास एक ऐसा ही अपने को समझदार समझने वाला नासमझ व्यक्ति आया। वह साधुवेश में था, बातों ही बातों में उसने बताया कि वह बाल ब्रह्मचारी है। उसकी सूखी, कृश देह, बुझा निस्तेज चेहरा यह बयान कर रहे थे कि उसने अपने शरीर पर बहुत अत्याचार किया है। स्वामी जी को उस पर बहुत दया आयी। वह बोले- अरे भाई! शरीर को इतना सताने की क्या जरूरत पड़ गयी। स्वामी जी के इस कथन पर वह कुछ चौंक सा गया। क्योंकि उसने दमन को त्याग, अस्वास्थ्य को आध्यात्मिकता, कुरूपता एवं विकृति को योग समझ रखा था। उसने असौन्दर्य साधने को ही साधना मान रखा था।
  
स्वामी विवेकानन्द उसके इस अज्ञान पर हँसे और बोले- तुमने स्वयं को शरीर तक क्यों सीमित कर रखा है। शरीर सब कुछ नहीं है। शरीर कुछ है और कुछ ऐसा भी है जो शरीर के पार और परे है। शरीर को न भोगी बनने देना है और न रोगी। न तो शरीर को उछालते फिरना है और न उसे तोड़ते फिरना है। देह तो बस गेह है, आत्मा का आवास है। उसका स्वस्थ और अच्छा होना आवश्यक है।
  
आध्यात्मिक जीवन स्वास्थ्य का विरोध नहीं है। वह तो परिपूर्ण स्वास्थ्य है। वह तो एक लय युक्त, संगीतपूर्ण सौन्दर्य की स्थिति का पर्यायवाची है। शरीर तो बस उपकरण है, अपना अनुगामी है। तुम जैसे बनते हो, वह वैसा बन जाता है। तुम वासना में हो, तो वह वहाँ साथ देता है, तुम साधना में हो तो वह साधना में साथ देता है। आध्यात्मिक जीवन का मतलब शारीरिक दमन नहीं बल्कि विचार, संस्कार और भावनाओं का परिमार्जन परिवर्तन व रूपान्तरण है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २१७