शनिवार, 3 फ़रवरी 2018

👉 परदोष दर्शन भी एक बड़ा पाप है :-

🔷 गाँव के बीच शिव मन्दिर में एक संन्यासी रहा करते थे। मंदिर के ठीक सामने ही एक वैश्या का मकान था।

🔶 वैश्या के यहाँ रात−दिन लोग आते−जाते रहते थे। यह देखकर संन्यासी मन ही मन कुड़−कुड़ाया करता। एक दिन वह अपने को नहीं रोक सका और उस वैश्या को बुला भेजा। उसके आते ही फटकारते हुए कहा—

🔷 ‟तुझे शर्म नहीं आती पापिन, दिन रात पाप करती रहती है। मरने पर तेरी क्या गति होगी?”

🔶 संन्यासी की बात सुनकर वेश्या को बड़ा दुःख हुआ। वह मन ही मन पश्चाताप करती भगवान से प्रार्थना करती अपने पाप कर्मों के लिए क्षमा याचना करती।

🔷 बेचारी कुछ जानती नहीं थी। बेबस उसे पेट के लिए वेश्यावृत्ति करनी पड़ती किन्तु दिन रात पश्चाताप और ईश्वर से क्षमा याचना करती रहती।

🔶 उस संन्यासी ने यह हिसाब लगाने के लिए कि उसके यहाँ कितने लोग आते हैं एक−एक पत्थर गिनकर रखने शुरू कर दिये। जब कोई आता एक पत्थर उठाकर रख देता। इस प्रकार पत्थरों का बड़ा भारी ढेर लग गया तो संन्यासी ने एक दिन फिर उस वेश्या को बुलाया और कहा

🔷 “पापिन? देख तेरे पापों का ढेर? यमराज के यहाँ तेरी क्या गति होगी, अब तो पाप छोड़।”

🔶 पत्थरों का ढेर देखकर अब तो वेश्या काँप गई और भगवान से क्षमा माँगते हुए रोने लगी। अपनी मुक्ति के लिए उसने वह पाप कर्म छोड़ दिया। कुछ जानती नहीं थी न किसी तरह से कमा सकती थी। कुछ दिनों में भूखी रहते हुए कष्ट झेलते हुए वह मर गई।

🔷 उधर वह संन्यासी भी उसी समय मरा। यमदूत उस संन्यासी को लेने आये और वेश्या को विष्णु दूत। तब संन्यासी ने बिगड़कर कहा “तुम कैसे भूलते हो। जानते नहीं हो मुझे विष्णु दूत लेने आये हैं और इस पापिन को यमदूत। मैंने कितनी तपस्या की है भजन किया है, जानते नहीं हो।”

🔴 यमदूत बोले “हम भूलते नहीं, सही है। वह वेश्या पापिन नहीं है पापी तुम हो। उसने तो अपने पाप का बोध होते ही पश्चाताप करके सच्चे हृदय से भगवान से क्षमा याचना करके अपने पाप धो डाले। अब वह मुक्ति की अधिकारिणी है और तुमने सारा जीवन दूसरे के पापों का हिसाब लगाने की पाप वृत्ति में, पाप भावना में जप तप छोड़ छाड़ दिए और पापों का अर्जन किया।

🔷 भगवान के यहाँ मनुष्य की भावना के अनुसार न्याय होता है। बाहरी बाने या दूसरों को उपदेश देने से नहीं। परनिन्दा, छिद्रान्वेषण, दूसरे के पापों को देखना उनका हिसाब करना, दोष दृष्टि रखना अपने मन को मलीन बनाना ही तो है। संसार में पाप बहुत है, पर पुण्य भी क्या कम हैं। हम अपनी भावनाऐं पाप, घृणा और निन्दा में डुबाये रखने की अपेक्षा सद्विचारों में ही क्यों न लगावें?

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 4 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 4 Feb 2018


👉 चिंतन,भावना एवं कर्मों के श्रेष्ठता द्वारा अर्चन

🔶 सच यही है कि सारा अस्तित्व एक है और हममें से कोई उस अस्तित्व से अलग-थलग नहीं है। हम कोई द्वीप नहीं है, हमारी सीमाएँ काम चलाऊ हैं। हम किन्हीं भी सीमाओं पर समाप्त नहीं होते। सच कहेें, तो कोई दूसरा है ही नहीं, तो फिर दूसरे के साथ जो घट रहा है, वह समझो अपने ही साथ घट रहा है। भगवान् महावीर, भगवान्ï बुद्ध अथवा महर्षि  पतंञ्जलि ने जो अङ्क्षहसा की महिमा गायी, उसके पीछे भी यही अद्वैत दर्शन है। इसका मतलब इतना ही है कि शिष्य होते हुए भी यदि तुम किसी को चोट पहुँचा रहे हो, या दु:ख पहुँचा रहे हो अथवा मार रहे हो, तो दरअसल तुम गुरुघात या आत्मघात ही कर रहे हो, क्योंकि गुरुवर की चेतना में तुम्हारी अपनी चेतना के साथ समस्त प्राणियों की चेतना समाहित है।
  
🔷 ध्यान रहे जब एक छोटा सा विचार हमारे भीतर पैदा होता है, तो सारा अस्तित्व उसे सुनता है। थोड़ा सा भाव भी हमारे हृदय में उठता है, तो सारे अस्तित्व में उसकी झंकार सुनी जाती है। और ऐसा नहीं कि आज ही अनन्त काल तक यह झंकार सुनी जायेगी। हमारा नामोनिशाँ भले ही न रहे। लेकिन हमने जो कभी चाहा, किया, सोच, भावना बनायी थी, वह सब इस अस्तित्व में गूँजती रहेगी। क्योंकि हममें से कोई यहाँ से भले ही मिट जाये, लेकिन कहीं और प्रकट हो जायेगा।
  
🔶 जो लहर मिट गयी है, उसका जल भी उस सागर में शेष रहता है। यह ठीक है कि एक लहर उठ रही है, दूसरी लहर गिर रही है, फिर लहरें एक हैं, भीतर नीचे जुड़ी हुई हैं और जिस जल से उठ रही हैं यह लहर, उसी जल से गिरने वाली लहर वापस लौट रही है। इन दोनों के नीचे के तल में कोई फासला नहीं हैं। यह एक ही सागर का खेल है। हम सब भी लहरों से ज्यादा नहीं है। इस जगत्ï में सभी कुछ लहरवत्ï हैं।
  
🔷 परमेश्वर से एक हो चुके चेतना महासागर की भाँति है। सारा अस्तित्व उनमें समाहित है। हमारे प्रत्येक कर्म, भाव एवं विचार उन्हीं की ओर जाते हैं, वे भले ही किसी के लिए भी न किये जाये। इसलिए जब हम किसी को चोट पहुँचाते हैं, दु:ख पहुँचाते हैं, तो हम किसी और को नहीं, सद्गुरु को चोट पहुँचाते हैं, उन्हीं को दु:खी करते हैं। श्रीरामकृष्ण परमहंस के एक शिष्य ने बैल को चोट पहुँचायी। बाद में वह दक्षिणेश्वर आकर परमहंस देव की सेवा करने लगा। सेवा करते समय उसने देखा कि ठाकुर की पाँव पर उस चोट के निशान थे। पूछने पर उन्होंने बताया, अरे! तू चोट के बारे क्या पूछता है, यह चोट तो तूने ही मुझे दी है। सत्य सुनकर उसका अन्त:करण पीड़ा से भर गया।
  
🔶 क्या हम सचमुच ही अपने भगवान से प्रेम से करते हैं एवं उनमें भक्ति है? यदि हाँ तो फिर हमारे अन्त:करण को सभी के प्रति प्रेम से भरा हुआ होना चाहिए। हमें किसी को भी चोट पहुँचाने का अधिकार नहीं है। क्योंकि सभी में भगवान ही समाये हैं। सभी स्थानों पर उन्हीं की चेतना व्याप्त है। इसलिए हमारे अपने मन में किसी के प्रति कोई भी द्वेष, दुर्भाव नहीं होना चाहिए। क्योंकि इस जगत्ï में ईश्वर, खुदा से अलग कुछ भी नहीं है। उन्हीं के चैतन्य के सभी हिस्से हैं। उन्हीं की चेतना के महासागर की लहरें हैं। इसलिए लोगों को सर्वदा ही श्रेष्ठ चिंतन, श्रेष्ठ भावना एवं श्रेष्ठ कर्मों के द्वारा उनका अर्चन करते रहना चाहिए।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 समर्थ और प्रसन्न जीवन की कुँजी (भाग 2)

🔷 चूल्हा बिलकुल ठंडा हो, नाम मात्र की गर्मी हो तो रसोई पकने की प्रतीक्षा में ही बैठा रहना पड़ेगा। इसके विपरीत यदि ईंधन अन्धाधुन्ध जलने लगे तो जो पकाया जा रहा है, उबल कर नीचे गिरेगा अथवा जल भुन कर राख हो जाएगा। रसोई सही समय पर सही ढंग से पके इसके लिए आवश्यक है कि चूल् की आग समतुल्य बनी रहे। मस्तिष्क ऐसा ही चूल्हा है जिस पर उपयोगी सामान सही तरह से पकने के लिए तापमान संतुलित रहना चाहिए। सही तरह से सोचना और करना इससे कम में बन ही नहीं सकता।

🔶 कठिनाई या असफलता के लक्षण देखने ही हड़बड़ा जाना बुरी बात है। सफलता की हल्की सी झलक झाँकी देखने ही फूले न समाने जैसी अहंकारी स्थिति बना लेना ओछेपन का लक्षण है। ऐसे आदमी बड़े काम कभी पूरा नहीं कर पतों। उन्हें आधी अधूरी स्थिति में ही काम की इति श्री समझनी पड़ती है। शेष मंजिल को छोड़कर बीच में ही बैठे रहते है। बिगड़ा हुआ संतुलन पूरी बात सोचने और मंजिल के अन्तिम चरण तक पहुँचने की स्थिति ही नहीं बनने देता।

🔷 कछुए और खरगोश की दौड़ में खरगोश इसलिए बाजी हरा कि ओछेपन ने उसे लगातार श्रम नहीं करने दिया और थोड़ी सी सफलता को ही काम बन जाना मान बैठा कछुआ इसलिए जाता कि अपनी धीमी चाल और लम्बी मंजिल की बात को भली प्रकार समझते हुए भी निराश नहीं हुआ और लगातार हिम्मत के साथ चलते रहने में ढीला नहीं पड़ा। धीरज और हिम्मत बनाए रहने वाला हर कछुआ बाजी जीतता है तब कि उतावले खरगोश सक्षम होते हुए भी मात खाते है।

🔶 जीवन कर्मभूमि है। इसमें खिलाड़ी का मन लेकर ही उतरा जाता है। खिलाड़ियों के सामने पग पग पर हार जीत भी उछलती कूदती रहती है। अभी लगता है कि हार अभी दीखता है कि जीते। दोनोँ ही परिस्थितियों में वे समान मन से जुटे रहते है। हार जाने पर जीतने वाले से लड़ने मरने पर उतारू नहीं होते वरन् हाथ मिलाते और बधाई देते है। जीत जाने पर इस तरह इठला कर नहीं चलते मानों कोई किला जीत कर आये हो। हारने वालों का तिरस्कार करना बेहूदों का काम है। वे कुशल खिलाड़ी नहीं माने जाते।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1988 पृष्ठ 56
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1988/March/v1.56

👉 खाने तक में नासमझी की भरमार (भाग 3)

🔷 दूसरी ओर दृष्टि डालने से जो दृश्य सामने आता है, उसे देखते हुए यह मानने को भी जी नहीं करता है कि शरीर को मित्र माना गया है और उसकी सुरक्षा, स्थिरता तथा प्रगति का वैसा ध्यान रखा गया है जैसा कि किसी समझदार को रखना चाहिए था। एक-एक करके पर्यवेक्षण करना हो तो सर्वप्रथम दृष्टि आहार पर जानी चाहिए, क्योंकि इसी ईंधन के सहारे यह भट्टी गरम रहती है और इसी पर पकने वाली खिचड़ी के सहारे जीवन की गाड़ी चलती है। रस-रक्त का तेल-पानी ही है जिसके बलबूते यह मोटर दौड़ती है। इस सन्दर्भ में असावधानी बरती जाय, उलटी नीति अपनाई जाय तो स्पष्ट है कि उस आधार को विषाक्त होना पड़ेगा, जिसे आरोग्य की आधारशिला कह सकते हैं।

🔶 अनुपयुक्त आहार करते रहने पर भी कोई किस प्रकार अपने स्वास्थ्य को अक्षुण्ण रख सकेगा? इस तथ्य को समझने में कोई बड़ी कठिनाई नहीं होनी चाहिए। फिर भी स्पष्ट है कि आहार के सम्बन्ध में वह ढर्रा अपनाया गया है, जिसके रहते निरोग रह सकने की बात सोची भी नहीं जा सकती। आश्चर्य यह है कि दुष्परिणाम भुगतने में इतनी देरी क्यों होती रहती है। प्रकृति को कठोर अनुशासन की अधिष्ठात्री कहा जाता है फिर भी वह मनुष्य के साथ धीमी और थोड़ी प्रताड़ना देने की उदारता क्यों कर दिखा पाती है।

🔷 अभ्यस्त आहार का निरीक्षण पर्यवेक्षण किया जाय तो प्रतीत होता है कि उसे निर्जीव और विषाक्त बनाने में कोई कमी नहीं रहने दी गई है। स्वादिष्ट के ध्रुवकेन्द्र समझे जाने वाले नमक पर दृष्टि डाली जाय तो प्रतीत होता है कि यह मनुष्य के आहार में सम्मिलित होने योग्य स्थिति में किसी भी प्रकार नहीं है। रासायनिक विश्लेषण करने पर वह सोडियम क्लोराइड नामक विष है। जिसकी पोषण में सहायता दे सकने जैसी स्थिति तनिक भी नहीं है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Advantages of Worship-Intercession (Part 3)

🔷 I have taken so many big jobs but none of them was ever halted. Have not you seen that? BHAGWAN said to me, ‘‘Change the minds and the hearts of people through spirituality.’’ When I told him about my efficiency in doing that, BHAGWAN just said to me, ‘‘BETA! Efficiency lies within your soul.’’ Well what all I did thereafter is before you. I actually concentrated, researched and exploited the very efficiency of my own soul only to provide this world with so much voluminous literature that stirred the minds & the hearts of millions of people leading them to remember me. I have given DIKSHA to 5 million persons and found a permanent place in hearts and minds of millions of million people all over the world, is it not any surprise?
                                          
🔶 O YES! I was a person, who initially had no means & no man to help & cooperate but my own soul only. I was alone, absolutely alone. Only support I had was of only my own soul. How a lonely person in spiritual field can do miracle cannot be evaluated right now. But pause just a minute. In days to come it will be evaluated that how I have stirred the society through literature, voice and teachings. When I open my voice, it pierces like a gun-bullet in the hearts and minds of listeners.

🔷 My words have been piercing & stirring the people and will continue to do so in future also. Whether I am finishing right now? Yes, right now I am giving my BAIKHARI voice a stop but will continue to stir and pierce through my PARAA, PASHYANT & MADHYAMA voices, the hearts and minds of people just to awaken them.
                                         
🔶 Such kind of efficiency must be visible in people. Yes, how has been that possible? It has been possible only and only through pure spirituality and not because of a little person like me who is without any means. I have told people that a righteous approach of utilizing the resources available can lead them to draw maximum advantages as I had been drawing.
                                                                                   
Finished, today’s session

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 12)

🔷 मित्रो! हमारे गुरुदेव भी इसी प्रकार के हैं। वे बहुत दूर रहते हैं। यहाँ से बहुत दूर, जहाँ मनुष्यों का कभी जाना संभव नहीं होता। उन्होंने अपनी जबान का-अपनी वाणी का कभी इस्तेमाल नहीं किया। शक्ति होते हुए भी अपनी जिंदगी में कभी व्याख्यान नहीं दिया। किसी को कभी गुरुदीक्षा नहीं दी। मुझे भी जब वे बुलाते हैं, तो ज्यादा से ज्यादा चार दिन के लिए बुलाते हैं और मौन बैठे रहते हैं। मुँह से-जबान से एक शब्द भी नहीं निकालते, लेकिन उनके पुण्य के प्रभाव से, शक्ति के प्रभाव से, तेज के प्रभाव से, ब्रह्मवर्चस के प्रभाव से समीप में जो कोई भी आदमी आता है, प्रभावित होता हुआ चला जाता है, बढ़ता हुआ, हिलता हुआ, काँपता हुआ चला जाता है। यह विशेषता उनकी वाणी की विशेषता नहीं है। उनकी क्रियाओं की विशेषता नहीं है। उनके पैसे की विशेषता नहीं है। यह उनके अंतःकरण की विशेषता है।

🔶 मित्रो! आप यहाँ से जाने के पश्चात् योगी बनकर रहना और तपस्वी बनकर रहना। योगी और तपस्वी की परिभाषाएँ आपको मैं कल बता चुका हूँ। आप भूलना मत। आप भूल जायेंगे तो मुश्किल हो जायेगी। आप फिर नाक में से पानी पीने को योग कहना शुरू कर देंगे और गले में से रस्सी डालने को योग कहना शुरू कर देंगे और टट्टी के रास्ते पानी चढ़ाने को योग कहना शुरू कर देंगे। आप नाक में से हवा निकालने को योग कहना शुरू कर देंगे। योग का यह आशय नहीं है, मैं आपको कितनी बार समझा चुका हूँ। योग का इन सबसे कोई ताल्लुक नहीं है। यह अभ्यास है, क्रियाकलाप है, जिससे शरीर को अच्छा रखा जा सके। यह सूत्र है, प्रक्रिया है, योग नहीं है। आप यहाँ से जाने के पश्चात् अपने आपको योगी बनाये रखने के लिए तप करना। आप अपने आपको भावनाओं में मत बहने देना। आप हमेशा यह विचार करना कि हम किसी व्यक्ति विशेष की सम्पत्ति नहीं हैं और हम किसी कुटुम्ब विशेष की सम्पत्ति नहीं हैं और हमारा मन किसी घर विशेष से जुड़ा हुआ नहीं है और किसी खानदान विशेष से जुड़ा हुआ नहीं है।

🔷 मित्रो! वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करने के पश्चात् और पीला कपड़ा पहनने के पश्चात् आपको भले से ही किसी घर में रहना पड़े, इसके लिए मैं आपको मजबूर नहीं करता और यह भी नहीं कहता कि जो बच्चे आपके बाकी रह गये हैं, उनकी सेवा नहीं करना चाहिए। उनका पालन-पोषण नहीं करना चाहिए, मैं यह भी नहीं कहता, पर मैं यह अवश्य कहता हूँ कि आप अपनी मन की स्थिति को बदल देना। आप अपनी मनःस्थिति को इस प्रकार बदल देना कि हम किसी खास आदमियों की संपदा नहीं है और हमारा कोई खास घर नहीं है। हम किसी खास वस्तु से जुड़े हुए नहीं हैं। अब हमारा कायाकल्प हो गया है और हमारे जीवन की नयी दिशायें बन गयी हैं। अब हम समाज की संपत्ति हैं। अब हम धर्म की संपत्ति हैं। अब हम भगवान की संपत्ति हैं। अब हम राष्ट्र की संपत्ति हैं और हम संस्कृति की संपत्ति हैं। अब हम व्यक्ति विशेष की संपत्ति नहीं हैं। अगर आप मन का यह कायाकल्प करने में समर्थ हो गये और मन का स्तर बदलने में समर्थ हो गये, तो मैं आपको सच्चा वैरागी कहूँगा और सच्चा संन्यासी कहूँगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 31)

👉 शिवभाव से करें नित्य सद्गुरु का ध्यान

🔷 गुरु नमन की यह महिमा अनन्त और अपरिमित है। इसका विस्तार असीम है। इसके अगले क्रम को गुरुगीता के महामंत्रों में प्रकट करते हुए भगवान् महेश्वर जगन्माता भवानी से कहते हैं-

यस्य कारणरूपस्य कार्यरूपेण भाति यत्। कार्यकारणरूपाय तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ ४१॥
नानारूपम् इदं सर्वं न केनाप्यस्ति भिन्नता। कार्यकारणता चैव तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ ४२॥
यदङ् घ्रिकमलद्वंद्वं द्वंद्वतापनिवारकम्। तारकं सर्वदाऽऽपद्भ्यः श्रीगुरुं प्रणमाम्यहम्॥ ४३॥
शिवे क्रुद्धे गुरुस्राता गुरौ कु्रद्धे शिवो न हि। तस्मात्सर्वप्रयत्नेन श्रीगुरुं शरणं व्रजेत्॥ ४४॥
वन्दे गुरुपदद्वन्द्वं वाङ्मनश्चित्तगोचरम्। श्वेतरक्तप्रभाभिन्नं शिवशक्त्यात्मकं परम्॥ ४५॥

सद्गुरु नमन के इन महामंत्रों में जीवन साधना का सार समाहित है। भगवान् सदाशिव की वाणी शिष्यों को बोध कराती है कि ब्राह्मी चेतना से एकरूप गुरुदेव इस जगत् का परम कारण होने के साथ ही कारण रूप यह  जगत् भी हैं। वे ही महाबीज हैं और वे ही महावट हैं। ऐसे कार्य-कारण रूपी सद्गुरु को नमन है॥ ४१॥ इस संसार में यद्यपि ऊपरी तौर पर सब जगह भेद व भिन्नता दिखाई देती है; परन्तु तात्त्विक दृष्टि से ऐसा नहीं है। इस दृष्टि से तो कार्य-कारण की परमात्म चेतना के रूप में गुरुदेव ही सर्वत्र व्याप्त हैं। ऐसे सर्वव्यापी सद्गुरु को नमन है॥ ४२॥ जिनके दोनों चरण कमल शिष्य के जीवन में आने वाले सभी द्वन्द्वों, सर्वविधि तापों और सब तरह की आपदाओं का निवारण करते हैं उन श्री गुरु को मैं प्रणाम करता हूँ॥ ४३॥ भगवान् भोलेनाथ स्वयं कहते हैं कि यदि शिव स्वयं क्रुद्ध हो जाएँ, तो भी शिष्य का त्राण करने में सद्गुरु समर्थ हैं; परन्तु यदि गुरुदेव रुष्ट हो गए, तो महारुद्र शिव भी उसकी रक्षा नहीं कर सकते। इसलिए सब तरह की कोशिश करके श्री गुरु की शरण में जाना चाहिए॥ ४४॥ श्री गुरु के चरणों की महिमा मन-वाणी, चित्त व इन्द्रिय ज्ञान से परे है। श्वेत-अरुण प्रभा युक्त गुरु चरण कमल परम शिव व परा शक्ति का सहज वासस्थान हैं, उनकी मैं बार-बार वन्दना करता हूँ॥ ४५॥
  
गुरु नमन के इन महामंत्रों के भाव को सही ढंग से वही समझ सकते हैं, जिन्हें इस सत्य की अनुभूति हो चुकी है कि सद्गुरु चेतना एवं ब्राह्मी चेतना सर्वथा एक हैं; अपने गुरुदेव कोई और नहीं, स्वयं देहधारी ब्रह्म हैं। इन महामंत्रों की व्याख्या को और अधिक सुस्पष्ट ढंग से समझने के लिए एक सत्य घटना का उल्लेख करना सम्भवतः अधिक उपयुक्त होगा। यह घटना बंगाल के महान् सन्त विजयकृष्ण गोस्वामी एवं उनके शिष्य कुलदानन्द ब्रह्मचारी के सम्बन्ध में है। महात्मा विजयकृष्ण गोस्वामी योग विभूतियों से सम्पन्न सिद्ध योगी थे। उनका सन्त जीवन अनेकों सन्तों व महान् देश भक्तों के लिए प्रेरक रहा है। उनके शिष्यों ने न केवल साधना जीवन में आश्चर्यजनक उपलब्धियाँ अर्जित कीं, अपितु कइयों ने राष्ट्रीय स्वाधीनता के लिए बढ़-चढ़कर भागीदारी भी निभायी। इन शिष्यों में कुलदानन्द ब्रह्मचारी उनके ऐसे शिष्य थे, जिन्होंने अपने तप और योग साधना से न केवल स्वयं को बल्कि अनेकों के जीवन को प्रकाशित किया।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 54

👉 बुरी आदत:-

एक अमीर आदमी अपने बेटे की किसी बुरी आदत से बहुत परेशान था। वह जब भी बेटे से आदत छोड़ने को कहते तो एक ही जवाब मिलता, “अभी मैं इतना छोटा ह...