सोमवार, 20 मई 2019

👉 जीवन साधना के त्रिविध पंचशील (भाग 6)

समाज निर्माणः-

(१) हममें से हर व्यक्ति अपने को समाज का एक अविच्छिन्न अंग मानें। अपने को उसके साथ अविभाज्य घटक मानें। सामूहिक उत्थान और पतन पर विश्वास करें। एक नाव में बैठे लोग जिस तरह एक साथ डूबते या पार होते हैं, वैसी ही मान्यता अपनी रहे। स्वार्थ और परमार्थ को परस्पर गुँथ दें। परमार्थ को स्वार्थ समझें और स्वार्थ सिद्धि की बात कभी ध्यान में आये तो वह संकीर्ण नहीं उदात्त एवं व्यापक हो। मिल जुलकर काम करने और मिल बाँटकर खाने की आदत डाली जाय।

(२)मनुष्यों के बीच सज्जनता, सद्भावना एवं उदार सहयोग की परम्परा चले। दान विपत्ति एवं पिछड़ेपन से ग्रस्त लोगों को पैरों पर खड़े होने तक के लिए दिया जाय। इसके अतिरिक्कत उसका सतत प्रवाह सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन के लिए ही नियोजित हो। साधारणतया मुफ्त में खाना और खिलाना अनैतिक समझा जाय। इसमें पारिवारिक या सामाजिक प्रीति भोजों का जहाँ औचित्य हो, वहाँ अपवाद रूप से छूट रहे। भिक्षा व्यवसाय पनपने न दिया जाय। दहेज, मृतक भोज, सदावर्त धर्मशाला आदि ऐसे दान जो मात्र प्रसन्न करने भर के लिये दिये जाते हैं और उस उदारता के लाभ समर्थ लोग उठाते हैं, अनुपयुक्त माने और रोके जायें। साथ ही हर क्षेत्र का पिछड़ापन दूर करने के लिए उदार श्रमदान और धनदान को अधिकाधिक प्रोत्साहित किया जाय।

(३) किसी मान्यता या प्रचलन को शाश्वत या सत्य न माना जाय, उन्हें परिस्थितियों के कारण बना समझा जाय। उनमें जितना औचित्य, न्याय और विवेक जुड़ा हो उतना ग्राह्य और जो अनुपयुक्त होते हुए भी परम्परा के नाम पर गले बंधा हो, उसे उतार फेंका जाय। समय- समय पर इस क्षेत्र का पर्यवेक्षण होते रहना चाहिये और जो असामयिक, अनुपयोगी हो उसे बदल देना चाहिये। इस दृष्टि से लिंग भेद, जाति भेद के नाम पर चलने वाली विषमता सर्वथा अग्राह्य समझी जाय।

.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन वाणी का संयम (Vani Ka Sanyam)


👉 प्रेरणादायक प्रसंग सेवा भाव ( Seva Bhav)


👉 Achchha Insaan अच्छा इंसान....

एक 6 वर्ष का लडका अपनी 4 वर्ष की छोटी बहन के साथ बाजार से जा रहा था। अचानक से उसे लगा कि, उसकी बहन पीछे रह गयी है। वह रुका, पीछे मुड़कर देखा तो जाना कि, उसकी बहन एक खिलौने के दुकान के सामने खडी कोई चीज निहार रही है।

लडका पीछे आता है और बहन से पूछता है, "कुछ चाहिये तुम्हें?" लडकी एक गुड़िया की तरफ उंगली उठाकर दिखाती है। बच्चा उसका हाथ पकडता है, एक जिम्मेदार बडे भाई की तरह अपनी बहन को वह गुड़िया देता है। बहन बहुत खुश हो गयी।

दुकानदार यह सब देख रहा था, बच्चे का प्रगल्भ व्यवहार देखकर आश्चर्यचकित भी हुआ। अब वह बच्चा बहन के साथ काउंटर पर आया और दुकानदार से पूछा, "सर, कितनी कीमत है इस गुड़िया की ?"

दुकानदार एक शांत और गहरा व्यक्ति था, उसने जीवन के कई उतार देखे थे, उन्होने बड़े प्यार और अपनत्व से बच्चे से पूछा, "बताओ बेटे, आप क्या दे सकते हो ?" बच्चा अपनी जेब से वो सारी सीपें बाहर निकालकर दुकानदार को देता है जो उसने थोड़ी देर पहले बहन के साथ समुंदर किनारे से चुन चुन कर बीनी थी!

दुकानदार वो सब लेकर यूँ गिनता है जैसे कोई पैसे गिन रहा हो।सीपें गिनकर वो बच्चे की तरफ देखने लगा तो बच्चा बोला,"सर कुछ कम हैं क्या?" दुकानदार : "नहीं - नहीं, ये तो इस गुड़िया की कीमत से भी ज्यादा है, ज्यादा मैं वापस देता हूँ" यह कहकर उसने 4 सीपें रख ली और बाकी की बच्चे को वापिस दे दी। बच्चा बड़ी खुशी से वो सीपें जेब मे रखकर बहन को साथ लेकर चला गया।

यह सब उस दुकान का कामगार देख रहा था, उसने आश्चर्य से मालिक से पूछा, "मालिक ! इतनी महंगी गुड़िया आपने केवल 4 सीपों के बदले मे दे दी?" दुकानदार एक स्मित संतुष्टि वाला हास्य करते हुये बोला, "हमारे लिये ये केवल सीप है पर उस 6 साल के बच्चे के लिये अतिशय मूल्यवान है और अब इस उम्र में वो नहीं जानता, कि पैसे क्या होते हैं?

पर जब वह बडा होगा ना.. और जब उसे याद आयेगा कि उसने सीपों के बदले बहन को गुड़िया खरीदकर दी थी। तब उसे मेरी याद जरुर आयेगी, और फिर वह सोचेगा कि, "यह विश्व अच्छे मनुष्यों से भी भरा हुआ है।"

यही बात उसके अंदर सकारात्मक दृष्टिकोण बढानेे में मदद करेगी और वो भी एक अच्छा इंन्सान बनने के लिये प्रेरित होगा।

👉 आत्मचिंतन के क्षण Moments of self-expression

■ मान, बड़ाई, प्रतिष्ठा तथा कार्यों में अभिमान प्राप्त करने की इच्छा खाज की भाँति बड़ा सुहावना रोग है। इसके वश में हो जाने पर मनुष्य सत्कर्मों तक को अभिमान की अग्नि से भस्म कर देता है, प्रमादी बन जाता है। अपने भाग्य पर इतराता है और आत्मा का पतन करता है। अभिमान बड़ी संक्रामक बीमारी है, जो मनुष्य को अधोगति में पहुँचा सकती है।

◆ परिश्रम और केवल उचित परिश्रम ही सफलता का आधार है। इसके लिए परमात्मा की अनायास कृपा पर निर्भर करना अनधिकार चेष्टा है, जो किसी प्रकार पूरी नहीं हो सकती। परमात्मा कृपा करता अवश्य है, किन्तु उन्हीं पर जो पहले स्वयं अपने पर कृपा करते हैं। उस परमात्मा ने मनुष्य को पहले से ही बल, बुद्धि और विशेषताओं से भरा शरीर देकर महती कृपा कर दी है। अपनी योग्यता और पात्रता बढ़ाइए , अपना लक्ष्य निश्चित करिये और एकनिष्ठ होकर पुरुषार्थ में संलग्न हो जाइए। आपको सफलता अवश्य मिलेगी।
★ सामाजिक सुख-शान्ति और मानवता के मंगल के लिए आवश्यक है कि संसार से मांस भोजन की प्रथा को उठा दिया जाये। इसकी विकृति के कारण मनुष्य क्रोधी बनकर असामाजिक बन जाता है। समाज एवं राष्ट्र के उत्थान के लिए जिन सुंदर गुणों, सुकुमार भावनाओं और सद्प्रवृत्तियों की आवश्यकता होती है, मांसाहार के कारण उनका स्निग्ध विकास नहीं हो पाता। मांसाहार से मनुष्य में हिंसा की भावना बढ़ती है, जिससे समाज में अशान्ति और अमंगल की परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं।

👉 निर्माण से पूर्व सुधार की सोचें (भाग १)

महत्त्व निर्माण का ही है। उपलब्धियाँ मात्र उसी पर निर्भर हैं। इतना होते हुए भी पहले से ही जड़ जमाकर बैठी हुई अवांछनीयता निरस्त करने पर सृ...