बुधवार, 22 नवंबर 2017

👉 युग-मनीषा जागे, तो क्रान्ति हो (भाग 5)

🔶 जब मैं शिलांग, डिब्रूगढ़ की तरफ अपने मिशन के लिए दौरा कर रहा था तो मेरी इच्छा हुई कि नागालैण्ड जाऊँ। नागा कैसे होते हैं? जरा देखकर आऊँ। हमारे कार्यकर्ता साथ चले, बोले हम दुभाषिए का काम करेंगे। उनकी जीप में बैठकर मैं नागालैण्ड चला गया। उन लोगों के बीच जो रेलगाड़ी पलट देते थे, तीर-कमानों से जिन्होंने सेना की नाक में दम कर रखा था। नागाओं के एक गाँव में जाकर एक चबूतरे पर मेरे मित्रों ने बिठा दिया व नागाओं से उनकी भाषा में कहा, ये हमारे गुरुजी हैं, महात्मा हैं, आशीर्वाद देते हैं। किसी का कोई दुःख हो तो इनसे कह लीजिए। ये नहीं कहा कि ये विद्वान हैं, कोई मिशन चलाते हैं। बस यही कहा कि कोई मनोकामना हो तो इनसे कहिए। कोई पचास-सौ नागा वहाँ बैठे थे। एक ने दूसरे से कहा, दूसरे ने तीसरे से कहा। सब ने आपस में पूछताछ कर ली व कहा कि हमारा तो कोई दुःख नहीं है, रोटी मिल जाती है। सोने के लिए फूस के मकान हैं, पहनने के लिए लोमड़ी के खाल है, मौज करते हैं। हमें दुःख काहे का।
             
🔷 एक-दूसरे की ओर देखा तो बुड्ढा नागा उठा व दुभाषिए से बोला कि इन स्वामी जी से पूछिए कि इनको कोई दुःख तो नहीं है। हमसे बोले, ‘‘हमें तो कोई परेशानी नहीं किन्तु आप भूखे हों तो हमारे यहाँ चावल हैं, भूखे नहीं जाएँ हमारे दरवाजे से। पहनने के कपड़े न हों तो खालें ले जाएँ। हमारा अपना कोई कष्ट नहीं। हम तो प्रसन्न हैं। स्वामीजी को कोई दुःख हो तो हम दूर कर देंं।’’ मैं समझ गया आदमी का दर्शन यह है। नागाओं ने नागालैण्ड बना लिया। क्या वजह हो सकती है? यह उस बिरादरी का दर्शन है। जो कुछ हमारे पास है, उससे खुशी की जिन्दगी जिएँगे। उसे देखकर के खाएँगे। मस्ती का जीवन जिएँगे। यह दर्शन है। कौमें, बिरादरियाँ, समय और जातियाँ हमेशा दर्शन के आधार पर उठी हैं। यह दर्शन पैदा करना मनीषा का काम है। दर्शन को बनाने वाली माँ का नाम है ‘मनीषा’। मनीषा कैसी होती है? मनीषा ऐसी होती है जैसी कि बुद्ध के भीतर से पैदा हुई थी।
 
🔶 बुद्ध ने जमाने को देखा था। बड़ा वाहियात जमाना, बड़ा फूहड़ जमाना। माँस, मदिरा, मद्य, मुद्रा, मैथुन—ये पाँच चीजें ही उस समय जीवन का आधार बनी हुई थीं। यही उस समय का धर्म था। जो आज के समय का वाममार्ग है, वही उस समय का दर्शन ऐसी परिस्थितियों में एक बुद्ध नाम का आदमी उठ खड़ा हुआ। बुद्ध किसे कहते हैं? बुद्ध विचारशीलता का, भावनाशीलता का प्रतीक है। लोगों को दिशा देने वाले को बुद्ध कहते हैं। कथावाचक, धर्मोपदेशक उस जमाने में भी थे लेकिन मनीषी के रूप में अकेले बुद्ध सामने आए। उन्होंने लोगों से कहा, ‘‘बुद्धं शरणं गच्छामि’’—बुद्धि की, विवेक की, समझदारी की पकड़ में आ जाओ। क्यों और कैसे के सवाल पूछो।

....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 Who Shapes the Course of Human Ascent?

🔶 Uncountable waves of lives emerge out of and submerge back into the eternal ocean of Nature. The March of Life records none of these into its incessant flow. Rare are those divine souls, whose lives engrave immortal imprints in the glorious chapters of human history.  Few years of their life-spans stand as beacons of light, faith and inspiration in the annals of humanity.

🔷 Ethics of humanity teach us that –– “an altruistic life of a poor man is far more blissful and liberated than that of a mighty king”; and “sacrificing self interest is always superior to oppressing others.”  Though these ethical values have been preached throughout the ages, only a few have lived them. It is the inner strength of such great characters, which has upheld the edifice of morality age after age.

🔶 Talent, skill, perseverance, wisdom, charisma and courage are necessary for nurturing aplomb and self-esteem. Leading others too cannot be effective and inspiring without inculcation in oneself the requisite virtues and attributes. Those devoid of such potentials cannot vaunt of altruist renunciation. Dullness and lethargy cannot masquerade as austerity, contentment and peace. How can the glow of moral eminence shine in the darkness of ignorance and inactivity? Great are those who, despite being endowed with brilliant talents, courage and strength, do not waste their precious efforts in the pursuit of egoistic aims. Their sagacity and potentials are creatively used towards the welfare and evolution of humanity.

🔷 Ideals must not be compromised to suit the weakness of our wavering minds, nor can they be put on as mere masks. The peaks of immortal glory cannot be conquered without traversing through the Everest of perennially uplifting values.

👉 आत्मचिंतन के क्षण 22 Nov 2017

🔶 हमारे भोगों, उपलब्धियों और प्रवृत्तियों के एकमात्र सूत्र संचालक हमारे स्वयं के कर्म ही हैं। तब फिर देवताओं और विधाता को प्रसन्न करने की चिन्ता करते रहना कहाँ की बुद्धिमत्ता है? हमारा साध्य और असाध्य तो कर्म ही है। वही वन्दनीय-अभिवन्दनीय है, वही वरण और आचरण के योग्य है। दैवी विधान भी उससे भिन्न और उसके विरुद्ध कुछ कभी नहीं करता। कर्म ही सर्वोपरि है। परिस्थितियों और मनःस्थितियों का वही निर्माता है। उसी की साधना से अभीष्ट की उलपब्धि सम्भव है।     

🔷 आप जीवन के प्रति अपनी धारणा बदल डालिए। विश्वास तथा ज्ञान में ही अपना जीवन भवन निर्माण कीजिए। यदि वर्तमान आपत्तिग्रस्त है, तो उसका यह अर्थ नहीं है कि भविष्य भी अन्धकारमय है। आपका भविष्य उज्ज्वल है। विचारपूर्वक देखिए कि जो कुछ आपके पास है, उसका सबसे अच्छा उपयोग कर रहे हैं अथवा नहीं? क्योंकि यदि प्रस्तुत साधनों का दुरुपयोग करते हैं, तो चाहे वह कितनी ही तुच्छ और सारहीन क्यों न हो, आप उसके भी अधिकारी न रहेंगे। वह भी आपसे दूर भाग जायेंगे या छीन लिए जावेंगे।

🔶 यदि हम क्रोध, चिन्ता, ईर्ष्या, लोभ आदि असंगत मानसिक दोषों के शिकार होते हुए भी उन्नति पूर्ण स्वस्थ जीवन की कल्पना करते हैं तो यह असम्भव बात का स्वप्र देखना मात्र है। यदि हम वास्तव में अपने जीवन को सुखी एवं उन्नतिशील देखना चाहते हैं तो क्रोध, चिन्ता, ईर्ष्या आदि कुविचारों को घटाने और हटाने के लिए प्रयत्न करना होगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 ‘बुरे’ भी ‘भले’ बन सकते हैं (भाग 1)

🔷 कोई मनुष्य अपने पिछले जीवन का अधिकाँश भाग कुमार्ग में व्यतीत कर चुका है या बहुत सा समय निरर्थक बिता चुका है तो इसके लिए केवल दुख मानने पछताने या निराशा होने से कुछ प्रयोजन सिद्ध न होगा। जीवन का जो भाग शेष रहा है वह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। राजा परीक्षित को मृत्यु से पूर्व एक सप्ताह आत्म कल्याण को मिला था, उस ने इस छोटे समय का सदुपयोग किया और अभीष्ट लाभ प्राप्त कर लिया। बाल्मीकि के जीवन का एक बड़ा भाग, लूट, हत्या, डकैती आदि करने में व्यतीत हुआ था वे संभले तो वर्तमान जीवन में ही महान ऋषि हो गये। गणिका जीवन भर वेश्या वृत्ति करती रही, सदन कसाई, अजामिल, आदि ने कौन से दुष्कर्म नहीं किये थे। सूरदास को अपनी जन्म भर की व्यभिचारी आदतों से छुटकारा मिलते न देखकर अन्त में आंखें फोड़ लेनी पड़ी थी, तुलसीदास का कामातुर होकर रातों रात ससुराल पहुँचना और परनाले में लटका हुआ साँप पकड़ कर स्त्री के पास जा पहुँचना प्रसिद्ध है। इस प्रकार के असंख्यों व्यक्ति अपने जीवन का अधिकाँश भाग बुरे कार्यों में व्यतीत करने के उपरान्त सत्पथ गामी हुए हैं और थोड़े से ही समय में योगी और महात्माओं को प्राप्त होने वाली सद्गति के अधिकारी हुए हैं।

🔶 यह एक रहस्यमय तथ्य है कि मंद बुद्धि, मूर्ख, डरपोक, कमजोर तबियत के ‘सीधे’ कहलाने वालों की अपेक्षा वे लोग अधिक जल्दी आत्मोन्नति कर सकते हैं जो अब तक सक्रिय, जागरुक, चैतन्य, पराक्रमी, पुरुषार्थी एवं बदमाश रहे हैं। कारण यह है कि मंद चेतना वालों में शक्ति का स्त्रोत बहुत ही न्यून होता है वे पूरे रचनाकारी और भक्त रहें तो भी मंद शक्ति के कारण उनकी प्रगति अत्यंत मंदाग्नि से होती है। पर जो लोग शक्तिशाली हैं, जिनके अन्दर चैतन्यता और पराक्रम का निर्झर तूफानी गति से प्रवाहित होता है वे जब भी, जिस दिशा में भी लगेंगे उधर ही सफलता का ढेर लगा देंगे। अब तक जिन्होंने बदमाशी में अपना झंडा बुलन्द रखा है वे निश्चय ही शक्ति सम्पन्न तो हैं पर उनकी शक्ति कुमार्ग गामी रही है यदि वही शक्ति सत्पथ पर लग जाय तो उस दिशा में भी आश्चर्य जनक सफलता उपस्थित कर सकती है। गधा दस वर्ष में जितना बोझा ढोता है, हाथी उतना बोझा एक दिन में ढो सकता है। आत्मोन्नति भी एक पुरुषार्थ है। इस मंजिल पर भी वे ही लोग शीघ्र पहुँच सकते हैं जो पुरुषार्थी हैं, जिनके स्नायुओं में बल और मन में अदम्य साहस तथा उत्साह है।

🔷 मंद मति तम की स्थिति में हैं, उनकी क्रिया किसी भी दिशा में क्यों न हो। पुरुषार्थी, चतुर, संवेदनशील व्यक्ति रज की स्थिति में हैं चाहे वह अनुपयुक्त दिशा में ही क्यों न लगा हो। तम नीचे की सीढ़ी है, रज बीच की, और सत सबसे ऊपर की सीढ़ी है। जो रज की स्थिति में है उसके लिए सत में जा पहुँचना केवल एक ही कदम बढ़ाने की मंजिल है, जिस पर वह आसानी से पहुँच सकता है। स्वामी विवेकानन्द से एक मूढ़मति ने पूछा- मुझे मुक्ति का मार्ग बताइए। स्वामी जी ने उसकी सर्वतोमुखी मूढ़ता को देख कर कहा तुम चोरी, व्यभिचार, छल, असत्य भाषण, कलह आदि में अपनी प्रवृत्ति बढ़ाओं। इस पर वहाँ बैठे हुए लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने पूछा स्वामी जी आप यह क्या अनीति का उपदेश करते हैं? उन्होंने विस्तार पूर्वक समझाया कि तम में पड़े हुए लोगों के लिए पहले रज में जागृत होना पड़ता है तब वे सत में पहुँच सकते हैं। भोग और ऐश्वर्य को अर्निद्य मार्ग से प्राप्त करना निर्दोष और निद्य मार्ग से प्राप्त करना, सदोष रजोगुणी अवस्था है। दरिद्र को पहले सुसम्पन्न बनना होता है तब यह महात्मा बन सकता है। दरिद्र और नीच मनोवृत्ति का मनुष्य उदारता और महानता की सतोगुणी भावनाओं को धारण करने में समर्थ नहीं होता।

....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)
📖 अखण्ड ज्योति, सितम्बर 1949, पृष्ठ 6
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1949/September/v1.6

http://literature.awgp.org

👉 आज का सद्चिंतन 22 Nov 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 22 Nov 2017

👉 निर्माण से पूर्व सुधार की सोचें (भाग १)

महत्त्व निर्माण का ही है। उपलब्धियाँ मात्र उसी पर निर्भर हैं। इतना होते हुए भी पहले से ही जड़ जमाकर बैठी हुई अवांछनीयता निरस्त करने पर सृ...