शनिवार, 7 दिसंबर 2019

👉 को धर्मानुद्धरिष्यसि?

हिमालय के हिमशिखरों से बहती हुई बासन्ती बयार हमारे दिलों को छूने आज फिर आ पहुँची है। इस बयार में दुर्गम हिमालय में महातप कर रहे महा-ऋषियों, महासिद्धों के तप प्राण घुले हुए हैं। इसमें घुली हुई है- उनकी विकल वेदना, उनकी गहरी पीड़ा और उनके सघन सन्ताप से उपजा महाप्रश्न- को धर्मानुद्धरिष्यसि? कौन करेगा धर्म का उद्धार? यदि हमारे दिलों में संवेदना है तो इस प्रश्न की टीस भरी चुभन हमें जरूर महसूस होगी। हमारे प्राण इस ऋषि पीड़ा को अवश्य अनुभव करेंगे।
  
धर्म-प्रवचन नहीं है। बौद्धिक तर्क विलास, वाणी का वाक् जाल भी धर्म नहीं है। धर्म- तप है। धर्म- तितीक्षा है। धर्म- कष्ट सहिष्णुता है। धर्म- परदुःख कातरता है। धर्म- सच्चाइयों और अच्छाइयों के लिए जीने और इनके लिए मर मिटने का साहस है। धर्म- मर्यादाओं की रक्षा के लिए उठने वाली हुंकारें हैं। धर्म- सेवा की सजल संवेदना है। धर्म- पीड़ा निवारण के लिए स्फुरित होने वाला महासंकल्प है। धर्म- पतन निवारण के लिए किए जाने वाले युद्ध का महाघोष है। धर्म- दुष्वृत्तियों, दुष्कृत्यों, दुरीतियों के महाविनाश के लिए किए जाने वाले अभियान का शंखनाद है। धर्म- सर्वहित के लिए स्वहित का त्याग है।
  
ऐसा धर्म केवल तप के बासन्ती अंगारों में जन्म लेता है। बलिदान के बासन्ती राग में इसकी सुमधुर गूंज सुनी जाती है। अबकी बार वसन्त पंचमी पर बहती बासन्ती बयार हम सबके जीवन में तप के इन्हीं अंगारों को दहकाने आयी है। महातप की इन्हीं ज्वालाओं को धधकाने आयी है। हमें ऋषि सन्तान होने का बोध और इससे जुड़े कर्त्तव्यों का अहसास कराने आयी है। हमें ही देना है बासन्ती बयार में घुले हुए ऋषियों के महाप्रश्न का उत्तर। हमें ही गढ़नी है अपने जीवन में धर्म की सच्ची परिभाषा। लेकिन यह होगा तभी जब हम अपने जीवन को धर्म का यज्ञकुण्ड बना लें। और तप की महाज्वालाओं में स्वयं के प्राणों का अनवरत समिधादान करते रहें। इस धर्म यज्ञ का सुफल ही धर्म के सत्य को व्यापक विस्तार देगा।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १३९

👉 आत्मचिंतन के क्षण 7 Dec 2019

■ सच्चा साथी प्यार करता है, सलाह देता है तथा सुख- दुःख में सहयोग भी देता है। इसके अलावा वह शक्ति और सुरक्षा भी दे और प्रत्युपकार की जरा भी अपेक्षा न रखे, तो वह सोने में सुहागा हो जायेगा- ईश्वर ऐसा ही साथी है।

□ मनुष्य इसीलिए श्रेष्ठ है कि वह धर्म, सदाचार, नीति विशेष और परमार्थ को प्रधानता देता है। यदि वह इन पाँचों को छोड़ दे, तब तो उसे सबसे निकृष्ट कहा जाएगा, क्योंकि बुद्धि का उपयोग करके वह संसार में दुःख और क्लेशों को ही बढाता है।

◆ आरोग्य रक्षा एवं स्वस्थ जीवन का महत्त्व पूर्ण सूत्र-
मित भुक् -- अर्थात भूख से कम खाना।
हित भुक् -- अर्थात्- सात्विक खाना।
ऋत भुक्- अर्थात् न्यायोपार्जित खाना।


◇ महत्त्व की बात यह नहीं है कि हमने कितने लोगों की सेवा की। निरहंकारितापूर्वक सेवा हुई या नहीं, सेवा का मूल्य इसी से आँका जाता है। संख्या अल्प होते हुए भी  अगर इसका छेद शून्य हो ,तो उसका मूल्य अनन्त हो जाता है। उसी प्रकार अल्प सेवा को भी निरहंकारिता का छेद प्राप्त होने से उसका मूल्य अनन्त हो जाता है। यथार्थ सेवा से सन्तोष की मात्रा बढ़ती है। उस सन्तोष से सेवा वास्तविक है या आभासात्मक, यह जाना जा सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गुरु पूर्णिमा-’युग निर्माण योजना’ का अवतरण पर्व (भाग ३)

राजनैतिक स्वाधीनता के लिए आत्माहुति देने वाले पिछली पीढ़ी के शहीद अपनी जलाई हुई मशाल हमारे हाथों में थमा कर गये हैं। जिनने अपने प्राण, प...