बुधवार, 8 नवंबर 2017

👉 भाव-संवेदना का विकास करना ही साधुता है (अन्तिम भाग)

🔶 तुम्हीं को कुम्हार व तुम्हीं को चाक बनना है। हमने तो अनगढ़ सोना, चाँदी ढेरों लगाकर रखा है, तुम्हीं को साँचा बनकर सही सिक्के ढालना है। साँचा सही होगा तो सिक्के भी ठीक आकार के बनेंगे। आज दुनिया में पार्टियाँ तो बहुत हैं, पर किसी के पास कार्यकर्ता नहीं हैं। ‘लेबर’ सबके पास है, पर समर्पित कार्यकर्ता जो साँचा बनता है व कई को बना देता है अपने जैसा, कहीं भी नहीं है। हमारी यह दिली ख्वाहिश है कि हम अपने पीछे छोड़कर जाएँ। इन सभी को सही अर्थों में ‘डाई’ एक साँचा बनना पड़ेगा तथा वही सबसे मुश्किल काम है। रॉ मेटेरियल तो ढेरों कहीं भी मिल सकता है। पर ‘डाई’ कहीं-कहीं मिल पाती है। श्रेष्ठ कार्यकर्ता श्रेष्ठ ‘डाई’ बनता है। तुम सबसे अपेक्षा है कि अपने गुरु की तरह एक श्रेष्ठ साँचा बनोगे।
        
🔷 तुमसे दो और अपेक्षाएँ हैं-एक श्रम का सम्मान। यह भौतिक जगत का देवता है। मोती-हीरे श्रम से ही निकलते हैं। दूसरी अपेक्षा यह कि सेवा-बुद्धि के विकास के लिए सहकारिता का अभ्यास। संगठन शक्ति सहकारिता से ही पहले भी बढ़ी है, आगे भी इसी से बढ़ेगी।

🔶 हमारे राष्ट्र का दुर्भाग्य यह है कि श्रम की महत्ता हमने समझी नहीं। श्रम का माद्दा इस सबमें असीम है। हमने कभी उसका मूल्यांकन किया ही नहीं। हमारा जीवन निरन्तर श्रम का ही परिणाम है। बीस-बीस घण्टे तन्मयतापूर्वक श्रम हमने किया है। तुम भी कभी श्रम की उपेक्षा मत करना। मालिक बारह घण्टे काम करता है, नौकर आठ घण्टे तथा चोर चार घण्टे काम करता है। तुम सब अपने आपसे पूछो कि हम तीनों में से क्या हैं? जीभ चलाने के साथ कठोर परिश्रम करो, अपनी योग्यताएँ बढ़ाओ व निरंतर प्रगति पथ पर बढ़ते जाओ।

🔷 दूसरी बात सहकारिता की है। इसी को पुण्य परमार्थ, सेवा, उदारता कहते हैं। अपना मन सभी से मिलाओ। मिल-जुलकर रहना, अपना सुख बाँटना, दुःख बँटाना सीखो। यही सही अर्थों में ब्राह्मणत्व की साधना है। साधु तुम अभी बने नहीं हो। मन से ब्राह्मणत्व की साधना करोगे तो पहले ब्राह्मण बनो। साधु अपने आप बन जाओगे। पीले कपड़े पहनते हो कि नहीं, पर मन को पीला कर लो। सेवाबुद्धि का, दूसरों के प्रति पीड़ा का, भाव-सम्वेदना का विकास करना ही साधुता को जगाना है। आज इस वर्ष श्रावणी पर्व पर तुमसे कुछ अपेक्षाएँ हैं। आशा है तुम इन्हें अवश्य पूरा करोगे व हेमाद्रि संकल्प लोगे। यही आत्मा की हमारी वाणी है, जो तुमसे कुछ कराना चाहती है, इतिहास में तुम्हें अमर देखना चाहती है। देखना है कितना तुम हमारी बात को जीवन में उतार पाते हो।

🌹  समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 गाथा इस देश की, गाई विदेशियों ने (भाग 2)

🔶 “संसार में भारतवर्ष के प्रति लोगों का प्रेम और आदर उसकी बौद्धिक, नैतिक और आध्यात्मिक सम्पत्ति के कारण है।” यह शब्द प्रो॰ लुई रिनाड ने व्यक्त किये हैं। इन शब्दों से भी यही तथ्य प्रकाशित होता है कि भारत समग्र विश्व का है और सम्पूर्ण वसुन्धरा इसके प्रेमपाश में आबद्ध है। अनादि काल से धर्म की, संस्कृति और मानवता की ज्योति यह विकीर्ण कर रहा है। धरती की अनुपम कृति यह देश भला किसे प्यारा न होगा। भारतवर्ष ने जो आध्यात्मिक विचार इस संसार में प्रसारित किये हैं वे युग युगान्तरों तक अक्षुण्ण रहने वाले हैं। उनसे अनेक सुषुप्त आत्माओं को अनन्त काल तक प्रकाश मिलता रहेगा। भारतीय संस्कृति के प्रवाह का उद्गम वे चिन्तन, शाश्वत और सनातन सत्य रहे हैं जिनकी अनुभूति ऋषियों ने प्रबल तपश्चर्याओं के द्वारा अर्जित की थी, वह प्रभाव धूमिल भले ही हो गया हो किन्तु अभी तक भी लुप्त नहीं हुआ है।

🔷 धार्मिक, आध्यात्मिक एवं नैतिक क्षेत्र में ही हम सर्वसम्पन्न नहीं रहे वरन् कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं छूटा जहाँ हमारी पहुँच न रही हो। आध्यात्मिक तत्व ज्ञान के अतिरिक्त सामाजिक, व्यावहारिक तथा अन्य विद्याओं के ज्ञान विज्ञान में भी हम अग्रणी रहे हैं। अपनी एक शोध में डॉ. थीवो ने लिखा है कि “संसार, रेखागणित के लिये भारत का ऋणी है यूनान का नहीं।” प्रसिद्ध इतिहासज्ञ प्रो. बेवर का कथन है—”अरब में ज्योतिष विद्या का विज्ञान भारतवर्ष से हुआ।” कोलब्रुक ने बताया है कि “कोई अन्य देश नहीं, चीन और अरब को अंकगणित का पाठ पढ़ाने वाला देश भारतवर्ष ही है।”

🔶 यूनान के प्राचीन इतिहास का दावा है कि “भारत के निवासी यूनान में आकर बसे। वे बड़े बुद्धिमान, विद्वान और कला-कुशल थे। उन्होंने विद्या और वैद्यक का खूब प्रचार किया। यहाँ के निवासियों को सभ्य और विश्वासपात्र बनाया।” निःसन्देह इतना सारा ज्ञान अगाध श्रम शोध और लगन के द्वारा पैदा किया गया होगा। तब के पुरुष आलस्य, अरुचि, आसक्ति , अहंकार आदि से दूर रहे होंगे तभी तो वह तन्मयता बन पाई होगी जिसके बूते पर इतनी सारी खोज की जा सकी होगी। दुर्भाग्य की बात है कि आज वही भारतवर्ष विदेशियों के अनुकरण को ही अपनी शान समझता है। इस कार्य में जो जितना अधिक निपुण है उसे उतनी ही सामाजिक प्रतिष्ठा मिलती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1965 अगस्त पृष्ठ 9
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/August/v1.9

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