शुक्रवार, 9 मार्च 2018

👉 सत्य को न समझ पाने की आत्मघाती विडम्बना

🔷 किसी गाँव में कन्फ्यूशियस शिष्यों सहित पधारे। गाँव के पाँच युवक एक अन्धे को पकड़कर उनके पास लाये। उनमें से एक बोला- “भगवन्! एक समस्या हम सबके लिए उत्पन्न हो गई है। यह व्यक्ति आंख का तो अन्धा है पर है बहुत मूर्ख एवं हद दर्जे का तार्किक। हम इसको सतत् समझा रहे हैं कि प्रकाश का अस्तित्व है। प्रकृति के दृश्यों में सौंदर्य की अद्भुत छटा है। दुनिया में कुरूपता एवं सुन्दरता का युग्म सर्वत्र विद्यमान है। सूर्य, चाँद, सितारे प्रकाशवान हैं। समस्त संसार उनसे प्रकाशित-आलोकित होता है। रंग-बिरंगे पुष्पों में एक प्राकृतिक आकर्षण है जो सब का मन मोह लेता है। बसन्त के साथ प्रकृति श्रृंगार करके अवतरित होती- सबको मनमोहित करती है।”

🔶 “हमारी हर बात को यह अन्धा अपने तर्कों के सहारे काट कर रख देता है। कहता है कि प्रकाश की सत्ता कल्पित है। तुम लोगों ने मुझे अन्धा सिद्ध करने के लिए प्रकाश के सिद्धान्त गढ़ लिए हैं। वस्तुतः प्रकाश का अस्तित्व ही नहीं है। यदि है तो सिद्ध करके बताओ। मुझे स्पर्श कराके दिखाओ कि प्रकाश है। यदि स्पर्श के माध्यम से सम्भव नहीं है तो मैं चखकर देखना चाहता हूँ। यदि तुम कहते हो वह स्वाद रहित है तो मैं सुन सकता हूँ। प्रकाश की आवाज सम्प्रेषित करो। यदि उसे सुना भी नहीं जा सकता तो तुम मुझे प्रकाश की गन्ध का पान करा दो। मेरी घ्राणेंद्रियां सक्षम हैं- गन्ध को ग्रहण करने में। मेरी चारों इन्द्रियाँ समर्थ हैं। इनमें से किसी एक से प्रकाश का संपर्क करा दो। अनुभूति होने पर ही तो मैं मान सकता हूँ कि प्रकाश की सत्ता है।

🔷 उन पांचों ने कन्फ्यूशियस से कहा- “आप ही बतायें, इस अंधे को कैसे समझायें? प्रकाश को चखाया तो जा नहीं सकता। न ही स्पर्श कराया जा सकता। उसमें से गन्ध तो निकलती नहीं कि इसे सुँघाया जा सके न ही ध्वनि निकलती है जिसे सुना जा सके। आप समर्थ हैं, सम्भव है आपके समझाने से उसे सत्य का ज्ञान हो।

🔶 कन्फ्यूशियस बोले- प्रकाश को यह नासमझ जिन इन्द्रियों के माध्यम से समझना अनुभव करना चाहता है, उनसे कभी सम्भव नहीं है कि वह प्रकाश का अस्तित्व स्वीकार ले। उसको बोध कराने में तो मैं भी असमर्थ हूँ। तुम्हें मेरे पास नहीं किसी चिकित्सक के पास जाना चाहिए जब तक नेत्र नहीं मिल जाते, कोई भी उसे समझाने में सफल नहीं हो सकता। इसलिए कि आँखों के अतिरिक्त दृश्य प्रकाश का कोई प्रमाण नहीं है।

🔷 महान दार्शनिक का निर्देश पाकर पाँचों उस जन्मजात अंधे को एक कुशल वैद्य के पास लेकर पहुँचे। विशेषज्ञ वैद्य बोला- ‘‘इस रोगी को तो और पहले लाना चाहिए था। इसका रोग इतना गम्भीर नहीं है। बेकार में यह अपनी आयु की इतनी लम्बी अवधि अन्धेपन का भार लादे व्यतीत करता रहा।”

🔶 वैद्य ने शल्य क्रिया द्वारा आँखों की ऊपरी झिल्ली हटादी जिससे प्रकाश को आने का मार्ग मिल गया। अल्पावधि के उपचार से ही वह अन्धा ठीक हो गया। उसके आश्चर्य का कोई ठिकाना न रहा। उसके सारे तर्क अपने आप तिरोहित हो गये। अपनी भूल तिरोहित हो गयी। अपनी भूल  उसे समझ में आ गयी कन्फ्यूशियस ने शिष्य मण्डली से कहा- “तुम्हें उस अंधे की मूर्खता तथा तर्क शीलता पर हँसी आ सकती है पर उन तथाकथित बुद्धिमानों को किस श्रेणी में रखा जाय जो ईश्वर जैसी अगोचर, निराकार, इन्द्रियातीत सत्ता को प्रत्यक्ष इन्द्रियों के सहारे समझने का प्रयास करते हैं। उसमें असफल होने पर ऐसे असंख्यों अन्धे उद्घोष करते दिखाई देते हैं कि ईश्वर का अस्तित्व नहीं है वह तो आस्तिकों की मात्र कल्पना है।”

🔷 सचमुच ही अन्तःकरण पर छाये कषाय-कल्मषों को धोकर परिमार्जित किया जा सके, उसे निर्मल बनाया जा सके तो उसमें ईश्वरीय प्रकाश को झिलमिलाते देखा- अनुभव किया जा सकता है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 10 March 2018


👉 आज का सद्चिंतन 10 March 2018


👉 Non-vegetarian food can be eaten only after leaving humanity

🔷 Compassion cannot be separated between human beings and animals. Cruel actions towards animals will directly affect behavior towards human beings. One who understands having affection & love for a human being, will never be cruel & merciless to animals. The famous travelers, Fahiyan and Marco Polo, have written that, “Aside from a wretch, nobody eats non-vegetarian food in India,” As per our religious books, non vegetarian food is always reprehensible. Non vegetarianism is frowned upon by various cultures throughout the world.

🔶 Buddist and Jain philosophies are based on non-violence and Vaishnavs also treat non-vegetarianism as a sin. The same concept is mentioned in Hindu holy books such as the Vedas and Purans.

🔷 The Bible says “Oh, what are you seeing, do open your mouth in favor of animals which are being cut.” Christ also praises vegetarianism in saying, “Do not hurt anyone neither kill animals nor eat meat.”

🔶 Similarly, the Quran says, “God never forgives those who cut green trees, sell human beings, cut animals, and have relationships with another’s wife. One who has mercy on others will get mercy from the God.” We must analyze the disadvantages of non-vegetarianism and act according to our basic nature and tendencies to keep ourselves physically and mentally healthy. Practicing non vegetarianism can be seen as mercilessness and cruelty towards animals. It will be beneficial if we, ourselves, get out from such cruel habits otherwise we will demonstrate the same cruelty towards human beings, and then the world will become hell.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 YUG NIRMAN YOJANA – DARSHAN, SWAROOP AND KARYAKRAM – Vangmay 66 Page 6.86

👉 मांस मनुष्यता को त्याग कर ही खाया जा सकता है

🔷 करुणा की प्रवृत्ति अविछिन्न है। उसे मनुष्य और पशुओं के बीच विभाजित नहीं किया जा सकता। पशु-पक्षियों के प्रति बरती जाने वाली निर्दयता मनुष्यों के साथ किये जाने वाले व्यवहार को भी प्रभावित करेगी। जो मनुष्यों से प्रेम और सद्व्यवहार का मर्म समझता है वह पशु-पक्षियों के प्रति निर्दय नहीं हो सकता। भारत यात्रा करने वाले सुप्रसिद्ध फाह्यान, मार्कोपोलो सरीखे विदेशी यात्रियों ने अपनी भारत यात्राओं के विशद् वर्णनों में यही लिखा है - भारत में चाण्डालों के अतिरिक्त और कोई सभ्य व्यक्ति माँस नहीं खाता था। धार्मिक दृष्टि से तो इसे सदा निन्दनीय पाप कर्म बताया जाता रहा है।

🔶 बौद्ध और जैन धर्म तो प्रधानतया अहिंसा पर ही आधारित है। वैष्णव धर्म भी इस सम्बन्ध में इतना ही सतर्क है । वेद, पुराण, स्मृति, सूत्र आदि हिन्दू धर्म-ग्रंथों में पग-पग पर मॉंसाहार की निन्दा और निषेध भरा पड़ा है।

🔷 बाइबिल में कहा गया है - ऐ देखने वाले देखता क्यों है, इन काटे जाने वाले जानवरों के विरोध में अपनी जुबान खोल। ईसा कहते थे -किसी को मत मार। प्राणियों की हत्या न कर और मांस न खा।

🔶 कुरान में लिखा है - हरा पेड़ काटने वाले, मनुष्य बेचने वाले, जानवरों को मारने वाले और पर स्त्रीगामी को खुदा माफ नहीं करता। जो दूसरों पर रहम करेगा, वही खुदा की रहमत पायेगा। हमें बढ़ते हुए माँसाहार की प्रवृति में होने वाली हानियों पर विचार करना चाहिए और अपनी मूल प्रकृति एवं प्रवृत्ति के अनुकूल आचरण करना चाहिए ताकि शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य नष्ट होने से बच सके। निष्ठुरता और क्रूरता का दूसरा नाम ही माँसाहार है। अच्छा हो हम अपनी प्रकृति में से इन तत्त्वों को निकाले अन्यथा हमारा व्यवहार मनुष्यों के प्रति भी इन्हीं दुर्गुणों से भरा होगा और संसार में नरक के दृश्य दीखेंगे ।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम- वांग्मय 66 पृष्ठ 6.86

👉 अभागो! आँखें खोलो!!

🔷 अभागे को आलस्य अच्छा लगता है। परिश्रम करने से ही है और अधर्म अनीति से भरे हुए कार्य करने के सोच विचार करता रहता है। सदा भ्रमित, उनींदा, चिड़चिड़ा, व्याकुल और संतप्त सा रहता है। दुनिया में लोग उसे अविश्वासी, धोखेबाज, धूर्त, स्वार्थी तथा निष्ठुर दिखाई पड़ते हैं। भलों की संगति उसे नहीं सुहाती, आलसी, प्रमादी, नशेबाज, चोर, व्यभिचारी, वाचाल और नटखट लोगों से मित्रता बढ़ाता है। कलह करना, कटुवचन बोलना, पराई घात में रहना, गंदगी, मलीनता और ईर्ष्या में रहना यह उसे बहुत रुचता है।

🔶 ऐसे अभागे लोग इस दुनिया में बहुत है। उन्हें विद्या प्राप्त करने से, सज्जनों की संगति में बैठने से, शुभ कर्म और विचारों से चिढ़ होती है। झूठे मित्रों और सच्चे शत्रुओं की संख्या दिन दिन बढ़ता चलता है। अपने बराबर बुद्धिमान उसे तीनों लोकों में और कोई दिखाई नहीं पड़ता। खुशाकय, चापलूस, चाटुकार और धूर्तों की संगति में सुख मानता है और हितकारक, खरी खरी बात कहने वालों को पास भी खड़े नहीं होने देता नाम के पथ पर सरपट दौड़ता हुआ वह मंद भागी क्षण भर में विपत्तियों के भारी भारी पाषाण अपने ऊपर लादता चला जाता है।

🔷 कोई अच्छी बात कहना जानता नहीं तो भी विद्वानों की सभा में वह निर्बलता पूर्वक बेतुका सुर अलापता ही चला आता है। शाम का संचय, परिश्रम, उन्नति का मार्ग निहित है यह बात उसके गले नहीं उतरती और न यह बात समझ में आती है कि अपने अन्दर की त्रुटियों को ढूँढ़ निकालना एवं उन्हें दूर करने का प्रचण्ड प्रयत्न करना जीवन सफल बनाने के लिए आवश्यक है। हे अभागे मनुष्य! अपनी आस्तीन में सर्प के समान बैठे हुए इस दुर्भाग्य को जान। तुम क्यों नहीं देखते? क्यों नहीं पहचानते?

✍🏻 समर्थ गुरु रामदास
📖 अखण्ड ज्योति जून 1943 पृष्ठ 12

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/June/v1.12

👉 क्षमताओं का सदुपयोग-प्रगति का राजमार्ग (भाग 1)

🔷 कौशल, मनोयोग और श्रम का अमुक गति से अमुक समय तक उपयोग करने की विद्या ही समयानुसार सम्पदा बनकर सामने आती है। इस तथ्य को समझ लेने पर इस तथ्य का रहस्योद्घाटन होता है कि समय का सुनियोजन ही धन है। भ्रष्ट प्रचलनों ने जो अपवाद खड़े किये हैं वे मान्यता प्राप्त नहीं कर सकते। उन्हें तो बुहार फेंकने में ही गति है। यह प्रक्रिया आज नहीं तो कल सम्पन्न करनी ही है। अर्थ क्षेत्र की विकृतियाँ तो मानवी गरिमा, सम्भावना और सौजन्य की सभ्यता को ही जड़-मूल से उखाड़ देंगी। इसलिए जहाँ उस परिमार्जन की तैयारी करनी चाहिए, वहाँ उसके सम्बन्ध में कम से कम अपने चिन्तन और निर्धारण में समय रहते सुधार परिवर्तन कर ही लेना चाहिए।

🔶 धन की आवश्यक ललक पर अंकुश लग सके और उसके उपार्जन में अपना तथा कुटुम्बियों का अधिक श्रम, मनोयोग लग सके तो समझना चाहिए कि अर्थ समस्या का समाधान हुआ और एक ऐसा बड़ा व्यवधान हटा जो किसी उच्चस्तरीय प्रयोजन के लिए समय, श्रम और मनोयोग लग सकने जैसी स्थिति ही नहीं बनने देता। समझा जाना चाहिए कि समय ईश्वर प्रदत्त ऐसा अनुदान है जिसे श्रम के साथ संयुक्त कर देने के उपरान्त अपनी क्षमता प्रकट करना है। वह क्षमता ही मनुष्य की वास्तविक शक्ति सामर्थ्य है। उसके बदले किसी भी दिशा में चला जा सकता है और किसी भी लक्ष्य तक पहुँचा जा सकता है। मनुष्य को सर्व समर्थ कहा गया है। वह सच्चे अर्थों में अपना भाग्य विधाता और भविष्य निर्धारक है, पर यह तथ्य साकार तभी होता है, जब समय के साथ श्रम और मनोयोग का समन्वय करके अभीष्ट प्रयोजन में संकल्पपूर्वक नियोजित किया जाय।

🔷 कौन कितना जिया? इसका लेखा-जोखा वर्ष, महीने या दिनों को गिनकर नहीं करना चाहिए वरन् देखा यह जाना चाहिए कि जीने वाले ने उस अवधि को किन प्रयोजनों में कितनी तत्परतापूर्वक नियोजित किया। हो सकता है कि कम समय जीने वाला भी शंकराचार्य और विवेकानन्द की तरह अपने अविस्मरणीय पदचिह्न छोड़े और सराहनीय कृतियों के पर्वत खड़े करे। साथ ही यह भी हो सकता है कि कोई शतायु होकर मरे किन्तु निरर्थक दिन बिताये और असंतोष उगाये।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)


👉 How long can we go on tolerating vulgarly and extravagant weddings? (Part 3)

Breaking marriages, unethical traditions

🔷 I don’t understand in which era we are living? Will the married life be happy because so much money has been spent? Just because it is a status symbol, or is it ethical and wise to spend so much of the nation’s money for a wedding? Will the noble sanskaras required for a lasting and loving relationship be present in these couples? According to a recent survey, during 2007-2008 10,000 extravagant weddings were performed. Almost in all these wedlocks, there have been problems in the very first year of married life. The issues varied from dowry to several other conflicts. 30% of those marriages broke up.

🔶 When the marriages lead to such a dismal end so soon, what is the meaning of muhurat and all the money that has gone down the drain? Have wealth, jewellery, expensive baraats, vehicles and multi-cuisine dinners become simply the occasions for showing off one’s prosperity? What right do we have to play with the lives of these couples? Why don’t we resolve to perform simple and sober marriage ceremonies that inspire them to live simple, noble and austere lives dedicated to high ideals of loving kindness, compassion and service? Probably, we all have something to gain from these big and fat weddings. Otherwise why don’t the elites of society lead a campaign against this accursed custom?

📖 From Akhand Jyoti
✍🏻 Pranav Pandya

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (अन्तिम भाग)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔷 मित्रो! हमको उनके पास विशेष रूप से जाना चाहिए, जिन लोगों के पास कला है। जिन लोगों के पास लेखन की शक्ति है, जिन लोगों के पास विद्या की शक्ति है, जिन लोगों के पास बुद्धि की शक्ति है, उन लोगों के पास आप जरूर जाना। बीमारी के समय डॉक्टर के पास हमको जरूर जाना चाहिए, क्योंकि वह जानता है और उस काम को आसानी से पूरा कर सकता है। एक डॉक्टर हैजे का मुकाबला आसानी से कर सकता है, जबकि सौ गँवार मिलकर भी हैजे का मुकाबला नहीं कर सकते। इसलिए आप उनके पास चक्कर जरूर लगाना। उनकी खुशामद करने में अपमान महसूस मत करना।

🔶 आप उनकी खुशामद करना, उनकी मिन्नतें करना, जिनके अंदर आपको जीवन मालूम पड़ता है और जीवट मालूम पड़ता है। अगर आपने खुशामद की है, मिन्नतें की हैं, तो आपने भीख माँगने के लिए नहीं की है, अपना पेट भरने के लिए नहीं की है। अपना उल्लू सीधा करने के लिए नहीं की है, वरन् समाज के लिए की है, देश के लिए की है, मानवता के लिए की है और मिशन के लिए की है।

🔷 मित्रो! आपको उन लोगों की खुशामद करनी चाहिए, जिनके पास बुद्धि है, क्षमता है, जिनके पास प्रभाव है, जिनके पास अक्ल है, जिनके पास कला है, जिनके पास जान है। जो आदमी कलम को पकड़ सकते हैं, जो आदमी अपनी विद्या से दूसरों को प्रभावित कर सकते हैं। जिनके पास भगवान् ने वाणी दी है, जो बोल सकते हैं, जो व्याख्यान दे सकते हैं, उनको आप यह कहना कि आपको जो विशेषताएँ मिली हुई हैं, वह भगवान् की अमानत हैं। आपको इसको इस विशेष समय पर इस्तेमाल करना चाहिए।

🔶 गवर्नमेंट के पास रिजर्व फोर्स, रिजर्व पुलिस होती है और वह विशेष समय के लिए रखी जाती है, ताकि जिस समय इसकी बेहद आवश्यकता हो, उस समय विशेष रूप से काम आए। आप उनसे यही कहना कि आप भगवान् के रिजर्व फोर्स के तरीके से हैं, तभी तो दूसरे सामान्य लोगों की अपेक्षा ज्यादा बुद्धि दी गई है, ज्यादा प्रभाव दिया गया है, ज्यादा प्रतिभा दी गई है और ज्यादा समझदारी दी गई है। यदि आप प्रतिभाओं को, विभूतियों को जगाकर राष्ट्र-निर्माण के लिए लगा सकें, तो इससे बड़ा पुण्य कोई नहीं।

आज की बात समाप्त।
॥ ॐ शांति

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 60)

👉 मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यम्

🔷 गुरुगीता के महामंत्रों में साधना की दुर्लभ अनुभूतियाँ सँजोयी हैं। लेकिन यह मिलती केवल उन्हें है, जो निष्कपट भाव से इन मंत्रों की साधना करते हैं। यहाँ साधना का अर्थ गुरुगीता के मंत्रों का बारबार उच्चारण नहीं; बल्कि बार-बार आचरण है। जो कहा जा रहा है, उसे रटो नहीं; बल्कि उसे जीवन में उतारो, आचरण में ढालो, उसे कर्तव्य मानकर करो। जो इस साधना सूत्र को स्वीकारते हैं, फलश्रुतियाँ भी उन्हीं की अन्तश्चेतना में उतरती हैं। सिर्फ बातें बनाने से काम नहीं चलता। श्रीरामकृष्ण परमहंस देव  कहा करते थे कि यदि घर से चिट्ठी आयी है, दो जोड़ी धोती, एक कुर्ते का कपड़ा और एक किलो सन्देश (मिठाई) भिजवाना है, तो फिर वैसा करना पड़ेगा कि बाजार जाकर यह सामान खरीद कर भिजवाना होगा; केवल चिट्ठी रटने से काम चलने वाला नहीं है।
  
🔶 गुरु गीता के महामंत्रों में महेश्वर महादेव जो कुछ भी माता पार्वती से कह रहे हैं, उसके अनुसार जीवन को गढ़ना-ढालना होगा। जो ऐसा करने में जुटे हैं, उन्हें स्मरण होगा कि पिछले मंत्रों  में यह कहा गया है कि गुरुदेव की चेतना ही इस जड़-चेतन, चर-अचर में संव्याप्त है। ज्ञान शक्ति पर आरूढ़ गुरुदेव प्रसन्न होने पर शिष्यों को भोग एवं मोक्ष दोनों का ही वरदान देते हैं। वे अपने ज्ञान व तप के प्रभाव से सहज ही शिष्यों  के संचित कर्मों को भस्म कर देते हैं। श्री गुरुदेव से बढ़कर अन्य कोई तत्त्व नहीं है। उनकी सेवा से अधिक कोई दूसरा तप नहीं है। गुरुदेव ही जगत् के स्वामी हैं, वे ही जगत्गुरु हैं। शिष्य के आत्मरूप गुरुदेव ही अन्तश्चेतना की सृष्टि के समस्त प्राणियों की आत्मा हैं।
  
🔷 ऐसे सर्वव्यापी सद्गुरु की महिमा बताने के बाद भगवान् भोलेनाथ गुरुदेव की चेतना में समाए अन्य आध्यात्मिक रहस्यों को उजागर करते हैं। वे भगवती पार्वती से कहते हैं-
ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिंः पूजामूलं गुरोःपदम्। मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोःकृपा॥ ७६॥
गुरुरादिरनादिश्च गुरुः परम दैवतम्। गुरोः परतरं नास्ति तस्मै श्री गुरवे नमः॥ ७७॥
सप्तसागरपर्यन्तं तीर्थस्नानादिकं फलम्। गुरोरङ्घ्रिपयोबिन्दुसहस्रांशेन दुर्लभम्॥ ७८॥
हरौ रुष्टे गुरस्राता गुरौ रुष्टे न कश्चन। तस्मात् सर्व प्रयत्नेन श्रीगुरुं शरणं व्रजेत्॥ ७९॥
गुरुरेव जगत्सर्वं ब्रह्म विष्णुशिवात्मकम्। गुरोः परतरं नास्ति तस्मात्संपूजयेद्गुरुम्॥ ८०॥

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 97

👉 वर्दी मैंने धोयी नहीं

🔶 "2009 में उसने मुझे प्रपोज़ किया था. 2011 में हमारी शादी हुई, मैं पुणे आ गयी. दो साल बाद नैना का जन्म हुआ. उसे लम्बे समय तक काम के सिलसिले में बाहर रहना पड़ता था. हमारी बच्ची छोटी थी, इसलिए हमारे परिवारों ने कहा कि मैं बेंगलुरु आ जाऊं. मैंने फिर भी वहीं रहना चुना जहां अक्षय था. मैं हमारी उस छोटी सी दुनिया से दूर नहीं जाना चाहती थी, जो हमने मिल कर बनायी थी.

🔷 उसके साथ ज़िंदगी हंसती-खेलती थी. उससे मिलने नैना को लेकर 2011 फ़ीट पर जाना, स्काईडाइविंग करना, हमने सबकुछ किया. 2016 में उसे नगरोटा भेजा गया. हमें अभी वहां घर नहीं मिला था, इसलिए हम ऑफ़िसर्स मेस में रह रहे थे. 29 नवम्बर की सुबह 5:30 बजे अचानक गोलियों की आवाज़ से हमारी आंख खुली. हमें लगा कि ट्रेनिंग चल रही है, तभी ग्रेनेड की आवाज़ भी आने लगी. 5:45 पर अक्षय के एक जूनियर ने आकर बताया कि आतंकियों ने तोपखाने की रेजिमेंट को बंधक बना लिया है. उसके मुझसे आखरी शब्द थे "तुम्हें इसके बारे में लिखना चाहिए".

🔶 सभी बच्चों और महिलाओं को एक कमरे में रखा गया था. संतरियों को कमरे के बाहर तैनात किया गया था, हमें लगातार फ़ायरिंग की आवाज़ आ रही थी. मैंने अपनी सास और ननद से इस बीच बात की. 8:09 पर उसने ग्रुप चैट में मेसेज किया कि वो लड़ाई में है.

🔷 8:30 बजे सबको सुरक्षित जगह ले जाया गया. अभी भी हम सब पजामों और चप्पलों में ही थे. दिन चढ़ता रहा, लेकिन कोई ख़बर नहीं आ रही थी. मेरा दिल बैठा जा रहा था. मुझसे रहा नहीं गया, मैंने 11:30 बजे उसे फ़ोन किया. किसी और ने फ़ोन उठा कर कहा कि मेजर अक्षय को दूसरी लोकेशन पर भेजा गया है.

🔶 लगभग शाम 6:15 बजे कुछ अफ़सर मुझसे मिलने आये और कहा, "मैम हमने अक्षय को खो दिया है, सुबह 8:30 बजे वो शहीद हो गए." मेरी दुनिया वहीं थम गयी. जाने क्या-क्या ख़याल मेरे मन में आते रहे. कभी लगता कि काश मैंने उसे कोई मेसेज कर दिया होता, काश जाने से पहले एक बार उसे गले लगा लिया होता, काश एक आखिरी बार उससे कहा होता कि मैं उससे प्यार करती हूं.

🔷 चीज़ें वैसी नहीं होतीं, जैसा हमने सोचा होता है. मैं बच्चों की तरह बिलखती रही, जैसे मेरी आत्मा के किसी ने टुकड़े कर दिए हों. दो और सिपाही भी उस दिन शहीद हो गए थे. मुझे उसकी वर्दी और कपड़े मिले. एक ट्रक में वो सब था जो इन सालों में हमने जोड़ा था. लाख नाकाम कोशिशें कीं अपने आंसुओं को रोकने की.

🔶 आज तक उसकी वर्दी मैंने धोयी नहीं है. जब उसकी बहुत याद आती है, तो उनकी जैकेट पहन लेती हूं. उसमें उसे महसूस कर पाती हूं.
शुरू में नैना को समझाना मुश्किल था कि उसके पापा को क्या हो गया, लेकिन फिर उससे कह दिया कि अब उसके पापा आसमान में एक तारा बन गए हैं. आज हमारी जमायी चीज़ों से ही मैंने एक दुनिया बना ली है, जहां वो जीता है, मेरी यादों में, हमारी तस्वीरों में. आंखों में आंसू हों, फिर भी मुस्कुराती हूं. जानती हूं कि वो होता तो मुझे मुस्कुराते हुए ही देखना चाहता.

🔷 कहते हैं न, अगर आपने अपनी आत्मा को चीर देने का दर्द नहीं सहा, तो क्या प्यार किया. दर्द तो बहुत होता है पर हां, मैं उससे हमेशा इसी तरह प्यार करूंगी."

🔶 शहीदों के परिवारों को वो सब सहना पड़ता है, जिसके बारे में सोच कर भी शायद आप कांप उठेंगे. उनके अपने क़ुर्बान हो जाते हैं हमारी रक्षा करते-करते. हम सलाम करते हैं इन लोगों को जो ये सब सहते हैं, ताकि हम सुरक्षित रह सकें.🙇🌹

👉 अपने ऊपर भरोसा करो!

🔷 यदि आप चाहते हैं कि दूसरे लोग आपके ऊपर भरोसा करें तो इसका सबसे सुलभ और सुनिश्चित उपाय यह है कि आप अपने ऊपर भरोसा करें। दुनिया में ऐसे अनेक मनुष्य हैं जिन पर कोई भरोसा नहीं करता, उन्हें गैर जिम्मेदार और बेपैंदी का समझा जाता है तथा जगह जगह दुत्कारा जाता है। ऐसे मनुष्य अपने आपे के प्रति अविश्वासी होते हैं। उनके चेहरे से, भावभंगिमा से, वाणी से, यह स्पष्ट रूप से प्रकट होता रहता है कि वह अपने आपके ऊपर भरोसा नहीं करता।

🔶 बाहर के मनुष्य हमें उसी नाम से पुकारते हैं कि जो हम अपना नाम उनके सामने प्रकट करते हैं। जब हमारी भावभंगिमा और वाणी से दीनता तुच्छता, असमर्थता, निराशा, निर्बलता, असमर्थता प्रकट होती है तो तुरन्त ही दूसरे लोग भी हमें वैसे ही मान लेते हैं और तदनुसार ही हमारे साथ व्यवहार करते हैं। जो लोग साहस पूर्वक किसी काम के करने के लिए खड़े होते हैं और यह घोषित करते हैं कि हम इस काम को पूरा करेंगे, देखा गया है कि वे लोग सफल हो भी जाते हैं। ईश्वर मर्दों का मददगार है। वह उन लोगों की सहायता करता है जो अपनी सहायता आप करने को तत्पर होते हैं।

🔷 आपके सामने आज जो कार्यक्रम है उसे पूरी दिलचस्पी के साथ पूरा करने का प्रयत्न कीजिए अपनी योग्यता, बुद्धिमत्ता और कर्मशीलता पर पूरा भरोसा रखिए। सारी शक्ति को एकत्रित करके अपने उद्देश्य को पूरा करने में इस प्रकार प्रवृत्त हूजिए मानो सफलता प्राप्त करने के लिए आपने प्राण प्रण से निश्चय कर लिया है। छिछोरपन और हीनता की वाणी बोलना छोड़िए और गंभीरता उत्साहपूर्ण आशा तथा दृढ़ता के साथ कार्य करना सीखिए। याद रखिए-इस दुनिया में सफलता उसे मिलेगी जो आत्म विश्वासी होगा।

📖 अखण्ड ज्योति सितम्बर 1944 पृष्ठ 11
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1944/September/v1.11

👉 समाजनिष्ठा का विकास करें

🔷 स्वयं क्रिया कुशल और सक्षम होने के बावजूद भी कितने ही व्यक्ति अन्य औरों से तालमेल न बिठा पाने के कारण अपनी प्रतिभा का लाभ समाज को नहीं दे पाते। उदाहरण के लिए फुटबाल का कोई खिलाड़ी अपने खेल में इतना पारंगत है कि घण्टों गेंद को जमीन पर न गिरने दे परन्तु यह भी हो सकता है कि टीम के साथ खेलने पर अन्य खिलाड़ियों से तालमेल न बिठा पाने के कारण वह साधारण स्तर का भी न खेल सके।

🔶 अक्सर संगठनों में यही भी होता है कि कोई व्यक्ति अकेले तो कोई ज़िम्मेदारी आसानी से निभा लेते हैं, किन्तु उनके साथ दो चार व्यक्तियों को और जोड़ दिया जाय तथा कोई बड़ा काम सौंप दिया तो वे ज़िम्मेदारी से कतराने लगते हैं। कुछ व्यक्तियों को यदि किसी कार्य कि ज़िम्मेदारी सौंप दी जाय  तो हर व्यक्ति यह सोच कर अपने दायित्व से उपराम होने की सोचने लगता है कि दूसरे लोग इसे पूरा कर लेंगे।

🔷 बौद्ध साहित्य में सामूहिक जिम्मेदारी के आभाव का एक अच्छा प्रसंग आता है। किसी प्रदेश के राजा ने कोई धार्मिक अनुष्ठान करने के लिए राजधानी के निवासियों को निर्देश दिया कि सभी लोग मिलकर नगर के बाहर तैयार किये गए हौज में एक-एक लोटा दूध डालें। हौज को ढक दिया गया था और निश्चित समय पर जब हौज का ढक्कन हटाया गया तो पता चला कि दूध के भरने के स्थान पर हौज पानी से भरा था। कारण का पता लगाया गया तो मालूम हुआ कि प्रत्येक व्यक्ति ने यह सोच कर दूध के स्थान पर पानी डाला था कि केवल मैं ही पानी डाल रहा हूँ अन्य और लोग तो दूध ही डाल रहे हैं।

🔶 समाज में रहकर अन्य लोगों से तालमेल बिठाने तथा अपनी क्षमता योग्यता का लाभ समाज को देने कि स्थिति भी सामाजिकता से ही प्राप्त हो सकती है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 जीवन देवता कि साधना-आराधना वांग्मय 2/2.20

👉 अचिन्त्य चिन्तन से मनोबल न गँवाएँ (अन्तिम भाग)

🔷 अपने आपको कमजोर करने और गिराने का यह अवसाद उपक्रम जिसने भी अपनाया है, वे घाटे में रहे हैं। मनोबल को गिराना भी धीमी आत्महत्या है, जो रोग निवारण, अर्थ उपार्जन, सौभाग्य संवर्धन, संकट निवारण जैसे अगणित महत्त्वपूर्ण कार्यों में अजस्र सहयोग प्रदान करता है। गिराने, थकाने और खोखला बनाने वाले उपरोक्त मनोविकारों में चिन्तन का निषेधात्मक प्रवाह ही आधारभूत कारण होता है। जैसे सोचा होता है, उसमें वास्तविकता का नगण्य सा ही अंश रहता है। कुकल्पनाओं का घटाटोप ही ‘शंका डायन मनसामते’ की उक्ति चरितार्थ करता है। कुकल्पनाओं के अँधेरे में झाड़ी की आकृति भूत जैसी बन जाती है। साहस और विवेक की मात्रा घट जाने पर ऐसे अनगढ़ विचार उठने लगते हैं, जिनसे विपत्ति का आक्रमण और उसके कारण विनाश का भयावह दिवास्वप्न आँखों के सामने तैरने लगता है।

🔶 जब कल्पना जगत में बेपर की उड़ाने ही उड़नी हैं तो फिर उन्हें विधेयात्मक स्तर की क्यों न गढ़ा जाय? असफलता के स्थान पर सफलता का स्वप्न देखने में क्या हर्ज है? संकट के न आने और उसके स्थान पर सुखद सम्भावनाओं के आगमन की बात सोचने में भी कोई अड़चन नहीं होनी चाहिए। यथार्थता तो समय पर ही सामने आती है। आशंका तो कल्पना पर आधारित हो सकती है, सो भी मनगढ़न्त। जब गढ़ना ही रहा तो भूत क्यों गढ़ा जाय? देवता की संरचना करने में भी तो उतनी ही शक्ति लगेगी। डर वास्तविक नहीं होते। जितने संकट अनगढ़ मस्तिष्क द्वारा सोचे जाते हैं, देखा गया है, उनमें से आधे चौथाई भी सामने नहीं आते। काली घटाएँ सदा बरसने वाली ही नहीं होतीं।

🔷 अनुकूलताएँ और प्रतिकूलताएँ धूप-छाँव की तरह आती-जाती रहती हैं। उनमें से एक भी चिरस्थायी नहीं होती। सामने आने वाली परिस्थितियों का समाधान ढूँढ़ने के लिए और भी अधिक सूझ-बूझ की, साहस एवं पुरुषार्थ की आवश्यकता पड़ती है। उन्हें जुटाने के लिए मनोबल तगड़ा रहना चाहिए, अन्यथा निराशा, चिन्ता, भय जैसी कुकल्पनाएँ घिर जाने पर तो हाथ-पैर फूल जाते हैं, कुछ करते धरते नहीं बन पड़ता है, फलतः अपने ही बुने जाल में मकड़ी की तरह फँसकर अकारण कष्ट सहना पड़ता है।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 How long can we go on tolerating vulgarly and extravagant weddings? (Part 2)

A tradition that has been making this country poor and dishonest
🔷 One tradition that shows us apart from other countries even during this increased cost of living is the tradition of expensive weddings coupled with dowry and show of extravagance in spite of the modern and scientific outlook. Param Pujya Gurudev has written that ‘Expensive weddings make our country poor and dishonest’.  But what is it that is encouraging this tradition to survive and gather speed so much so that even poor families indulge in it and are getting submerged in increased debts and quarrels? Marriage is a sacred bond; it marks the union of two souls. Then why do we need to resort to so much extravagance and showoff during this sacred ceremony? There has been so much progress in science but how come it has not given us little discrimination and intelligence that we could break away from the herd and set an example? Nobody is ready. The poor blindly imitates the rich in this vulgar waste of money while celebrating weddings of their children.

‘Muhurtavaad’ has made the weddings more expensive


🔶 Whatever has been missing, those gaps have been filled by the muhurtavaad. Marriage has to be solemnized during specific muhurats. This has created a crazy situation where more and more money gets spent; there is scarcity of marriage halls and banquet halls. In addition to all this, attending several weddings on the same day becomes a matter of dilemma for a person. Astrologers also manage to have their say and fix a special day for the wedding.

🔷 Though living in a scientific age, we tend to blindly follow these trends. During the recent past, 22 and 28th November 2009 were announced to be auspicious muhurats and the so-called astrologers declared that such an auspicious time was not going to come for a long time. It is estimated that in Delhi alone, 10,000 weddings were performed and more than Rs 1200 crores was spent on these two days. This amount is equivalent to what was spent for the Lok Sabha elections in 2009. Between November 2009 and February 2010, astrologers have identified 24 auspicious days for weddings. Rs 30 to 50 lakhs are spent in a standard middle class wedding.

📖 From Akhand Jyoti
✍🏻 Pranav Pandya

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 23)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔷 सौ फीसदी मरा हुआ आदमी हो, तब तो हम नहीं कह सकते, लेकिन कोई अगर जिंदा आदमी होगा, तो उसको एक बार तड़फड़ाए बिना, उसको एक बार हिलाए बिना नहीं रह सकती। माला वालों को तो यह शायद जगाएगी नहीं। माला वाले तो अखण्ड ज्योति का चंदा इसलिए भेज देते हैं कि गुरुजी नाराज हो जाएँगे और अगली बार मुकदमे में सहायता नहीं करेंगे। वे पत्रिका को पढ़ते थोड़े ही हैं, कोई नहीं पढ़ते, लेकिन जिन लोगों ने इन विचारों को पढ़ा है, वे आदमी काँपते हैं, हिलते हैं। उन आदमियों के अंदर एक स्पंदन पैदा होता है, फुरेरी पैदा होती है।

🔶 आप इन विचारों को लेकर सामान्य जनता तक जरूर जाना। लेकिन सामान्य जनता के अलावा कोई विशेष आदमी दिखाई पड़ते हों, जिनके अंदर आपको जीवट दिखाई पड़ती हो, प्रतिभा दिखाई पड़ती हो, उनके पास आप जरूर जाना विद्यावानों के पास, प्रतिभावानों के पास, कलाकारों के पास जाना। जहाँ कहीं भी कलाकार दिखाई पड़ते हों, उनके पास आप जरूर जाना। उनसे कहना कि भगवान् ने आपको मीठा वाला गला दिया है, आपको गाने की कला आती है। आप इस गाने की कला के द्वारा जिस तरीके से कामुकता के गीत, अंध विश्वासों का समर्थन करने वाले गीत और भक्ति के नाम पर शृंगार रस के गीत गाया करते हैं।

🔷 इनके स्थान पर कहीं आप चंदवरदायी के तरीके से समय को कँपाने वाले, भूषण के तरीके से समय को कँपाने वाले, युगों में जीवन भरने वाले गीत आप इसी गले के द्वारा गाने लगें, चौराहे-चौराहे पर खड़े होकर अलख जगाने लगें-गाँव-गाँव जाकर लोगों को इकट्ठा करके गीत की कला का उपयोग करने लगें, तो आपके यही गीत आपका यही गला और गले की मिठास सैकड़ों-हजारों मनुष्यों के जीवन में हेर-फेर करने में समर्थ हो सकती है। मीरा का गला, मीरा की मिठास और मीरा का संगीत कितने आदमियों के जीवन में हेर-फेर करने में समर्थ हो गया। अतः हमको उस हर मीठे गले वाले व्यक्ति से कहना चाहिए, जिसको ये विशेषताएँ और विभूतियाँ भगवान् ने अमानत के रूप में विशेष रूप से दी हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 59)

👉 मद्गुरुः श्री जगद्गुरुः

🔷 इस सत्य को उजागर करने वाली एक सच्ची घटना यहाँ पर कहने का मन है। इस घटना पर मनन करके श्री गुरुदेव की कृपा का अनुभव किया जा सकता है। यह सत्यकथा रूसी सन्त गुरजिएफ एवं उनके एक शिष्य रूशिल मिनकोव के बारे में है। गुरजिएफ महात्मा कबीर की भाँति बड़े अक्कड़-फक्कड़ सन्त हुए हैं। वे परम ज्ञानी होने के साथ आध्यात्मिक रहस्यों के महान् जानकार थे। इस सब के बावजूद उनका व्यवहार काफी अटपटा-बेबूझ और विचित्र सा होता था। उनके शिष्य समझ ही नहीं पाते थे कि ये क्यों और किसलिए ऐसा कर रहे हैं। पर शायद यही शिष्यों की परीक्षा का उनका ढंग था। इसी कसौटी पर वे शिष्यों की श्रद्धा को जाँचा-परखा करते थे। जो इस जाँच-परख में सही पाया गया, वही आध्यात्मिक ज्ञान के लिए सुयोग्य पात्र समझा जाता था।
  
🔶 रूशिल मिनकोव ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि उनके साथ यह परीक्षा लगातार चौबीस सालों तक चलती रही। रूशिल लिखते हैं कि वह लगभग साढ़े तेईस साल की आयु में गुरजिएफ से मिले थे। बातचीत एवं श्रद्धा की अभिव्यक्ति के क्रम में उन्होंने कहा- गुरुदेव मैं अध्यात्म विद्या पाना चाहता हूँ। शिष्य की इस चाहत पर गुरजिएफ बोले- ठीक है मिलेगी; पर देख, पाँव जमाकर इस कोठरी में रहना। जो भी हो उसे सहना, भागना मत। पीड़ा, परेशानी, अपमान, तिरस्कार सभी कुछ यदि तू सहता रहा, तो समझ तू वह सब पा जाएगा जिसकी तुझे चाहत है। अपने, गुरु के इस कथन पर मिनकोव ने हाँ भर दी। हालाँकि उसे उस समय भविष्य में आने वाली परेशानियों का कोई अन्दाजा नहीं था।
  
🔷 गुरजिएफ के शरीर छोड़ते ही उस पर एक के बाद एक नए-नए वज्रपात होना शुरू हो गए। सालों-साल चलने वाली शारीरिक व्याधियाँ, जैसे-तैसे घिसट-घिसट कर चलता जीवन। हालाँकि मिनकोव अपनी पीड़ाओं के बावजूद किसी अन्य की सहायता करने से चूकता नहीं था। जिनकी वह सहायता करता उसमें पुरुष-स्त्रियाँ, बच्चे सभी शामिल थे। अपनी सारी सहायताओं एवं सभी अच्छे कर्मों के बदले उसे वंचना ही मिली। प्रत्येक सत्कर्म के बदले दुष्परिणाम! जब तब लगने वाले चारित्रिक लांछन उसे प्रायः पीड़ाओं में डुबोए रखते; पर करता भी क्या? श्री गुरुदेव को दिया गया वचन था। ऐसी ही विपत्तियों से जूझते-जूझते अठारह वर्ष बीत गए। हालाँकि संकट यथावत् थे।
  
🔶 उसके मन में शंकाएँ घर करने लगीं; क्योंकि शरीर छोड़ने के बाद गुरजिएफ ने उसे स्वप्न में भी दर्शन नहीं दिए थे। पर इस उन्नीसवें साल में गुरजिएफ की एक अन्य शिष्या ने उसे बताया कि अभी ६ वर्षों की सघन पीड़ाएँ सहनी है। गुरुदेव यही चाहते हैं। ६ सालों के सघन मानसिक यातना एवं कठोर श्रम के बाद ही तुम्हारे  जीवन में प्रकाश का अवतरण होगा। मिनकोव  ने छः वर्ष भी बिताए और अपने निष्कर्ष में कहा कि आज मैं गुरुदेव की कृपा को अनुभव कर रहा हूँ, जो कर्मजाल शायद अनेकों जन्मों में भी न कटता, उन्होंने मात्र चौबीस सालों में ही काट दिया। सद्गुरु जिस पर जितना ज्यादा कठोर हैं, समझो उस पर उतने ही अधिक कृपालु हैं। मिनकोव की ये बातें रहस्यमय होते हुए भी सद्गुरु की करुणा को जताती हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 95

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 09 March 2018


👉 आज का सद्चिंतन 09 March 2018


👉 जीवन सम्पदा:-

🔷 एक सुबह, अभी सूरज भी निकला नहीं था और एक मांझी नदी के किनारे पहुंच गया था। उसका पैर किसी चीज से टकरा गया , झुक कर उसने देखा, पत्थरों से भरा हुआ एक झोला पड़ा था।

🔶 उसने अपना जाल किनारे पर रख दिया, वह सुबह सूरज के उगने की प्रतीक्षा करने लगा। सूरज उग आए, वह अपना जाल फेंके और मछलियां पकड़े।

🔷 वह जो झोला उसे पड़ा हुआ मिल गया था, जिसमें पत्थर थे, वह एक-एक पत्थर निकाल कर शांत नदी में फेंकने लगा ।सुबह के सन्नाटे में उन पत्थरों के गिरनेकी छपाक की आवाज सुनता, फिर दूसरा पत्थर फेंकता । धीरे-धीरे सुबह का सूरज निकला, रोशनी हुई। तब तक उसने झोले के सारे पत्थर फेंक दिए थे, सिर्फ एक पत्थर उसके हाथ में रह गया था।

🔶 सूरज की रोशनी में देखते से ही जैसे उसके हृदय की धड़कन बंद हो गई, सांस रुक गई। उसने जिन्हें पत्थर समझ कर फेंक दिया था, वे हीरे-जवाहरात थे! लेकिन अब तो अंतिम हाथ में बचा था टुकड़ा और वह पूरे झोले को फेंक चुका था।

🔷 वह रोने लगा, चिल्लाने लगा। इतनी संपदा उसे मिल गई थी कि अनंत जन्मों के लिए काफी थी, लेकिन अंधेरे में, अनजान, अपरिचित, उसने उस सारी संपदा को पत्थर समझ कर फेंक दिया था ।लेकिन फिर भी वह मछुआ सौभाग्यशाली था क्योंकि अंतिम पत्थर फेंकने के पहले सूरज निकल आया था और उसे दिखाई पड़ गया था कि उसके हाथ में हीरा है।

🔶 साधारणतः सभी लोग इतने सौभाग्यशाली नहीं होते हैं। जिंदगी बीत जाती है, सूरज नहीं निकलता, सुबह नहीं होती, रोशनी नहीं आती और सारे जीवन के हीरे हम पत्थर समझ कर फेंक चुके होते हैं।

🔷 जीवन एक बड़ी संपदा है, लेकिन आदमी सिवाय उसे फेंकने और गंवाने के कुछ भी नहीं करता है! जीवन क्या है, यह भी पता नहीं चल पाता और हम उसे फेंक देते हैं! जीवन में क्या छिपा था--कौन से राज, कौन सा रहस्य, कौन सा स्वर्ग, कौन सा आनंद, कौन सी मुक्ति--उस सबका कोई भी अनुभव नहीं हो पाता और जीवन हमारे हाथ से रिक्त हो जाता है!

🔶 गुरू रूपी प्रकाश किसी को मिल जाता है तो शेष जीवन तो संवर ही जाता है।