रविवार, 14 अगस्त 2016

छोटी उम्र में महान कार्य करने वाले भारतीय


🔴 विवेकानंद: 39 साल का पूरा जीवन और 32 साल की उम्र मे पूरे विश्व मे हिन्दुत्व का डंका बजाने वाले निर्विवाद भारतीय महापुरुष।

🔵 रानी लक्ष्मी बाई: 30 साल की उम्र मे अंग्रेज़ो के खिलाफ क्रांति का नेतृत्व करने वाली अमर बलिदानी झाँसी की रानी।

🔴 भगत सिंह: 23 वर्ष की अल्पायु मे बलिदान। भगत सिंह भारत के एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी थे। भगतसिंह ने देश की आज़ादी के लिए जिस साहस के साथ शक्तिशाली ब्रिटिश सरकार का मुक़ाबला किया, वह आज के युवकों के लिए एक बहुत बड़ा आदर्श है। इन्होंने केन्द्रीय संसद (सेण्ट्रल असेम्बली) में बम फेंककर भी भागने से मना कर दिया। जिसके फलस्वरूप इन्हें 23 मार्च, 1931 को इनके दो अन्य साथियों, राजगुरु तथा सुखदेव के साथ फाँसी पर लटका दिया गया।


🔵 खुदीराम बोस: भारतीय स्वाधीनता के लिये मात्र 19 साल की उम्र में हिन्दुस्तान की आजादी के लिये फाँसी पर चढ़ गये। मुज़फ्फरपुर जेल में जिस मजिस्ट्रेट ने उन्हें फाँसी पर लटकाने का आदेश सुनाया था, उसने बाद में बताया कि खुदीराम बोस एक शेर के बच्चे की तरह निर्भीक होकर फाँसी के तख़्ते की ओर बढ़ा था। जब खुदीराम शहीद हुए थे तब उनकी आयु 19 वर्ष थी। शहादत के बाद खुदीराम इतने लोकप्रिय हो गए कि बंगाल के जुलाहे उनके नाम की एक ख़ास किस्म की धोती बुनने लगे।

🔴 करतार सिंह साराभा: 19 साल की उम्र मे लाहौर कांड के अग्रदूतों मे एक होने के कारण फांसी की सजा। देश के लिए दिया गया सर्वोच्च बलिदान।

🔵 अशफाक़ उल्ला खाँ: 27 साल की उम्र मे देश के लिए प्राणो की आहुती देने वाले वीर हुतात्मा।

🔴 उधम सिंह: 14 साल की उम्र से लिए अपने प्रण को उन्होने 39 साल की उम्र मे पूरा किया और देश के लिए फांसी चढ़े। उन्होने जालियाँवाला बाग हत्याकांड के उत्तरदायी जनरल डायर को लन्दन में जाकर गोली मारी और निर्दोष लोगों की हत्या का बदला लिया।

🔵 गणेश शंकर विद्यार्थी: 25 साल की उम्र से सक्रिय 40 साल की उम्र मे हिन्दुत्व की रक्षा के लिए बलिदान।

🔴 राजगुरु: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रमुख क्रान्तिकारी थे । 23 साल की उम्र मे इन्हें भगत सिंह और सुखदेव के साथ 23 मार्च 1931 को फाँसी पर लटका दिया गया था ।

🔵 सुखदेव: 33 साल की अल्पायु मे 23 मार्च 1931 को इन्होंने भगत सिंह तथा सुखदेव के साथ लाहौर सेण्ट्रल जेल में फाँसी के तख्ते पर झूल कर अपने नाम को हिन्दुस्तान के अमर शहीदों की सूची में अहमियत के साथ दर्ज करा दिया।

🔴 चन्द्रशेखर आजाद : 25 साल की उम्र मे बलिदान : चन्द्रशेखर आज़ाद ने वीरता की नई परिभाषा लिखी थी। उनके बलिदान के बाद उनके द्वारा प्रारम्भ किया गया आन्दोलन और तेज हो गया, उनसे प्रेरणा लेकर हजारों युवक स्वरतन्त्रता आन्दोलन में कूद पड़े। आजाद की शहादत के सोलह वर्षों बाद 15 अगस्त सन् 1947 को हिन्दुस्तान की आजादी का उनका सपना पूरा तो हुआ किन्तु वे उसे जीते जी देख न सके। आजाद अपने दल के सभी क्रान्तिकारियों में बड़े आदर की दृष्टि से देखे जाते थे। सभी उन्हें पण्डितजी ही कहकर सम्बोधित किया करते थे। वे सच्चे अर्थों में पण्डित राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ के वास्तविक उत्तराधिकारी थे।

🔵 मंगल पांडे: सन् 1857 के प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के अग्रदूत थे। क्रांति के समय और फांसी दिये जाने के समय इनकी उम्र 30 साल थी।
🔴 राम प्रसाद ‘बिस्मिल’: काकोरी कांड के क्रांतिकारी । 28 साल की उम्र मे काकोरी कांड से अंग्रेज़ सत्ता हो हिला के रख दिया और 30 साल की उम्र मे बलिदान।

महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी


👉 अखिल विश्व गायत्री परिवार के संस्थापक महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य के इस पक्ष को भी जानिए।

🔵 परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य राष्ट्र के परावलम्बी होने की पीड़ा भी उन्हें उतनी ही सताती थी जितनी कि गुरुसत्ता के आदेशानुसार तपकर सिद्धियों के उपार्जन की ललक उनके मन में थी। उनके इस असमंजस को गुरुसत्ता ने ताड़कर परावाणी से उनका मार्गदर्शन किया  कि युगधर्म की महत्ता व समय की पुकार देख- सुनकर तुम्हें अन्य आवश्यक कार्यों को छोड़कर अग्निकाण्ड में पानी लेकर दौड़ पड़ने की तरह आवश्यक कार्य भी करने पड़ सकते हैं।

🔴 इसमें स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के नाते संघर्ष करने का भी संकेत था। १९२७ (1927) से १९३३ (1933) तक का समय उनका एक सक्रिय स्वयं सेवक-स्वतंत्रता सेनानी के रूप में बीता, जिसमें घरवालों के विरोध के बावजूद पैदल लम्बा रास्ता पार कर वे आगरा के उस शिविर में पहुँचे, जहाँ शिक्षण दिया जा रहा था, अनेकानेक मित्रों- सखाओं के साथ भूमिगत हो कार्य करते रहे तथा समय आने पर जेल भी गये ।। छह-छह माह की उन्हें कई बार जेल हुई ।।

🔵 जेल में भी जेल के निरक्षर साथियों को शिक्षण देकर व स्वयं अँग्रेजी सीखकर लौटै। आसनसोल जेल में वे श्रीमती स्वरूपरानी नेहरू, श्री रफी अहमद किदवई, महामना मदनमोहन मालवीय जी, देवदास गाँधी जैसी हस्तियों के साथ रहे व वहाँ से एक मूलमंत्र सीखा जो मालवीय जी ने दिया था कि जन- जन की साझेदारी बढ़ाने के लिए हर व्यक्ति के अंशदान से, मुट्ठी फण्ड से रचनात्मक प्रवृत्तियाँ चलाना।

🔴 यही मंत्र आगे चलकर एक घंटा समयदान, बीस पैसा नित्य या एक दिन की आय एक माह में तथा एक मुट्ठी अन्न रोज डालने के माध्यम से धर्म घट की स्थापना का स्वरूप लेकर लाखों- करोड़ों की भागीदारी वाला गायत्री परिवार बनता चला गया, जिसका आधार था - प्रत्येक व्यक्ति की यज्ञीय भावना का उसमें समावेश।

🔵 स्वतंत्रता की लड़ाई के दौरान कुछ उग्र दौर भी आये, जिनमें शहीद भगतसिंह को फाँसी दिये जाने पर फैले जन आक्रोश के समय श्री अरविन्द के किशोर काल की क्रान्तिकारी स्थिति की तरह उनने भी वे कार्य किये, जिनसे आक्रान्ता शासकों प्रति असहयोग जाहिर होता था। नमक आन्दोलन के दौरान वे आततायी शासकों के समक्ष झुके नहीं, वे मारते रहे परन्तु, समाधि स्थिति को प्राप्त राष्ट्र देवता के पुजारी को बेहोश होना स्वीकृत था पर आन्दोलन के दौरान उनने झण्डा छोड़ा नहीं जबकि, फिरंगी उन्हें पीटते रहे, झण्डा छीनने का प्रयास करते रहे। उन्होंने मुँह से झण्डा पकड़ लिया, गिर पड़े, बेहोश हो गये पर झण्डे का टुकड़ा चिकित्सकों द्वारा दाँतों में भींचे गये टुकड़े के रूप में जब निकाला गया तक सब उनकी सहनशक्ति देखकर आश्चर्यचकित रह गये। उन्हें तब से ही आजादी के मतवाले उन्मत्त श्रीराम मत्त नाम मिला।

🔴 अभी भी भी आगरा में उनके साथ रहे या उनसे कुछ सीख लिए अगणित व्यक्ति उन्हें मत्त जी नाम से ही जानते हैं।

🔵 लगानबन्दी के आकड़े एकत्र करने के लिए उन्होंने पूरे आगरा जिले का दौरा किया व उनके द्वारा प्रस्तुत वे आँकड़े तत्कालीन संयुक्त प्रान्त के मुख्यमंत्री श्री गोविन्द वल्लभ पंत द्वार गाँधी जी के समक्ष पेश किये गये। बापू ने अपनी प्रशस्ति के साथ वे प्रामाणिक आँकड़े ब्रिटिश पार्लियामेन्ट भेजे, इसी आधार पर पूरे संयुक्त प्रान्त के लगान माफी के आदेश प्रसारित हुए।

🔴 कभी जिनने अपनी इस लड़ाई के बदले कुछ न चाहा, उन्हें सरकार ने अपने प्रतिनिधि के साथ सारी सुविधाएँ व पेंशन दिया, जिसे उनने प्रधानमंत्री राहत फण्ड के नाम समर्पित कर दी। वैरागी जीवन का, सच्चे राष्ट्र संत होने का इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है?
 

👉 समाधि के सोपान (भाग 17) (In The Hours Of Meditation)


🔴 अहो! एक जीवन है, जो प्रेम है, आनन्द है। मैं- वही जीवन हूँ। उस जीवन को कोई सीमित नहीं कर सकता, परिमित नहीं कर सकता तथा वही अनन्त जीवन है। वही शाश्वत जीवन है और वह जीवन मैं ही हूँ। उसका स्वभाव शांति है और मैं स्वयं शांति हूँ। उसकी समग्रता में कहीं कलह नहीं है। त्वरित आवागमन नहीं है। जीने की निर्दय चेष्टा नहीं है, प्रजनन की इच्छा नहीं है। वह अस्तिमात्र है। मैं वही जीवन हूँ। सूर्य और तारे इसे धारण नहीं कर सकते। इस ज्योति से अधिक प्रकाशमान और कोई ज्योति नहीं है। यह स्वयं- प्रभ है। इस जीवन की गहराइयों को नहीं नापा जा सकता। इसकी ऊँचाइयों को नहीं नापा जा सकता। मैं ही वह जीवन हूँ। तथा तुम मुझमें और मैं तुममें हूँ।

🔵 स्वयं निरालम्ब हो कर भी मैं सब का अवलम्बन हूँ। सभी रूपों में आत्मा मैं ही हूँ। जीवन की ध्वनि में मैं मौन हूँ। समय के ताने- बाने में बुना हुआ सब कुछ मैं ही हूँ। विचार और रूप के परे आत्मा मैं ही हूँ। मनरहित होकर भी मैं सर्वज्ञ हूँ। अरूप होकर भी मैं सर्वत्र हूँ। अधार्य होकर मैं सभी में विद्यमान हूँ। मैं शक्ति  हूँ ! मैं शांति हूँ। मैं अनंत हूँ।  मैं शाश्वत हूँ। सभी विविधताओं में ऐक्य स्थापन करने वाला सूत्र मैं ही हूँ। सभी जीवधारियों का सारतत्त्व मैं ही हूँ। सभी संघर्षरत अंशों का पूर्ण मैं ही हूँ। जन्म मृत्यु की सीमा के परे, अमर, अजन्मा, बंधनमुक्त में ही विद्यमान हूँ। जो मुझे पा लेता है वही मुक्त है।

🔴 सभी भ्रान्तियों के मध्य में मैं सत्य को देखता हूँ। वह दृश्य सत्य मैं ही हूँ। माया जो कि माँ का ही स्वरूप है, मैं उस मायिक शक्ति का शक्तिधर हूँ। काल के गर्भ से उत्पन्न होकर सभी रूपधारियों में मैं ही रूपधारण करता हूँ। मैं काल का भी जन्मस्थान हूँ। इसलिए शाश्वत हूँ। तथा जीव, तू वही है, जो मुझमें है, वही अन्तरात्मा ! इसलिए उठो, जागो और सभी बंधनों को छिन्न भिन्न कर दो। सभी स्वप्नों को भंग कर दो। भ्रांतियों को दूर कर दो। तुम्हीं आत्मा हो। आत्मा ही तुम हो। तुच्छता तुम्हारे स्वरूप के अनुभव में बाधा दे सकती है।  उठो ! उठो !! और जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाय न रुको। लक्ष्य जो आत्मा है, जीवन है, प्रेम है, है, जो कि मुक्त आत्मा का आनन्द, -ज्ञान है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 आत्मचिंतन के क्षण 14 AUG 2016


🔴 उतावले और जल्दबाज, असंतुष्ट और उद्विग्न व्यक्ति एक प्रकार के अधपगले कहे जा सकते हैं वे जो कुछ चाहते हैं उसके तुरन्त ही प्राप्त हो जाने की कल्पना किया करते हैं। यदि जरा भी देर लगती है तो अपना मानसिक संतुलन खो बैठते हैं और प्रगति के लिए अत्यन्त आवश्यक गुण मानसिक स्थिरता को खोकर असंतोष रूपी उस भारी विपत्ति को कंधे पर ओढ़ लेते हैं, जिसका भार लेकर उन्नति की दिशा में कोई आदमी देर तक नहीं चल सकता।
 
🔵 अपनी आलोचना कर सकना, आत्म-निरीक्षण करके अपनी बुराइयाँ ढूँढना और उन्हें सुधारने के लिए तत्पर होना सचमुच ही एक बड़ी बहादुरी और दूरदर्शिता का काम है। जिसमें इतना साहस आ गया, उसे सच्चे अर्थों में आध्यात्मिक व्यक्ति कहा जा सकता है।
 
 🔴 बड़प्पन की इच्छा सबको होती है, पर बहुत कम लोग यह जानते हैं कि उसे कैसे प्राप्त किया जाय। जो जानते हैं वे उस ज्ञान को आचरण में लाने का साहस नहीं करते। आमतौर से यह सोचा जाता है कि जिसका ठाटबाट जितना बड़ा है वह उसी अनुपात से बड़ा माना जाएगा। मोटर, बंगला, सोना, जायदाद, कारोबार, सत्ता, पद आदि के अनुसार किसी को बड़ा मानने का रिवाज चल पड़ा है। इससे प्रतीत होता है कि लोग मनुष्य के व्यक्तित्व को नहीं, उसकी दौलत को बड़ा मानते हैं- यह दृष्टिदोष ही है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

👉 अशुभ चिंतन छोड़िये-भय मुक्त होइये (भाग 1)


🔵 अपने कार्यकारी जीवन में लोग कई तरह की अशुभ आशंकाओं से आतंकित रहते हैं। रोजगार ठीक से चलेगा या नहीं, कहीं व्यापार में हानि तो नहीं हो जाएगी, नौकरी से हटा तो नहीं दिया जायेगा, अधिकारी नाराज तो नहीं हो जायेंगे जैसी चिन्ताएँ लोगों के मन मस्तिष्क पर हावी होने लगती हैं तो वह जो काम हाथ में होता है, उसे भी सहज ढंग से नहीं कर पाता। इन अशुभ आशंकाओं के करते रहने से मन में जो स्थाई गाँठ पड़ जाती है उसकी का नाम भय है।

🔴 भय का एक सामान्य रूप यह भी होता है कि अन्धेरे में जाते ही डर लगता है, अकेले यात्रा करने में किसी अनिष्ट की सम्भावना दिखाई देती है, रोगी होने बीमार पड़ने पर रोग के ठीक न होने तथा उसी के कारण मृत्युद्वार तह पहुँच जाने का डर रहता है। यह भी भविष्य के प्रति अशुभ आशंकाओं का ही छोटा रूप है। अँधेरे में जाते समय जी क्यों काँपने लगाता है? इसलिए कि आशंका होती है कहीं कोई कीड़ा-काँटा न बैठा हो या कोई भूत-प्रेत ही न पकड़ ले। अकेले यात्रा करने में भी चोर डाकुओं द्वारा सताये जाने, लूट लेने की आशंका ही डराती है। इस तरह के डर भी एक तरह से भविष्य के प्रति अशुभ आशंकाओं के परिणाम ही हैं।

🔵 इस तरह की आशंकाएँ स्वभाव बन कर भय के रूप में परिणत हो जाती हैं और इन आशंकाओं या भयों का एक ही कारण है- मन की दुर्बलता। भय और कुछ नहीं मन की दुर्बलता से उत्पन्न हुआ भूत ही है। इस सम्बन्ध में एक जापानी लोक कथा प्रचलित है। किसी व्यक्ति को एक डरावना जिन्न सताया करता था। वह जागता था तो जिन्न सामने खड़ा रहता था और उसे तरह-तरह से सताया करता था, सोता था तो सपने में डरावनी हरकतों से उसे परेशान करता था। एक दिन उसने हिम्मत कर जिन्न से पूछ ही लिया, ‘तुम कहाँ से आ गए हो? क्यों मुझे इतना सताते रहते हो? मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
🌹 अखण्ड ज्योति जून 1981 पृष्ठ 20
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1981/January.20

👉 आत्मचिंतन के क्षण 15 Dec 2018

प्रतिभा किसी पर आसमान से नहीं बरसती, वह अंदर से ही जागती है। उसे जगाने के लिए केवल मनुष्य होना पर्याप्त है। वह अन्य कोई प्रतिबन्ध नहीं...