गुरुवार, 21 जुलाई 2016

🌞 शिष्य संजीवनी (भाग 61) 👉 व्यवहारशुद्धि, विचारशुद्धि, संस्कारशुद्धि

  
🔴 शिष्य संजीवनी के सूत्र शिष्यों को अपने अन्तरतम में छुपे जीवन के परम रहस्य को अनुभव करने का अवसर देते हैं। यह अवसर अतिदुर्लभ है। युगों की साधना और सद्गुरु कृपा के बल पर कोई विरला शिष्य इसे जानने का अधिकारी हो पाता है। सामान्यतया तो शिष्य और साधक अहंकार की भटकन भरी भूल भुलैया में उलझते- फंसते और फिसलते रहते हैं। शिष्यों का अहं उन्हें सौ चकमे देता है, सैकड़ों भ्रम खड़े करता है। कभी- कभी तो इन भ्रमों व भुलावों में पूरी जिन्दगी ही चली जाती है। अहं के इन्हीं वज्रकपाटों की वजह से अपना ही अन्तरतम अनदेखा रह जाता है। इसके भीतर झांकने और जानने की कौन कहे- इसका स्पर्श तक दुर्लभ रहता है। जबकि जीवन के परम रहस्य इसी में संजोये और समाए हैं। इसी में गूंथे और पिरोये गए हैं।
     
🔵 यह अनुभव उन सभी का है जो शिष्यत्व की कठिन कसौटियों पर कसे गए हैं। जिन्होंने अनगिनत साहसिक परीक्षाओं में अपने को खरा साबित किया है। वे सभी कहते हैं- ‘पूछो अपने अन्तरतम से, उस एक से, जीवन के परम रहस्य को, जो कि उसने तुम्हारे लिए युगों से छिपा रखा है। अनुभव कहता है कि जीवात्मा की वासनाओं को जीत लेने का कार्य बड़ा कठिन है। इसमें युगों लग जाते हैं। इसलिए उसके पुरस्कार को पाने की आशा मत करो, जब तक कि वासनाओं को जीत लेने का दुष्कर कार्य पूरा न हो जाए। इस कार्य के पूरा हो जाने पर ही इस नियम की उपयोगिता सिद्ध होती है। तभी मानव- अतिमानव अवस्था की ड्योढ़ी पर पहुँच पाता है।

🔴 इस अवस्था में जो ज्ञान मिलता है वह इसी कारण मिल पाता है कि अब तुम्हारी आत्मा सभी शुद्धतम आत्माओं में से एक है। और उस परम तत्त्व से एक हो गयी है। यह ज्ञान तुम्हारे पास उस परमात्मा की धरोहर है। उन प्रभु के साथ तनिक सा भी विश्वासघात अथवा इस दुर्लभ ज्ञान का दुरुपयोग अथवा अवहेलना शिष्य या साधक के पतन का कारण भी हो सकता है। कई बार ऐसा होता है कि परमात्मा की ड्योढ़ी तक पहुँच जाने वाले लोग भी नीचे गिर जाते हैं। इसलिए इस क्षण के प्रति श्रद्धा एवं भय के साथ सजग रहो।’

🌹 क्रमशः जारी
🌹 डॉ. प्रणव पण्डया
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Devo/vyav

👉 उपासना, साधना व आराधना (भाग 5)


🔵 अगर आपका मन संसार की ओर अधिक लगा हुआ है, तो आप आध्यात्मिकता की ओर कैसे बढ़ पाएँगे? फिर आपका मन पूजा- उपासना में कैसे लगेगा? आप इस दिशा में आगे कैसे बढ़ेंगे? गोली चलाने वाला अगर निशाना न साधे, तो उसका काम कैसे चलेगा? वह कभी इधर को भटके, कभी उधर को भटके, तो उससे निशाना कैसे साधा जाएगा? बीस जगह ध्यान रहा, तो आप विजेता नहीं बन सकते हैं। भगवान् आपको अपनाने के लिए हाथ बढ़ा रहा है, परन्तु ये तीन हथकड़ियाँ वासना, तृष्णा एवं अहंता आपको भगवान् तक पहुँचने में रुकावट पैदा कर रही हैं। आपको इनसे लोहा लेना होगा। आप अगर अपने हाथों को नहीं खोलेंगे, तो भगवान् की गोद में आप कैसे जाएँगे?

🔴 मित्रो, साधना में आपको अपने मन को समझाना होगा। अगर मन नहीं मानता है, तो आपको उसकी पिटाई करनी होगी। बैल जब खेतों में हल नहीं खींचता है तथा घोड़ा जब रास्ते पर चलने अथवा दौड़ने को तैयार नहीं होता है, तो उसकी पिटाई करनी पड़ती है। हमने अपने आपको इतना पीटा है कि उसका कहना नहीं। हमने अपने आपको इतना धुलने का प्रयास किया है कि उसे हम कह नहीं सकते। इस प्रकार धुलाने के कारण हम फकाफक कपड़े के तरीके से आज धुले हुए उज्ज्वल हो गये। हमने अपने आपको रूई की तरह से धुनने का प्रयास किया है, जो धुनने के पश्चात् फूलकर इतनी स्वच्छ और मोटी हो जाती है कि उससे नयी चीज का निर्माण होता है।

🔵 भगवान् का भजन करने एवं नाम लेने के लिए अपना सुधार करना परम आवश्यक है। वाल्मीकि ने जब यह काम किया, तो भगवान् के परमप्रिय भक्त हो गये। उनकी वाणी में एक ताकत आ गयी। उसने डकैती छोड़ दी, उसके बाद भगवान् का नाम लिया, तो काम बन गया। कहने का मतलब यह है कि आप अपने आपको धोकर इतना निर्मल बना लें कि भगवान् आपको मजबूर होकर प्यार करने लग जाए। राम नाम के महत्त्व से ज्यादा आपकी जीभ का महत्त्व है। आप जीभ पर कंट्रोल रखिए, तब ही काम बनेगा। जीभ पर काबू रखें, आप ईमानदारी की कमाई खाएँ, बेईमानी की कमाई न खाएँ।

🔴 हमने अपनी जीभ को साफ किया है। उसे इस लायक बनाया है कि गुरु का नाम लेकर जो भी वरदान देते हैं, वह सफल हो जाता है। आप भी जीभ को ठीक कीजिए न! आप अपने आपको सही करें। अपने जीवन में सादा जीवन उच्च विचार लाएँ। इस सिद्धान्त को जीवन का अंग बनाने से ही काम बनेगा। आपको खाने के लिए दो मुट्ठी अनाज और तन ढँकने के लिए थोड़ा- सा कपड़ा चाहिए, जो इस शरीर के द्वारा आप सहज ही पूरा कर सकते हैं। फिर आप अपने जीवन को शुद्ध एवं पवित्र क्यों नहीं बनाते। अगर यह काम करेंगे, तो आप भगवान् की गोदी के हकदार हो जाएँगे। ऐसा बनकर आदमी बहुत कुछ काम कर सकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पूज्य पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Lectures/112

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ८१)

👉 अथर्ववेदीय चिकित्सा पद्धति के प्रणेता युगऋषि युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव इस अथर्ववेदीय अध्यात्म चिकित्सा के विशेषज्ञ थे। उनका कहना था कि...