रविवार, 17 फ़रवरी 2019

👉 जरा सोचिये !!!

एक बार किसी रेलवे प्लैटफॉर्म पर जब गाड़ी रुकी तो एक लड़का पानी बेचता हुआ निकला। ट्रेन में बैठे एक सेठ ने उसे आवाज दी,ऐ लड़के इधर आ!!लड़का दौड़कर आया। उसने पानी का गिलास भरकर सेठ की ओर बढ़ाया तो सेठ ने पूछा, कितने पैसे में? लड़के ने कहा - पच्चीस पैसे।सेठ ने उससे कहा कि पंदह पैसे में देगा क्या?

यह सुनकर लड़का हल्की मुस्कान दबाए पानी वापस घड़े में उड़ेलता हुआ आगे बढ़ गया।
उसी डिब्बे में एक महात्मा बैठे थे, जिन्होंने यह नजारा देखा था कि लड़का मुस्कराय मौन रहा। जरूर कोई रहस्य उसके मन में होगा। महात्मा नीचे उतरकर उस लड़के केपीछे- पीछे गए। बोले : ऐ लड़के ठहर जरा, यह तो बता तू हंसा क्यों?

वह लड़का बोला, महाराज, मुझे हंसी इसलिए आई कि सेठजी को प्यास तो लगी ही नहीं थी। वे तो केवल पानी के गिलास का रेट पूछ रहे थे।

महात्मा ने पूछा - लड़के, तुझे ऐसा क्यों लगा कि सेठजी को प्यास लगी ही नहीं थी।

लड़के ने जवाब दिया - महाराज, जिसे वाकई प्यास लगी हो वह कभी रेट नहीं पूछता। वह तो गिलास लेकर पहले पानी पीता है। फिर बाद में पूछेगा कि कितने पैसे देने हैं?
पहले कीमत पूछने का अर्थ हुआ कि प्यास लगी ही नहीं है।

वास्तव में जिन्हें ईश्वर और जीवन में कुछ पाने की तमन्ना होती है, वे वाद-विवाद में नहीं पड़ते। पर जिनकी प्यास सच्ची नहीं होती, वे ही वाद-विवाद में पड़े रहते हैं।
वे साधना के पथ पर आगे नहीं बढ़ते.

अगर भगवान नहीं हे तो उसका ज़िक्र क्यो??
और अगर भगवान हे तो फिर फिक्र क्यों ???

समय दान ही युगधर्म
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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https://youtu.be/N_eAjQRo25g

👉 आज का सद्चिंतन 17 Feb 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 17 Feb 2019


👉 जहाँ जाना है उसे ठीक बनाया

एक राज्य का यह नियम था कि जन साधारण में से जो राजा चुनकर गद्दी पर बिठाया जाय ठीक अनाया दस वर्ष बाद ऐसे निविड़ एकाकी द्वीप में छोड़ दिया जाय, जहाँ अन्न जल उपलब्ध न हो। कितने ही राजा इसी प्रकार अपने प्राण गवाँ चुके थे। जो अपना राज्यकाल बिताते थे उन्हें अन्तिम समय में अपने भविष्य की चिन्ता दु:खी करती थी, तब तक समय आ चुका होता था।

एक बार एक बुद्धिमान व्यक्ति जानबूझकर उस समय गद्दी पर बैठा जब कोई भी उस पद को लेने के लिए तैयार न था। उसे भविष्य का ध्यान था। उसने उस द्वीप को अच्छी तरह देखा व वहाँ खेती कराने, जलाशय बनाने, पेड़ लगाने तथा व्यक्तियों को बसाने का कार्य आरम्भ कर दिया। दस वर्ष में वह नीरव एकाकी प्रदेश अत्यन्त रमणीक बन गया। अपनी अवधि समाप्त होते ही राजा वहाँ गया और सुख पूर्वक शेष जीवन व्यतीत किया।

जीवन के थोडे़ दिन 'स्वतन्त्र चयन' के रूप में हर व्यक्ति को मिलते हैं। इसमें वर्तमान का सुनियोजन और भविष्य की सुखद तैयारी जो कर लेता है, वह दूरदर्शी राजा की तरह सुखपूर्वक जीता है।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग १


स्वाध्याय एवं सत्संग।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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https://youtu.be/IIJG66Dp01E

👉 आत्मचिंतन के क्षण 17 Feb 2019

★ धैर्य का मंत्र उनके लिए लाभदायक है, जिनके कार्यों में विघ्न-बाधाएँ उपस्थित होती हैं और वे निराश होकर अपने विचार को ही बदल डालते हैं। यह निराशा तो मनुष्य के लिए मृत्यु के समान है। इससे जीवन की धारा का प्रवाह मंद पड़ जाता है और वह किसी काम का नहीं रहता। यदि निराशा को त्यागकर विघ्नों का धैर्यपूर्वक सामना किया जाय, तो असफलता का मुख नहीं देखना पड़े।

◆ जो लोग प्रत्यक्ष में पुण्यात्मा दिखाई देते हैं, वे भी बड़ी-बड़ी विपत्तियों में फँसते देखे गये हैं। सतयुग में भी विपत्ति के अवसर आते रहते थे। यह कौन जानता है कि किस मनुष्य पर किस समय कौन विपत्ति आ पड़े। इसलिए दूसरों की विपत्ति में सहायक होना ही कर्त्तव्य है। यदि कोई सहायता करने में किसी कारणवश समर्थ न हो तो भी विपत्तिग्रस्त के प्रति सहानुभूति तो होनी ही चाहिए।

◇ विचारों का परिष्कार एवं प्रसार करके आप मनुष्य से महामनुष्य, दिव्य मनुष्य और यहाँ तक ईश्वरत्त्व तक प्राप्त कर सकते हैं। इस उपलब्धि में आड़े आने के लिए कोई अवरोध संसार में नहीं। यदि कोई अवरोध हो सकता है, तो वह स्वयं ेका आलस्य, प्रमाद, असंमय अथवा आत्म अवज्ञा का भाव। इस अनंत शक्ति का द्वार सबके लिए समान रूप से खुला है और यह परमार्थ का पुण्य पथ सबके लिए प्रशस्त है। अब कोई उस पर चले या न चले यह उसकी अपनी इच्छा पर निर्भर है।

■ कठिनाइयों को उनसे दूर भाग कर, घबराकर दूर नहीं किया जा सकता। उनका खुलकर सामना करना ही बचने का सरल रास्ता है। प्रसन्नता के साथ कठिनाइयों का वरण करना आंतरिक मानसिक शक्तियों के विकसित होने का राजमार्ग है। संसार के अधिकांश महापुरुषों ने कठिनाइयों का स्वागत करके ही जीवन में महानता प्राप्त की है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

संसार का सबसे महत्वपूर्ण काम लोकमानस का परिष्कार।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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https://youtu.be/eT4Rj6sDAeU

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1) श्लोक 10 से 15

पिपृच्छां च समाधातुं वैकुण्ठं नारदो गत:।
नत्वाSभ्यर्च्य च देवेशं देवेनापि तु पूजित: ॥११॥
कुशलक्षेमचर्चान्तेSभीष्टे चर्चाSभवद् द्वयो ।
संसारस्य च कल्याणकामना संयुता च या ॥१२॥

टीका- इस पूछताछ के लिए देवर्षि नारद बैकुण्ड लोक पहुँचे, नारद ने नमन-वन्दन किया, भगवान ने भी उन्हें सम्मानित किया। परस्पर कुशल-क्षेम के उपरान्त अभीष्ट प्रयोजनों पर चर्चा प्रारम्भ हुई जो संसार की कल्याण-कामना से युक्त थी ॥११-१२॥

नारद उवाच-

देवर्षि: परमप्रीत: पप्रच्छ विनयान्यित:।
नेतुं जीवनचर्या वै साधनामयतां प्रभो॥१३॥
प्राप्तुं च परमं लक्ष्यमुपायं सरलं वद।
समाविष्टो भवेद्यस्तु सामान्ये जनजीवने॥१४॥
विहाय स्वगृहं नैव गन्तु विवशता भवेत्।
असामान्या जनार्हा च तितीक्षा यत्र नो तप: ॥१५॥

टीका- प्रसन्नचित्त देवर्षि ने विनय पूर्वक पूछा-''देव! संसार में जीवनचर्या को ही साधनामय बना लेने और परमलक्ष्य प्राप्त कर सकने का सरल उपाय बतायें ऐसा सरल जिसे सामान्य जन-जीवन में समाविष्ट करना कठिन न हो। घर छोड़कर कहीं न जाना पडे़ और ऐसी तप-तितीक्षा न करनी पड़े जिसे सामान्य स्तर के लोग न कर सकें ॥१३-१५॥

व्याख्या- भगवान् से देवर्षि जो प्रश्न पूछ रहे हैं वह सारगर्भित है। सामान्यजन भक्ति, वैराग्य, तप का मोटा अर्थ यही समझते हैं कि इसके लिए एकान्तसाधना करने, उपवन जाने की आवश्यकता पड़ती है पर इस उच्चस्तरीय तपश्रर्या के प्रारम्भिक चरण जीवन साधना के मर्म को नहीं जानते। इसी जीवन-साधना, प्रभु परायण जीवन के विधि-विधानों को जानने, उन्हें व्यवहार में कैसे उतारा जाय इस पक्ष को विस्तार से खोलने की वे भगवान से विनती करतें हैं।

रामायण में काकभुशुण्डि जी ने इसी प्रकार का मार्गदर्शन गरुड़जी को दिया है। जीवन साधना कैसे की जाय इसका प्रत्यक्ष उदाहरण राजा जनक के जीवन में देखने को मिलता है।
 
.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 8