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गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

👉 हमारी युग निर्माण योजना (अंतिम भाग)

🌹 प्रगतिशील जातीय संगठनों की रूपरेखा

🔴 युग-निर्माण योजना का उद्देश्य व्यक्ति, परिवार और समाज की ऐसी अभिनव रचना करना है जिसमें मानवीय आदर्शों का अनुसरण करते हुए सब लोग प्रगति, समृद्धि और शान्ति की ओर अग्रसर हो सकें। मानव-जीवन को वैयक्तिक एवं सामूहिक रूप में दुर्भावना एवं दुष्प्रवृत्तियों ने ही नरकमय बना रखा है। इस स्थिति को बदलना होगा और ऐसा प्रयत्न करना होगा कि इस अन्धकार के स्थान पर नया प्रकाश प्रतिष्ठित हो सके। सद्-भावनाएं और सत्प्रवृत्तियों की अभिवृद्धि ही उज्ज्वल भविष्य की सम्भावनाएं प्रशस्त कर सकती है। इसलिए हमें इन दोनों को बढ़ाने के लिए सभी सम्भव उपायों का अवलम्बन करना चाहिये। हम गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से उत्कृष्ट एवं आदर्श मानव बन सकें तो ही वे परिस्थितियां उत्पन्न होंगी जिन में अपनी और दूसरों की सुख शान्ति की सुरक्षा सम्भव हो सके।

🔵 दूसरे क्षेत्रों में आर्थिक राजनैतिक, औद्योगिक, वैज्ञानिक एवं अन्यान्य प्रगतियों के लिये विविध प्रयत्न किये जाते हैं, वे स्वागत योग्य हैं। पर व्यक्तियों के दृष्टिकोण को आदर्शवादिता की ओर उन्मुख करने के लिये नहीं के बराबर ध्यान दिया जा रहा है। जो हो रहा है उसमें दिखावा अधिक और तथ्य कम है। आवश्यकता इस बात की है कि मनुष्य को आदर्शवादिता को अपनाने के लिये—सदाचार, संयम, उदारता, सज्जनता जैसे सद्गुणों का विकास करने के लिये—लोक मंगल के लिए, त्याग बलिदान का आदर्श प्रस्तुत करने के लिए ऐसी प्रेरणा दी जाय जिससे उसकी वर्तमान हेय मनोदशा में आमूलचूल परिवर्तन हो सके।

इसी प्रयास का आरम्भ ‘अखण्ड-ज्योति परिवार’ के सदस्यों ने अपने छोटे क्षेत्र से कर दिया है। बड़े लोगों की बड़ी योजनायें इस दिशा में बनें और वे व्यापक रूप से कार्यान्वित की जायें, आवश्यकता तो इसी बात की है। पर जब तक समाज के कर्णधारों एवं शक्तिशाली पुरुषों की अभिरुचि इस ओर उत्पन्न नहीं होती तब तक भावनाशील लोगों के लिए निष्क्रिय बैठे रहना उचित न होता। इससे हम लोगों ने अपने छोटे से परिवार से यह कार्यक्रम आरम्भ कर दिया है। यह पंक्तियां लिखे जाते समय इस परिवार के प्रमुख और सहायक सदस्यों को मिला कर तीन लाख के लगभग संख्या हो जाती है। इतनी जन-संख्या अपने वैयक्तिक एवं सामूहिक जीवन में नव-निर्माण की रचनात्मक योजना अपना ले तो उसका कुछ न कुछ प्रभाव शेष समाज पर भी पड़ेगा। इसी आशा से शत-सूत्री युग-निर्माण योजना प्रस्तुत की गई है। प्रसन्नता की बात है कि यह आशा-जनक गति से उत्साहवर्धक प्रगति करती चली जा रही है। मानव-समाज के पुनरुत्थान में यह छोटा-सा प्रयत्न कुछ उपयोगी सिद्ध हो सके ऐसी परमात्मा से प्रार्थना है।

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 105)

🌹 प्रगतिशील जातीय संगठनों की रूपरेखा

🔴 11. वार्षिकोत्सव:--
संगठनों में चेतना और सक्रियता बने रहने के लिये यह आवश्यक है कि उस तरह के विचारों के लोगों का परस्पर सम्मिलन होता रहे। उत्सवों के द्वारा प्रत्येक चेतना को नवजीवन तथा प्रोत्साहन प्राप्त होता है। बड़े उत्सव खर्चीले होते हैं, किन्तु छोटे-छोटे आयोजन तो आसानी से हो सकते हैं। जातीय संगठनों के मेले आयोजित करने की बात बहुत ही महत्वपूर्ण है। आदर्श विवाहों की पृष्ठभूमि रूपी उन सम्मेलनों में सामूहिक विवाह होने की प्रथा चल पड़े तो और भी उत्तम रहे।

🔵 इन उत्सवों को गायत्री यज्ञ का रूप दिया जाना चाहिये। यज्ञ से उत्सव की शोभा सज्जा ही नहीं, भावनात्मक, धार्मिक वातावरण भी बनता है और शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक कई प्रकार के लाभ भी होते हैं। सामूहिक यज्ञोपवीत संस्कार, मुण्डन आदि भी उस अवसर पर हो सकते हैं। प्रचार के लिए तो यह एक प्रभावशाली माध्यम है ही। इन यज्ञो में कुछ लोग विधिवत् वानप्रस्थ लेकर समाज-सेवा के लिये अपना जीवन उत्सर्ग किया करें, ऐसी चेष्टा भी करते रहना चाहिये।

जिस जाति का सम्मेलन हो उसके लोगों को तो आना ही चाहिए, पर साथ ही अन्य जातियों के लोगों को भी बुलाया जाना आवश्यक है, ताकि वे भी उसके अनुकरण की प्रेरणा ले सकें।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 104)

🌹 प्रगतिशील जातीय संगठनों की रूपरेखा

🔴 10. आन्दोलन का खर्च:-- हर आन्दोलन कुछ खर्च चाहता है। पैसे के बिना कोई भी काम, संस्थाएं भी अपना काम ठीक नहीं कर पातीं। जातीय-संगठनों का कार्य और आदर्श विवाहों की योजना भी व्ययसाध्य हैं। संगठनकर्त्ता, दफ्तर, पत्र-व्यवहार, मार्गव्यय, प्रचार आदि सभी कार्यों के लिए तो पैसा चाहिये। इसकी पूर्ति हमें निष्ठावान् सदस्यों से मासिक चन्दे के रूप में करना चाहिये। युग-निर्माण योजना के सदस्यों को अपनी आय का एक अंश सामाजिक पुनरुत्थान के लिए अनिवार्य रूप से निकालना होगा। भावनाशील लोगों से यह आशा की जाती है कि वे अपने हृदय की विशालता और उच्च आदर्शवादिता के अनुरूप समय ही नहीं, धन भी उदारतापूर्वक देंगे।

🔵 मासिक चन्दा हर सक्रिय कार्यकर्त्ता को देना चाहिये। इसका आरम्भ अपने लोगों से ही होगा। बाहर के नये लोगों से प्रारम्भ में ही चन्दा मांगने लगने से वे बिचक जाते हैं। जो जितना आस्थावान बनता जाय, उससे उसी अनुपात से आर्थिक सहयोग की भी आशा की जा सकेगी। सम्पन्न एवं दानी लोगों से जो सक्रिय कार्य नहीं कर सकते, पर पैसा दे सकते हैं, उनसे लेना चाहिए। किन्हीं दानी उदार सज्जनों से इन कार्यों के लिए कोई स्थायी जमीन-जायदाद मिल सके तो उसके लिये भी प्रयत्न करना चाहिये। मन्दिरों, धर्मशालाओं की खाली इमारतें संगठन के कार्यालय का काम देने योग्य मिल सकें तो उन्हें लेने का भी प्रयास करना चाहिये, ताकि मकान सम्बन्धी आवश्यकता की पूर्ति बिना खर्च के भी हो सके। धर्म घट रखकर प्रतिदिन एक मुट्ठी अन्न या धर्म पेटी रखकर कुछ पैसे लेने वाला क्रम भी जहां जम सके वहां अवश्य जमाना चाहिये।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 103)

🌹 प्रगतिशील जातीय संगठनों की रूपरेखा

🔴 8. विवाह योग्य लड़की लड़कों की जानकारी:-- संगठन बन जाने पर उसका प्रथम कार्य प्रगतिशील लोगों के लड़के लड़कियों की जानकारी क्षेत्रीय दफ्तर में एकत्रित करना है। प्रत्येक ग्राम सभा अपने यहां से इस प्रकार की सूचना संग्रह करके क्षेत्रीय कार्यालयों में भेजा करेगी। जो लोग आदर्श विवाह करने के लिए सहमत हों, उन्हीं की जानकारियां संग्रह की जांय। क्योंकि यह सारा प्रयत्न ही आदर्श विवाहों के प्रचलन के लिये किया गया है। जिन्हें पुराने ढर्रे के देन-दहेज और ठाट-बाट के विवाह करने हैं वे अपने आप, अपने ढंग से लड़की-लड़के ढूंढ़ते रहते हैं। हमें तो उन लोगों की सुविधा की दृष्टि से इतना बड़ा यह ढांचा खड़ा करना पड़ रहा है जो आदर्श विवाहों के इच्छुक हों, उनको अपने ही विचारों एवं आदर्श वाले सम्बन्धी मिल सकें यही हमारा उद्देश्य रहना चाहिये।

🔵 ऐसी सूचनाऐं एक क्षेत्र के एक ही दफ्तर में रह सकती हैं। उस क्षेत्र की सभी उपजातियों या जातियों की सूचनाएं अलग-अलग फाइलों में एक ही दफ्तर में एकत्रित रह सकती हैं। सभी जातियों का एक ही दफ्तर रह सकता है। इसी प्रकार संगठनकर्त्ता भी एक ही सब जातियों के लिए काम दे सकता है। क्षेत्रीय प्रगतिशील जातीय सभा कार्यालय आरम्भ में एक ही रखना होगा। पीछे जब काम का बहुत विस्तार हो तो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आदि चार वर्णों के अलग-अलग कार्यालय बांटे जा सकते हैं और यदि काम बहुत बढ़ जाय तो उपजातियों के लिये भी अलग दफ्तर की आवश्यकता पूरी की जा सकती है, पर आरम्भ में एक ही संगठन-कर्त्ता की नियुक्ति करना उचित होगा।

🔴 9. प्रचार साधन और सुविधाएं:-- आदर्श विवाहों की आवश्यकता, उपयोगिता एवं रूपरेखा समझने के लिये व्यापक प्रचार की आवश्यकता होगी। इन विचारों से जब तक लोगों को प्रभावित न किया जायगा, तब तक वे उससे सहमत न होंगे और वैसा करने के लिए साहस न कर सकेंगे। इसलिये छोटी-मोटी पुस्तिकाएं पढ़ना, भजन, गायन, चित्र प्रदर्शिनी, कवि-सम्मेलन, सभा-सम्मेलन, गोष्ठियां आदि के छोटे-छोटे आयोजन आदि माध्यमों से लोगों में आदर्श विवाहों की भावना आकांक्षा एवं हिम्मत पैदा करनी चाहिए। 

🔵 वैसे जोड़े ढूंढ़ने में अधिक व्यक्तियों की सहायता की जानी चाहिये। उत्सव का रूप प्रभावशाली एवं आकर्षक कैसे बने, इसकी व्यवस्था बनाने में सहयोग होना चाहिये, तथा जहां भी ऐसे विवाह हों, उनका प्रचार दूर-दूर तक करने के लिये प्रयत्न होना चाहिये। यह सुविधाएं प्रस्तुत करना क्षेत्रीय संगठन का काम हैं। इन प्रयत्नों से ही उत्साह उत्पन्न होगा और उत्साह सामूहिक कार्यक्रमों की प्रगति का मूलभूत आधार होता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

रविवार, 12 फ़रवरी 2017

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 102)

🌹 प्रगतिशील जातीय संगठनों की रूपरेखा

🔴 6. संगठन-कर्त्ता की आवश्यकता:-- अच्छा यही हो कि क्षेत्रीय प्रचार के लिए कम से कम एक वैतनिक या अवैतनिक पूरे समय का कार्यकर्त्ता नियत हो। वह अपना पूरा समय उसी कार्य के लिए लगाता रहे। अपने साथ एक-दो सक्रिय प्रभावशाली सदस्यों को लेकर वह जन-सम्पर्क के लिए प्रयत्न करता रहे। लोगों को इकट्ठा करने, समझाने तथा प्रभावित करने का गुण कार्यकर्त्ता में अवश्य होना चाहिए। संकोची, दब्बू प्रकृति के या आलसी व्यक्ति इस कार्य को ठीक तरह नहीं कर सकते। इसलिए संगठनकर्त्ता नियत करते समय यह बातें देख लेनी चाहिए।

🔵 क्षेत्रीय शाखा का एक कार्यालय नियत होना चाहिए। यथा-सम्भव उसे प्रधान या मन्त्री के निकट होना चाहिए। किसी उदार व्यक्ति का कमरा इस कार्य के लिए प्राप्त करना चाहिए। उसमें दफ्तर तथा सदस्यों के विचार विनिमय कर सकने जैसी गुंजाइश होनी चाहिए। जहां संगठनकर्ता की नियुक्ति सम्भव न हो, वहां क्षेत्रीय संगठन के सदस्य गण स्वयं ही थोड़ा-थोड़ा समय देकर वह कार्य करते रहें। कोई भी उपाय क्यों न हो, इस कार्य में समय की नितान्त आवश्यकता है, सो लगाने के लिए किसी न किसी प्रकार व्यवस्था बननी ही चाहिए।

🔴 7. दोनों कार्यक्रम एक दूसरे से पूरक:-- युग-निर्माण केन्द्रों और इन जातीय संगठनों में कोई प्रतिद्वन्द्विता या भिन्नता नहीं होनी चाहिये। वस्तुतः दोनों को एक ही समझना चाहिए। यह भिन्नता केवल विवाह शादियों की सुविधा की दृष्टि से की गई है। सो हर जगह इन जातीय संगठनों को अपना सम्मिलित स्वरूप युग-निर्माण शाखाओं के रूप में भी रखना चाहिए। एक व्यक्ति उन दो संगठनों का सदस्य आसानी से रह सकता है, जो परस्पर एक दूसरे के पूरक हैं। इस प्रकार युग-निर्माण योजना के सदस्यों को दो उत्तरदायित्व वहन करने पड़ेंगे। एक सभी जाति, धर्मों का सम्मिलित युग-निर्माण आन्दोलन चलाने का—दूसरा समाज सुधार के लिये अपने व्यक्तिगत प्रभाव-क्षेत्र में जाति की ओर ध्यान देने का। इनमें परस्पर कोई भिन्नता या झंझट नहीं। वरन् एक दूसरे के पूरक हैं। रोटी खाना और पानी पीना देखने में दो अलग प्रकार के काम हैं, उनका दृश्य स्वरूप भी भिन्न प्रकार का है, पर वस्तुतः वे दोनों एक दूसरे के पूरक हैं, इसलिए किसी रोटी खाने वाले को पानी पीना कोई अलग काम या भिन्न प्रकार का झंझट मालूम नहीं पड़ता। इसी प्रकार युग-निर्माण आन्दोलन और जातीय-संगठनों में बाहर से देखने का ही अन्तर है, वस्तुतः युग-निर्माण की सामाजिक क्रान्ति योजना का एक पहलू या मोर्चा भर जातीय संगठन है।

🔵 अस्तु हर जगह इस प्रकार का खांचा मिलाया जाना चाहिए कि दोनों कार्य एक ही साथ चलते रहें। प्रत्येक कार्यकर्त्ता दोनों कार्य करता रहे। यह दोनों आपस में टकराते नहीं। दुहरा झंझट तभी तक मालूम पड़ेगा, जब तक उसे व्यवहार में न लाया जाय। जो उसे कार्यान्वित करेंगे, वे देखेंगे कि युग-निर्माण योजना की शत-सूत्री योजना का जातीय संगठन भी एक अंग मात्र है। जिस प्रकार प्रौढ़ पाठशाला, पुस्तकालय, वृक्षारोपण, हवन आदि में एक ही व्यक्ति कई प्रवृत्तियों में एक साथ भाग लेता रहा सकता है, उसी प्रकार यह दोनों कार्यक्रम एक साथ चलाये जा सकने में पूर्णतया सरल एवं शक्य हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 11 फ़रवरी 2017

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 101)

🌹 प्रगतिशील जातीय संगठनों की रूपरेखा

🔴 4. कार्य का आरम्भ:-- यह प्रगतिशील जातीय सभाओं का संगठन-कार्य अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों द्वारा आरम्भ किया जा रहा है। इसलिए प्रेरक सदस्यों की तरह आरंभ में वे ही अपनी-अपनी उपजाति का क्षेत्रीय संगठन बना लें। क्षेत्र की परिधि साधारणतया 50-50 मील चारों ओर होनी चाहिए। सौ मील लम्बे और सौ मील चौड़े क्षेत्र में भी सैकड़ों गांव कस्बे होते हैं, उतने क्षेत्र को ठीक तरह संगठित कर सकना भी कठिन नहीं है। इसलिए आरम्भ में भले ही यह क्षेत्र अधिक विस्तृत हों, पर अन्त में इनका कार्य-क्षेत्र उतना ही बड़ा रहना चाहिए, जितने में कि कार्यकर्त्ता गण आसानी से आपस में मिलते-जुलते रह सकें। इस दृष्टि से सौ-सौ मील की लम्बाई-चौड़ाई का क्षेत्र पर्याप्त है। विशेष परिस्थिति होने पर ही उसे घटाया-बढ़ाया जाय।

🔵 अखण्ड-ज्योति सदस्यों के यह उपजातियों के आधार पर क्षेत्रीय संगठन तुरन्त बन जाने चाहिए। इसके लिए कुछ अधिक सेवा-भावी व्यक्तियों को आगे आना चाहिए और इन सब सदस्यों से मिलकर उन्हें मीटिंग के लिए आमन्त्रित करना चाहिए। सब लोग इकट्ठे होकर अपनी-अपनी सदस्यता को नियमित कर लें। दस व्यक्तियों की कार्य-समिति गठित करलें और प्रधान-मन्त्री तथा कोषाध्यक्ष चुन लें। युग-निर्माण केन्द्रों में पांच व्यक्तियों की कार्य-समिति होती है और एक शाखा संचालक ही पदाधिकारी रहता है, पर इन जातीय संगठनों में उपरोक्त तीन पदाधिकारी और 10 सदस्य रहने चाहिए, क्योंकि इनका कार्य-क्षेत्र बड़ा है।

🔴 5. क्षेत्रीय संगठनों का विस्तार:-- यह प्रारम्भिक गठन हो जाने के बाद इन प्रेरक सदस्यों को अपने-अपने कार्य-क्षेत्र में सदस्य बनाने के लिए छोटी-छोटी मित्र-मण्डलियों के रूप में नये सदस्य भर्ती करने निकल पड़ना चाहिए। जिन गांवों में कम से कम पांच सदस्य भी बन जांय, वहां ग्राम सभाएं बना दी जांय। प्रयत्न यह होना चाहिए कि जहां भी जिस उपजाति के लोग हों, उनकी एक-एक ग्राम-सभा वहां गठित रहे। क्षेत्रीय सभाओं के अन्तर्गत जितनी ग्राम सभाएं होंगी, वह उतनी ही सफल मानी जायेंगी और उनकी गतिविधियां उतनी ही बढ़ सकेंगी। इसलिए क्षेत्रीय संगठनों के कार्यकर्त्ताओं को दौरा करके अपना कार्य-क्षेत्र सुगठित कर लेने के लिए तत्परतापूर्वक लग जाना ही पड़ेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://awgpskj.blogspot.in/2017/02/100-11-feb.html

शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 100)

🌹 प्रगतिशील जातीय संगठनों की रूपरेखा

🔴 2. उप जातियों के प्रथम संगठन:-- प्रगतिशील भटनागर सभा, प्रगतिशील श्रीवास्तव सभा, प्रगतिशील सक्सेना सभा जैसे छोटे संगठन अलग-अलग से बनेंगे। लेकिन वे अन्ततः ‘प्रगतिशील कायस्थ सभा’ के अन्तर्गत रहेंगे। इसी प्रकार अन्य जातियों के भी उप-जातियों के अलग-अलग संगठन होने चाहिए, ताकि उसी समुदाय के अन्तर्गत विवाह करने वाले या उसे छोड़कर अन्यों में करने वाले लोगों का विवाह सम्बन्ध करने में सुविधा रह सके। उप-जातियों के यह पृथक-पृथक संगठन अन्ततः अपनी मूल जाति के केन्द्रीय संगठन के अन्तर्गत रहेंगे। आरम्भिक गठन उप-जातियों के द्वारा शुरू करना चाहिए और पीछे उन सब प्रतिनिधियों को लेकर एक मूल जाति की प्रगतिशील सभा गठित कर लेनी चाहिए। जैसी—ब्राह्मणों की सनाढ्य गौड़, कान्यकुब्ज, सरयूपारीण, सारस्वत, औदीच्य, श्रीमाली, गौतम आदि उप-जातियों की अलग सभाएं बन गईं तो उनके दो-दो प्रतिनिधि लेकर एक केन्द्रीय प्रगतिशील ब्राह्मण सभा बना दी जायगी।

🔵 3. सदस्यता की शर्त:-- इन संगठनों के सदस्यों की भर्ती सामाजिक सुधारों को, विशेषतया विवाहों में होने वाले अपव्यय को रोकने के प्रति आस्थावान होने की शर्त पर की जानी चाहिए। भले ही 24 सूत्रीय आदर्श विवाहों की रूपरेखा को वे आज पूरी तरह कार्यान्वित करने की स्थिति में न हों, पर विचारों की दृष्टि से तो उसके औचित्य को पूर्णतया मानना ही चाहिए और अवसर आने पर समर्थन भी उन्हीं बातों का करना चाहिए। 24 सूत्रों में से कोई पूरी तरह न निभ सके तो उसे अपनी कमजोरी ही मानना चाहिए और उसके लिए दुःख एवं लज्जा अनुभव करनी चाहिए। उस दुर्बलता का उन्हें समर्थन कदापि न करना चाहिए।

🔴 ऐसे आस्थावान व्यक्तियों की सहमति:--
प्रतिज्ञा का एक फार्म होगा, जिस पर सदस्यगण अपने हस्ताक्षर करेंगे। इन हस्ताक्षर कर्त्ताओं के प्रार्थना-पत्र क्षेत्रीय संगठन द्वारा स्वीकार किये जाने पर उन्हें सदस्य घोषित किया जायगा और उन्हें प्रमाण-पत्र दिया जायगा। अवांछनीय, व्यक्तियों के सदस्यता-पत्र अस्वीकृत कर दिये जायेंगे। पीछे भी कभी कोई सदस्य संगठन को कलंकित करने वाले काम करता पाया गया तो उसकी सदस्यता क्षेत्रीय संगठन की सिफारिश पर केन्द्रीय संगठन रद्द कर देगा। सदस्यता की कोई फीस नहीं होगी। वयस्क नर-नारी सभा का सदस्य बन सकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 99)

🌹 प्रगतिशील जातीय संगठनों की रूपरेखा

🔴 जातियों-संगठनों के वर्तमान स्वरूप और जाति-पांति से उत्पन्न होने वाली बुराइयों को ध्यान में रखते हुए तत्काल तो कोई भी विचारशील व्यक्ति इस प्रकार के प्रयत्नों का विरोध नहीं करेगा। जब उसे हमारे प्रयोजन का पता चलेगा और वस्तु स्थिति पर विचार करेगा तो उसे इसकी सामयिक उपयोगिता एवं आवश्यकता का महत्व भी स्वीकार करना पड़ेगा। कुएं में गिरना एक बात है और कुएं में गिरे हुये को निकालने के लिये कुएं में घुसना दूसरी बात है। जाति वाद की संकीर्णता से लड़ने के लिये और उस बुराई का उन्मूलन करने के लिये बनाये गये जातीय संगठन लहर एक जैसे दीख पड़ सकते हैं, पर वस्तुतः उनमें कुएं में गिरने वाले और निकालने के लिये उतरने वाले की तरह जमीन-आसमान का अन्तर है। हम संकीर्णता फैलाने के लिये नहीं वरन् उसके उन्मूलन के लिये जातीय संगठन बना रहे हैं। अस्तु इसका परिणाम भी हमारी भावना के अनुरूप ही होगा।

🔵 अखण्ड-ज्योति परिवार के लिये लोग अपने जातीय संगठन बनाने और उनके द्वारा आदर्श विचारों का प्रयोजन पूरा करने का प्रयत्न करें। इन संगठनों को अधिक सहायक बनाकर हम सामाजिक क्रान्ति की एक भारी आवश्यकता को पूरा भी कर सकते हैं।

🔴 1. संगठनों का नामकरण:-- इन जातीय संगठनों का निर्माण प्रगतिशीलता बढ़ाने के लिये किया जा रहा है। आज जातिवाद जिन कारणों से बदनाम है, उन्हें हटाना अपना उद्देश्य है। संकीर्णता, वंशगत अहंकार, अपनी जाति वालों के साथ पक्षपात, अपने वर्ग में प्रचलित रूढ़ियों का अन्ध-समर्थन जैसे कारणों से जातिवाद बदनाम हुआ है। हमें इन बातों से तनिक भी लगाव नहीं, अपना उद्देश्य तो जिस क्षेत्र में अपना अधिक परिचय, अधिक प्रभाव एवं अधिक सम्बन्ध रहता है, उसे अधिक सुविकसित, सुसंस्कृत एवं प्रगतिशील बनाना है। इसलिये अपने द्वारा संगठित सभाओं के साथ अनिवार्यतः ‘प्रगतिशील’ शब्द जुड़ा रहना चाहिये। ताकि अपने उद्देश्यों की प्राथमिकता और पुराने ढंग की जातीय सभाओं से अपनी भिन्नता सिद्ध कर सकें।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

बुधवार, 8 फ़रवरी 2017

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 98)

🌹 प्रगतिशील जातीय संगठनों की रूपरेखा

🔴 आदर्श विवाह तभी सम्भव हो सकते हैं जब वर और कन्या दोनों पक्ष इसके लिये सहमत हों। एक पक्ष कितना ही आदर्शवादी क्यों न हो, बिना दूसरा पक्ष अपने अनुकूल मिले इन विचारों को कार्यान्वित न कर सकेगा। इसलिए यह आवश्यक है कि कोई ऐसा तन्त्र खड़ा किया जाय जिसके माध्यम से एक समान विचार और आदर्शों के लोगों को ढूंढ़ने की सुविधा मिल सके। यह प्रयोजन प्रगतिशील जातियों के संगठनों के माध्यम से ही पूरा हो सकता है।

🔵 अत्यधिक उत्साही लोग यह भी सोच कर सकते हैं कि अपनी जाति को छोड़कर अन्य जातियों में अपने विचार के लोगों को साथ विवाह क्यों न आरम्भ किये जाय? आदर्श के लिये यह विचार उत्तम हैं। ऊंचे घर के लोगों के लिये सम्भव भी है। पर भारत की वर्तमान स्थिति में सर्व साधारण के लिये इतना बड़ा कदम उठा लेने के बाद जो कठिनाइयां उपस्थित होती हैं, उन्हें नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता। प्रस्तुत योजना अखण्ड-ज्योति परिवार के लोगों को ध्यान में रखते हुए आरम्भ की गई है।

🔴 उनकी स्थिति हमें विदित है। इसलिये उन्हें अभी मितव्ययी विवाह के लिये ही जोर दे सकना उचित है। उन जातियों के बन्धन शिथिल करने के लिये ही उन्हें कहा जा सकता है। जिनमें अधिक साहस हो वे जाति-पांति की परवा किये बिना भी विवाह करें, पर जो एक बार भी उतना न कर सकेंगे वे अपनी जातियों में सम्बन्ध करने को उत्सुक होंगे। उनका काम इतने साहस से भी कहा जायगा। रूढ़ि ग्रसित समाज में आर्थिक सुधार ही सफल हो सकते हैं। अत्यधिक उत्साह आदर्शवाद की दृष्टि से प्रशंसनीय हो सकता है पर समय से पूर्व उठाये गए कदमों के असफल होने की ही संभावना ज्यादा रहती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 7 फ़रवरी 2017

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 97)

🌹 आदर्श विवाहों के लिए 24 सूत्री योजना

🔴 (8) लोक सेवी युग-निर्माता की धर्म सेवा— संसार में जितने भी महत्वपूर्ण जन-आन्दोलन चले और सफल हुए हैं उनके पीछे भावनाशील, उच्च चरित्र, आदर्शवादी लोक सेवकों की शक्ति ही प्रधान आधार रही है। इस बल के अभाव में अन्य साधन कितने ही अधिक होने पर भी कोई बड़ा काम, खास तौर से नव-निर्माण जैसा महान अभियान सफल नहीं हो सकता। इसलिए हमें इस बात का घोर प्रयत्न करना होगा कि कुछ व्यक्ति भजन करके स्वर्ग प्राप्ति के लिए लाल कपड़े वाले बाबाजी नहीं वरन् युग रचना के लिए जनता जनार्दन की आराधना करने वाले विवेकशील त्यागी तपस्वी लोग कर्म क्षेत्र में उतरें और भौतिक एकताओं से ऊंचे उठकर सच्चे महामानवों की तरह अपनी हस्ती विश्व मंगल के लिए लगा दें।

🔵 जिनके बच्चे समर्थ होकर कमाने खाने लगे हैं, जिनके ऊपर ईश्वर की कृपा से ही कमाने की या बच्चों की जिम्मेदारी नहीं है वे वानप्रस्थ की तरह अपने घर रहते हुए भी अपने क्षेत्र में प्रकाश स्तम्भ की तरह काम कर सकते हैं। जिनके ऊपर पारिवारिक जिम्मेदारियां हैं वे भी अवकाश का थोड़ा बहुत समय समाज सेवा के लिए लगा सकते हैं। इन समयदानी लगनशील लोगों के भागीरथ प्रयत्नों से ही आदर्श विवाहों की प्रथा का प्रचलन सम्भव हो सकेगा।

🔴 युग-निर्माण योजना के सदस्यों को इस धर्म-सेना में सम्मिलित होना चाहिए। इस सेना में भर्ती की शर्त लोक मंगल के लिए नियमित रूप से समय दान करने लगना है। जो पारिवारिक जिम्मेदारियों से निवृत्त हैं उनका धर्म कर्तव्य यह है कि लोक और मोह के बन्धनों को काट कर जनता जनार्दन की सेवा के लिए एक सच्चे तपस्वी की तरह काम करने का व्रत धारण करलें। जिनके पास बहुत जिम्मेदारियां हैं वे भी एक दो घण्टे का समय तो नित्य लगा ही सकते हैं। अपना काम काज करते हुए भी सम्पर्क में आने वाले व्यक्तियों को इस मिशन की प्रेरणा दे सकते हैं। छुट्टी का पूरा दिन इस कार्य के लिए दे सकते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

सोमवार, 6 फ़रवरी 2017

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 96)

🌹 आदर्श विवाहों के लिए 24 सूत्री योजना

🔴  (7) सुधार प्रतिरोध और असहयोग— जहां विवाहों में अपव्यय करने का पागलपन गहराई तक जड़ जमाये बैठा हो, वहां यह आशा नहीं की जा सकती कि प्रचार से ही सब कुछ ठीक हो जायगा। इसके लिए उस किसान या माली से प्रेरणा लेनी पड़ेगी जो अवांछनीय झाड़-झंखाड़ों को उखाड़ फेंकने के लिए उनकी जड़ों पर अपने पैने औजारों के तीव्र प्रहार करता है। कूड़ा-करकट अपने आप नहीं हटता उसे झाड़ू से घसीट कर बाहर करना होता है। कुरीतियां अपने आप मिटने वाली नहीं हैं उनके विरुद्ध संघर्ष करना पड़ेगा। उस संघर्ष में अपने को कुछ चोट पहुंचती हो तो उसे धर्म वीरों की परम्परा के अनुसार त्याग बलिदान का छोटा-सा सौभाग्य मानने के लिए तैयार रहना चाहिए।

🔵 हम में से जिनका प्रभाव जहां हो, वहां उस प्रभाव का उपयोग करके इन कुरीतियों से बचने का प्रयत्न करना चाहिए। अपने घर, कुटुम्ब, मित्र एवं रिश्तेदारों में तो ऐसा सुझाव बलपूर्वक भी किया जा सकता है और यदि वे न मानें तो अपने असहयोग की, उस विवाह में सम्मिलित न होने की बात भी कही जा सकती है।

🔴 जिन विवाहों में अपने को सम्मिलित होने का अवसर मिले उनमें पूर्णतया न सही, जितना कुछ वश चले, 24 में से जितने भी सूत्र जितने अंशों में भी कार्यान्वित किये जा सकें उसके लिए जोर देना चाहिये, प्रयत्न करना चाहिये। जो अन्य प्रभावशाली व्यक्ति उस उत्सव में आते हों उनमें से कोई विचारवान दीखें तो उनके माध्यम से प्रभाव डलवाना चाहिये ताकि जितने अंशों में कुरीतियां हट सकें उतना तो किया ही जाय। आदर्श विवाह आन्दोलन के सम्बन्ध में छपे ट्रैक्ट भी ऐसे अवसरों पर रखने चाहिये और उन्हें पढ़ा सुनाकर ऐसा वातावरण बनाना चाहिये कि सुधारवादी विचारधारा के लिए कोई स्थान उनके मन में बने। यह सब काम बिना कटु संघर्ष के चतुरता एवं बुद्धिमत्ता द्वारा मधुरता के वातावरण में भी सम्पन्न हो सकते हैं।

🔵 असहयोग वहीं करना चाहिए जहां अपना दबाव हो। अन्य विवाहों में सम्मिलित होकर अपनी विचारधारा के पक्ष में जितना भी वातावरण बन सके उतना बनाना चाहिये। रूठ बैठना या ऐसे पुराने ढर्रे से जहां विवाह हो रहा हो वहां जाना ही नहीं इस प्रकार का असहयोग व्यर्थ है। वहां तो भीतर घुस कर ही कुछ काम हो सकता है।

🔴 यों कानून द्वारा भी दहेज, अधिक बारात ले जाने पर कड़े प्रतिबन्ध लगे हुए हैं, पर उनका प्रयोग न करे जहां तक सम्भव हो सके प्रेम, मधुरता, प्रचार, समझाना, धमकी, नाराजी आदि शस्त्रों से ही काम लेना चाहिये। जहां अनिवार्य हो जाय वहीं कानूनी सहायता ली जाय।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

रविवार, 5 फ़रवरी 2017

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 95)

🌹 आदर्श विवाहों के लिए 24 सूत्री योजना

🔴 (6) प्रतिज्ञा आन्दोलन— कमर तोड़ खर्चीले विवाहों की कुरीति को त्यागने के लिए विचारशील लोगों से प्रतिज्ञा पत्र भराये जांय कि अवसर आने पर अपने बच्चों की शादी आदर्श विवाह वाली संहिता के अनुसार ही करूंगा। ऐसी प्रतिज्ञा सर्व साधारण से कराई जाय। इसके लिए जो छपे प्रतिज्ञापत्र हों उन्हें खेल कौतूहल की दृष्टि से नहीं वरन् ईश्वर को साक्षी देकर भरा जाना चाहिए और प्रण के निवाहने की दृढ़ता के साथ उसे निवाहा जाना चाहिए।

🔵 छात्रों, छात्राओं एवं अविवाहितों से भी ऐसे प्रतिज्ञा पत्र भराये जाने चाहिये जिनमें आदर्श विवाह न होने पर अविवाहित ही रहने की प्रतिज्ञा हो। जो युवक ऐसे प्रतिज्ञा पत्र भरें वे अपने अभिभावकों को भी इसकी सूचना दे दें ताकि पीछे उन्हें विरोध-प्रतिरोध का सामना न करना पड़े।

🔴 समाज निर्माण की पुण्य प्रवृत्ति में जिन्हें भावना एवं उत्साह हो वे ऐसी प्रतिज्ञा पत्र पुस्तिकाएं अपने साथ रखें और जहां जावें वहीं अपनी बात का प्रचार करें, जो सहमत हो जावें उनसे फार्म भरा लें। और साथ ही ‘धन्यवाद का अभिनन्दन पत्र’ भी उन्हें दे दें।

🔵 इस प्रकार की प्रतिज्ञा फार्मों की पुस्तिकायें तथा स्वीकृति के सुन्दर अभिनन्दन प्रमाण पत्रों की पुस्तिकायें युग-निर्माण योजना के केन्द्रीय कार्यालय में छापी जा रही है। आवश्यकतानुसार शाखायें उन्हें अपने यहां मंगालें और कार्यकर्त्ताओं के लिए सुलभ बनाया करें। यह प्रतिज्ञा पुस्तिकायें लागत से भी कम मूल्य पर प्रस्तुत की गई हैं।

🔴 यह हस्ताक्षर आन्दोलन तेजी से चलाया जाना चाहिये और प्रत्येक कार्यकर्ता को इस प्रकार के प्रयत्न को अपना एक आवश्यक कर्म मानकर उसके लिए सचेष्ट रहना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 94)

🌹 आदर्श विवाहों के लिए 24 सूत्री योजना

🔴 (5) प्रचार की आवश्यकता— आदर्श विवाहों की ख्याति दूर-दूर तक फैलानी चाहिए ताकि वैसा करने का उत्साह दूसरे लोगों में भी उत्पन्न हो। हमारे देश में अभी विवेकशीलता जागृत नहीं हुई है। हर बात ‘भेड़ियाधसान’ की तरह एक दूसरे की देखा-देखी होती है। लोग चाहते हुए भी किसी सुधार को साहस के अभाव में अपना नहीं पाते, पर जब उन्हें पता लगता है कि ऐसा तो अन्य कितने ही लोग कर रहे हैं तब उनकी हिम्मत बढ़ जाती है और वे भी वैसा ही करने उद्यत हो जाते हैं। इसलिए प्रत्येक शुभ कर्म का अधिकाधिक प्रचार होना चाहिए। विशेषतः आदर्श विवाहों की ख्याति को दूर-दूर तक अवश्य ही फैलाई जानी चाहिए।

🔵 समाचार पत्रों में ऐसे समाचार अवश्य भेजे जांय। युग-निर्माण योजना पत्रिका में ऐसे समाचार बहुत प्रेम और उत्साहपूर्वक छापे जाते हैं। जिन अभिभावकों या लड़की-लड़के के विशेष साहस से वह शुभ कार्य सम्पन्न हुआ हो उनके फोटो भी छापे जाते हैं। मथुरा केन्द्रीय कार्यालय से ऐसे समाचार भारत भर में अनेक भाषाओं में छपने वाले पत्रों में छपने भेज दिये जाते हैं।

🔴 जहां समाचार पत्र नहीं पहुंचते वहां पच, विज्ञप्ति आदि छाप कर वह समाचार घर-घर पहुंचाया जा सकता है और उनके पोस्टर दीवारों खम्भों आदि पर चिपकाये जा सकते हैं। और भी जो तरीके ऐसे समाचार दूर प्रदेशों तक अधिक जनता तक पहुंचाये जाने के लिए सम्भव हों वे सभी करने का प्रयत्न करना चाहिए। ताकि बढ़ती हुई सुधारात्मक प्रवृत्तियों का परिचय अधिकाधिक जनता को हो सके और सर्व साधारण के मन में उसी तरह के अनुकरण की आकांक्षा जागृत हो सके।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 93)

🌹 आदर्श विवाहों के लिए 24 सूत्री योजना

🔴  (4) आदर्श विवाहों का अभिनन्दन— सामाजिक कुरीतियों को कुचलते हुए, प्रतिक्रियावादियों का उपहास व्यंग एवं विरोध सहते हुए जिन लोगों ने इस प्रकार का साहस प्रदर्शित किया है, लोगों की परवा न करते हुए विवेक को महत्व दिया है, निस्सन्देह वे साहसी, शूर, आदर्शवादी और नेतृत्व कर सकने की क्षमता सम्पन्न व्यक्ति हैं। उनकी प्रशंसा और प्रतिष्ठा होनी चाहिए। जहां वीर पूजा नहीं होती वह भूमि वीरविहीन हो जाती है। इसलिए प्रयत्न यह किया जाना चाहिए कि इन आदर्शवादी विवाहों को, उनके संयोजकों को विवेकशील लोगों का समर्थन, सहयोग, सद्भाव एवं आशीर्वाद प्राप्त हो।

🔵 ऐसे विवाहों के अवसर पर सम्भ्रान्त लोगों के पास स्वयं व्यक्तिगत अनुरोध एवं निवेदन लेकर जाना चाहिए और उन्हें अधिकाधिक संख्या में एकत्रित करना चाहिए। जितने अधिक लोग इस प्रकार के आयोजन को देखेंगे उतनी ही चर्चा फैलेगी और अपने उद्देश्य की पूर्ति सम्भव हो सकेगी। इसलिए काफी दिन पहले से यह निमन्त्रण देने आरम्भ करने चाहिए।

🔴 ऐसे उत्सवों उपस्थित जो सज्जन आशीर्वाद एवं समर्थन देने आयें उनमें से जो भाषण कर सकते हों वे खड़े होकर अपने विचार भी व्यक्त करें। फूल माला लेकर सभी आगन्तुक आवें और उन्हें दोनों ओर के अभिभावकों को पहनावें जिन्होंने यह साहस प्रदर्शित किया। छपे अभिनन्दन पत्र भेट करने की व्यवस्था हो सके तो और भी उत्तम हैं। उस नगर में या आस-पास जो सार्वजनिक संस्थायें हों वे भी अपनी ओर से अभिनन्दन करें। युग-निर्माण शाखाओं को तो विशेष उत्साहपूर्वक ऐसे आयोजनों का अभिनन्दन करना चाहिए। जहां जुलूस सम्भव हों वहां वह भी निकालें जांय और लाउडस्पीकरों से उस विवाह की विशेषता जनता को बताई जाय। आशीर्वाद देने आने वाले व्यक्ति भोजन स्वीकार न करें। इलाइची जैसा छोटा सत्कार ही पर्याप्त माना जाय।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 92)

🌹 आदर्श विवाहों के लिए 24 सूत्री योजना

🔴  (3) जातियों के प्रान्तीय सम्मेलन— जिन जाति-उपजातियों में परस्पर विवाह हो सकता है उनके क्षेत्रीय मेले सम्मेलन तीन दिन के हुआ करें। इनमें प्रवचन भाषण ही नहीं, मनोरंजन के मेले जैसे आयोजन भी रहें। ठहरने और खाने का उचित प्रबन्ध रहे। उन मेलों में उस क्षेत्र के लोग जहां समाज सुधार, ज्ञान-चर्चा, संगठन व्यवस्था आदि की बातें कहें-सुनें वहां परस्पर परिचय बढ़ाकर अपने बच्चों के विवाह-शादी की समस्या भी सुलझावें। हो सके तो विवाह योग्य लड़का-लड़की को भी साथ लेते आवें, जिससे सम्बन्ध पक्के करने में और भी अधिक सुविधा हो सके।

🔵 ऐसे जातीय मेलों की तारीखें तथा स्थान नियत रहे। पचास-पचास मील चारों ओर का घेरा एक मेले का विशेष कार्य क्षेत्र माना जाय। इस प्रकार सौ मील लम्बाई-चौड़ाई का एक क्षेत्र उस मेले से सम्बन्धित हो। इससे उस प्रदेश के लोग परस्पर परिचित हो जायेंगे, उपयुक्त जोड़े ढूंढ़ने में अधिक आसानी से सफल हो जाया करेंगे। ऐसे मेले उन प्रदेशों के अलग-अलग क्षेत्रों में होते रहें जहां वे परस्पर विवाह करने वाली, जाति-उपजातियां फैली हुई हों।

🔴 इन मेलों में, जो जातीय वार्षिक सम्मेलन हों, उनके संगठन एवं प्रगतिशीलता की योजना विशेष रूप से बनाई जाय और उसी तरह के भाषण, प्रवचन एवं विचार विनियम होता रहे। इन सम्मेलनों में सामूहिक विवाहों का भी आयोजन हो। ऐसे विवाह बहुत ही सस्ते पड़ते हैं और दूर-दूर तक कुरीति विरोधी आन्दोलन की सफलता का प्रचार करते हैं। बिहार के मैथिल ब्राह्मणों में तथा पंजाब के सिखों में इस प्रकार की व्यवस्था बनाई हुई भी है। आवश्यकता इस बात की है कि ऐसे जातीय मेले, जो आदर्श विवाहों का उद्देश्य पूरा करने में सहायक हों, जगह-जगह लगाये जायें और उन्हें सफल बनाया जाय।

🔵 जब कि निरर्थक मेले हर साल हजारों की संख्या में होते रहते हैं तो कोई कारण नहीं कि विचारशील लोगों द्वारा, सदुद्देश्य के लिए सूझ-बूझ के साथ लगाये गये यह मेले सफल न हों। इनमें विवाह शादियों के अतिरिक्त सामूहिक यज्ञोपवीत आदि भी हो सकते हैं और अन्य अनेकों कुरीतियों का निवारण तथा जातीय समस्याओं का हल हो सकता है। ध्यान रखने की बात इतनी ही है कि इन सम्मेलनों में प्रगतिशील लोगों की प्रमुखता हो। भावावेश में उनका संचालन तथा-कथित बड़े आदमियों के हाथों दे दिया गया तो वे लाल बुझक्कड़ इस माध्यम का उपयोग संकीर्णता एवं रूढ़िवादिता फैलाने में करने लगेंगे। इससे अपना मूल उद्देश्य ही नष्ट हो जायगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2017

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 91)

🌹 आदर्श विवाहों के लिए 24 सूत्री योजना

🔴 (2) प्रगतिशील जातीय संगठन— यों रूढ़ियों के समर्थक पंच चौधरियों का मान बढ़ाने के लिए अभी भी बहुत-सी जातीय सभाएं बनी हुई हैं। पर उनका स्वरूप और उद्देश्य बारीकी से देखने पर पता चलता है कि एकाध छोटी-मोटी बात सुधार की रखकर अधिकांश में वे रूढ़िवाद का पोषण करती हैं और संकीर्णता, पृथकता एवं जन्म-जाति के बड़प्पन का समर्थन करती हैं। इसीलिए विचारवान् एवं प्रगतिशील लोग इन जातीय संगठनों को अनुपयोगी एवं हानिकारक मानकर उनसे उपेक्षा या घृणा का भाव रखते हैं, जो उचित भी है।

🔵 हमें जातीय संगठनों की आवश्यकता अनुभव हो रही है पर उनका उद्देश्य सर्वथा भिन्न है। हम सामाजिक क्रान्ति का एक महान् मिशन लेकर अग्रसर हो रहे हैं। उसमें विवाहों में होने वाले अपव्यय को रोकना हमारा प्रथम मोर्चा है। इसके लिए पृष्ठभूमि तैयार करनी है। इसमें सबसे बड़ी कठिनाई प्रगतिशील विचार के लोगों का परस्पर न होना है। चूंकि अभी लोग छोटी-छोटी जातीय इकाइयों में ही विवाह शादी करते हैं, इस दायरे को बढ़ाना, आदर्श विवाहों से भी अधिक कठिन है। इसलिए प्रारम्भ में आदर्श विवाहों को ही हाथ में लिया जाय और विवाहों की जातीय इकाइयों को उतना ही बढ़ाया जाय जितना कि वर्तमान परिस्थितियों में-आरम्भिक प्रयास में-सम्भव है। इसमें उन जातियों के बन्धन ढीले करने तक की बात ही अभी व्यवहारिक हो सकती है। अन्त में हर जाति की प्रगतिशील सभाएं गठित करनी चाहिए। इनका उद्देश्य कुरीतियों का उन्मूलन एवं स्वस्थ परम्पराओं का प्रचलन हो।

🔴 इन सभाओं के सदस्य केवल वे बनाये जांय जो विवेक एवं औचित्य पर आस्था रखते हों। सदस्यता के प्रतिज्ञा पत्र में यह बातें लिखी हुई हों। भले ही आरम्भ में संख्या थोड़ी हो और उसमें ‘‘बड़े लोग’’ भले ही सम्मिलित न हों पर यह ध्यान रखा जाय कि इन संगठनों में रहें वे लोग जो सुधारवाद पर विश्वास करते हों। प्रयत्न करके ऐसे लोग ढूंढ़े और पैदा किये जांय, इसमें देर लगे तो हर्ज नहीं। पर जल्दी से बड़ी सभा बना लेने के मोह में रूढ़िवादियों को उसमें भर लेने से वे अपनी मनमानी चलायेंगे और संगठन का उद्देश्य ही नष्ट कर देंगे।

🔵 यह शुभारम्भ अपने युग-निर्माण परिवार से ही आरम्भ होता है, इसलिए हम लोगों को अपनी-अपनी प्रगतिशील जातीय सभाओं के संगठन की तैयारी में लग जाना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

सोमवार, 30 जनवरी 2017

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 91)

🌹 आदर्श विवाहों का प्रचलन कैसे हो?

🔴 आदर्श विवाहों का प्रचलन हिन्दू समाज की आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। इसे युग की महत्वपूर्ण मांग कहना चाहिए। नव-निर्माण के लिए कुप्रथाओं को हटाकर उनके स्थान पर स्वस्थ परम्पराओं को जन्म दिया जाना आवश्यक है। ऐसे प्रयत्नों से ही सामाजिक क्रान्ति का उद्देश्य पूर्ण होगा।

🔵 आदर्श विवाहों की 24 सूत्री रूपरेखा मूर्त रूप कैसे धारण करे इसके लिए नीचे आठ उपाय प्रस्तुत किये जा रहे हैं। इनको अपनाने से ही यह महान विचारधारा कार्यान्वित हो सकेगी।

🔴 (1) समान विचार वालों की तलाश— आदर्श विवाह तभी संभव, सफल और सार्थक हो सकते हैं जब दोनों पक्ष समान विचार के हों। एक पक्ष आदर्शवादी हो और दूसरा रूढ़िवादी तो ‘आधा तीतर आधा बटेर’ कहावत के अनुसार वह विवाह भी आधा सुधरा, आधा प्रतिक्रियावादी रहेगा। कभी-कभी तो यह मतभेद उग्र होकर संघर्ष और द्वेष का रूप भी धारण कर लेता है। जो बेमन से ठोक-पीटकर आदर्शवादी बनते हैं वे गुप्त रूप से दहेज आदि मांगते हैं और इच्छानुसार न मिलने पर किसी अन्य बहाने अपना रोष प्रकट करते हैं।

🔵 आवश्यकता इस बात की है कि दोनों ही पक्ष आदर्शवादी विचारों के मिलें। यह खोज काफी कठिन होती है। धन, शिक्षा, स्वास्थ्य की दृष्टि से तो अच्छे लड़के मिल जाते हैं पर विचारों के साथ ताल-मेल न बैठने से उनको नीलामी बोली पर ही खरीदना संभव होता है। अस्तु हमें वह माध्यम ढूंढ़ निकालना पड़ेगा जिसके अनुसार परस्पर विवाह संबंध करने वाली इकाइयों में जो भी प्रगतिशील विचारों के हों वे एक संगठन सूत्र में बंधे हों और उनका परस्पर परिचय सुलभ हो सके। इस वर्ग में से अपनी-अपनी स्थिति के अनुकूल जोड़े ढूंढ़ लिये जाया करें, तब आदर्श विवाहों की परम्परा सरल हो जायगी।

🔴 कई जातीय पत्रों में वर कन्या का परिचय, विवरण छपता रहता है, उससे कुछ विशेष प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। ऐसी जानकारी तो किसी भी कालेज में जाकर आसानी से प्राप्त की जा सकती है। जब तक लड़का और उसके घर वाले आदर्श रीति से विवाह करने के लिए प्रतिज्ञाबद्ध न हों, तब तक लड़कों की सूची छपना कुछ महत्व नहीं रखता। हमें उन जातीय इकाइयों को संघबद्ध करना पड़ेगा जो परस्पर विवाह शादी करती हैं। इसके लिए दो उपाय हो सकते हैं (1) प्रगतिशील जातीय सभाओं का संगठन। (2) उन संगठनों द्वारा आयोजित वार्षिकोत्सव या जातीय मेले। दोनों की रूपरेखा आगे प्रस्तुत की जाती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 90)

🌹 आदर्श विवाहों के लिए 24 सूत्री योजना

🔴 22. बारात कम समय ठहरे:-- समीप की बारात का एक दिन और दूर की बारात का दो दिन ठहरना पर्याप्त है।

🔵 अधिक दिनों बारात रुकने से सभी की असुविधा होती है और तरह-तरह के खर्च बढ़ते हैं। समय और पैसे की बर्बादी होती है इसलिये कम समय ही बारात का रुकना उचित है।

🔴 23. नेग अपने-अपने चुकायें:-- कहीं-कहीं ऐसे रिवाज अभी भी हैं कि लड़की वाले के ‘काम वालों’ के नेग बेटे वाले को चुकाने पड़ते हैं। कुछ नेग बेटी वाले को बेटे वाले के कर्मचारियों के चुकाने पड़ते हैं। यह झंझट बन्द करके दोनों अपने-अपने कर्मचारियों के खर्चे चुकावें।

🔵 उपरोक्त प्रकार के हेर-फेर से ‘काम वाले’ या तो असन्तुष्ट रहते हैं या अनुचित लाभ लेते हैं। मनोमालिन्य भी बढ़ता है और देखने में भी यह बात भद्दी लगती हैं। उचित यही है कि उनके परिश्रम का ध्यान रखते नेग या वेतन अपने आप ही चुकाया जाय। दूसरे पक्ष पर उसका भार न डाला जाय।

🔴 24. छुट-पुट रस्म रिवाजें संक्षिप्त की जायें:- बार-बार छुट-पुट रस्म रिवाजें चलाने में समय और धन की बर्बादी न की जाय।

🔵 विवाह पक्का होने से लेकर बारात विदाई होने तक ही नहीं वरन् एक साल तक और रिवाज चलाने पड़ते हैं और उनमें बेकार की चीजें खरीद कर इधर से उधर भेजनी पड़ती हैं। इनका खर्च कई बार विवाह जितना ही आ पहुंचता है। इन बेकार बातों को जितना घटाया जा सकता हो तो अवश्य घटाना चाहिये। विवाह के अवसर पर देन-दहेज देने लेने के अनेक ‘ठिक’ बने हुये हैं। इन्हें कम करके (1) पक्की (वर के घर पर) (2) द्वार स्वागत (लड़की के घर) यह दो ही प्रमुख रखें। विदाई, गोद भरना जैसी शुभ समझे जाने वाले रस्म भी स्थानीय लोकाचार के अनुसार की जा सकती हैं।

🔴 हर प्रान्त के सब क्षेत्रों में अपने-अपने ढंग की अगणित प्रकार के अनेकों छुट-पुट रस्म रिवाज हैं। उनमें से कौन-कौन पूरी तरह तुरन्त ही छोड़ देने चाहिये और कौन-कौन किस तरह घटाई जानी चाहिये यह स्थानीय परिस्थितियों को देखकर किया जाय। दृष्टिकोण यही रहे कि जो रूढ़ियां अनावश्यक है उन्हें घटाकर समय और धन की बर्बादी रोकी जाय।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 28 जनवरी 2017

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 89)

🌹 आदर्श विवाहों के लिए 24 सूत्री योजना

🔴 20. दावत में अधिक संख्या में मिठाइयां न हों?:-- खाद्य संकट और चीनी की कमी का ध्यान रखते हुये मिठाइयां न बनाई जांय और बनानी भी हों तो इनकी संख्या दो तीन से अधिक न हो।

🔵 अधिक संख्या में मिष्ठान्न पकवान बनाने से उनकी तादाद इतनी हो जाती है कि उन सबको खा सकना सम्भव नहीं होता। फलस्वरूप वे बचती और बर्बाद होती हैं। आज ऐसी बर्बादी का समय नहीं। खाने वालों से अनुरोध किया जाय कि वे उतनी वस्तुयें लें जो खा सकें। परोसने वालों से कहा जाय कि वे प्रेम और आतिथ्य तो दिखाएं पर बर्बादी जरा भी न हो इस कला से परसें। अन्न की बर्बादी को देश-द्रोह समझा जाय। अन्न देवता को जूठन के रूप में तिरस्कृत करना धार्मिक दृष्टि से भी अवांछनीय है। मेहतर को जूठन देने की ‘उदारता’ दर्शाने के स्थान पर उसे और भी अधिक उदारता के साथ अच्छा शुद्ध भोजन देना चाहिये।

🔴 उच्छृंखलता एवं अशिष्टता न बरती जाय—हल्दी के थापे लगाना, रंग फेंक कर कपड़े खराब करना, भद्दे मजाक करना जैसे उच्छृंखल अशिष्ट व्यवहार न हों।

🔵 देखा जाता है कि विवाहों के अवसर पर उच्छृंखलता और गन्दे मजाकों का वातावरण बन जाता है। यह अवांछनीय है। इस महंगाई के जमाने में कपड़े खराब कर देना, कहीं पर गुलाल, बूरा आदि वस्तुयें मल कर आंखों को हानि पहुंचाने का खतरा उत्पन्न कर देना अनुचित है। महिलायें अश्लील गीत गाकर अपना गौरव ही घटाती हैं और आगन्तुक अतिथियों का मजाक उड़ना धृष्टता है। ऐसी ओछी बातें सभ्य लोगों के लिये अशोभनीय है, जहां ऐसा कुछ प्रचलित हो उसे रोका जाय।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

गुरुवार, 26 जनवरी 2017

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 84)

🌹 आदर्श विवाहों के लिए 24 सूत्री योजना

🔴 18. बारात की संख्या कम ने कम रहे:-- केवल अत्यन्त आवश्यक एवं निजी व्यक्ति ही बारात में जावें। इसमें कुटुम्बी, रिश्तेदारों या अत्यन्त आवश्यक व्यक्तियों के अतिरिक्त फालतू लोग न हों।

🔵 अक्सर बड़े आदमियों या उजले कपड़े वालों को बारात की शोभा बढ़ाने के लिए खुशामदें करके मिन्नत करके ले जाया जाता है। इसमें उनका अहसान होता है, अपना खर्चा पड़ता है और बेटी वाले की परेशानी बढ़ती है। इन सब असुविधाओं का ध्यान रखते हुये, इस अन्न संकट तथा महंगाई के जमाने में बारात की संख्या बढ़ाना सर्वथा अनुचित है। साधारणतया 20-20 आदमी की बारात पर्याप्त होगी। अधिकतम संख्या 51 तक हो सकती है।

🔴 19. बारात चढ़ाई सादगी के साथ:-- बारात चढ़ाने और उसकी शोभा बनाने में ढेरों निरर्थक पैसा बर्बाद होता है और उसका स्वरूप दम्भ, अहंकार एवं नकली अमीरी जैसा उपहासास्पद बन जाता है। इसे बदल कर सादगी एवं सौम्यता बरती जाय।

🔵 वर की सवारी घोड़े पर निकले जैसा कि बड़े शहरों में रिवाज है। बारात वर के पीछे पैदल शोभा यात्रा में चलें। गांव और कस्बों में भी यही तरीका उचित है। बारातियों के बैठने के लिये जो सवारियां ली गई हों, उनको इस शोभा यात्रा में न रखा जाय। बाजे में 10 से अधिक व्यक्ति न हों। आतिशबाजी, फूलटट्टी, कागज के घोड़े-हाथी, परियां, लड़की लड़के के ऊपर पैसों की बखेर जैसे बेकार खर्च बिलकुल भी न किये जांय। गोधूलि का विवाह रहने से बारात दिन में ही चढ़ेगी इसलिये रात में ही अच्छी लगने वाली इन बेकार चीजों की जरूरत भी न पड़ेगी। बारात के साथ रोशनी का प्रबन्ध भी न करना पड़ेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सुख और दुःख दृष्टिकोण मात्र हैं। (भाग 1)

सब कुछ साधन सम्पन्न और सूक्ष्म होने पर भी एक नहीं असंख्यों व्यक्ति संसार में चिन्तित और उद्विग्न दिखाई देते हैं। यदि और अधिक गहराई से देखा ज...