शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 92)

🌹 आदर्श विवाहों के लिए 24 सूत्री योजना

🔴  (3) जातियों के प्रान्तीय सम्मेलन— जिन जाति-उपजातियों में परस्पर विवाह हो सकता है उनके क्षेत्रीय मेले सम्मेलन तीन दिन के हुआ करें। इनमें प्रवचन भाषण ही नहीं, मनोरंजन के मेले जैसे आयोजन भी रहें। ठहरने और खाने का उचित प्रबन्ध रहे। उन मेलों में उस क्षेत्र के लोग जहां समाज सुधार, ज्ञान-चर्चा, संगठन व्यवस्था आदि की बातें कहें-सुनें वहां परस्पर परिचय बढ़ाकर अपने बच्चों के विवाह-शादी की समस्या भी सुलझावें। हो सके तो विवाह योग्य लड़का-लड़की को भी साथ लेते आवें, जिससे सम्बन्ध पक्के करने में और भी अधिक सुविधा हो सके।

🔵 ऐसे जातीय मेलों की तारीखें तथा स्थान नियत रहे। पचास-पचास मील चारों ओर का घेरा एक मेले का विशेष कार्य क्षेत्र माना जाय। इस प्रकार सौ मील लम्बाई-चौड़ाई का एक क्षेत्र उस मेले से सम्बन्धित हो। इससे उस प्रदेश के लोग परस्पर परिचित हो जायेंगे, उपयुक्त जोड़े ढूंढ़ने में अधिक आसानी से सफल हो जाया करेंगे। ऐसे मेले उन प्रदेशों के अलग-अलग क्षेत्रों में होते रहें जहां वे परस्पर विवाह करने वाली, जाति-उपजातियां फैली हुई हों।

🔴 इन मेलों में, जो जातीय वार्षिक सम्मेलन हों, उनके संगठन एवं प्रगतिशीलता की योजना विशेष रूप से बनाई जाय और उसी तरह के भाषण, प्रवचन एवं विचार विनियम होता रहे। इन सम्मेलनों में सामूहिक विवाहों का भी आयोजन हो। ऐसे विवाह बहुत ही सस्ते पड़ते हैं और दूर-दूर तक कुरीति विरोधी आन्दोलन की सफलता का प्रचार करते हैं। बिहार के मैथिल ब्राह्मणों में तथा पंजाब के सिखों में इस प्रकार की व्यवस्था बनाई हुई भी है। आवश्यकता इस बात की है कि ऐसे जातीय मेले, जो आदर्श विवाहों का उद्देश्य पूरा करने में सहायक हों, जगह-जगह लगाये जायें और उन्हें सफल बनाया जाय।

🔵 जब कि निरर्थक मेले हर साल हजारों की संख्या में होते रहते हैं तो कोई कारण नहीं कि विचारशील लोगों द्वारा, सदुद्देश्य के लिए सूझ-बूझ के साथ लगाये गये यह मेले सफल न हों। इनमें विवाह शादियों के अतिरिक्त सामूहिक यज्ञोपवीत आदि भी हो सकते हैं और अन्य अनेकों कुरीतियों का निवारण तथा जातीय समस्याओं का हल हो सकता है। ध्यान रखने की बात इतनी ही है कि इन सम्मेलनों में प्रगतिशील लोगों की प्रमुखता हो। भावावेश में उनका संचालन तथा-कथित बड़े आदमियों के हाथों दे दिया गया तो वे लाल बुझक्कड़ इस माध्यम का उपयोग संकीर्णता एवं रूढ़िवादिता फैलाने में करने लगेंगे। इससे अपना मूल उद्देश्य ही नष्ट हो जायगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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