शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 27) 4 Feb

🌹 व्यावहारिक साधना के चार पक्ष 

🔴 चौथा संयम है- विचारसंयम मस्तिष्क में हर घड़ी विचार उठते रहते हैं, कल्पनायें चलती रहती हैं। ये अनर्गल, अस्त-व्यस्त एवं अनैतिक स्तर के न हों, इसके लिये विवेक को एक चौकीदार की तरह नियुक्त कर देना चाहिये। उसका काम हो कुविचारों को सद्विचारों की टक्कर मारकर परास्त करना। अनगढ़ विचारों के स्थान पर रचनात्मक चिन्तन का सिलसिला चलाना। विचार मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति है। वही कर्म के रूप में परिणत होती और परिस्थिति बनकर सामने आती है। जीवन को कल्पवृक्ष बनाने का श्रेय रचनात्मक विचारों का ही होता है। इस तथ्य को भली प्रकार समझते हुए चिन्तन को मात्र रचनात्मक एवं उच्चस्तरीय विचारों में ही संलग्न रखना चाहिये।                 

🔵 साधना, स्वाध्याय, संयम, सेवा के चार पुरुषार्थों मेें जीवन की प्रगति एवं सफलता बन पड़ती है। इसलिये दिनचर्या में उन चारों के लिये समुचित स्थान रहे, उसकी जाँच-पड़ताल आत्मसमीक्षा के समय में निरन्तर करनी चाहिये। आत्मसमीक्षा, आत्मसुधार, आत्म-निर्माण और आत्मविकास की चतुर्दिक् प्रक्रिया को अग्रगामी बनाने के लिये मध्यान्तर काल की मनन साधना करनी चाहिये। इसे आत्मदर्शन समझा जाना चाहिये जो थोड़ी विकसित अवस्था में ईश्वर दर्शन के रूप में फलित होता है।     

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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