शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 41)

🌞 हिमालय में प्रवेश (गोमुख के दर्शन)

🔵 नदी नदों ने, झरने और सर सोतों ने भी अपना अलग अस्तित्व कायम न रखने की, अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और कीर्ति स्थापित करने की लालसा को दमन करने की जो दूरदर्शिता की है वह भी सर्वथा अभिनन्दनीय है। उनने अपने को खोकर गंगा की क्षमता, महत्ता और कीर्ति बढ़ाई। सामूहिकता का, एकत्रीकरण का, मिलजुल कर काम करने का महत्व समझा, इसके लिए उनकी जितनी प्रशंसा की जाय कम है। संगठन में ही शक्ति है यह उन्होंने वाणी से नहीं, मन से नहीं प्रत्यक्ष क्रिया से कर दिखाया, कर्मवीरता इसे ही कहते हैं, आत्म-त्याग के इस अनुपम आदर्श में जितनी महानता है उतनी ही दूरदर्शिता भी है। यदि वे अपना अलग अस्तित्व बनाये रहने पर अड़े रहते, सोचते जो मेरी क्षमता है उसका यश मुझे ही मिलना चाहिए और गंगा में मिलने से इनकार कर देते तो अवश्य ही उनका अपना अस्तित्व भी अलग रहता और नाम भी। पर वह होता इतना छोटा कि उसे उपेक्षणीय और नगण्य ही माना जाता। उस दशा में उस जल को गंगाजल कोई नहीं कहता और उसका चरणामृत सिर पर चढ़ाने को कोई लालायित न रहता।

🔴 गोमुख पर आज जिस पुनीत जल धारा में माता गंगा का दर्शन मज्जन मैंने किया, वह तो उद्गम मात्र था। पूरी गंगा का तो सहस्रों नदी नालों के संगठन से सामूहिकता का कार्य-क्रम लेकर चलने पर बनी है। गंगा सागर ने उसी का स्वागत किया है। सारी दुनिया उसी को पूजती है। गोमुख की तलाश में तो मुझ जैसे चन्द आदमी ही पहुंच पाते हैं।

🔵 गंगा और नदी नालों के सम्मिश्रण के महान् परिणाम को यदि सर्व साधारण की—नेता और अनुयायियों की समझ में आ जावे—लोग सामूहिक के, सामाजिकता के महत्व को हृदयंगम कर सकें—तो एक ऐसा ही पवित्र पापनाशिनी, लोकतारिणी संघ शक्ति का प्रादुर्भाव हो सकता है जैसा गंगा का हुआ है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

👉 आपसी मतभेद से विनाश :-

🔵 एक बहेलिए ने एक ही तरह के पक्षियों के एक छोटे से झुंड़ को खूब मौज-मस्ती करते देखा तो उन्हें फंसाने की सोची. उसने पास के घने पेड़ के नीच...