गुरुवार, 21 नवंबर 2019

My Family Is My Strength Part 2 | Pt Shriram Sharma Acharya



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Gayatri Hi Brahmastra | गायत्री ही गायत्री ही ब्रह्मास्त्र



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👉 कोयले का टुकड़ा

अमित एक मध्यम वर्गीय परिवार का लड़का था। वह बचपन से ही बड़ा आज्ञाकारी और मेहनती छात्र था। लेकिन जब से उसने कॉलेज में दाखिला लिया था उसका व्यवहार बदलने लगा था। अब ना तो वो पहले की तरह मेहनत करता और ना ही अपने माँ-बाप की सुनता।  यहाँ तक की वो घर वालों से झूठ बोल कर पैसे भी लेने लगा था। उसका बदला हुआ आचरण सभी के लिए चिंता का विषय था। जब इसकी वजह जानने की कोशिश की गयी तो पता चला कि अमित बुरी संगती में पड़ गया है।  कॉलेज में उसके कुछ ऐसे मित्र बन गए हैं जो फिजूलखर्ची करने, सिनेमा देखने और धूम्र-पान करने के आदि हैं।

पता चलते ही सभी ने अमित को ऐसी दोस्ती छोड़ पढाई- लिखाई पर ध्यान देने को कहा; पर अमित का इन बातों से कोई असर नहीं पड़ता, उसका बस एक ही जवाब होता,  मुझे अच्छे-बुरे की समझ है, मैं भले ही ऐसे लड़को के साथ रहता हूँ पर मुझपर उनका कोई असर नहीं होता…

दिन ऐसे ही बीतते गए और धीरे-धीरे परीक्षा के दिन आ गए, अमित ने परीक्षा से ठीक पहले कुछ मेहनत की पर वो पर्याप्त नहीं थी, वह एक विषय में फेल हो गया । हमेशा अच्छे नम्बरों से पास होने वाले अमित के लिए ये किसी जोरदार झटके से कम नहीं था। वह बिलकुल टूट सा गया, अब ना तो वह घर से निकलता और ना ही किसी से बात करता। बस दिन-रात अपने कमरे में पड़े कुछ सोचता रहता। उसकी यह स्थिति देख परिवारजन और भी चिंता में पड़ गए। सभी ने उसे पिछला रिजल्ट भूल आगे से मेहनत करने की सलाह दी पर अमित को तो मानो सांप सूंघ चुका था, फेल होने के दुःख से वो उबर नही पा रहा था।

जब ये बात अमित के पिछले स्कूल के प्रिंसिपल को पता चली तो उन्हें यकीन नहीं हुआ, अमित उनके प्रिय छात्रों में से एक था और उसकी यह स्थिति जान उन्हें बहुत दुःख हुआ, उन्होंने निष्चय किया को वो अमित को इस स्थिति से ज़रूर निकालेंगे।

इसी प्रयोजन से उन्होंने एक दिन अमित को अपने घर बुलाया।

प्रिंसिपल साहब बाहर बैठे अंगीठी ताप रहे थे। अमित उनके बगल में बैठ गया। अमित बिलकुल चुप था , और प्रिंसिपल साहब भी कुछ नहीं बोल रहे थे। दस -पंद्रह मिनट ऐसे ही बीत गए पर  किसी ने एक शब्द नहीं कहा। फिर अचानक प्रिंसिपल साहब उठे और चिमटे से कोयले के एक धधकते टुकड़े को निकाल मिटटी में डाल दिया, वह टुकड़ा कुछ देर तो गर्मी  देता रहा पर अंततः ठंडा पड़ बुझ गया।

यह देख अमित कुछ उत्सुक हुआ और बोला,  प्रिंसिपल साहब, आपने उस टुकड़े को मिटटी में क्यों डाल दिया, ऐसे तो वो बेकार हो गया, अगर आप उसे अंगीठी में ही रहने देते तो अन्य टुकड़ों की तरह वो भी गर्मी देने के काम आता !

प्रिंसिपल साहब मुस्कुराये और बोले,  बेटा, कुछ देर अंगीठी में बाहर रहने से वो टुकड़ा बेकार नहीं हुआ, लो मैं उसे दुबारा अंगीठी में डाल देता हूँ…. और ऐसा कहते हुए उन्होंने टुकड़ा अंगीठी में डाल दिया।

अंगीठी में जाते ही वह टुकड़ा वापस धधक कर जलने लगा और पुनः गर्मी प्रदान करने लगा।

कुछ समझे अमित।  प्रिंसिपल साहब बोले, तुम उस कोयले के टुकड़े के समान ही तो हो, पहले जब तुम अच्छी संगती में रहते थे, मेहनत करते थे, माता-पिता का कहना मानते थे तो अच्छे नंबरों से पास होते थे, पर जैस वो टुकड़ा कुछ देर के लिए मिटटी में चला गया और बुझ गया, तुम भी गलत संगती में पड़ गए  और परिणामस्वरूप  फेल हो गए, पर यहाँ ज़रूरी बात ये है कि एक बार फेल होने से तुम्हारे अंदर के वो सारे गुण समाप्त नहीं हो गए… जैसे कोयले का वो टुकड़ा कुछ देर मिटटी में पड़े होने के बावजूब बेकार नहीं हुआ और अंगीठी में वापस डालने पर धधक कर जल उठा, ठीक उसी तरह तुम भी वापस अच्छी संगती में जाकर, मेहनत कर एक बार फिर मेधावी छात्रों की श्रेणी में आ सकते हो …

याद रखो,  मनुष्य ईश्वर की बनायीं सर्वश्रेस्ठ कृति है उसके अंदर बड़ी से बड़ी हार को भी जीत में बदलने की ताकत है, उस ताकत को पहचानो, उसकी दी हुई असीम शक्तियों का प्रयोग करो और इस जीवन को सार्थक बनाओ।

अमित समझ चुका था कि उसे क्या करना है, वह चुप-चाप उठा, प्रिंसिपल साहब के चरण स्पर्श किये और निकल पड़ा अपना भविष्य बनाने।

👉 निर्माण से पूर्व सुधार की सोचें (अन्तिम भाग)

भिक्षा व्यवसाय, मृतक भोज, बाल-विवाह, कन्या विक्रय, पत्नी त्याग आदि अनेकानेक प्रचलन ऐसे हैं जो औचित्य की कसौटी पर किसी भी प्रकार खरे सिद्ध नहीं होते फिर भी हमारे गले में फाँसी के फंदे की तरह कसे हुए हैं। इन कुरीतियों को इसी प्रकार सहते रहा गया, उनका मोह न छोड़ा गया तो समझना चाहिए कि हम दिन-दिन गलते, फिसलते, पिछड़ते और घटते गिरते ही चले जायेंगे।

अनैतिकता का तो कहना ही क्या? समय का पालन, वचन का पालन, विश्वास का पालन घटता जा रहा है। व्यवसाय, आचरण, कर्तव्य, उत्तरदायित्व के क्षेत्रों में तनिक तनिक सी बात पर मनुष्य ऐसी कलामुण्डी खाता है मानों नीति मर्यादा पालन की नहीं, कहने सुनने भर की बात रह गई है। कामचोरी, हरामखोरी, करचोरी, रिश्वत, धोखाधड़ी, छल, स्वार्थान्धता, नागरिक कर्तव्यों की अवहेलना आदि की अवांछनीयताएँ अब सामान्य व्यवहार की, चातुर्य कौशल की अंग बनती जा रही है। लगता है मनुष्य अपनी गरिमा का परित्याग कर प्रेत पिशाच जैसी अपनाई जाने वाली दुष्टता, भ्रष्टता अपनाने के लिए तेजी से अग्रसर हो रहा है।

आज राष्ट्र का एक भी परिवार परिकर इस सर्वव्यापी छूत से बचा हुआ नहीं है। नौकरी के लिए पढ़ाई की अब कोई उपयोगिता रह नहीं गई है। फिर भी लोग घर फूँककर तमाशा देखने और बालकों को उच्च शिक्षा के नाम पर ऐसी स्थिति में पटक देते हैं जिनमें से नौकरी न मिलने पर किसी काम के नहीं रहते।

आज की व्यस्तता को देखते हुए यह आशा तो नहीं की जा सकती कि जन सामान्य चक्रव्यूह तोड़ने वाले अभिमन्यु की भूमिका निभायें। पर इतनी आशा तो की ही जा सकती है कि वे अपने निजी जीवन में, परिवार के क्षेत्र में जो मूढ़ मान्यताएँ, कुरीतियाँ, अवांछनीयताएँ पनपती देखें उन्हें समय रहते उखाड़ने का प्रयत्न करें। कम से कम इतना तो हो ही सकता है कि उनका समर्थन न करें, उनकी प्रशंसा भी न करें। विरोध बन पड़े तो करे पर यदि वैसा साहस न हो तो कम से कम असहमति और असहयोग की स्थिति तो बनाये ही रहें। यदि सत्य निष्ठा उमगे, औचित्य के प्रति श्रद्धा जगे तो उसे साहस भरे संघर्ष के रूप में परिणत करना चाहिए और जितना सम्भव हो उतना विरोध अथवा असहयोग जारी रखना ही चाहिए। इतनी प्रखरता यदि जीवन्त रखी जा सके तो उतने से भी अनौचित्य के असुर का मनोबल टूटेगा और देवत्व पनपेगा।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 शक्ति - साधना

शक्ति में समूचा अस्तित्त्व सिमटा है। जड़-चेतन इसी के रूप हैं। कहीं इसकी सुप्त निष्क्रियता झलकती है, तो कहीं इसकी जाग्रत् सक्रियता के दर्शन होते हैं। जीवन के विविध रूप इसी से प्रकटे हैं। पशु-पक्षियों में, वृक्ष-वनस्पतियों में इसी की चेतनता लहराती है। इसकी ही ऊर्जा गति-प्रगति, विकास-विस्तार के अनेक रूप धरती है। सचमुच ही जीवन और जगत् शक्तिमय है। शक्ति के सिवा यहाँ कुछ भी नहीं।
  
शक्ति-लीला का यह रहस्य मानव जीवन में सबसे गहरा है। स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण शरीर, अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय एवं आनन्दमय कोश शक्ति की विविध रहस्यमयी धाराओं को ही प्रकट करते हैं। मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्धि, आज्ञा व सहस्रार चक्र में महाशक्ति अपने अनेकों रहस्यों को उजागर करती है। कुण्डलिनी महाशक्ति तो जैसे मानव जीवन का अधिष्ठान ही है। जगन्माता आदिशक्ति स्वयं ही इस परम रूप में प्रतिष्ठित होकर मानवीय जीवन को सर्वश्रेष्ठ होने का गौरव प्रदान करती हैं।
  
शक्ति-लीला के इस रहस्य से जो अनजान-अनभिज्ञ रहते हैं, वे शक्ति-समुद्र में वास करते हुए भी दीन-दुःखी व दयनीय बने रहते हैं। ‘सागर-बिच मीन पियासी’ यही उनकी जीवन कहानी होती है। जो इस रहस्य को जानने की साधना करते हैं, वे आदिशक्ति की सन्तान होने का गौरव पाते हैं। उनके रोम-रोम में शक्ति के समुद्र लहराते हैं। उनकी नाड़ियों व शिराओं में ऊर्जा की धाराएँ उफनती हैं। शक्ति-साधकों के लिए कहीं भी कुछ भी असम्भव नहीं रहता।
  
असम्भव को सम्भव करने वाली शक्ति साधना की यह परम विद्या गायत्री महामंत्र के चौबीस अक्षरों में समायी है। जो अनुभवी हैं वे इस सच्चाई को जानते हैं। नवरात्रि के नौ दिनों का प्रति क्षण इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। जो शक्ति-साधक इन क्षणों के महत्त्व को पहचान कर गायत्री महाशक्ति की साधना में तल्लीन होंगे वे शक्ति स्रोत बने बिना न रहेंगे। जीवन और जगत् की अनेकों रहस्यमयी शक्ति के अनुदानों से उनका जीवन कृतार्थ होगा।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १२८

👉 आत्मचिंतन के क्षण 21 Nov 2019

★ प्रेम गंगा की भाँति वह पवित्र जल है, जिसे जहाँ छिडका जाय, वहीं पवित्रता पैदा करेगा। उसमें आदर्शेंकी अविच्छिन्नता जुड़ी रहती है। आदर्श रहित प्यार को ही मोह कहते हैं। दूरदर्शिता, विवेकशीलता, शालीनता, पवित्रता, सदाशयता जैसे गुणों का भरपूर समावेश प्रेम में होता है। उसमें इन्हीं गुणों की अभिवृद्धि के लिए प्रयत्नशील रहता है। मोह इन विशेषताओं से रहित होता है।

◆ दृष्टिकोण में संयम, सहकार, सन्तुलन स्नेह, सद्भाव, श्रम, साहस जैसे सद्गुणों का महत्व समझने और अपने स्वभाव, व्यवहार को सज्जनोचित बनाने की उपयोगिता समाविष्ट हो सके, तो समझना चाहिए कि आज गई- गुजरी स्थिति होने पर भी कल इन्हीं विशेषताओं के कारण उज्ज्वल भविष्य का सरंजाम जुटाना सुनिश्चित है।   

□  धर्म व्यक्तित्व के गहन क्षेत्र में प्रवेश करके भावश्रद्धा, प्रखर प्रज्ञा और आदर्श कर्म- निष्ठा को उभारकार मनुष्य में देवत्व का उदय करता है। भ्रष्टता और दुष्टता पर शासकीय नियन्त्रण नगण्य जितना ही हो पाता है। धर्म चरित्र और चिन्तन में उत्कृष्टता भर देने और समाज को सत्परम्परा अपनाने के लिए बाधित करने वाला एक प्रचण्ड अनुशासन है। ऐसा अनुशासन जिसके सामने न अनीति ठहरती है, न उद्दण्ड आततायी उच्छृंखलता। 
 
■   ऊँचे उद्देश्यों का होना सराहनीय है, पर उनकी सफलता के लिए ऐसे कर्मठ समर्थकों की मण्डली चाहिए जो लक्ष्य के प्रति, इस प्रकार समर्पित हो, मानो वही ईमान है और वही भगवान है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Gayatri Sadhna truth and distortions (Part 9)

Q.11. What is Savita?         
Ans. The deity for meditation on Gayatri Mantra is ‘Savita’. Savita is the cosmic power of God which provides energy to all animate and inanimate systems of the cosmos. In the Sun and other stars, for instance, it works as fission and fusion of atoms.

Q.12. Why is Gayatri Upasana considered supreme as compared to other forms of worship?

Ans. Gayatri is the fountainhead of all streams of divine powers personified and designated as deities (Lakhyami, Durga, Saraswati etc.) Thus by invocation of Gayatri the Sadhak starts accessing divine attributes. Speciality of Gayatri Sadhana lies in the fact that it provides the Sadhak an access to the huge store of spiritual energy accumulated in the cosmos by Tap of innumerable Gayatri Sadhakas since times immemorial. With a little effort, he is able to get assistance from the ancient Rishis in astral realms (the abodes of elevated and enlightened soul) and moves speedily realms on the spiritual path.  
Gayatri Sadhana is based on the super-science governing the laws of transformation of matter and energy by influx of divine energies from supramental (Para) realms to the natural (a-Para) realm.  

Gayatri is also personification of God’s power of righteous wisdom. Assimilating the substance and meaning underlying its worship leads to far-sighted wisdom. This alone is  sufficient incentive to inspire one to lead righteous life and effortlessly get rid of worldly sorrows, grief, pain and suffering. The Sadhak gets patience to endure difficulties which cannot be avoided. He is also crowned with worldly success on account of inculcation of perseverance and courage to march ahead on the path of integral growth.

Attainment of heaven and liberation are the outcome of refinement in outlook and incorporation of excellence in the method of working. It  is not necessary to wait for the next life after death for achieving these twin aims. Liberation from bondage means freedom from the fetters of greed, infatuation and egoism. A person who assimilates the knowledge underlying Gayatri and infuses his soul with inner refinement surely gets liberated from worldly bondage. However,   when Jap is performed in a routine manner as a ritual and no attempt is made to assimilate its substance in practical life, no perceptible progress takes place.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 24