रविवार, 12 नवंबर 2017

👉 चार विद्वान ब्राह्मण

🔷 बहुत पुरानी बात है। चार विद्वान ब्राह्मण मित्र थे। एक दिन चारों ने संपूर्ण देश का भ्रमण कर हर प्रकार का ज्ञान अर्जित करने का निश्चय किया। चारों ब्राह्मणों ने चार दिशाएं पकड़ीं और अलग-अलग स्थानों पर रहकर अनेक प्रकार की विद्याएं सीखीं। पांच वर्ष बाद चारों अपने गृहनगर लौटे और एक जंगल में मिलने की बात तय की। चूंकि चारों परस्पर एक-दूसरे को अपनी गूढ़ विद्याओं व सिद्धियों को बताना चाहते थे, अत: इसके लिए जंगल से उपयुक्त अन्य कोई स्थान नहीं हो सकता था।

🔶 जब चारों जंगल में एक स्थान पर एकत्रित हुए तो वहां उन्हें शेर के शरीर की एक हड्डी पड़ी हुई मिली। एक ब्राह्मण ने कहा, ‘मैं अपनी विद्या से इस एक हड्डी से शेर का पूरा अस्थि पंजर बना सकता हूं।’ उसने ऐसा कर भी दिखाया। तब दूसरे ब्राह्मण ने कहा, ‘मैं इसे त्वचा, मांस और रक्त प्रदान कर सकता हूं।’ फिर उसने यह कर दिया। अब उन लोगों के समक्ष एक शेर पड़ा था, जो प्राणविहीन था।

🔷 अब तीसरा ब्राह्मण बोला, ‘मैं इसमें अपनी सिद्धि के चमत्कार से प्राण डाल सकता हूं।’ चौथे ब्राह्मण ने उसे यह कहते हुए रोका, ‘यह मूर्खता होगी। हमें तुम पर विश्वास है, किंतु यह करके न दिखाओ।’ किंतु तीसरे ब्राह्मण का तर्क था कि ऐसी सिद्धि का क्या लाभ जिसे क्रियान्वित न किया जाए। उसका हठ देखकर चौथा ब्राह्मण तत्काल पास के पेड़ पर चढ़कर बैठ गया। तीसरे ब्राह्मण के मंत्र पढ़ते ही शेर जीवित हो गया। प्राणों के संचार से शेर को आहार की आवश्यकता महसूस हुई और उसने सामने मौजूद तीनों ब्राह्मणों को मारकर खा लिया। चौथे ब्राह्मण ने समझदारी से अपने प्राण बचा लिए।

🔶 किसी भी कार्य को करने से पहले उसके परिणामों पर भली-भांति विचार कर लेना चाहिए, अन्यथा विपरीत स्थिति का सामना करना पड़ सकता है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 13 Nov 2017


👉 आज का सद्चिंतन 13 Nov 2017


👉 पिशाच प्रेमी या पागल (भाग 1)

🔶 देखते हैं कि आजकल गली कूचों में प्रेम की आँधी सी आई हुई है। मुहब्बत के तूफान उड़ रहे हैं। सिनेमाबाज, मनचले, शौकीन फिल्म अभिनेत्रियों से प्रेम करते हैं, उनकी तस्वीरों को आँखों में छिपाये फिरते हैं। सूरत मन में बसी हुई है, उनके हाव-भाव और भाव-भंगी का ऐसा स्मरण करते रहते हैं मानो ये ही इनकी उपास्य देवता हैं। “प्रेम का घर हो प्रेम की छत हो” के गीत उनकी जबान पर गुनगुनाते रहते हैं, उन्हीं की प्रतिध्वनि उनके कानों में गूँजती रहती है।

🔷 देखते हैं कि गलियों में कमर लचकाकर चलने वाले छैल चिकनियाँ पराई बहिन-बेटियों पर कुदृष्टि डालते हैं। उन्हें बहकाकर पाप पंक में घसीटने का प्रयत्न करते हैं, मौका लगे तो उनका धन, धर्म ले भागते हैं। कलेजा थामे फिरते हैं, कोई नयन बाण से बिधा हुआ बनता है, किसी को इश्क का ज्वर है, किसी को मुहब्बत मर्ज। बुलबुल के तराने, सैयाद कफस, शमा, परवाना, कातिल, शमशीर दिल, छुरी और न जाने क्या-क्या उन्हें याद आता है। वेश्याओं के उपासक, दुराचारिणी स्त्रियों के गुलाम, यह रंगीले मनचले इधर से उधर मटर-गश्ती करते हैं और अपने को प्रेमी बताते हैं।

🔶 देखते हैं कि घासलेटी कथाकार, आशिक माशूकी के अफसाने कहने वाले, लैला मजनू के नवीन संस्करण तैयार करते हैं। भोगेच्छा को अनियंत्रित रूप से भड़काने के लिए प्रेम को बन्धन रहित बताते हैं। “काबू में जिसका दिल न हो-वह गरीब क्या करे?” का नारा इसलिए लगाया जाता है कि इनकी शोहदाई को छूट मिल जाय, दुनिया इन्हें निर्दोष समझे। चार मनचले मिले कि गन्दी-गन्दी चर्चा चली, खूबसूरत औरतों की चर्चा, अपने कुकर्मों का बढ़ा-चढ़ा वर्णन, इन्द्रिय सुख की अनर्गल कल्पनाएं करने वाले अपने को प्रेमी मानते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, मई1942, पृष्ठ 11
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1942/May/v1.11


http://literature.awgp.org

👉 आत्मोन्नति के चार आधार (भाग 3)

🔶 अब हम चारों चीजों के ऊपर प्रकाश डालते हैं। पहली है— उपासना प्लस साधना। उपासना और साधना— इन दोनों को मिलाकर पूरी चीज बनती है। उपासना का अर्थ है भगवान् पर विश्वास, भगवान् की समीपता। उपासना माने भगवान् के पास बैठना, नजदीक बैठना। इसका मतलब यह हुआ कि उसकी विशेषताएँ हम अपने जीवन में धारण करें। जैसे आग के पास हम बैठते हैं, तो आग की गर्मी से हमारे कपड़े गरम हो जाते हैं, हाथ गरम हो जाते हैं, शरीर गरम हो जाता है। पास बैठने का यही लाभ होना चाहिए। बर्फ के पास बैठते हैं, ठण्डक में बैठते हैं तो हमारे हाथ ठण्डे हो जाते हैं, कपड़े ठण्डे हो जाते हैं।
        
🔷 पानी में बर्फ डालते हैं तो पानी ठण्डा हो जाता है। ठण्डक के नजदीक जाने से हमें ठण्डक मिलनी चाहिए। गर्मी की समीपता से गर्मी मिलनी चाहिए। सुगन्धित चीजों से सुगन्ध मिलनी चाहिए। चन्दन के समीप उगने वाले पौधे सुगन्धित हो जाते हैं, उसकी समीपता की वजह से। यही समीपता वास्तविक है। उपासना का अर्थ यह है कि भगवान का भजन करें, नाम लें, जप करें, ध्यान करें, पर साथ-साथ हम इस बात के लिए भी कोशिश करें कि हम भगवान के नजदीक आते जाएँ। भगवान हमारे में समाविष्ट होता जाए और हम भगवान में समाविष्ट होते जाएँ अर्थात् दोनों एक हो जाएँ।

🔶 एक होने से मतलब यह है कि हम दोनों की इच्छाएँ, दोनों की गतिविधियाँ, दोनों की क्रिया-पद्धति, दोनों के दृष्टिकोण एक जैसे रहें। हमको ईश्वर जैसा बनने का प्रयत्न करना चाहिए। ईश्वर जैसे बनें, न कि ईश्वर पर हुक्म चलाएँ, आपको किसी भी हालत में हमारी माँगे पूरी करनी चाहिए। उपासना का तात्पर्य अपनी मनोभूमि को इस लायक बनाना कि हम भगवान् के आज्ञानुवर्ती बन सकें। उनके संकेतों के इशारे पर अपनी विचारणा और क्रिया-पद्धति को ढाल सकें। उपासना-भजन इसीलिए किया जाता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 आज का सद्चिंतन 12 Nov 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 12 Nov 2017


👉 आन्तरिक निकटता चाहिए

🔶 दूसरों की तरह हमारे भी दो शरीर हैं, एक हाड़-मांस का, दूसरा विचारणा एवं भावना का। हाड़-मांस से परिचय रखने वाले करोड़ों हैं। लाखों ऐसे भी हैं जिन्हें किसी प्रयोजन के लिए हमारे साथ कभी सम्पर्क करना पड़ा है। अपनी उपार्जित तपश्चर्या को हम निरन्तर एक सहृदय व्यक्ति की तरह बाँटते रहते हैं। विभिन्न प्रकार की कठिनाइयों एवं उलझनों में उलझे हुए व्यक्ति किसी दलदल में से निकलने के लिए हमारी सहायता प्राप्त करने आते रहते हैं।

🔷 अपनी सामर्थ्य के अनुसार उनका भार हलका करने में कोई कंजूसी नहीं करते। इस संदर्भ में अनेक व्यक्ति हमारे साथ संपर्क बनाते और प्रयोजन पूरा होने पर उसे समाप्त कर देते हैं। कितने ही व्यक्ति साहित्य से प्रभावित होकर पूछताछ एवं शंका समाधान करने के लिए, कितने ही आध्यात्मिक साधनाओं के गूढ़ रहस्य जानने के लिए, कई अन्यान्य प्रयोजनों से आते हैं। इनकी सामयिक सेवा कर देने से हमारा कर्त्तव्य पूरा हो जाता है। उनके बारे में न हम अधिक सोचते हैं और न उनकी कोई शिकायत या चिंता करते हैं।

🔶 हमारे मन में भावनाएँ उनके लिए उफनती हैं जिनकी पहुँच हमारे अंतःकरण एवं भावना स्तर तक है। भावना शरीर ही वास्तविक शरीर होता है। हम शरीर से जो कुछ हैं, भावना की दृष्टि से कहीं अधिक हंै। हम शरीर से किसी  की जो भलाई कर सकते हैं उसकी अपेक्षा अपनी भावनाओं, विचारणाओं का अनुदान देकर कहीं अधिक लाभ पहुँचाते हैं। पर अनुदान ग्रहण वे ही कर पाते हैं जो भावनात्मक दृष्टि से हमारे समीप हैं।

🔷 जिन्हें हमारे विचारों से प्रेम है, जिन्हें हमारी विचारणा, भावना एवं अंतःप्रेरणा का स्पर्श करने में अभिरुचि है उन्हीं के बारे में यह कहना चाहिए कि वे तत्त्वतः हमारे निकटवर्ती एवं स्वजन संबंधी हैं। उन्हीं के बारे में हमें कुछ विशेष सोचना है, उन्हीं के लिए हमें कुछ विशेष करना है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, जुलाई 1966, पृष्ठ 42
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1966/July/v1.42
 

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग 33)

युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव ऐसे ही आध्यात्मिक चिकित्सक थे। मानवीय चेतना के सभी दृश्य- अदृश्य आयामों की मर्मज्ञता उन्हें हासिल थी। जब भी कोई...