बुधवार, 25 जनवरी 2017

👉 वास्तविक प्रार्थना का सच्चा स्वरूप

🔴 मानव मात्र शांति चाहता है, चिरशांति, पर वह शांति है कहाँ? संसार में तो अशांति का ही साम्राज्य है। शांति के भंडार तो वही केवल शक्तिपुंज सर्वेश्वर भगवान् ही हैं। वे ही परम गति हैं और उनके पास पहुँचने के लिए सत्य हृदय से की गई प्रार्थना ही पंखस्वरूप है। उनके अक्षय भंडार से सुख-शांति की प्राप्ति होती है।

🔵 प्रार्थना कीजिए। अपने हृदय को खोल कर कीजिए। चाहे जिस रूप में कीजिए, चाहे जहाँ एकांत में कीजिए, अपनी टूटी-फूटी लडख़ड़ाती भाषा में कीजिए, भगवान् सर्वज्ञ हैं। वे तुरंत ही आप की तोतली बोली को समझ लेंगे। प्रात: काल प्रार्थना कीजिए, मध्याह्नï में कीजिए, संध्या को कीजिए, सर्वत्र कीजिए और सभी अवस्थाओं में कीजिए। उचित तो यही है कि आप की प्रार्थना निरंतर होती रहे। यही नहीं आप का संपूर्ण जीवन प्रार्थना- मय बन जाए।

🔴 प्रभु से माँगिए कुछ नहीं। वे तो सबके माँ-बाप हैं। सबकी आवश्यकताओं को वे खूब जानते हैं। आप तो दृढ़ता से उनके मंगलविधान को सर्वथा स्वीकार कर लीजिए। उनकी इच्छा के साथ आपनी इच्छा को जोडक़र एकरूप कर दीजिए। भगवान् की हाँ में हाँ मिलाते रहिए, तभी सच्ची शांति का अनुभव कर सकोगे।

🔵 जब कभी जो भी परिस्थिति अनुकूल अथवा प्रतिकूल आ जाए, भगवान को धन्यवाद दीजिए और हृदय से कहिए-‘प्रभो! मैं तो यही चाहता था।’

🌹 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 26 Jan 2017


👉 आज का सद्चिंतन 26 Jan 2017


👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 19) 26 Jan

🌹 सार्थक, सुलभ एव समग्र साधना  

🔴 चेतना की शक्ति संसार की सबसे बड़ी शक्ति है। मनुष्य ही, रेल, जहाज कारखाने आदि बनाता है। विज्ञान के नित नये आविष्कार करता है। यहाँ तक कि धर्म और दर्शन, आचार और विचार भी उसी के रचे हुए हैं। ईश्वर की साकार रूप में कल्पना तथा स्थापना करना भी उसी का बुद्धि-कौशल है। इस अनगढ़ धरातल को, सुविधाओं, सुन्दरताओं, उपलब्धियों से भरापूरा बनाना भी मनुष्य का ही काम है। यहाँ मनुष्य शब्द में किसी शरीर या वैभव को नहीं समझा जाना चाहिये। विशेषताएँ चेतना के साथ जुड़ी होती हैं। इसे भी प्रयत्न पूर्वक उठाया या गिराया जा सकता है। शरीर को बलिष्ठ या दुर्बल बना लेना प्राय: मनुष्य की अपनी, रीति-नीति पर निर्भर रहता है।                

🔵 सम्पन्न और विपन्न भी लोग अपनी हरकतों से ही बनते हैं। उठना और गिरना अपने हाथ की बात है। मनुष्य को अपने भाग्य का निर्माता आप कहा जाता है। यहाँ व्यक्ति का मतलब आत्मचेतना से ही समझा जाना चाहिये। वही प्रगतिशीलता का उद्गम है। इसी क्षेत्र में पतन-पराभव के विषैले बीजांकुर भी जमे होते हैं। सद्गुणी लोग अभावग्रस्त परिस्थितियों में भी सुख-शान्ति का वातावरण बना लेते हैं। अन्त: चेतना से समुन्नत होने पर समूचा वातावरण, सम्पर्क क्षेत्र सुख-शान्ति से भर जाता है। इसके विपरीत जिनका मानस दोष-दुर्गुणों से भरा हुआ है, वे अच्छी भली परिस्थितियों में भी दुर्गति और अवगति का कठोर दु:ख सहते हैं।  

🔴 वैभव अर्जित करने के अनेक तरीके सीखे और सिखाये जाते हैं। शरीर को निरोग रखने के लिये भी व्यायामशालाओं, स्वास्थ्य केन्द्रों से लेकर अस्पतालों तक की अनेक व्यवस्थायें देखी जाती हैं। औद्योगिक, वैज्ञानिक, शैक्षणिक, शासकीय प्रबन्ध भी अनेक हैं, पर ऐसी व्यवस्थायें कम ही कहीं दीख पड़ती है, जिनसे चेतना को परिष्कृत एवं विकसित करने के लिये सार्थक, समर्थ एवं बुद्धि-संगत सर्वोपयोगी आधार बन पड़ा हो।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आत्म निर्माण की ओर (भाग 2)

🔵 यदि तुम्हें इस प्रकार प्रयत्न करने में प्रथम दिन सफलता न मिले तो हताश होकर छोड़ मत दो, प्रयत्न करते रहो। बहाना मत करो कि इतनी बारीकी से व्यवहार हमसे नहीं होता, कहाँ तक किस किसके साथ हरेक शब्द का खयाल रखें। एक एक व्यक्ति के सुधार से दुनिया धीरे धीरे सुधर जायगी, जल्दी नहीं होता। संसार का विकास क्रम सूक्ष्म गति से हो रहा है।

🔴 किसी रोज सन्ध्या समय विश्लेषण करने में जब मालूम हो जाय कि आज दिन भर हमने किसी की निन्दा नहीं की, कोई हीन बात नहीं बोले, किसी का तिरस्कार नहीं किया, चुगली नहीं की, तो समझ लो कि उस दिन तुम्हारा आध्यात्मिक विकास का बीजारोपण हो गया। शब्दों पर अधिकार रखकर अब तुम आगे उन्नति कर सकोगे। 

🔵 यदि तुम किसी व्यक्ति द्वारा अन्य व्यक्ति की आलोचना, चुगली या तिरस्कार सुनो तो उस पर ध्यान मत दो, उसे मत मानो। वह निन्दक अपनी ही आत्महीनता का परिचय दे रहा है- उसमें स्वयं कितनी बुराइयाँ हैं उसे वह नहीं देखता और नहीं दूर करता। वह दूसरों के छिद्र देखता है- उसकी बात सुनकर उससे कहो, “मुझे आलोचना या चुगली मत सुनाओ। इससे तुम्हें या मुझे क्या लाभ ? मुझे यह बताओ कि उस व्यक्ति में अच्छे गुण क्या हैं, और वे अच्छे गुण तुम में हैं या नहीं ? तथा उसकी अपेक्षा तुम कितना अच्छा काम कर सकते हो यह सिद्ध करो।” तुम्हारी ऐसी बातें सुनकर उसकी दुबारा चुगली करने की हिम्मत नहीं होगी।

🔴 तुम भी यदि चुगली या वार्ता सुनो, दूसरों की चर्चा सुनो तो उसे दूसरों को मत सुनाओ- इससे व्यर्थ बकवाद बढ़ता है, व्यर्थ के विचार फैलते हैं, जूठा खाकर उसे उगलना कोई अच्छी बात नहीं है- यह तो कुत्तों से भी बुरा काम है। उस बात को छोड़ दो विचार करो कि क्या वह व्यक्ति सत्य कह रहा है? क्या ऐसा कह देना आवश्यक है? यदि मैं यह बात अमुक व्यक्ति को कह दूँ तो इसका क्या नतीजा होगा? इससे किसको लाभ होगा और न कह देने से किसको हानि? इन बातों में प्रेम कितना है? घृणा कितनी है? इत्यादि बातों पर विचार कर लो तब कोई सुनी हुई बात अपनी ओठों पर से दूसरे के कान में डालो फिर इसका क्या परिणाम होता है- तुम्हें पश्चाताप न होगा और दोष नहीं लगेगा, गवाही नहीं देनी होगी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति -अगस्त 1948 पृष्ठ 24
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1948/August.23

👉 आत्मचिंतन के क्षण 26 Jan 2017

🔴 आभूषणों से स्त्रियाँ नहीं सजतीं। यदि ऐसा रहा होता और इससे कुछ लाभ रहे होते तो हमारे पूर्व पुरुषों में भी इस प्रथा का प्रचलन रहा होता। साधारण मंगल आभूषणों के अतिरिक्त भारी सोने-चाँदी के जेवरों का प्रचलन हमारी अपनी संस्कृति से नहीं हुआ, वरन् यवनों ने यह विकृति भारतीय जीवन में पैदा की है। वैदिक साहित्य में सइस तरह के गहने का कहीं दर्शन नहीं है। स्त्रियाँ सरल और स्वाभाविक शृंगार फूल और पत्तों से कर लेती थीं उनमें वासना को बढ़ाने वाला कोई दोष नहीं होता था और न उनसे सामाजिक तथाराष्ट्रीय व्यवस्थ्ज्ञा में किसी तरह की गड़बड़ी पैदा होती थी।

🔵 संस्कारवान् बालकों की शिक्षा के लि नालन्दा, तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय की आवश्यकता होगी। जहाँ का प्रत्येक पाठ, प्रत्येक आचरण, प्रत्येक शिक्षण महामानव बनाने वाला हो। ऐसे विश्वविद्यालय बनाने और चलाने के लिए संभवतः हम इस शरीर से जिन्दा न रहेंगे, पर उसकी योजना तो स्वजनों के मस्तिष्क में छोड़ी ही जानी होगी।

🔴 विवाहों का मँहगा बनाना अपनी बच्चियों के जीवन विकास पर कुठाराघात करना है। जिन्हें अपनी या दूसरों की बच्चियों के प्रति मोह, ममता न हो, जिन्हें इस दो दिन की धूमधाम की तुलना में नारी जाति की बर्बादी उपेक्षणीय लगती हो वे ही विवाहोन्माद का समर्थन कर सकते हैं। जब तक विवाह को भी नामकरण, अन्नप्राशन, मुंडन, विद्यारंभ, यज्ञोपवीत की तरह एक बहुत ही सरल, स्वाभाविक, सादा और कम खर्च का न बनाया जायगा तब तक नारी जाति की उन्नति और सुख-शान्ति की आशा दुराशा मात्र ही रहेगी।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 35) 26 Jan

🌹 साधना का स्तर ऊंचा उठाएं
🔴 अनुष्ठान समय विशेष पर नियत अवधि में पूरा करना पड़ता है। यों उसे कभी भी आरम्भ किया जा सकता है लेकिन अवधि का ध्यान तो रखना ही पड़ता है। उच्च स्तर के, बहुत ही ऊंची श्रेणी के साधक 24 लाख का महापुरश्चरण नित्य निरन्तर चलाते हैं पर यह पूरा समय साधना उपासना में लगा सकने वालों के लिए ही सम्भव है। सामान्य स्थिति में अपनी उपासना को अनुष्ठान स्तर का बनाना हो तो उसके लिए एक वर्षा में पांच लाख जप की संख्या पूर्ण करना सर्वश्रेष्ठ है। एक वर्ष में पूरा होने वाले इस उपासना अनुष्ठान को अभियान साधन कहते हैं।

🔵 इस साधना का विधि-विधान भी बहुत सरल है। 5 लाख की जप संख्या 15 माला प्रति दिन जप करने तथा चैत्र और आश्विन की दो नवरात्रियों में 24 हजार का लघु अनुष्ठान करने से पूरी हो जाती है। यों पन्द्रह माला प्रति दिन करने से भी 360 दिन में पांच लाख की संख्या पूरी हो जाती है किन्तु नवरात्रियों में लघु अनुष्ठान तो सभी उपासक करते हैं, सामान्य उपासना क्रम अपनाने वाले साधक भी प्रायः नवरात्रि अनुष्ठान करते हैं। अतएव अभियान साधना करने वाले साधकों को भी यह अनुष्ठान करना और भी आवश्यक है लाभप्रद है।

🔴 यह तो हुई संख्या पूरी करने की बात। अभियान साधना को अनुष्ठान स्तर की बनाने वाले नियम हैं गुरुवार के दिन संयम। संयम अर्थात् उपवास, मौन, ब्रह्मचर्य, तितिक्षा और उन सभी नियमों का पालन जो 24 हजार के, सवालक्ष के अथवा चौबीस लक्ष के, लघु-मध्यम तथा पूर्ण अनुष्ठान पुरश्चरण में करने पड़ते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 पराक्रम और पुरुषार्थ (भाग 29) 26 Jan

🌹 साहस का शिक्षण—संकटों की पाठशाला में

🔵 प्राचीन काल की ऋषि परम्परा के शिक्षण में ऐसी व्यवस्था रहती थी कि मनोभूमि को सबल, काया को समर्थ और सुदृढ़ बनाने के लिए वे सारे प्रयोग किये जाय जो अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति में सहायक हों। गुरुकुलों में ऐसा ही शिक्षण चलता था। तप और तितिक्षा का कठोर अभ्यास शिक्षार्थी से कराया जाता था ताकि भावी जीवन में आने वाले किसी भी संकट-चुनौती का सामना करने में वह समर्थ हो सके। गुरुकुलों में प्रवेश लेने तथा प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले छात्रों को अनुकूलताओं में नहीं, प्रतिकूलताओं में जीना सिखाया जाता था। उस शिक्षण प्रक्रिया का परिणाम यह होता था कि विद्यालय से निकलने वाला छात्र हर दृष्टि से समर्थ और सक्षम होता था। जीवन में आने वाले अवरोध उन्हें विचलित नहीं कर पाते थे।

🔴 परिस्थितियां बदली और साथ में वह शिक्षण पद्धति भी। मनुष्य के चिन्तन में भारी हेर-फेर आया। यह मान्यता बनती चली गयी कि अनुकूलताओं में ही मनुष्य का सर्वांगीण विकास सम्भव है। फलतः आरम्भ से ही बालकों को अभिभावक हर प्रकार की सुविधाएं देने का प्रयास करते हैं। उन्हें तप तितीक्षामय जीवन का अभ्यास नहीं कराया जाता। यही कारण है कि जब कभी भी प्रतिकूलताएं प्रस्तुत होती हैं ऐसे बालक उनका सामना करने में असमर्थ सिद्ध होते हैं।

🔵 कुछ विद्यालय आज भी ऐसे हैं जो जीवट को प्रखर बनाने का व्यावहारिक प्रशिक्षण देते हैं। उदाहरणार्थ जंगल एण्ड स्नो सरवाइल स्कूल इंडियन एयर फोर्स’ की ओर से भेजे गये वायुयान चालकों को ऐसी ट्रेनिंग दी जाती है, जिससे वे हर तरह के संकटों का सामना करने में सक्षम हो सकें। हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित एक समाचार के अनुसार शिक्षण की प्रणाली अत्यन्त रोमांचक होती है। सामान्यतया विमान चालकों को हर तरह के क्षेत्र से होकर उड़ान भरनी होती है। हिमालय की ऊंचाई पर स्थित सघन वनों अथवा हिमाच्छादित प्रदेशों अथवा मरुस्थलों से होकर भी चालकों को गुजरना पड़ता है। यदि इन दुर्गम प्रदेशों में कोई दुर्घटना घटती है तो किन-किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। इसका शिक्षण एवं अभ्यास चालकों को कराया जाता है। इन स्थानों पर बिना किसी बाह्य सहायता के उसे किस तरह प्रतिकूलताओं से जूझते हुए बाहर निकलना चाहिये इसका प्रशिक्षण दिया जाता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 आप अपने आपको पहचान लीजिये (भाग 7)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी

🔴 तुम भी जिस लायक हो जो तुम्हारी वास्तविक योग्यता है जन्म- जन्मान्तरों की संग्रह की हुई वह बड़ी योग्यता है। हमारे पास भी जन्म जन्मान्तरों की संग्रह की हुई योग्यता थी इसीलिये हमारे गुरु ने स्वयं हमारे घर आकर के कहा था कि भाई जिस काम में तेरे घर वाले लगाना चाहते हैं उस काम में लगना तेरे लिये ठीक नहीं है। हम जो कहते है वही काम कर। हमने वही काम किया हमने उनका कहना न माना होता घरवालों का कहना माना होता तो तो फिर अपने आपका ज्ञान ही नहीं होता। यह नहीं मालूम होता कि पूर्व जन्मों की कोई संचित संपदा कोई है क्या हमारे पास। उन्होंने दिखाया तो मालूम पड़ा कि हमारा पूर्व जन्मों का संकलन है और पूर्व जन्मों की कोई संपदा है हमारे पास। हम कोई सामर्थ्यवान व्यक्ति हैं और सामर्थ्यवान व्यक्ति हैं तो कोई बड़े काम कर सकते हैं और बड़े काम करने चाहिये।

🔵 आपसे भी मैं ठीक वही बात कह रहा हूँ। जो पुरानी घटना मेरे साथ बीती है उन्हीं बातों को मैं कह रहा हूँ और कोई नई बात नहीं कह रहा हूँ। मैं आपसे यह कह रहा हूँ कि यदि आप हमारा कहना माने तो आप नफे में रहेंगे जैसे कि हम नफे में रहे। जिस तरीके से पहले जन्मों के संस्कार हमारे पास जमा थे और उन संस्कारों की वजह से इस जन्म में सफलताओं पर सफलतायें मिलती चली गयी। आप भी यदि कदम उठायेंगे इसी राह पर तो आपको भी सफलता पर सफलता मिलती जायेगी इसी राह पर आपको यह नहीं कहना पड़ेगा कि हम घाटे में रहे और नुकसान में रहे आप बड़े सामर्थ्यवान है लेकिन सामर्थ्यवान होते हुए भी यह बड़े अचम्भे की बात है कि आप अपने आपको पहचान नहीं पा रहे हैं।

🔴 सोया हुआ आदमी होता है तो उसको नींद आ जाती है। नींद में पड़ा हुआ आदमी मरे हुए के समान हो जाता है चाहे गाली दो उसको, न उसको अपने शरीर का पता है, न कपड़ों का पता है, नंगा पड़ा है कि उघारा पड़ा है। घर में चोरी हो रही है क्या हो रहा है सोया हुआ है तो मालूम ही नहीं है आप सो गये मालूम पड़ते हैं इसलिये मुझे आपको जगाना है। जगाने के लिये मैं प्रार्थना करता हूँ आपसे कि आप अपने आपको जगा लीजिये सोयी हुई स्थिति में पड़े रहेंगे तो बड़ी खराब बात हो जायेगी आप खुमारी में पड़े रहेंगे तो सड़क में पड़े रहेंगे नाली में पड़े रहेंगे, नाक रगड़ते रहेंगे और आप शराबी कहलायेंगे और बस थोड़ी देर के लिये मजा तो आ जायेगा लेकिन फिर आप नुकसान में जायेंगे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/lectures_gurudev/31.2

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 83)

🌹 आदर्श विवाहों के लिए 24 सूत्री योजना

🔴 15.वर कन्या भारतीय पोशाक में हों?:-- विवाह एक यज्ञ एवं धर्मानुष्ठान है। इसमें सम्मिलित होने के लिए वर-वधू को भारतीय वेष-भूषा में ही रहना चाहिये।

🔵 आजकल पढ़े-लिखे लड़के विवाह के समय भी ईसाई पोशाक धारण करके अपनी मानसिक गुलामी का परिचय देते हैं। यह अभागा भारत ही ऐसा है जहां के नवयुवक अपनी भाषा, अपनी संस्कृति तथा अपनी वेष-भूषा को तुच्छ समझकर ईसाई संस्कृति की नकल करने में गौरव समझते हैं। विवाह के समय भी वे पेन्ट, टाई जैसे ईसाई लिवास के लिए ही आग्रह करते हैं। उनकी मानसिक दासता विवाह जैसे धर्म कृत्य में तो इस भोंड़े ढंग से प्रदर्शित न हो तो ही अच्छा है। लड़का धोती कुर्ता पहने। ऊपर से जाकेट या बन्द गले का कोट पहना जा सकता है।

🔴 16.सार्वजनिक सत्कार्यों के लिए दान:-- विवाह के हर्षोत्सव में अपनी प्रसन्नता की अभिव्यक्ति लोकोपयोगी सार्वजनिक कार्यों के लिए मुक्तहस्त से दान देकर की जाय।

🔵 विवाहों में दोनों पक्षों को अपने-अपने बड़प्पन की बहुत चिन्ता रहती है। यह दिखाने की कोशिश की जाती रहती है कि हम कितने अमीर और उदार हैं। उसकी एक ठोस कसौटी यह है कि दोनों पक्ष अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार सार्वजनिक सत्कर्मों के लिये उदारता पूर्वक अधिक दान देकर अपने सच्चे बड़प्पन का परिचय दें।

🔴 17. प्रीतिभोज कन्या के स्वागत समारोह के रूप में हो:--
विवाह से एक दिन पहले लड़के के यहां प्रीतिभोज करने का रिवाज है। इसके स्थान पर बारात घर लौट आने पर नवागन्तुक वधू के स्वागत में एक छोटा सम्मान समारोह किया जाय।

🔵 विवाह से पूर्व किए गए प्रीतिभोज में जो लोग जाते हैं उनसे शिष्टाचारवश बारात में चलने के लिये कहना पड़ता है और मन में कम व्यक्ति ले जाने की इच्छा होते हुये भी बारात बढ़ जाती है। इसलिए उसे बारात लौटने पर किया जाय। वे वधू को आशीर्वाद देने आवें और उसे कुछ उपहार भी दें। इससे वधू का मान गौरव बढ़ेगा और उसे प्रसन्नता भी होगी। तब उसे बहुत बड़ा न करके संक्षिप्त या स्वल्पाहार तक सीमित करना भी सरल हो जायगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 34)

🌞 दिए गए कार्यक्रमों का प्राण-पण से निर्वाह
🔴 कांग्रेस की स्थापना की एक शताब्दी होने को चली है, जिसमें हमने काम किया, वह अलग थी। उसमें काम करने के हमारे अपने विलक्षण अनुभव रहे हैं। अनेक मूर्धन्य प्रतिभाओं से सम्पर्क साधने के अवसर अनायास ही आते रहे हैं। सदा विनम्र और अनुशासनरत स्वयं सेवक की अपनी हैसियत रखी। इसलिए मूर्धन्य नेताओं की सेवा में किसी विनम्र स्वयं सेवक की जरूरत पड़ती, तो हमें ही पेल दिया जाता रहा। आयु भी इसी योग्य थी। इसी संपर्क में हमने बड़ी से बड़ी विशेषताएँ सीखी। अवसर मिला तो उनके साथ भी रहने का सुयोग मिला, साबरमती आश्रम में गाँधी जी के साथ और पवनार आश्रम में विनोबा के साथ रहने का लाभ मिला है। दूसरे उनके समीप जाते हुए दर्शन मात्र करते हैं या रहकर लौट आते हैं जब कि हमने इन सम्पर्कों में बहुत कुछ पढ़ा और जाना है। इन सबकी स्मृतियों का उल्लेख करना तो यहाँ अप्रासंगिक होगा, पर कुछ घटनाएँ ऐसी हैं, जो हमारे लिए कल्पवृक्ष की तरह महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुईं।

🔵 सन् १९३३ की बात है। कलकत्ता में इंडियन नेशनल काँग्रेस का अधिवेशन था। उन दिनों काँग्रेस गैर कानूनी थी, जो भी जाते, पकड़े जाते, गोली काण्ड भी हुआ। जिन्हें महत्त्वपूर्ण समझा गया, उन्हें बर्दवान स्टेशन पर पकड़ लिया गया और ईस्ट इंडिया कंपनी के जमाने में बनी गोरों के लिए बनाई गई एक विशेष जेल (आसनसोल) में भेज दिया गया। इसमें हम भी आगरा जिले के अपने तीन साथियों के साथ पकड़े गए। यहाँ हमारे साथ में मदनमोहन मालवीय जी के अलावा गाँधीजी के सुपुत्र देवीदास गाँधी, श्री जवाहरलाल नेहरू की माता स्वरूप रानी नेहरू, रफी अहमद किदवई, चंद्रभान गुप्ता, कन्हैयालाल खादी वाला, जगन प्रसाद रावत आदि मूर्धन्य लोग थे। वहाँ जब तक हम लोग रहे, सायंकाल महामना मालवीय जी का नित्य भाषण होता था। मालवीय जी व माता स्वरूपरानी सबके साथ सगे बच्चों की तरह व्यवहार करते थे।

🔴  एक दिन उनने अपने व्याख्यान में इस बात पर बहुत जोर दिया कि हमें आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए हर मर्द से एक पैसा और हर स्त्री से एक मुट्ठी अनाज माँग कर लाना चाहिए, ताकि सभी यह समझें कि काँग्रेस हमारी है। हमारे पैसों से बनी है। सबको इसमें अपनापन लगेगा एवं एक मुट्ठी फंड ही इसका मूल आर्थिक आधार बन जाएगा। वह बात औरों के लिए महत्त्वपूर्ण न थी, पर हमने उसे गाँठ बाँध लिया। ऋषियों का आधार यही ‘‘भिक्षा’’ थी। उसी के सहारे वे बड़े-बड़े गुरुकुल और आरण्यक चलाते थे। हमें भविष्य में बहुत बड़े काम करने के लिए गुरुदेव ने संकेत दिए थे। उनके लिए पैसा कहाँ से आएगा, इसकी चिंता मन में बनी रहती थी। इस बार जेल से सूत्र हाथ लग गया। जेल से छूटने पर जब बड़े काम पूरे करने का उत्तरदायित्व कंधे पर आया तब उसी फार्मूले का उपयोग किया। ‘‘दस पैसा प्रतिदिन या एक मुट्ठी अनाज’’ अंशदान के रूप में यही तरीका अपनाया और अब तक लाखों नहीं, करोड़ों रुपया खर्च करा चुके हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/diye.4

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 34)

🌞  हिमालय में प्रवेश

पत्तीदार साग

🔵 सोचता हूं इस संसार में किसी वस्तु का महत्व तभी समझा जायगा जब उसकी उपयोगिता का पता हो। यह तीनों पत्तीदार साग मेरी दृष्टि में उपयोगी थे इसलिये वे महत्वपूर्ण भी जड़ें और स्वादिष्ट थीं। इन पहाड़ियों की इस उपयोगिता को न जाना था और न माना था इसलिए उनके समीप यह मुफ्त का साग मनों खड़ा था पर उससे वे लाभ नहीं उठा पा रहे थे। किसी वस्तु या बात की उपयोगिता जाने और अनुभव किये बिना मनुष्य न तो उसकी ओर आकर्षित होता है और न उसका उपयोग करता है। इसलिए किसी वस्तु का महत्व पूर्ण होने से भी बढ़कर है उसकी उपयोगिता को जानना और उनसे प्रभावित होना।

🔴 हमारे समीप भी कितने ही ऐसे तथ्य हैं जिनकी उपयोगिता समझ ली जाय तो उनसे आशाजनक लाभ हो सकता है। ब्रह्मचर्य, व्यायाम, ब्रह्म मुहूर्त में उठना, सन्ध्या वन्दन, समय का सदुपयोग, सात्विक आहार, नियमित दिनचर्या, व्यसनों से बचना, मधुर भाषण, शिष्टाचार आदि अनेकों तथ्य ऐसे हैं जिनका उपयोग हमारे लिए अतीव लाभदायक है और इनको व्यवहार में लाना कठिन भी नहीं है फिर भी हममें से कितने ही इनकी उपेक्षा करते हैं, व्यर्थ समझते हैं और हृदयंगम करने पर होने वाले लाभों से वंचित रह जाते हैं।

🔵 पहाड़ी लोग उपयोगिता न समझने के कारण ही अपने बिलकुल समीप प्रचुर मात्रा में खड़े पत्तीदार शाकों का लाभ नहीं उठा रहे थे। इसके लिए उनकी निन्दा करना व्यर्थ है। हमारे समीप भी तो आत्मकल्याण के लिए अगणित उपयोगी तथ्य बिखरे पड़े हैं पर हम ही कब उनको व्यवहार में लाते और लाभ उठाते हैं? मूर्खता में कोई किसी से पीछे भी क्यों रहे?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 बुरी आदत:-

एक अमीर आदमी अपने बेटे की किसी बुरी आदत से बहुत परेशान था। वह जब भी बेटे से आदत छोड़ने को कहते तो एक ही जवाब मिलता, “अभी मैं इतना छोटा ह...