बुधवार, 25 जनवरी 2017

👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 19) 26 Jan

🌹 सार्थक, सुलभ एव समग्र साधना  

🔴 चेतना की शक्ति संसार की सबसे बड़ी शक्ति है। मनुष्य ही, रेल, जहाज कारखाने आदि बनाता है। विज्ञान के नित नये आविष्कार करता है। यहाँ तक कि धर्म और दर्शन, आचार और विचार भी उसी के रचे हुए हैं। ईश्वर की साकार रूप में कल्पना तथा स्थापना करना भी उसी का बुद्धि-कौशल है। इस अनगढ़ धरातल को, सुविधाओं, सुन्दरताओं, उपलब्धियों से भरापूरा बनाना भी मनुष्य का ही काम है। यहाँ मनुष्य शब्द में किसी शरीर या वैभव को नहीं समझा जाना चाहिये। विशेषताएँ चेतना के साथ जुड़ी होती हैं। इसे भी प्रयत्न पूर्वक उठाया या गिराया जा सकता है। शरीर को बलिष्ठ या दुर्बल बना लेना प्राय: मनुष्य की अपनी, रीति-नीति पर निर्भर रहता है।                

🔵 सम्पन्न और विपन्न भी लोग अपनी हरकतों से ही बनते हैं। उठना और गिरना अपने हाथ की बात है। मनुष्य को अपने भाग्य का निर्माता आप कहा जाता है। यहाँ व्यक्ति का मतलब आत्मचेतना से ही समझा जाना चाहिये। वही प्रगतिशीलता का उद्गम है। इसी क्षेत्र में पतन-पराभव के विषैले बीजांकुर भी जमे होते हैं। सद्गुणी लोग अभावग्रस्त परिस्थितियों में भी सुख-शान्ति का वातावरण बना लेते हैं। अन्त: चेतना से समुन्नत होने पर समूचा वातावरण, सम्पर्क क्षेत्र सुख-शान्ति से भर जाता है। इसके विपरीत जिनका मानस दोष-दुर्गुणों से भरा हुआ है, वे अच्छी भली परिस्थितियों में भी दुर्गति और अवगति का कठोर दु:ख सहते हैं।  

🔴 वैभव अर्जित करने के अनेक तरीके सीखे और सिखाये जाते हैं। शरीर को निरोग रखने के लिये भी व्यायामशालाओं, स्वास्थ्य केन्द्रों से लेकर अस्पतालों तक की अनेक व्यवस्थायें देखी जाती हैं। औद्योगिक, वैज्ञानिक, शैक्षणिक, शासकीय प्रबन्ध भी अनेक हैं, पर ऐसी व्यवस्थायें कम ही कहीं दीख पड़ती है, जिनसे चेतना को परिष्कृत एवं विकसित करने के लिये सार्थक, समर्थ एवं बुद्धि-संगत सर्वोपयोगी आधार बन पड़ा हो।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

👉 दाम्पत्य-जीवन को सफल बनाने वाले कुछ स्वर्ण-सूत्र (भाग 3)

🔴 बहुत से स्वार्थी लोग बड़प्पन और अधिकार के अहंकार में हर वस्तु में अपना लाइन्स-शेयर (सिंह भाग) रखते हैं। वे नाश्ते और भोजन की सबसे अ...