मंगलवार, 12 जुलाई 2016

👉 अखंड ज्योति का प्रधान उद्देश्य (भाग 2)


🔴 हम प्रत्येक धर्मप्रेमी से करबद्ध प्रार्थना करते हैं कि धर्म के वर्तमान विकृत रूप में संशोधन करें और उसको सुव्यवस्थित करके पुनरुद्धार करें। धर्माचार्यों और आध्यात्म शास्त्र के तत्वज्ञानियों पर इस समय बड़ा भारी उत्तरदायित्व है, देश को मृत से जीवित करने का, पतन के गहरे गर्त में से उठाकर समुन्नत करने की शक्ति उनके हाथ में है, क्योंकि जिस वस्तु से-समय और धन से-कौमों का उत्थान होता है, वह धर्म के निमित्त लगी हुई हैं। जनता की श्रद्धा धर्म में है। उनका प्रचुर द्रव्य धर्म में लगता है, धर्म के लिये छप्पन लाख साधु संत तथा उतने ही अन्य धर्मजीवियों की सेना पूरा समय लगाये हुए है।

🔵 करीब एक करोड़ मनुष्यों की धर्म सेना, करीब तीन अरब रुपया प्रतिवर्ष की आय, कोटि-कोटि जनता की आन्तरिक श्रद्धा, इस सब का समन्वय धर्म में है। इतनी बड़ी शक्ति यदि चाहे तो एक वर्ष के अन्दर-अन्दर अपने देश में रामराज्य उपस्थित कर सकती है, और मोतियों के चौक पुरने, घर-घर वह सोने के कलश रखे होने तथा दूध दही की नदियाँ बहने के दृश्य कुछ ही वर्षों में दिखाई दे सकते हैं। आज के पददलित भारतवासियों की सन्तान अपने प्रातः स्मरणीय पूर्वजों की भाँति पुनः गौरव प्राप्त कर सकती है।

🔴 अखंड ज्योति धर्माचार्यों को सचेत करती है कि वे राष्ट्र की पंचमाँश शक्ति के साथ खिलवाड़ न करें। टन-टन पों-पों में, ताता थइया में, खीर-खाँड़ के भोजनों में, पोथी पत्रों में, घुला-घुला कर जाति को और अधिक नष्ट न करे, वरन् इस ओर से हाथ रोककर इस शक्ति को देश की शारीरिक, आर्थिक, सामाजिक, मानसिक शक्तियों की उन्नति में नियोजित कर दें। अन्यथा भावी पीढ़ी इसका बड़ा भयंकर प्रतिशोध लेगी।

🔵 आज के धर्माचार्य कल गली-गली में दुत्कारे जायेंगे और भारत-भूमि की अन्तरात्मा उन पर घृणा के साथ थूकेगी कि मेरी घोर दुर्दशा में भी यह ब्रह्मराक्षस कुत्तों की तरह अपने पेट पालने में देश की सर्वोच्च शक्ति को नष्ट करते रहे थे। साथ ही अखंड-ज्योति सर्वसाधारण से निवेदन करती है कि वे धर्म के नाम पर जो भी काम करें उसे उस कसौटी पर कस लें कि “सद्भावनाओं से प्रेरित होकर आत्मोद्धार के लिये लोकोपकारी कार्य होता है या नहीं।” जो भी ऐसे कार्य हों वे धर्म ठहराये जावें इनके शेष को अधर्म छोड़ कर परित्याग कर दिया जाय।

🌹 अखण्ड ज्योति सितंबर 1942 पृष्ठ 7
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1942/September.7

👉 आत्मचिंतन के क्षण 12 July 2016



🔴 निराश कभी मत होइए। उन्नति के लिए, अच्छी आदतों के लिए, अपने शुभ संकल्पों की सिद्धि के लिए सतत प्रयत्न करते रहिए। बार-बार प्रयत्न करने से ही आपको उत्साह मिलेगा, सफलता मिलेगी। आपके कठिन कार्य सरल होते जायेंगे। प्रत्येक प्रत्यन, आपकी प्रत्येक छोटी-सी सफलता आपका आत्मबल बढ़ाने वाली है। भविष्य में आप कठिनतर कार्य भी हँसते-हँसते कर सकेंगे। अपने शुभ संकल्पों की सिद्धि के लिए सावधान रहकर प्रयत्न करना भी  है। अति आवश्यक है। इस आत्मबल की आवश्यकता हम सबको  है।

🔵 विचार फालतू बात नहीं है। वह एक संज्ञा है। एक मजबूत ताकत है। उसका स्पष्ट स्वरूप है। उसमें  जीवन है। वह स्वयं ही हमारा मानसिक जीवन है। वह सत्य है। विचार ही मनुष्य का आदि रूप है। पानी में लकड़ी, पत्थर, गोली आदि फेंकने से जैसा आघात होता है, जैसा रूप बनता है, जो प्रभाव होता है, वैसा ही तथा उससे भी अधिक तेज आघात विचारों को फेंकने से होता  है। मनुष्य के जैसे  विचार होते हैं उसी दिशा में उसकी तीव्र उन्नति-अवनति होती जाती है।

🔴 आप अवकाश के क्षणों को व्यर्थ ही सिनेमा, क्लबों, व्यर्थ की बातचीत, ताश, चौपड़, गपबाजी, चुहल तथा बेमतलब की बातों में नष्ट कर देते हैं। ये तथाकथित मनोरंजन के साधन स्वस्थ नहीं है। जबकि स्वाध्याय से आप अपनी गुप्त शक्तियों का विकास करते हैं और समुन्नत आत्माओं के सत्संग में रहते हैं। वे आपको पवित्र कल्पनाएँ और विचार की नई दिशाएँ देते हैं। स्वाध्याय का साधन स्वस्थ और गुणकारी है। अतएव स्वाध्याय में प्रमाद नहीं करना चाहिए। यह हमारे  दैनिक जीवन का एक अंग होना चाहिए।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

प्रभु से प्रार्थना (Kavita)

प्रभु जीवन ज्योति जगादे! घट घट बासी! सभी घटों में, निर्मल गंगाजल हो। हे बलशाही! तन तन में, प्रतिभापित तेरा बल हो।। अहे सच्चिदानन्द! बह...