बुधवार, 31 जनवरी 2018

👉 परोपकारः पुण्याय:-

🔶 फारस में एक बादशाह बड़ा ही न्याय प्रिय था। वह अपनी प्रजा के दुख-दर्द में बराबर काम आता था। प्रजा भी उसका बहुत आदर करती थी। एक दिन बादशाह जंगल में शिकार खेलने जा रहा था, रास्ते में देखता है कि एक वृद्ध एक छोटा सा पौधा रोप रहा है।

🔷 बादशाह कौतूहलवश उसके पास गया और बोला, ‘‘यह आप किस चीज का पौधा लगा रहे हैं?’’ वृद्ध ने धीमें स्वर में कहा, ‘‘अखरोट का।’’ बादशाह ने हिसाब लगाया कि उसके बड़े होने और उस पर फल आने में कितना समय लगेगा। हिसाब लगाकर उसने अचरज से वृद्ध की ओर देखा, फिर बोला, ‘‘सुनो भाई, इस पौधै के बड़े होने और उस पर फल आने मे कई साल लग जाएंगे, तब तक तु कहॉं जीवित रहोगे ’’ वृद्ध ने बादशाह की ओर देखा। बादशाह की आँखों में मायूसी थी। उसे लग रहा था कि वह वृद्ध ऐसा काम कर रहा है, जिसका फल उसे नहीं मिलेगा।

🔶 यह देखकर वृद्ध ने कहा, ‘‘आप सोच रहें होंगे कि मैं पागलपन का काम कर रहा हूँ। जिस चीज से आदमी को फायदा नहीं पहुँचता, उस पर मेहनत करना बेकार है, लेकिन यह भी सोचिए कि इस बूढ़े ने दूसरों की मेहनत का कितना फायदा उठाया है? दूसरों के लगाए पेड़ों के कितने फल अपनी जिंदगी में खाए हैं? क्या उस कर्ज को उतारने के लिए मुझे कुछ नहीं करना चाहिए? क्या मुझे इस भावना से पेड़ नहीं लगाने चाहिए कि उनके फल दूसरे लोग खा सकें? जो अपने लाभ के लिए काम करता है, वह स्वार्थी होता है।’’ बूढ़े की यह दलील सुनकर बादशाह चुप रह गया।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 1 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 1 Feb 2018

👉 समग्र अध्यात्म

🔶 अध्यात्म की त्रिवेणी प्रेम, ज्ञान और बल इन तीन धाराओं में प्रवाहित होती है। इन तीनों का संतुलित अभिवर्धन करने से ही कोई समग्र आध्यात्मवादी हो सकता है। प्रेम हमारे अन्त:करण का अमृत है। जिस प्रकार हम अपने स्वार्थ, सुख, यश, वैभव और उत्सर्ग को चाहते हैं उसी प्रकार दूसरों के लिए भी चाह उठने लगे, तो उसे प्रेम का प्रकाश कहना चाहिए। अपनापन ही सबसे अधिक प्रिय है। अपने शरीर, मन, यश, सुख की चाहत सभी को रहती है। यह अपना आपा जितना विस्तृत होता जाता है, वह उतना ही प्रिय लगता जाता है और उसे सुखी समुन्नत बनाने की परिधि विस्तृत होती जाती है और अपना ‘प्रिय’ क्षेत्र बढ़ता चला जाता है। उसके लिए सेवा सहायता करने की इच्छा होती है और जो सत्कर्म ही बनते हैं। अपनों के साथ दुष्टता कौन करता है? प्रेम भावना की वृद्धि मन में से सभी दुष्प्रवृत्तियों को हटा देती है और मनुष्य सज्जन और सच्चरित्र एवं सहृदय बनता चला जाता है। प्रेम असंख्य सदगुणों का स्रोत है इसलिए उसे अध्यात्म का प्रथम चरण माना गया है।
  
🔷 दूसरा घटक है- ज्ञान। यथार्थ को समझना ही सत्य है। इसी को विवेक कहते हैं। जीवन के लक्ष्य को हम भूल जाते हैं। आत्मकल्याण की बात विस्तृत हो जाती है और कत्र्तव्य धर्म का पालन करने की गरिमा समझ में नहीं आती। इन्द्रियों की वासना और मन की तृष्णा पूरी करने के लिए अहंकार की पूर्ति के लिए निरर्थक कार्य करते हुए जीवन बीत जाता है और पाप की गठरी सिर पर लद जाती है। यह सब अज्ञान का फल है। अपने को शरीर नहीं आत्मा मानकर चलें। आत्मकल्याण की दृष्टिï से जीवन क्रम निर्धारित करें और वासना, तृष्णा को अनियन्त्रित न होने दें। स्कूली शिक्षा या धर्म की पुस्तकें पढ़ लेने का नाम ज्ञान नहीं है। यह तो एक आस्था है जो अन्त:करण में प्रकाशवान होकर हमें सही और गलत का विवेक कराती है। यह ज्ञान जो जितना प्राप्त कर लेता हैं वह उतना ही सफल आत्मवादी कहा जाता है।
  
🔶 तीसरा चरण है- बल। निर्बल को न सांसारिक सुख मिलता है न आत्मिक। हमें बलवान बनना चाहिए। मनोबल के आधार पर ही आपत्तियों से निपटना-प्रगति के पथ पर बढ़ चलना सम्भव होता है। लोभ, मोह जैसे शत्रुओं को परास्त करते हुए-प्रलोभनों से बचते हुए आदर्शवादिता के मार्ग पर अपनी प्रवृत्तियों को मोड़ सकना साहसी और पराक्रमी व्यक्ति के लिए ही सम्भव है। जीवन का प्रत्येक क्षेत्र सामथ्र्यवान और सशक्त बनाना पड़ता है। आत्मिक, मानसिक, शारीरिक सभी दुर्बलताएँ दूर करनी पड़ती हैं और आर्थिक क्षेत्र में इतना स्वावलम्बी रहना पड़ता है कि किसी के आगे न हाथ पसारना पड़े।
  
🔷 मनुष्य की सत्ता तीन भागों में विभक्त है- अन्त:करण, मस्तिष्क और शरीर। इसी विभाजन को अध्यात्म की भाषा में कारण शरीर और स्थूल शरीर कहते हैं। अन्त:करण का वैभव है-प्रेम। मस्तिष्क का धन है-ज्ञान। शरीर का वर्चस्व है-बल। चूँकि शरीर से ही आर्थिक, पारिवारिक और सामाजिक सम्बन्ध है इसलिए धन, व्यवहार कौशल और संगठन को भी इसी क्षेत्र में गिना जाता है। इन तीनों के समन्वय से ही समग्र अध्यात्म बनता है। एकांगी से काम नहीं चलता। अन्न, जल और वायु के त्रिविध आहार पर जीवन निर्भर है। आध्यात्मिक जीवन की यह तीनों प्रवृत्तियाँ समान रूप से आवश्यक हैं। इनका समन्वय ही त्रिवेणी का संगम है। इस तीर्थराज प्रयाग में स्नान करके ही हम जीवन लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन को बालक्रीड़ाओं में भटकने न दें (भाग 3)

🔷 किसी विचारवान की दृष्टि से देखा जाये तो इस प्रकार जिया जाना कृमि-कीटकों से, पशु-पक्षियों से ऊँचे स्तर का तनिक भी नहीं है। सभी जीवधारी ऐसा ही करते एवं इसी मार्ग पर चलते रहते हैं। भवन बनाने में दीमक, और दाने जमा करने में, श्रम करने में चींटी की मेहनत को सराहा ही जा सकता है। जमाखोरी के लिए खटने वालों में मधुमक्खी का जीवन इसी गोरख-धन्धे में बीतता है। दिन भर वह श्रम करती है और उस संचय का लाभ कोई दूसरे उठाते हैं। मनुष्य भी अपनी क्षमताओं का उपयोग इन्हीं प्रयोजनों के लिए करते रहते हैं। सब ओर जो होता दिखता है उसी की नकल वे स्वयं भी करने लगते हैं। मस्तिष्क में समझ तो बहुत होती है। शिक्षा और चतुरता तो बहुत अर्जित कर ली जाती है। पर उनका उपयोग भी इन्हीं तुच्छ प्रयोजनों के लिए होता रहता है। इसी कोल्हू में चलते पिलते वह दिन आ खड़ा होता है जिसके उपरान्त और कुछ करने को शेष नहीं रह जाता।

🔶 मन को समझाया जाना चाहिए कि जिस प्रकार एकाकी स्वार्थ चिन्तन में अपनी बुद्धि लगाई जाती है, उसी प्रकार यह भी देखा जाना चाहिए कि जीवन सम्पदा का उपयोग मानवोचित रीति से हुआ या नहीं? मनुष्य को अतिरिक्त बुद्धिमत्ता, अतिरिक्त क्षमता और प्रतिभाओं से भरा-पूरा जीवन दिया गया है। वह शरीर यात्रा भर के लिए खर्च नहीं हो जाना चाहिए जिस प्रकार कीड़े-मकोड़ों का होता है।

🔷 अपनी ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए मोर नाचता है, जुगनूँ चमकता है, भौंरा गूँजता है, पर इस विडंबना से क्या तो उन्हें मिलता है और क्या कोई और कुछ पता या सीखता है। वैभव बढ़ाकर ठाठ-बाट रोपने में हमें भी मिथ्या अभिमान के अतिरिक्त और क्या मिल पाता है। उपभोग की एक सीमा है। उसके बाद जो बचता है, उसे दूसरे मुफ्तखोर ही हड़प जाते और हराम की कमाई को फुलझड़ी की तरह जलाते हैं। हो सकता है यह मुफ्तखोर तथाकथित कुटुम्बी सम्बन्धी ही क्यों न हों?

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1986 पृष्ठ 3
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1986/February/v1.3

👉 Amrit Chintan 1 Feb

🔷 As long as man is totally materialistic in life, he will grow roots of evil in himself. It is only spiritual way of life. That man starts hating sins of his own when he become his own soul conscious. The worldly atmosphere always put one down and resists ideal growth of life. Only spiritual life can save a person from the bad effect of the prevailing atmosphere.
 
🔶 You all my loving soul! I wish that you strictly follow the path of truth. Truth must be follow at the cost of all hurdles and difficulties of life. Voice of the soul should always be followed. Truth itself is such a great power, which gives tremendous power and courage to stick to the right path and object of life.
 
🔷  The beauty of life is not its external appearance but it is his changed life. The changed life must radiate love for all and they appreciate his virtues. To earn all these one will have to develop his character behavior and make his actions ideal for others.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 10)

🔷 मित्रो! यही हमारे मिशन का संदेश है और यही मिशन का संदेश है। यही हमारे युग निर्माण योजना का संदेश है और यही हमारे गायत्री परिवार का संदेश है। यही हमारे अध्यात्म का संदेश है और यही हमारी गुरु परम्परा का संदेश है। आप जाना और हमारे कार्यकर्ताओं को हमारा संदेश सुनाना। आप जनता को ज्यादा जोर मत देना। आपके रथयात्रा के लिए कितनी भीड़ आ गयी, कितनी नहीं, इसके ऊपर जोर देने की जरूरत नहीं है। आपके यज्ञ में कितने आदमी हवन करने वाले आये कितने नहीं आये इस पर भी बहुत जोर देने की आवश्यकता नहीं है। जितना बन जाय-उतना अच्छा ही है। हम कब मा करते हैं कि जनता को आपको इकट्ठा नहीं करना चाहिए।

🔶 जनता इकट्ठी हो तो अच्छी बात है। आपका पंडाल अच्छा बन गया, तो अच्छी बात है। उससे कुछ बनता-बिगड़ता नहीं है। परन्तु हमको शुरुआत वहाँ से करनी पड़ेगी कि जो हमारा बगीचा लगाया हुआ था, वह सूख तो नहीं रहा है, कुम्हला तो नहीं रहा है। कहीं वह जानवरों द्वारा खाया तो नहीं जा रहा है? जिसके लिए हमने इतना परिश्रम किया, उतना वह विकसित होना चाहिए था पर विकसित नहीं हो रहा है। हमको ज्यादा ध्यान वहाँ देना है। इसलिए हम जहाँ कहीं भी आपको भेजते हैं, आप यह प्रयत्न करना कि जो आदमी हमारे कर्मठ कार्यकर्ता हैं, जो भी हमसे संबंधित व्यक्ति हैं, उनके अंदर मिशन की प्रेरणा, मिशन का संदेशा पहुँचाने में आप समर्थ हों।

🔷 इसके लिए मित्रो! करना क्या पड़ेगा? आपको ज्यादातर उनके संपर्क में रहना पड़ेगा। आपको उनसे दूर नहीं रहना चाहिए। नेता और जनता के बीच जो खाई पैदा हो गयी है, वह खाई आपको पैदा नहीं करना चाहिए। हमने जो संगठन किया है, उसका नाम सभा या सम्मेलन नहीं रखा है। हमारा यह मठ नहीं है और हमारे यहाँ उतनी गुरु-शिष्य परम्परा भी नहीं है। हमारे यहाँ तो परिवार प्रणाली है। कुटुम्ब में किस तरीके से भाई-बहन एक साथ रहते हैं, माँ-बाप एक साथ रहते हैं, बेटे और भतीजे एक साथ रहते हैं। उसी प्रणाली का, उसी परंपरा को हमने जन्म दिया है। आप भी उसी प्रणाली में अपने को फिट करने की कोशिश करना।

🔶 जहाँ कहीं भी आप जायँ और वहाँ गायत्री परिवार के लोग और युग निर्माण परिवार के लोग मिलें, तो उन पर आपको ज्यादा ध्यान देना है और उन लोगों के साथ में आत्मीयता का विस्तार करना है और वह भी चापलूसी के द्वारा नहीं, लम्बी-चौड़ी लच्छेदार बात के साथ नहीं, क्योंकि आप उनके कंधे से कंधा मिलाकर काम करने वालों में से हैं। हमारी आत्मीयता का तरीका हमेशा से यही रही है। लच्छेदार बातें कभी किसी आदमी को आत्मीय नहीं बनाती हैं। आत्मीयता तब बनती है जब हम और आप कंधे से कंधा मिला करके, हाथ में हाथ मिला करके और पाँव से पाँव मिला करके साथ-साथ चलना शुरू करते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 28)

👉 शंकर रूप सद्गुरु को बारंबार नमन्

🔶 गुरु महिमा के साथ गुरु नमन की महिमा ही अपरिमित है। इसे गुरुगीता के अगले महामंत्रों में प्रकट करते हुए भगवान् भोलेनाथ आदिमाता पार्वती से कहते हैं-

यत्सत्येन जगत्सत्यं यत्प्रकाशेन भाति तत्। यदानन्देन नन्दन्ति तस्मै श्री गुरवे नमः॥ ३६॥
यस्य स्थित्या सत्यमिदं यद्भाति भानुरूपतः। प्रियं पुत्रादि यत्प्रीत्या तस्मै श्री गुरवे नमः॥ ३७॥
येन चेतयते हीदं चित्तं चेतयते न यम्। जाग्रत्स्वप्न सुषुप्त्यादि तस्मै श्री गुरवे नमः॥ ३८॥
यस्य ज्ञानादिदं विश्वं न दृश्यं भिन्नभेदतः। सदेकरूपरूपाय तस्मै श्री  गुरवे नमः॥ ३९॥
यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः। अनन्यभावभावाय तस्मै श्री गुरवे नमः॥ ४०॥

🔷 सद्गुरु नमन के इन महामंत्रों में गहन तत्त्वचर्चा है। गुरुतत्त्व, परमात्मतत्त्व और प्रकृति या सृष्टि तत्त्व अलग-अलग नहीं है। यह सब एक ही है- भगवान् शिव के वचन शिष्य को समझाते हैं, जिस सत्य के कारण जगत् सत्य दिखाई देता है अर्थात् जिनकी सत्ता से जगत् की सत्ता प्रकाशित होती है, जिनके आनन्द से जगत् में आनन्द फैलता है, उन सच्चिदानन्द रूपी सद्गुरु को नमन है॥ ३६॥

🔶 जिनके सत्य पर अवस्थित होकर यह जगत् सत्य प्रतिभासित होता है, जो सूर्य की भाँति सभी को प्रकाशित करते हैं। जिनके प्रेम के कारण ही पुत्र आदि सभी सम्बन्ध प्रीतिकर लगते हैं, उन सद्गुरु को नमन है॥ ३७॥

🔷 जिनकी चेतना से यह सम्पूर्ण जगत् चेतन प्रतीत होता है, हालांकि सामान्य क्रम में मानव चित्त को इसका बोध नहीं हो पाता। जाग्रत्-स्वप्न, सुषुप्ति आदि अवस्था को जो प्रकाशित करते हैं, उन चेतनारूपी सद्गुरु को नमन है॥ ३८॥

🔶 जिनके द्वारा ज्ञान मिलने से जगत् की भेददृष्टि समाप्त हो जाती है और वह शिव स्वरूप दिखाई देने लगता है। जिनका स्वरूप एकमात्र सत्य का स्वरूप ही है, उन सद्गुरु को नमन है॥ ३९॥

🔷 जो कहता है कि मैं ब्रह्म को नहीं जानता, वही ज्ञानी है। जो कहता है कि मैं जानता हूँ, वह नहीं जानता। जो स्वयं ही अभेद एवं भावपूर्ण ब्रह्म है, उस सद्गुरु को नमन है॥ ४०॥

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 50

मंगलवार, 30 जनवरी 2018

👉 ज्ञान का नया संदेश

🔶 महर्षि_वेदव्यास ने एक कीड़े को तेजी से भागते हुए देखा। उन्होंने उससे पूछा, 'हे क्षुद्र जंतु, तुम इतनी तेजी से कहां जा रहे हो?' उनके प्रश्न ने कीड़े को चोट पहुंचाई और वह बोला, 'हे महर्षि, आप तो इतने ज्ञानी हैं। यहां क्षुद्र कौन है और महान कौन? क्या इस प्रश्न और उसके उत्तर की सही-सही परिभाषा संभव है?' कीड़े की बात ने महर्षि को निरुत्तर कर दिया।

🔷 फिर भी उन्होंने उससे पूछा, 'अच्छा यह बताओ कि तुम इतनी तेजी से कहां जा रहे हो?' कीड़े ने कहा, 'मैं तो अपनी जान बचाने के लिए भाग रहा हूं। देख नहीं रहे, पीछे से कितनी तेजी से बैलगाड़ी चली आ रही है।' कीड़े के उत्तर ने महर्षि को चौंकाया। वे बोले, 'तुम तो इस कीट योनि में पड़े हो। यदि मर गए तो तुम्हें दूसरा और बेहतर शरीर मिलेगा।'

🔶 इस पर कीड़ा बोला, 'महर्षि, मैं तो इस कीट योनि में रहकर कीड़े का आचरण कर रहा हूं, परंतु ऐसे प्राणी असंख्य हैं, जिन्हें विधाता ने शरीर तो मनुष्य का दिया है, पर वे मुझसे भी गया-गुजरा आचरण कर रहे हैं। मैं तो अधिक ज्ञान नहीं पा सकता, पर मानव तो श्रेष्ठ शरीरधारी है, उनमें से ज्यादातर ज्ञान से विमुख होकर कीड़ों की तरह आचरण कर रहे हैं।' कीड़े की बातों में महर्षि को सत्यता नजर आई। वे सोचने लगे कि वाकई जो मानव जीवन पाकर भी देहासक्ति और अहंकार से बंधा है, जो ज्ञान पाने की क्षमता पाकर भी ज्ञान से विमुख है, वह कीड़े से भी बदतर है।

🔷 महर्षि ने कीड़े से कहा, 'नन्हें जीव, चलो हम तुम्हारी सहायता कर देते हैं। तुम्हें उस पीछे आने वाली बैलगाड़ी से दूर पहुंचा देता हूं।' कीड़ा बोला: 'किंतु मुनिवर श्रमरहित पराश्रित जीवन विकास के द्वार बंद कर देता है।' कीड़े के कथन ने महर्षि को ज्ञान का नया संदेश दिया।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 31 Jan 2018


👉 आज का सद्चिंतन 31 Jan 2018


👉 समस्त शक्तियों का स्रोत

🔶 कोई भी व्यक्ति जितना कुछ वैभव, उल्लास और साधन सम्पत्ति अर्जित करता है, वह उपार्जन एक ही मूल्य पर होता है। वह मूल्य है- शक्ति। जिसमें जितनी क्षमता है, जितनी शक्ति है, वह उतना ही वैभव और उल्लास अर्जित कर लेता है। इन्द्रियों में शक्ति हो तो विभिन्न भोगों को भोगा जा सकता है और इन्द्रियाँ यदि अशक्त, असमर्थ हो जायें, तो आकर्षक से आकर्षक भोग भी उपेक्षणीय लगते हैं। उनकी ओर देखने का भी जी नहीं करता। नाड़ी संस्थान की क्षमता यदि क्षीण हो जाय, तो शरीर का सामान्य क्रियाकलाप भी ठीक प्रकार से नहीं चल पाता। मानसिक शक्ति यदि घट जाय, तो मनुष्य की गणना विक्षिप्त व्यक्तियों में होने लगती है और विक्षिप्तों जैसी नहीं भी हो, तो वह ऐसी हरकतें करने लगता है कि उसकी स्थिति उपहासास्पद बन जाती है। धन की शक्ति में यदि कोई व्यक्ति, शून्य हो तो वह दीन-हीन बना रहता है। अभावग्रस्तता से उसकी स्थिति दयनीयों जैसी बनी रहती है और वह जीवन की सामान्य आवश्यकतायें भी भली प्रकार पूरी नहीं कर पाता। मित्रता को भी शक्ति कहा जा सकता है, जिसका स्वरूप सामाजिक होता है। यदि सच्चा मित्र शक्ति न रहे, तो व्यक्ति अपने आप को एकाकी अनुभव करने लगता है और जीवन निरर्थक-निरीह लगने लगता है।
  
🔷 इन सभी शक्तियों में प्रधान है- आत्मबल। आत्मबल आध्यात्मिक पक्ष से संबंधित होने के कारण अन्य सभी शक्तियों से उच्च स्तर का समझा जाता है। यदि यह शक्ति पास में न रहे, तो मनुष्य प्रगति के पथ पर एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता। जीवनोद्देश्य की पूर्ति आत्मबल से रहित व्यक्ति के लिए प्राय: असंभव ही रहती है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि क्या आध्यात्मिक और क्या भौतिक, सभी क्षेत्रों में अभीष्टï सफलता प्राप्त करने के लिए शक्ति का संपादन नितांत आवश्यक है। शक्ति संपादन के संबंध में यह तथ्य ध्यान में रखना चाहिए कि इनका स्वरूप चाहे जो हो, स्रोत एक ही है।

🔶 आभूषण चाहें कान के बने या गले का, सोना का ही उपयोग किया जाता है। पृथ्वी पर व्याप्त समस्त ऊष्माओं का केन्द्र सूर्य ही है, चाहे वह शरीर की गर्मी हो या आग की। भारतीय मनीषियों ने इसी प्रकार समस्त शक्तियों का स्रोत साधन एक ही माना है और उसे गायत्री नाम दिया है। भौतिक जगत में पंचभूतों को प्रभावित करने वाली जितनी भी शक्तियाँ हैं और आध्यात्मिक जगत में जितनी भी विचारात्मक, भावनात्मक तथा संकल्पनात्मक शक्तियाँ हैं, उन सब का मूल उद्ïगम एवं अजस्र भण्डार एक ही है, जिसे गायत्री नाम से संबोधित किया गया है। इस भण्डार में शक्ति सागर में जितना भी गहरे उतरा जाय, उतना ही बहुमूल्य रत्न राशि उपलब्ध होने की संभावना बढ़ती चली जाती है।
  
🔷 मनीषियों ने परब्रह्मï परमात्मा की चेतना, प्रेरणा सक्रियता एवं समर्थता को गायत्री कहा है तथा इसे विश्व की सर्वोपरि शक्ति बताया है। विभिन्न देवशक्तियाँ जो अन्यान्य प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त होती हैं और विभिन्न देवनामों से पुकारी जाती हैं, इसी शक्ति के ज्योति स्फुलिंग है। वे समस्त शक्तियाँ उस परम शक्ति की ही किरणें हैं। उत्पादन, विकास एवं संहार में संलग्ïन ब्राह्मïी, वैष्णवी और शांभवी शक्तियों के प्रतीक प्रतिनिधि ब्रह्मïा, विष्णु, महेश परमब्रह्मï की इसी सर्वोपरि शक्ति से अपना काम चलाते हैं और अभीष्टï कार्यों को पूरा करने के लिए शक्तियाँ प्राप्त करते हैं। पंचतत्त्वों की चेतना को आदित्य, वरुण, मरुत, द्यौ और अंतरिक्ष कहकर पुकारते हैं। उनकी शक्ति का स्रोत भी परमब्रह्मï की वही चेतना है, जिसे गायत्री कहा गया है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन को बालक्रीड़ाओं में भटकने न दें (भाग 2)

🔷 देखना यह है कि जीवन सम्पदा को किस निमित्त लगाया जाये? इसके लिए प्रचलन देखने की आवश्यकता है। मछलियों में बड़ी छोटी को निगल जाती है और उस बड़ी को मछुए के जाल में अपना प्राण गँवाना पड़ता है। प्रचलन ऐसा ही है। बहुमत ऐसे ही निरर्थक काम करता रहता है। समस्त पृथ्वी पर जितने मनुष्य रहते हैं, उतने दृश्य और अदृश्य कृमि कीटक एक मील की परिधि में रहा करते हैं। पर उनकी उपयोगिता क्या? पेट प्रजनन के कुचक्र में इधर से उधर भटकते रहते हैं। इसी स्तर का जीवन अधिकाँश मनुष्य जीते हैं। उनकी नकल क्या करनी? वनमानुषों, नर पशुओं का अनुकरण भी कोई करने लायक बात है।

🔶 बहुसंख्यक लोगों का क्रिया-कलाप ही प्रचलन कहाता है। बहुसंख्यक तो अपनी आत्मा सत्ता के अस्तित्व तक को भुला बैठे हैं। उन्हें अपना आपा काया मात्र के रूप में परिलक्षित होता है। अपनापन उन्हें शरीर तक सीमित प्रतीत होता है इसलिए उसी की सुख-सुविधा साधने में जीवन को रुचिपूर्वक खपाते रहते हैं। पेट की भूख, जननेन्द्रिय की तरंग, धन की ललक, बड़प्पन की बड़ाई की सनक। बस इसी सीमा में उनके क्रिया-कलाप बनते हैं। बच्चे जनने और उन्हें पालने में तो चुहिया भी प्रवीण होती है।

🔷 वह तीन सप्ताह में प्रौढ़ हो जाती है और एक बार में आठ दस बच्चे जनती है। यह प्रजनन वर्ष में प्रायः चार बार होता है। इस प्रकार तीस-चालीस बच्चों की जननी वह एक वर्ष में ही बन जाती है। हर बार पति बदलने पड़ते हैं इस प्रकार ढेरों की वह पर्यंक शाथिनी बन लेती है। इसमें कौन-सा व कैसा बड़प्पन? क्या गौरव, क्या महत्व? मनुष्य भी किशोरावस्था में ही प्रजनन कर्म में लगता है और बच्चे पैदा करने के अतिरिक्त उन्हें पालता भी है। यही जाल-जंजाल इतना बड़ा है जिसका कि ताना-बाना बुनते बुढ़ापा आ धमकता है और मौत अपने थैले में चना चबैना की तरह समेट ले जाती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1986 पृष्ठ 3


http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1986/February/v1.3

👉 जीवन को सार्थक बनाया या निरर्थक गँवाया जाय (भाग 6)

🔷 पड़ोस में आग लगने पर भोजन पकाने जैसा आवश्यक काम भी पीछे कभी के लिए छोड़ना पड़ता है। कितने ही काम सामने हो तो उसमें बुद्धिमानी का कदम यह होता है कि प्राथमिकता देने और पीछे धकेलने की एक सुव्यवस्थित शृंखला बनाई जाय। इसका निर्धारण ही सुव्यवस्था कहा जाता है। इस क्रम को बिगाड़ देने पर पूरा परिश्रम करने पर भी बात बनती नहीं और समस्याएँ सुलझने के स्थान पर और भी अधिक उलझ जाती है। इन दिनों प्रत्येक विज्ञजन के लिए करने योग्य सामयिक कार्य एक ही है, कि लोक मानस के परिष्कार का महत्त्व समझा जाय और आस्था संकट का निवारण करने के लिए प्राण प्रण से जुट पड़ा जाय। इस एक ही व्यवधान के समाधान पर समय की समस्त गुत्थियों का सुलझ सकना निर्भर है।

🔶 यह सब अनायास ही संभव नहीं हो सकता। इस श्रेय पथ पर चल सकना मात्र उन्हीं के लिए संभव है, जो अपनी आकांक्षा उत्कंठा को तृष्णा से हटाये और उसे उतनी ही भावना पूर्वक श्रेय साधना के लिए लगायें। यह आन्तरिक परिवर्तन ही बाह्य क्षेत्र में वह सुविधा उत्पन्न कर सकता है, जिसके सहारे शरीर निर्वाह की तरह ही आत्म-कल्याण और विश्व-कल्याण का महान प्रयोजन बिना किसी के, नितान्त सरलतापूर्वक सधता रहे। परमार्थ परायणों में से एक भी भूखा, नंगा नहीं रहा। उनके पारिवारिक उत्तरदायित्वों में से एक भी रुका नहीं पड़ा रहा। तरीके अनेकानेक हैं। अपना सोचा हुआ तरीका ही एक मात्र मार्ग नहीं है।

🔷 नये सिरे से नये उपाय सोचने पर ऐसे समाधान हर किसी को उपलब्ध हो सकते हैं जिनमें से साँप मरे न लाठी टूटे। निर्वाह किसी के लिए समस्या नहीं। कठिनाई एक ही है-अनन्त वैभव की लिप्सा और कुटुम्बियों को सुविधा सम्पदा से लाद देने की लालसा। यदि परिवार के समस्त सदस्यों को श्रमजीवी, स्वावलम्बी बनाने की बात सोची जाय, औसत नागरिक स्तर का निर्वाह स्वीकार किया जाय तो इतने भर से जीवन को सार्थक बनाने वाली राह मिल सकती है। प्रश्न एक ही है कि शरीर के लिए जिया जाय या आत्मा के लिए। दोनों में से एक को प्रधान एक को गौण मानना पड़ेगा। यदि आत्मा की वरिष्ठता स्वीकार की जा सके तो उन प्रयोजनों को पूरा करना पड़ेगा, जिनके लिए सृष्टा ने यह सुर दुर्लभ अवसर उच्चस्तरीय उपयोग के निमित्त प्रदान किया है।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Amrit Chintan 31 Jan

🔷 Farmers shade their perspiration in the field and they grow the crop in their fields. In the same way good persons get co-operation and followers from all sides. If one is keen to get the answer of his problem he will surely find suitable person to answer. There are examples where the prisoners under iron curtain can learn a lot just using a chalk and precocious on some metal vessel as the writing pad. Actually it is the keen desire of the person that can give any thing is this word but for that what is needed is hard labour and constant practice whole heartedly.
 
🔶 All the three dimensions of spiritual growth atheism, concept of soul and duty must be covered for proper development. Devotion to God is devotion to ideality, because God is representation of all virtues of human life. Worship is the starting point to achieve those virtues in his own life.
 
🔷  A woman’s body is not her anatomy but is truly complimentary to the make figure. The women create the true happiness of the family. It is that motherhood of a lady which creates a heavenly atmosphere in family. Women mean the source of  loving atmosphere in family. She wipes of the gloomy condition among the members. Her life is full of love, sacrifice, tolerance and bliss of life.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 9)

🔷 मित्रो! यह सब देखकर मुझे बड़ा क्लेश होता है, बड़ा दुःख होता है। लोगों ने तो रामचंद्र जी की भी मिट्टी पलीद कर दी थी। उनको गये हुए कितने वर्ष हो गये। भगवान श्रीकृष्ण की भी लोगों ने मिट्टी पलीद कर दी। उन्हें गये हुए पाँच हजार वर्ष से अधिक दिन हो गये। गाँधी जी की भी मिट्टी पलीद हो जाय, राणाप्रताप की भी मिट्टी पलीद हो जाय, तो क्या कह सकते हैं? लोग उनके नाम पर भी धंधा करने लग जायँ तो क्या कहा जा सकता है? तुम लोग मेरी भी मिट्टी पलीद क्यों कर रहे हो? मेरी जिंदगी में ही मुझे क्यों बदनाम कर रहे हो? मेरे जाने के बाद मुझे बदनाम करना? अभी तो अपनी सफाई पेश करने के लिए मैं जिन्दा हूँ। अभी मुझे क्यों तंग करते हो।

🔶 मित्रो! आप लोगों के पास जाना और जिन आदमियों को-लाखों मनुष्यों को, जिनको मैंने अपने खून-पसीने से और अपनी मेहनत के बाद तैयार किया है, उन्हें यह संदेश सुनाना कि गुरुजी क्या हैं और यह मिशन क्या है? हमारा मिशन इन्सान में भगवान पैदा करने की कल्पना करता है। हम इन्सान में भगवान पैदा करेंगे। हम इन्सान को भगवान बनायेंगे। भगवान की खुशामद करके मनोकामना पूर्ण कराने का प्रोत्साहन हम नहीं देंगे। हम ऐसा कोई आश्वासन नहीं देंगे, वरन् हम यह आश्वासन देंगे कि इंसान अपने आपमें भगवान है और अपने आपके भगवान को विकसित करने के लिए उनको खाद-पानी और बीज-तीनों की आवश्यकता पड़ेगी। हमको हर आदमी को आस्तिक बनाना पड़ेगा, जो कि आज नहीं है। आज जो है, वे नास्तिक हैं। आपको उन तक आस्तिकता का संदेश पहुँचाना पड़ेगा और आस्तिकता की व्याख्या करनी पड़ेगी, जो मैंने इस समय तक आपको कही।

🔷 मित्रो! आपको लोगों के पास जाना पड़ेगा। मनुष्यों में महानता विकसित करने के लिए, महानता के लिए बरगद का पेड़ उगाने के लिए, जीवन का कल्पवृक्ष उगाने के लिए उसमें खाद देनी पड़ेगी। खाद का नाम वह है-जिसको हम आस्तिकता कहते हैं। जिसको हम आध्यात्मिकता कहते हैं, अर्थात् अपने आप पर विश्वास करना और अपने आपका परिशोधन करना। आप हर आदमी से यह कहना कि मनुष्य को सुख और शांति देने के लिए, जीवन को कल्पवृक्ष बनाने के लिए जिस चीज की आवश्यकता है, उस चीज का नाम धार्मिकता है।

🔶 पौधे को विकसित करने के लिए बीज बोना-एक, पौधे में पानी देना-दो और खाद लगाना-तीन तीनों काम अगर आप कर लेंगे, तो आपका विशाल बरगद जैसा वृक्ष बढ़ता हुआ चला जायेगा। आपका जीवन रूपी बरगद का विशाल वृक्ष पल्लवित-पुष्पित होता हुआ चला जायेगा। उसके ऊपर फूल आयेंगे, उसके ऊपर फल आयेंगे और उसके ऊपर डालियाँ आयेंगी। ऐसे आदमी न केवल उस व्यक्ति को, जो अभावों में डूबा हुआ है, कंगाली में डूबा हुआ है, उसका न केवल उद्धार करेंगे, वरन् उसको इस लायक बना देंगे कि अपनी नाव में बिठा करके वह हजारों मनुष्यों को पार करने में सफल हो सके।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 27)

👉 शंकर रूप सद्गुरु को बारंबार नमन्

🔶 गुरुगीता अध्यात्मविद्या का परमगोपनीय शास्त्र है। हाँ, इसे समझने के लिए गहरी तत्त्वदृष्टि चाहिए। यह तत्त्व दृष्टि विकसित हो सके, तो पता चलता है कि वैदिक ऋचाएँ जिस सत्य का बोध कराती हैं, उपनिषद् की श्रुतियों में जिसका बखान हुआ है, गुरुगीता में भी वही प्रतिपादित है। अठारह पुराणों में जिन परमेश्वर की लीला का गुणगान है- वही सर्वेश्वर प्रभु शिष्यों के लिए सद्गुरु का रूप धरते हैं। अध्यात्म विद्या के सभी ग्रन्थों-शास्त्रों को पढ़ने का सुफल इतना ही है कि अपने कृपालु सद्गुरु के नाम में प्रीति जगे। सन्तों ने इसे कहा भी है-
    पढ़िबे को फल गुनब है, गुनिबे को फल ज्ञान।
    ज्ञान को फल गुरु नाम है, कह श्रुति-सन्त पुराण॥
  
🔷 यानि कि समस्त शास्त्रों को पढ़ने का फल यह है कि उस पर चिन्तन-मनन-निदिध्यासन हो। और इस निदिध्यासन का फल है कि साधक को तत्त्वदृष्टि मिले, उसे ज्ञान हो तथा ज्ञान का महाफल है कि उसे सद्गुरु के नाम की महिमा का बोध हो। उनके नाम में प्रीति जगे। उन्हें नमन का बोध जगे। यही श्रुति, सन्त और पुराण कहते हैं।
  
🔶 ऊपर के मंत्रों में गुरुभक्त शिष्यों को इसकी अनुभूति कराने की चेष्टा की गयी है। इसमें बताया गया है कि शिष्य का परम कर्त्तव्य है कि वह अपने सद्गुरु को नमन करें, क्योंकि वही संसार वृक्ष पर आरूढ़ जीव का नरक सागर में गिरने से उद्धार करते हैं। नमन उनश्री गुरु को, जो अपने शिष्य के लिए ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर होने के साथ स्वयं परब्रह्म परमेश्वर हैं। शिव रूपी उन सद्गुरु को नमन करना शिष्य का परम कर्त्तव्य है, जो समस्त विद्याओं का उदय स्थान और संसार का आदि कारण हैं और संसार सागर को पार करने के लिए सेतु हैं। वे गुरुदेव भगवान् ही अज्ञान के अन्धकार से अन्धे जीव की आँखों को ज्ञानाञ्जन की शलाका से खोलते हैं। गुरुवर ही अपने शिष्य के लिए पिता हैं, माता हैं, बन्धु हैं और इष्ट देवता हैं। वे ही उसे संसार के सत्य का बोध कराने वाले हैं। ऐसे परम कृपालु सद्गुरु को शिष्य बार-बार नमन करे और करता रहे

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 49

सोमवार, 29 जनवरी 2018

👉 गलती को भी मानें

🔷 अक्सर हम आवेश में आकर ऐसी प्रतिक्रिया दे देते हैं जो बाद में जाकर हमें दुःख देती है। कई बार परिवार के भीतर या कंपनी में ही हम अपने वरिष्ठों ये कनिष्ठों की बात को पूर्ण सुने बिना ही अपनी प्रतिक्रिया दे देते हैं। हम दूसरों में खोट, कपट, बेईमानी के लक्षण ढूँढते रहते हैं पर स्वयं की गलतियाँ मानने में हमारा ही अहं हमें रोकता है।

🔶 एक छोटी-सी कहानी है जिसके माध्यम से हम जान सकते हैं कि जल्दबाजी में प्रतिक्रिया देने का असर क्या होता है। कॉलेज में अच्छे नंबरों से पास होने के बाद एक युवा की अच्छी कंपनी में नौकरी लगती है। वह एक बहुत ही बड़े बिजनेसमैन का लड़का रहता है और कॉलेज में जाने से पूर्व से उसकी इच्छा रहती है कि उसके पास महँगी कार होना चाहिए।

🔷 अपने युवा पुत्र को उन्होंने यह वादा किया था कि अगर वह अच्छे नंबरों से पास हो जाता है और अपने बल पर नौकरी प्राप्त कर लेता है तब उसे वे कार जरूर लेकर देंगे। उस लड़के ने काफी दिनों से एक विशेष मॉडल की कार के सपने देखे थे और वह चाहता था कि पिता वही कार उसे दें।

🔶 पिता को भी यह बात पता थी। पास होने के बाद एक दिन पिता ने पुत्र को बुलाया। पुत्र समझ गया था कि आज उसे निश्चित रूप से कार मिलेगी। उसने अपने सभी साथियों से पहले ही कह दिया था कि सभी कार से लांग ड्राइव पर चलेंगे। वह पिता से मिलने जाता है। पिता उसे शाबासी देते हैं, साथ ही एक प्रेरक पुस्तक बक्से में रखकर देते हैं और कहते हैं कि बेटा तुम पास हो गए हो और अब आगे की जिंदगी बड़ी कठिनाई भरी होगी इस कारण तुम इस किताब को जरूर पढ़ो।

🔷 कार के सपनों में खोया युवा साथी किताब की बात सुनकर ही भड़क जाता है और उस बक्से को फेंक देता है और वहाँ से बाहर आ जाता है। वह काफी मायूस होता है कि क्या सोचा था और क्या हो गया? उसके मन में ऐसे विचार आने लगते हैं कि क्यों न घर ही छोड़ दे? काफी विचार करने के बाद वह नौकरी करने दूसरे शहर चले जाता है और पिता के काफी संपर्क करने के बाद भी वापस नहीं आता।

🔶 कई वर्षों तक वह पिता से संपर्क हीं नहीं करता। एक दिन उसके पास खबर आती है कि पिता की मृत्यु हो गई है। अपनी पत्नी के कहने पर वह पिता के अंतिम संस्कार में शामिल होने जाता है। अंतिम संस्कार के बाद वह पिता के कमरे में जाता है जहाँ पर वहीं बक्सा रखा होता है जिसमें किताब रहती है।

🔷 वह उस बक्से को उठाता है और किताब के पन्ने पलटता है तब उसमें से चाबी गिरती है। यह उसी कार की चाबी होती है जो उसके पिता ने वर्षों पूर्व खरीदी रहती है और यह वही कार होती है जिसके सपने वह देखा करता था। साथ ही किताब के नीचे कुछ कागजात रहते हैं जिनमें संपूर्ण संपत्ति व जायदाद उसके नाम की होती है। यह देखकर युवा लड़के की आँखों से आँसू निकल पड़ते हैं और वह स्वयं से ही कहने लगता है कि मैं अपने आपको कभी माफ नहीं कर पाऊँगा।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 30 Jan 2018


👉 आज का सद्चिंतन 30 Jan 2018


👉 संकल्प शक्ति

🔶 संकल्प का अपना विज्ञान है। उसे कर्म का बीजारोपण कह सकते हैं। संकल्प की चरणबद्ध रूपरेखा बनाई जाती है। इसमें सोच विचार कर निश्चय किये जाते हैं। निश्चय को मन में छिपाकर नहीं रखा जाता है, वरन् प्रकट किया जाता है। उसकी क्रमबद्ध योजना बनाई जाती है। तत्परतापूर्वक और तन्मयतापूर्वक मन लगाने के लिए साहस जुटाया जाता है। साधन एवं सहयोग एकत्रित करने का ताना-बाना बुना जाता है और उसके लिए समुचित दौड़-धूप की जाती है। कठिनाइयाँ आ सकती हैं और उनका सामना अथवा समाधान करने के लिए पहले से ही क्या तैयारी रखी जा सकती है, इन सब प्रश्रों पर गंभीरता एवं दूरदर्शिता के साथ विचार किया जाता है। जानकारों के साथ परामर्श किया जाता है। सामयिक परिवर्तनों की गुंजाइश रहती है। ऐसे सुनिश्चित प्रयत्नों को संकल्प कहते हैं।
  
🔷 संकल्प और असंकल्प का अन्तर समझने वालों को असफलता से बचने और सफलता के लक्ष्य तक पहुँचने में विशेष कठिनाई नहीं होती। संकल्पवान् हर परिस्थिति का सामना करने के लिए साहस उभारते हैं। आंतरिक और परिस्थितिजन्य अवरोधों से जूझने का पराक्रम करते हैं। फलत: असमंजस हटता है और पुरुषार्थ की गतिशीलता प्रखर होती चली जाती है। लक्ष्य तक पहुँचने का यही राजमार्ग है।
  
🔶 श्रेष्ठता की साधना संकल्प से ही संभव होती है। संकल्प को ही व्रत कहते हैं। व्रतधारी ही तपस्वी और मनस्वी कहलाते हैं। लक्ष्य की ओर शब्दवेधी बाण की तरह सनसनाते हुए चल पडऩे की क्षमता उन्हीं में होती है। संकल्प का कार्य है- अमुक कार्य करने का अमुक लक्ष्य तक पहुँचने का दृढ़ निश्चय। दृढ़ निश्चय का अर्थ है- काम करने की सुव्यवस्थित योजना बनाना, उसके लिए समुचित श्रम, साधना और मनोयोग लगाने की प्रतिज्ञा। प्रतिज्ञा का अर्थ है- आत्म गौरव को दाँव पर लगा देना, प्रयास को चरम पुरुषार्थ के साथ पूरा करना। मन:संस्थान की संरचना कर सकना संकल्प का ही काम है। इसी से कहा जाता है कि संकल्प कभी अधूरे नहीं रहते।
  
🔷 संकल्प को जड़ और सफलता को तना कहा जा सकता है। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए तत्त्ववेत्ताओं ने व्रतशील संकल्प के निर्धारण के कार्य को आधी सफलता माना है। यह मान्यता अक्षरश: सत्य है, जिसे संदेह हो वह इस सच्चाई की परीक्षा स्वयं करके देख सकता है।
  
🔶 सृष्टि का प्रादुर्भाव भी प्रजापति ब्रह्म की संकल्पशक्ति के  द्वारा ही हुआ है। जागरूकता पुरुषार्थ का प्रथम संकल्प है। हममें से प्रत्येक को कुछ सृजनात्मक संकल्प करना चाहिए। अब हमें जागरूक होने की आवश्यकता है। मनगढंत हवाई उड़ानें भरते रहने से हम कहीं के न रहेंगे। कहा भी गया है- ख्वाब कभी पूरे नहीं होते, संकल्प कभी अधूरे नहीं रहते।
  
🔷 संकल्प शक्ति के प्रचण्ड सामथ्र्यवान-व्रतशील व्यक्ति उच्च आदर्शों को लेकर अपने कार्य क्षेत्र में उतरे और तुच्छ सामथ्र्य के रहते हुए भी महान् कार्य करने में सफल हुए हैं। भगवान् ने मनुष्य को जहाँ अन्य प्राणियों की तुलना में अनेकों शारीरिक-मानसिक विशेषताएँ प्रदान की हैं, वहाँ एक और विलक्षण अनुदान भी दिया है, जिसका नाम है संकल्प बल। इसकी सामथ्र्य का कोई पारावार नहीं है। संकल्प बल ही है, जो सन्मार्ग पर चल पड़े, तो व्यक्तित्व को इतना ऊँचा उठा सकता है, जिस पर देवता भी ईष्र्या करने लगें। नर हो या नारी, बालक हो या वृद्ध, स्वस्थ हो या रुग्ण, धनी हो या निर्धन, परिस्थितियों से कुछ बनता-बिगड़ता नहीं। प्रश्र संकल्प शक्ति का है। मनस्वी व्यक्ति अपने लिए उपयुक्त परिस्थितियाँ बनाते और सफल होते हैं। समय कितना लगा और श्रम कितना पड़ा, उसमें अंतर हो सकता है, पर आत्म निर्माण के लिए प्रयत्नशील व्यक्ति अपनी आकांक्षा को सक्रियता एवं प्रखरता के अनुरूप देर-सबेर में सफल करके ही रहता है। यदि मनुष्य अपनी साहसिकता को जगा लें, संकल्प शक्ति का सदुद्देश्य के लिए उपयोग करने लगे, तो कोई कारण नहीं कि वह अपनी गौरव- गरिमा का सिक्का जमाने में किसी से पीछे रहे।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन को बालक्रीड़ाओं में भटकने न दें (भाग 1)

🔷 बादलों का पानी जमीन पर गिरता है। जमीन से ढलान पर बहने वाली नदियों में जाता है और नदियाँ समुद्र के गहरे गर्त में जा गिरती हैं। पतन का यही स्वाभाविक क्रम है। मन को यदि रोका न जाये तो वह भी इसी दिशा में स्वभावतः चल पड़ेगा। इसलिए वर्षा के पानी को समुद्र के गर्त में से बचाकर किसी उपयोगी कार्य में लगाना या दिशा विशेष में बहाना हो तो उस पर भी रोकथाम लगानी होगी। पशुओं को खूँटे से बाँध कर ही निर्धारित कामों में लगाया जा सकता है अन्यथा वे छुट्टल छोड़ देने पर जिस-तिस का खेत उजाड़ेंगे। निरर्थक घूमेंगे और आपस में लड़ेंगे। इसलिए उन्हें अनुशासन में रखने के लिए मर्यादाओं का घेरा डालना और बंधन बाँधना पड़ेगा। मजबूत और ऊँचा बाँध बनाकर ही नदियों से सिंचाई के काम की नहरें निकाली जाती हैं।

🔶 मन को चिन्तन पक्ष में प्रशिक्षित करने के लिए उसे संयम के अनुबन्ध अपनाने के लिए प्रशिक्षित करना पड़ेगा। इन अनुबंधों को संयम कहते हैं। संयम के चारों पक्षों को गत अंक में अवगत कराया जा चुका है। इन्द्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम, और विचार संयम सीख लें तो समझना चाहिए कि अबोध मन वयस्क हो गया और उसने नहाने, कपड़ा धोने, दाँत माँजने, बिस्तर उठाने, बुहारी लगाने जैसे उपक्रम अपनाकर साफ-सुथरा रहना सीख लिया। उन्हें न अपनाने पर कल्पनाएँ और इच्छाएँ ऐसा नटखटपन करती रहेंगी जैसा अबोध बालक करते हैं। वे चन्दा मामा से लेकर तारा गणों की गेंदें बनाने के लिए मचल सकते हैं। इन अभिलाषाओं को- माँगों को- कोई पूरा नहीं कर सकता। तृष्णा की खाई इतनी गहरी है कि उसके लिए अनेकों जन्मों का परिश्रम खपाया जाये तो भी उसको पाटा नहीं जा सकता। अन्ततः अब या फिर कभी उन विडम्बनाओं में से कल्पनाओं को उबारना पड़ेगा तो उसके लिए चिन्तन पर अंकुश लगाने, इच्छाओं पर अंकुश लगाने के अतिरिक्त और कोई मार्ग मिलेगा नहीं।

🔷 चिन्तन के उपरान्त मनुष्य की बड़ी शक्ति है- प्रयास श्रम एवं समय का सुनियोजन। जीवन का तात्पर्य वर्षों की लम्बाई नहीं, वरन् यह है कि उसके समय घटकों का किस प्रकार, किस निमित्त उपयोग किया गया। अनेकों थोड़े दिन जीते हैं, किन्तु अभिमन्यु और भगतसिंह की तरह, विवेकानन्द और रामतीर्थ की तरह अल्प आयु में ही अपने को, अपने समाज को कृत्य-कृत्य कर जाते हैं। कितने ही ऐसे होते हैं जो परम अवधि सौ वर्ष तक जी लेते हैं, पर रहते दूसरों पर भार बनकर ही हैं। ऐसे दीर्घ जीवन से क्या अपना और क्या दूसरों का लाभ?

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1986 पृष्ठ 3
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1986/February/v1.3

👉 जीवन को सार्थक बनाया या निरर्थक गँवाया जाय (भाग 5)

🔷 करना क्या चाहिए? यदि इस प्रश्न का उत्तर गम्भीरता और दूरदर्शिता के सहारे उपलब्ध करना हो तो एक ही निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि शरीर को जीवित रखने भर के साधन जुटा देने के उपरान्त जो सामर्थ्य शेष रहती है, उसे आत्मा का कल्याण कर सकने वाले परमार्थ में लगा देने का साहस करना चाहिए। मात्र औचित्य अपनाने की इस समझदारी को साहस इस अर्थ में कहा जा रहा है, कि जन समुदाय के अधिकांश सदस्य अनर्थरत ही देखे जाते हैं उन्हें लोभ मोह की आग भड़काने और उसे बुझाने के लिए ईंधन जुटाने में ही निरन्तर कार्यरत देखा जाता है।

🔶 सुना है कि तेल या ईंधन डालने से आग भड़कती है, पर मनुष्य है जो तृष्णा को भड़काता और उसकी पूत के लिए, रावण जितना वैभव जुटाने के लिए अहर्निश श्रम करता है। अपना ही नहीं पड़ोसियों का सामान समेट कर भी उसी दावानल में झोंकता रहता है। यही है असफल और उद्विग्न जीवन का स्वरूप, जिसे अपनाने के लिए अधिकांश लोग उन्मादियों की तरह दौड़-धूप करते रहते हैं। यही है प्रवाह जिसमें जन समुदाय को तिनके पत्तों की तरह बहते देखा जाता है। इस भगदड़ भेड़चाल से भिन्न दिशा में कोई अपना मार्ग निर्धारित करता है तो उसे साहस ही कहना चाहिए। दिग्भ्रान्तों के झुण्ड को चुनौती देकर सही रास्ते का सुझाव देने वाला मूर्ख कहलाता और उपहासास्पद बनता है। तथाकथित जन समुदाय का विशेषतया कुटुम्बियों, हितैषियों का उपहास, तिरष्कार सहने की क्षमता सँजोना निस्संदेह साहस भरा कदम है। इसी से कहा जा रहा है कि आदर्शवाद को, सत्य और तथ्य को अपनाना भी इस अवांछनीयता के माहौल में साहस ही नहीं दुस्साहस भरा कदम है।

🔷 औचित्य कहा जाय या साहस। जीवन की सार्थकता का रास्ता एक ही है कि अमीरी और लिप्सा पर अंकुश लगाकर औसत नागरिक स्तर का निर्वाह क्रम अपनाया जाय। उतना जुट जाने पर पूरा-पूरा संतोष किया जाय। इसके उपरान्त जो भी बचा रहता है उस समूचे को ऐसे उपक्रम में नियोजित किया जाय, जिससे मानवी गरिमा का अभिवर्धन होता हो। आत्म-कल्याण और विश्व-कल्याण का उभय पक्षीय प्रयोजन सधता है। इस निर्धारण में भी यह देखना होता है कि सामयिक आवश्यकता पर ध्यान रखते हुए जो सर्वप्रथम सँभालने सुधारने योग्य है उसी को हाथ में लिया जाय।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Amrit Chintan 30 Jan

🔷 There is somewhere oneness in visible different forms. And this is the base of development and progress. When we divide or break in pieces. The power is reduced and the collective power of any material thing makes it strong and useful. A drop of water is same as a glass of water qualitatively, but drop can not quench the thirst. The law exists for human development as well.
 
🔶 My dear sons,
You can do a lot for me and for the mission I am committed if you decide so. You must grow sacredness and selfless love in life not only you will be my beloved son but you will be blessed by Rishis of Himalaya and saints who are our guide for the success of the mission of Yug Nirman Yojna.
 
🔷 The whole progress in life is right thinking and developing that in action. The objects of all religions are proper guidance to do good for self and others. God showers his grace to give you more courage to stick to right path. If that courage does not develop in one’s life is meant that his religion and spiritual path in simply a mimic.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 8)

🔷 मित्रो! क्या करना पड़ेगा? अधिक से अधिक लोग जो इस मिशन के विचारों को सुनने में समर्थ हों, उन तब हमारा संदेश पहुँचाया जा सके जिसको हमने आस्तिकता कहा है, जिसको हमने अध्यात्मवाद कहा है, जिसको हमने धर्म परम्पराएँ कहा है, उसका संदेश अधिक से अधिक लोगों तक पहुँच जाय, तो अच्छा है। लेकिन अगर अधिक संख्या में लोग इकट्ठा नहीं होते, तो आप कभी सफलता-असफलता का अंदाज मत लगाना। हमने संख्या की दृष्टि से क्रियाकलापों को महत्त्व नहीं दिया है। बहिरंग रूप से कितना बड़ा पंडाल बना, कितना खर्च हुआ, कितने लोग आये-आदि की दृष्टि से आप सफलता-असफलता का अन्दाज कभी मत लगाना। आपको अन्दाज लगाना है, तो इस तरह से लगायें कि जहाँ और जिस कार्य के लिए आपको भेजा गया था, वहाँ जा करके आपने लोगों के अंदर भावनायें उत्पन्न करने में कितनी सफलतायें प्राप्त की। लोगों की भावनाओं को जाग्रत करके उन्हें ऊँचा उठाने में कदाचित आपने सफलता प्राप्त कर ली, तो मैं यह समझूँगा कि आपने अपना काम पूरा कर लिया और आपका काम पूरा हो गया। तब मैं समझूँगा कि आपका उद्देश्य सही था और आप यह समझते थे कि आपको किस काम के लिए भेजा गया है।

🔶 मित्रो! आप जिन लोगों के संपर्क में आयें, उनसे बराबर बात करना, सलाह देना, परामर्श देना, उनके साथ रहना, उनसे हिलना-मिलना और खासतौर से उन लोगों से जिनको हम अपना कार्यकर्ता कहते हैं। जनता हमारे कार्यों में भाग लेती है कि नहीं लेती है, अभी हमको उसकी फिकर नहीं है। अभी हमको यह फिकर है कि जिन लाखों आदमियों को हमने अब तक की अपनी लम्बी जिंदगी में कितनी मेहनत करने के बाद और कितना परिश्रम करने के बाद तैयार किया है और अपने संपर्क में लाया है। उनको हमारे उद्देश्यों की सही बात मालूम न हो सकी और उन सब को हमारी क्रियाओं का आभास न हो सका और उन सब तक हमारी गतिविधियों की कोई बात मालूम न हो सकी। यह कैसी मुसीबत है और कैसी कठिनाई है और कैसी दिक्कत है? सबसे बड़ी कठिनाई, सबसे बड़ी दिक्कत और सबसे बड़ी मुसीबत इस बात की है कि हम अपनी टीमवालों को ही नहीं समझा सके, तो बाहर वालों को कैसे समझाएँगे?

🔷 साथियो! अभी तक लोग हमें मैजेशियन-जादूगर समझते हैं। संतोषी माता समझते हैं। गुरुजी के मायने वे समझते हैं-मनोकामनाएँ पूरी करने की मशीन। गुरुजी के गले में माला डालो और उनके मुँह से आशीर्वाद निकालो। स्टेशनों पर यही होता है। हर स्टेशन पर वेट करने की-तौलने की मशीन लगी होती है। लोग उस पर खड़े हो जाते हैं और दस पैसे का सिक्का डालते हैं। दस पैसा डालते ही मशीन घूमी और वजन लिखा हुआ टिकट बाहर आ जाता है। गुरुजी क्या हैं? वही हैं जो स्टेशन पर मशीन लगी है। किसकी मशीन? वेट जानने की मशीन। वेट जानने में क्या करना पड़ता है? उनके गले में माला पहनानी पड़ती है और क्या करना पड़ता है? पैर छूने पड़ते हैं। पैर छूने के बाद में और माला पहनाने के बाद में और क्या करना पड़ता है? उनके पेट में से, उनके मुँह में से जाकर खट से टिकट आ जाता है। किसका टिकट आ जाता है? आशीर्वाद का टिकट आ जाता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 26)

👉 आओ, गुरु को करें हम नमन
🔶 यह घटना समर्थ गुरु रामदास और उनके शिष्य शिवराम के सम्बन्ध में है। उन दिनों स्वामी रामदास अपनी तेरह वर्षीय कठोर साधना को पूर्ण करके सारे देश में अलख जगा रहे थे।
  
🔷 इस क्रम में उन्हें बनारस आना था। अपनी बनारस यात्रा की चर्चा उन्होंने अपने शिष्यों से करते हुए कहा कि इस बार की यात्रा मैं अकेले ही करूँगा। सब शिष्यों ने उनका आदेश स्वीकार कर लिया, पर बालभक्त शिवराम ने जिद्द पकड़ ली कि वह भी उनके साथ जाएगा। शिवराम की आयु बारह साल थी। समर्थ गुरु ने बहुत समझाया कि बेटा तुम इतनी लम्बी यात्रा पैदल कैसे करोगे? पर बालहठ पर कोई असर नहीं हुआ। अन्त में स्वामी रामदास ने उससे कहा- अच्छा बेटा! तुम अपनी मां से आज्ञा ले लो। अगर वह आज्ञा दे देगी, तो हम तुम्हें ले चलेंगे। शिवराम की मां एक भक्तिमती विधवा महिला थी। शिवराम उनकी इकलौती सन्तान था। सन्तान के प्रति उनका जितना गहरा ममत्व था, समर्थ गुरु के चरणों में उतनी ही गहरी भक्ति थी। पुत्र की बात सुनकर उन्होंने एक पल की देर लगाये बिना आज्ञा दे दी।
  
🔶 शिवराम की भक्ति और उसकी मां की आस्था से द्रवित होकर समर्थ गुरु उसे अपने साथ काशी ले आए। काशी आने पर गुरु आज्ञा से शिवराम भिक्षा मांगने के लिए निकला। समर्थ रामदास और उनके शिष्यों का भिक्षा हेतु एक नियम था। वह किसी के द्वार पर खड़े होकर केवल तीन बार पुकारते थे- जय-जय रघुवीर समर्थ। तीन बार पुकारने पर यदि किसी ने भिक्षा दी तो ठीक अन्यथा आगे बढ़ जाते थे। इस तरह तीन घरों में भिक्षा मांगना उनका नियम था। तीन घरों में यदि भिक्षा न मिली तो वे उस दिन उपवास कर लेते थे। शिवराम ने भी इसी नियम के अनुसार एक द्वार पर आवाज लगायी। यह द्वार काशी के महातांत्रिक भैरवानन्द का था। भैरवानन्द को अनेकों तामसी तान्त्रिक क्रियाएँ सिद्ध थीं। यह महातांत्रिक होने के साथ महाक्रोधी भी था।
  
🔷 अपने द्वार पर जय-जय रघुवीर समर्थ की आवाज सुनते ही वह भड़क उठा। क्रोधावेश में वह द्वार पर निकलकर आया और बालक शिवराम को डांटते हुए बोला कि कौन है, जो अपने को समर्थ कहता है। शिवराम ने बिना किसी भय के कहा कि समर्थ हैं मेरे गुरु और उनकी सामर्थ्य का स्रोत उनके आराध्य भगवान् राम हैं। छोटे बालक को अपने सामने इस तरह बोलते हुए देख उस क्रोधी तांत्रिक ने कहा, जा मैं भैरवानन्द तुझसे कहता हूँ कि तू कल प्रातःकाल तक मर जाएगा, तेरे गुरु में सामर्थ्य है, तो तुझे बचा लें। शिवराम ने समर्थ रामदास के पास उपस्थित होकर उस तांत्रिक की सारी बातें बतायी। उन बातों से भी उन्हें अवगत कराया, जो रास्ते में बनारस के लोगों ने उसे महातांत्रिक की आश्चर्यजनक शक्तियों के बारे में बतायी थी। इन सारी बातों को सुनकर समर्थ रामदास हंसे और बोले बेटा- समर्थ रघुवीर के होते डर कैसा? तू तो बस आराम से गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु वाला मन्त्र पढ़ता रह और आराम से मेरे पांव दबाए जा। इतना कहकर समर्थ रामदास लेट गए।
  
🔶 बालक शिवराम ने उनके पांव दबाते हुए गुरु नमन के मंत्र पढ़ने शुरू किए। इधर भैरवानन्द ने भी उसके मारण के लिए महाकृत्या का प्रयोग किया था। पूरी रात महाकृत्या ने शिवराम को मारने के लिए अनेकों रूप धरे, उसको कई तरह से गुरु नमन से विरत करना चाहा, परन्तु शिवराम की अटल गुरुभक्ति के सामने उसकी एक न चली। अन्त में असफल होकर उसने भैरवानन्द पर ही अपना आक्रमण किया। महातांत्रिक अपनी क्रिया को इस तरह उलटते देखकर घबरा गया। वह भागा-भागा आकर समर्थ के चरणों में गिर गया। समर्थ रामदास ने उसे अभय देते हुए कृत्या का शमन किया और उसे चेताया—गुरुगीता के गुरु नमन मंत्र साधारण नहीं हैं। जिसकी वाणी में ये मंत्र हैं और हृदय में गुरुभक्ति है, वह गुरुकृपा के कवच से सदा सुरक्षित है। कोई अभिचार क्रिया उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। गुरु नमन के इन नमन मंत्रों की शृंखला में आगे कहा गया है।
  
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 47

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 29 Jan 2018


👉 आज का सद्चिंतन 29 Jan 2018


👉 हृदय का संस्कार

🔶 बुद्धि का संस्कार करना उचित है। पर हृदय का संस्कार करना तो नितान्त आवश्यक है। बुद्धिमान और विद्वान बनने से मनुष्य अपने लिए धन और मान प्राप्त कर सकता है। पर नैतिक दृष्टि से वह पहले दर्जे का पतित भी हो सकता है। आत्मा को ऊँचा उठाना और मानवता के आदर्शों पर चलने के लिए प्रकाश प्राप्त करना हृदय के विकास पर ही निर्भर है। बुद्धि हमें तर्क करना सिखाती है और आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन खोजती है। जैसी आकाँक्षा और मान्यता होती है उसके अनुरूप दलील खोज निकालना भी उसका काम है पर धर्म कर्तव्यों की ओर चलने की प्रेरणा हृदय से ही प्राप्त होती है।

🔷 जब कभी बुद्धि और हृदय में मतभेद हो, दोनों अलग अलग मार्ग सुझाते हो तो हमें सदा हृदय का सम्मान और बुद्धि का तिरस्कार करना चाहिए। बुद्धि धोखा दे सकता है पर हृदय के दिशासूचक यंत्र (कुतुबनुमा) की सुई सदा ठीक ही दिशा के लिए मार्ग दर्शन करेगी।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 कर्म का फल

🔶 यदि कर्म का फल तुरंत नहीं मिलता, तो इससे यह नहीं समझ लेना चाहिए कि उसके भले-बुरे परिणाम से हम सदा के लिए बच गये। कर्मफल एक ऐसा अमिट तथ्य है, जो आज नहीं तो कल भुगतना ही पड़ेगा। कभी-कभी इन परिणामों में देर इसलिए होता है कि ईश्वर मानवीय बुद्धि की परीक्षा करना चाहता है कि व्यक्ति अपने कत्र्तव्य धर्म समझ सकने और निष्ठापूर्वक पालन करने लायक विवेक बुद्धि संचय कर सका या नहीं। जो दण्ड भय से डरे बिना दुष्कर्मों से बचना मनुष्यता का गौरव समझना है और सदा सत्कर्मों तक ही सीमित रहता है, समझना चाहिए कि उसने सज्जनता की परीक्षा पास कर ली और पशुता से देवत्व की ओर बढऩे का शुभारंभ कर दिया।
  
🔷 दंडमय से तो विवेक रहित पशु को भी अवांछनीय मार्ग पर चलने से रोका जा सकता है। मानवीय अंत:करण की विकसित चेतना तभी अनुभव की जा सकेगी, जब वह कुमार्ग पर चलने से रोके और सन्मार्ग के लिए प्रेरणा प्रदान करे। लाठी के बल पर भेड़ों को इस या उस रास्ते पर चलाने में गड़रिया सफल रहता है। सभी जानवर इसी प्रकार दंड भय दिखाकर उसे जोते जाते हैं। यदि हर काम का तुरंत दंड मिलता और ईश्वर बलपूर्वक किसी मार्ग पर चलने के लिए विवश करता, तो फिर मनुष्य भी पशुओं की श्रेणी में आता, उसकी स्वतंत्र आत्म चेतना विकसित हुई या नहीं, इसका पता ही नहीं चलता।
  
🔶 ईश्वर या खुदा ने मनुष्य को भले या बुरे कर्म करने की स्वतंत्रता इसीलिए प्रदान की है कि वह अपने विवेक को विकसित करके भले-बुरे का अंतर करना सीखे और दुष्परिणामों के शोक संतापों से बचने एवं सत्परिणामों का आनंद लेने के लिए स्वत: अपना पथ निर्माण कर सकने में समर्थ हो। उन्नति को अपनाने वाला विवेक और कर्त्तव्य परायणता यह दो ही कसौटी मनुष्यता का आत्मिक स्तर विकसित होने की है। इस आत्म विकास पर ही जीवनोद्देश्य की पूर्ति और मनुष्य जन्म की सफलता निहित है। ईश्वर खुदा चाहता है कि व्यक्ति अपनी स्वतंत्र चेतना का विकास करे और विकास के क्रम से आगे बढ़ता हुआ पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त करने की सफलता प्राप्त करे।
  
🔷 यदि ईश्वर को यह प्रतीत होता कि बुद्धिमान बनाया गया मनुष्य पशुओं जितना मूर्ख ही बना रहेगा, तो शायद उसने दण्ड के बल पर चलाने की व्यवस्था उसके लिए भी सोची होती। तब झूठ बोलते ही जीभ में छाले पडऩे, चोरी करते ही हाथ में फोड़ा उठ पडऩे, बेईमानी करते ही बुखार आ जाने, कुदृष्टिï डालते ही आँख दु:खने लगने, कुविचार आते ही सिर दर्द होने जैसे दण्ड मिलने की तुर्त-फुर्त व्यवस्था बनी रही होती, तो किसी के लिए भी दुष्कर्म करना संभव ही न होता। लोग जब उसमें लाभ की अपेक्षा प्रत्यक्ष हानि देखते तो दुष्कर्म करने की हिम्मत न करते। ऐसी स्थिति में मनुष्य की स्वतंत्र चेतना, विवेक बुद्धि और आंतरिक महानता के विकसित होने का अवसर ही नहीं आता और आत्म विकास के बिना पूर्णता के लक्ष्य को प्राप्त कर सकने की दिशा में प्रगति ही न होती। अतएव परमेश्वर के लिए यह उचित ही था कि मनुष्य को अपना सबसे बड़ा, सबसे बुद्धिमान और सबसे जिम्मेदार बेटा समझकर उसे कर्म करने की स्वतंत्रता प्रदान करे और यह देखे कि वह मनुष्यता का उत्तरदायित्व संभाल सकने में समर्थ है या नहींï? परीक्षा के बिना वास्तविकता का पता भी कैसे चलता और उसे अपनी इस सर्वश्रेष्ठ रचना मनुष्य में कितने श्रम की सार्थकता हुई यह कैसे अनुभव होता।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 निरीक्षण और नियंत्रण आदतों का भी करें (भाग 2)

🔷 उपरोक्त हाथ पैरों की हरकतों की तरह मुँह से भी कितने ही लोग ऐसे ही बेतुके कार्य करते रहते हैं। बात-बात में गालियाँ देना, असम्मान सूचक भाषा का प्रयोग करना, अकारण निन्दा चुगली करना, तम्बाकू पान के कारण अथवा ऐसे ही जहाँ-तहाँ थूकते रहना, जोर-जोर से बोलना, जल्दी-जल्दी अथवा अस्पष्ट भाषा में बोलना, इस तरह बोलना कि मुँह से थूक उड़े, होठों की अगल-बगल में थूक जमा लेना अथवा दाँतों से थूक के तार उठाना, खाते समय मुँह खुला रखना और चप-चप की आवाज करना, घूमते-फिरते खाना, जब-तब गाने लगना, अपनी शेखी बघारते रहना, बात को अतिशयोक्तिपूर्ण करके कहना, जैसी बुरी आदतें अशिष्टता की गणना में आती हैं और ऐसे व्यक्ति को असंस्कृत माना जाता है।

🔶 बुरी आदतें तब पड़ती हैं जब आवेश ही प्रधान बन जाता है और निरीक्षण नियंत्रण को ध्यान में रखने की बात भुला दी जाती है। साधारण बुद्धि के लोग भी अपने कार्य व्यवसायों में निरीक्षण और नियन्त्रण की आवश्यकता समझते हैं, पर न जाने क्यों लोग अपनी आदतों और हरकतों के बारे में असावधानी बरतते हैं और आवेश में अंग संचालन का जो उत्साह आता है उसे मर्यादित रखने की बात भुला देते हैं फलतः उन्हें उपहासास्पद और छिछोरा बनना पड़ता है। अपनी शक्ति नष्ट होती है और दूसरे उसे असामाजिकता मानकर नाक भौं सिकोड़ते हैं इस असम्मान के कारण उन्हें अव्यवस्थित, असावधान एवं अप्रमाणिक तक मान लिया जाता है। दूसरे लोग उनके हाथ कोई महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व सौंपते या सहयोग देते हुए झिझकते हैं और सोचते हैं जो अपनी आदतों का निरीक्षण नियन्त्रण नहीं कर सकता वह किसी बड़े कार्य को पूरा करने में या दिये हुए सहयोग का सदुपयोग करने में कैसे समर्थ हो सकेगा?

🔷 किसी भी क्षेत्र में प्रगति का मूल आधार व्यवस्था बुद्धि होती है। जीवन जीना भी एक बड़ा कार्य क्षेत्र है इसमें व्यवस्था बुद्धि का उपयोग इस दिशा में भी सतर्कतापूर्वक किया जाना चाहिए कि अपनी आदतें बिगड़ने न पायें। निरर्थक और अनर्थ उत्पन्न करने वाली बुरी आदतें असावधानी के कारण हमारे स्वभाव का अंग बन जाती हैं और परिपक्व होने पर जड़ें इतने गहरी जमा लेती हैं कि उन्हें हटाना बहुत ही कठिन एवं प्रयत्न साध्य होता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1975 पृष्ठ 31

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1975/January/v1.31

👉 जीवन को सार्थक बनाया या निरर्थक गँवाया जाय (भाग 4)

🔷 अन्यान्य प्राणियों के पेट बहुत बड़े हैं, जबकि मनुष्य का छै इंच चौड़ाई का इतना छोटा पेट है जो मुट्ठी भर अनाज से भर सके। अन्य प्राणी केवल जो सामने है उसी को पाते और मुख के द्वारा खाते है। जबकि मनुष्य अगणित सुविधा साधन अपने कौशल और पराक्रम से चुटकी बजाते उपार्जित कर सकता है। ऐसी दशा में किसी को भी अभाव ग्रस्त होने जैसी शिकायत करने की गुंजाइश नहीं है। मनुष्य जीवन असीम सुविधाओं से भरा-पूरा है। उसकी दुनियाँ इतनी साधन सम्पन्न है कि अभाव जन्य कठिनाइयाँ अनुभव करने की किसी को कभी आवश्यकता ही न पड़े। दूषित अव्यवस्था ही है जिसमें ग्रसित होकर उसे अभावों का रोना रोते हुए समय गुजारना पड़ता हैं।

🔶 शरीर और आत्मा की भिन्नता अनुभव करने के लिए दूर जाने की आवश्यकता नहीं। किसी श्मशान में थोड़ी देर बैठकर वहाँ के दृश्य का अवलोकन करते हुए यह पाठ भली प्रकार पढ़ा जा सकता है। आत्मा के पृथक होते ही हृष्ट-पुष्ट शरीर की भी कैसी दुर्गति होती है, इसे देखते हुए समझा जा सकता है कि शरीर ही आत्मा नहीं है, जीवधारी का अपना स्वतन्त्र अस्तित्व भी है, जो मरण के उपरान्त भी बना रहता है। यही है वास्तविक ‘स्व’ इसी का हित साधन करने को स्वार्थ कहा जाता है।

🔷 जब आत्मा को संकीर्णता की कीचड़ से बाहर निकाल कर उसे व्यापक क्षेत्र में विचरण कर सकने की स्थिति में लाया जाता है, तो उसे सबमें अपना ही आत्मा दिखता है। तब सर्वजनीन हित साधन परमार्थ बन जाता है। जिससे न स्वार्थ सधता है न परमार्थ, उसे अनर्थ ही कहना चाहिए। लगता है लोग अनर्थ को ही अपनाते और उसी के नियोजन में अपने चातुर्य को संलग्न रखे रहते हैं। अन्ततः यह तथाकथित बुद्धिमत्ता मूर्खता से भी मँहगी पड़ती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Amrit Chintan 29 Jan

🔷 Oh God, I pray you that I should always be ready to face the adversities of life. So I pray you to save me in my hard days. It is not that I don’t face probles but I request to prepare me for facing them bravely and positively. I offer myself to you. And wish that I should win and come out safely without being envolved negatively.
 
🔶 Worship never completes unless other important dimensions of self rectification good life and service to others is also covered with that, the seed bears the total tree no doubt but it need a land to grow well enriched with its neutrition and time factor to grow. Worship is not only the ritual part of it but also compassion and ideality of life are important discipline to be followed, otherwise rituals will not make any effect.

🔷 To be ambicious is good subject to conditional makes you great and not only rich. There is always only one highway to attain Honest and object in life. High thinking and behaviour in accordance to that and high moral character is the triadent dimensions for true growth of life.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 8)

🔷 मित्रो! कष्ट बस एक ही बात का है कि मनुष्य अपने विचार करने के तरीके को भूल गया। आचार, विचार और व्यवहार को ठीक करने के लिए, गुण, कर्म एवं स्वभाव में उत्कृष्टता, शालीनता एवं उदारता को समाविष्ट करने के लिए हम आपको भेजते हैं। यह इतना बड़ा महत्त्वपूर्ण कार्य है कि जिस तरीके से फायर ब्रिगेड वालों को आग बुझाने के लिए भेजा जाता है हम आपको फायर ब्रिगेड वालों के तरीके से उस समाज में भेजते हैं, जहाँ चारों ओर से आग लग रही है और चारों ओर से लपटें उठ रही हैं।

🔶 आप अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए वहाँ जाना। वहाँ जाकर आप क्या काम करेंगे? बहिरंग रूप से हमने आपको बहुत सारे काम सौंपे हैं। उन बहिरंग कार्यों में आपको कितनी सफलता मिली और कितनी असफलता मिली, इस पर आप ध्यान मत देना। आपको जहाँ भेजा जाता है, वहाँ के सम्मेलन की रूपरेखा, सफलता और असफलता के मामले में देखना शुरू कर दिया, तो आप बहुत बड़ी गलती पर होंगे। वहाँ आपको सभा-सम्मेलन में कितने लोग इकट्ठे हुए। इस तरह लोगों के इकट्ठा करने की संख्या के आधार पर हम सफलता असफलता का अन्दाज नहीं करते।

🔷 मित्रो! लोगों की संख्या के आधार पर यदि हमने सफलता-असफलता के मूल्यांकन किये होते, तो सोमवती अमावस्या के दिन गंगा जी के एक-एक घाट पर लाखों आदमी स्नान करते हैं। अगर हम यह मान लें कि हिन्दुस्तान में गंगा जी के घाट करीब सौ हैं और एक-एक घाट पर एक-एक लाख आदमी स्नान करते हैं। तब यह माना जा सकता है कि एक करोड़ आदमी धर्मात्मा हैं। भीड़ को देखकर हम क्या अन्दाज लगा सकते हैं, नहीं लगा सकते।

🔶 रामलीला होती रहती है और उसमें औरतें, बच्चे और दूसरे आदमी आते रहते हैं। अरे साहब! रामलीला हुई थी, उसमें दस हजार आदमी आये थे। बेटे, मैं क्या करूँ दस हजार आदमी थे तो? उससे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है। कुंभ में बारह लाख आदमी आये थे, तो मैं क्या करूँ? आप भीड़ से क्या मतलब लगाते हैं? नहीं साहब! बड़ा कुंभ का मतलब है कि हिन्दुस्तान में बड़ा धर्म फैल रहा है और यहाँ पर बड़े अध्यात्मवादी लोग हैं। बेटे, ऐसा नहीं है। अध्यात्मवादी लोग यहाँ कहाँ हैं? संख्या की दृष्टि से हम भीड़ में यह अंदाज भी नहीं लगा सकते। आप भी मत लगाना।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 25)

👉 आओ, गुरु को करें हम नमन

🔶 गुरु नमन की महिमा को अगले महामंत्रों में प्रकट करते हुए भगवान् सदाशिव माता पार्वती को समझाते हैं-

संसारवृक्षमारूढा पतन्तो नरकार्णवे।     येन चैवोद्धृताः सर्वे तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ ३१॥
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुरेव परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ ३२॥
हेतवे जगतामेव संसारार्णवसेतवे। प्रभवे सर्वविद्यानां शंभवे गुरवे नमः॥ ३३॥
अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया। चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ ३४॥
त्वं पिता त्वं च मे माता त्वं बंधुस्त्वं च देवता। संसारप्रतिबोधार्थं तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ ३५॥

🔷 उन सद्गुरुदेव भगवान् को शिष्य नमन करे, जो संसारवृक्ष पर आरूढ़ जीव का नरक सागर में गिरने से उद्धार करते हैं॥ ३१॥ नमन उन श्रीगुरु को, जो अपने शिष्य के लिए ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर होने के साथ परब्रह्म परमेश्वर हैं॥ ३२॥ शिव रूपी उन सद्गुरु को नमन, जो समस्त विद्याओं का उदय स्थान हैं। इस संसार का आदिकारण हैं और संसार सागर को पार करने के लिए सेतु हैं॥ ३३॥ नमन उन श्री गुरु को, जो अज्ञान के अन्धकार से अन्धे जीव की आँखों को ज्ञानाञ्जन की शलाका से खोलते हैं॥ ३४॥ नमन उन श्री गुरु को, जो अपने शिष्य के लिए पिता हैं, माता हैं, बन्धु हैं, इष्ट देवता हैं और संसार के सत्य का बोध कराने वाले हैं॥ ३५॥

🔶 इन महामंत्रों में सद्गुरु के नमन का विज्ञान-विधान है। गुरुतत्त्व को जान लेने पर, उनकी महिमा का साक्षात्कार कर लेने पर शिष्य को कुछ भी अप्राप्य नहीं रहता। उसे किसी का भी भय नहीं रहता। शिष्य के हृदय में जब अपने सद्गुरु के प्रति नमन के भाव उपजते रहते, तब उसका सर्वत्र मंगल होता है, उसे अमंगल की छाया स्पर्श भी नहीं कर सकती। सद्गुरु को नमन शिष्य के लिए महाअभेद्य कवच है। इस सम्बन्ध में एक सत्य घटना का उल्लेख करने के लिए भावनाएँ आतुर हो रही हैं।
  
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 46

शनिवार, 27 जनवरी 2018

👉 अपने सुख के लिए दूसरों के दुःख नहीं

🔶 सेवा ग्राम में गाँधी जी के पास एक कुष्ठ रोगी परचुरे शास्त्री रहते थे। उनके कुष्ठ रोग के लिए किसी ने दवा बताई कि- एक काला साँप लेकर हाँडी में बंद किया जाय फिर उस हाँडी को कई घंटे उपलों की आग में जलाया जाय। जब साँप की भस्म हो जाय तो उसे शहद में मिलाकर खाने से कुष्ठ अच्छा हो जायेगा। गाँधी जी ने पूछा- ‘क्या आप ऐसी दवा खाने को तैयार है?’ शास्त्री जी ने उत्तर दिया- बापू! यदि साँप की जगह मुझे ही हांडी में बन्द करके जला दिया जाय तो क्या हानि है? साँप ने क्या अपराध किया है कि उसे इस प्रकार जलाया जाय?

परचुरे शास्त्री की वाणी में उस दिन मानवता की आत्मा बोली थी। वे लोग जो पशु पक्षियों का माँस खाकर अपना माँस बढ़ाना चाहते हैं, इस मानवता की पुकार को यदि अपने बहरे कानों से सुन पाते तो कितना अच्छा होता।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 27 Jan 2018

👉 आज का सद्चिंतन 27 Jan 2018


👉 गायत्री की असंख्य शक्तियाँ

🔶 संसार में जितना भी वैभव, उल्लास दिखाई पड़ता है या प्राप्त किया जाता है, वह शक्ति के मूल्य पर ही मिलता है। जिसमें, जितनी क्षमता होती है, वह उतना ही सफल होता और वैभव उपार्जित कर लेता है। जीवन में शक्ति का इतना महत्त्वपूर्ण स्थान है कि उसके बिना कोई आनंद नहीं उठाया जा सकता, यहाँ तक कि अनायास उपलब्ध हुए भोगों को भी नहीं भोगा जा सकता। इन्द्रियों में शक्ति रहने तक ही विषय भोगों का सुख प्राप्त किया जा सकता है। यदि ये किसी प्रकार अशक्त हो जाएँ, तो आकर्षक से आकर्षक भोग भी उपेक्षणीय और घृणास्पद लगते हैं। नाड़ी संस्थान की क्षमता क्षीण हो जाय, तो शरीर का सामान्य क्रियाकलाप भी ठीक तरह नहीं चल पाता। मानसिक शक्ति घट जाने पर मनुष्य की गणना विक्षिप्तों और उपहासास्पदों में होने लगती है। धन-शक्ति न रहने पर दर-दर का भिखारी बनना पड़ता है। मित्र शक्ति न रहने पर एकाकी जीवन सर्वथा निरीह और निरर्थक लगने लगता है। आत्म-बल न होने पर प्रगति के पथ पर एक कदम भी यात्रा नहीं बढ़ती। जीवनोद्देश्य की पूर्ति आत्म-बल से रहित व्यक्ति के लिए सर्वथा असंभव ही है।
  
🔷 भारतीय मनीषियों ने विभिन्न शक्तियों को देवनामों से संबोधित किया है। ये समस्त देव-शक्तियाँ उस परम शक्ति की किरणें ही हैं, उनका अस्तित्व इस महत्तत्त्व के अंतर्गत ही है। विद्यमान सभी देव शक्तियाँ उस महत्तत्त्व के ही स्फुलिंग हैं, जिसे अध्यात्म की भाषा में गायत्री कहकर पुकराते हैं। जैसे जलते हुए अग्रिकुण्ड में से चिनगारियाँ उछलती हैं, उसी प्रकार विश्व की महान् शक्ति सरिता गायत्री की लहरें उन देव शक्तियों के रूप में देखने में आती हैं। संपूर्ण देवताओं की सम्मिलित शक्ति को गायत्री कहा जाय, तो यह उचित होगा।
  
🔶 हमारे पूर्वजों ने चरित्र को उज्ज्वल तथा विचारों को उत्कृष्ट रखने के अतिरिक्त अपने व्यक्तित्व को महानता के शिखर तक पहुँचाने के लिए उपासना का मोहात्मक संबल गायत्री महामंत्र को पकड़ा था और इसी सीढ़ी पर चढ़ते हुए वे देव पुरुषों में गिने जाने योग्य स्थिति प्राप्त कर सके थे। देवदूतों, अवतारों, गृहस्थियों, महिलाओं, साधु ब्राह्मïणों, सिद्ध पुरुषों की ही नहीं, साधारण सद्गृहस्थों की उपास्य भी गायत्री ही रही है और उस अवलम्बन के आधार पर न केवल आत्म-कल्याण का श्रेय साधन किया है, वरन् भौतिक सुख-संपदाओं की सांसारिक आवश्यकताओं को भी आवश्यक मात्रा में उपलब्ध किया है।

🔷 संसार में कुछ भी प्राप्त करने की एकमेव महाशक्ति ने इस निखिल ब्रह्मण्ड में अपनी अनंत शक्तियाँ बिखेर रखी हैं। उनमें से जिनकी आवश्यकता होती है, उन्हें मनुष्य अपने प्रबल पुरुषार्थ द्वारा प्राप्त कर सकता है। विज्ञान द्वारा प्रकृति की अनेकों शक्तियों को मनुष्य ने अपने अधिकार में कर लिया है। विद्युत्, ताप, प्रकाश, चुम्बक, शब्द, अणु- शक्ति जैसी प्रकृति की कितनी ही अदृश्य और अविज्ञात शक्तियों को उसने ढूँढ़ा और करतलगत किया है; पर ब्रह्म की चेतनात्मक शक्तियाँ भी कितनी ही हैं, उन्हें आत्मिक प्रयासों द्वारा करतलगत किया जा सकता है। मनुष्य का अपना चुम्बकत्व असाधारण है। वह उसी क्षमता के सहारे भौतिक जीवन में अनेकों को प्रभावित एवं आकर्षित करता है। उसी आधार पर वह साधन जुटाता, सम्पन्न बनता और सफलताएँ उपलब्ध करता है। इसी चुम्बक शक्ति के सहारे वह व्यापक ब्रह्म-चेतना के महासमुद्र में से उपयोगी चेतन तत्त्वों को आकर्षित एवं करतलगत कर सकता है।
  
🔶 इन शक्तियों में सर्वप्रमुख और सर्वाधिक प्रभावशाली प्रज्ञा-शक्ति है। प्रज्ञा की अभीष्ट मात्रा विद्यमानï हो, तो फिर और कोई ऐसी कठिनाई शेष नहीं रह जाती, जो नर को नारायण, पुरुष को पुरुषोत्तम बनाने से वंचित रख सके। श्रम और मनोयोग तो आत्मिक प्रगति में भी उतना ही लगाना पर्याप्त होता है, जितना की भौतिक समस्याएँ हल करने में आये दिन लगाना पड़ता है। महामानवों को उससे अधिक कष्ट नहीं सहने पड़ते, जितने कि सामान्य जीवन में आये दिन हर किसी को सहने पड़ते हैं। लोभ और मोह की पूर्ति में जितना पुरुषार्थ और साहस करना पड़ता है, उससे कम में ही उत्कृष्ट आदर्शवादी जीवन का निर्माण-निर्धारण किया जा सकता है। मूल कठिनाई एक ही है- प्रज्ञा प्रखरता की। यदि वह प्राप्त हो सके, तो जीवन में ऋद्धि-सिद्धियों की उपलब्धियों से भर देने वाली संभावनाओं को प्राप्त कर सकने में अब कोई कठिनाई शेष नहीं रह गई।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 निरीक्षण और नियंत्रण आदतों का भी करें (भाग 1)


🔷 क्रियाशीलता का अपना महत्व है। श्रम और पुरुषार्थ की महिमा सर्वविदित है। आलस्य और निष्क्रियता की सर्वत्र निन्दा की गई है। इतने पर भी यह सोचना शेष ही रह जाता है कि हमारी क्रियाशीलता निरर्थक अथवा विकृत न हो। सुनियोजित और सुव्यवस्थित श्रम ही सत्परिणाम उत्पन्न करता है। निरर्थक और उद्देश्य रहित चेष्टाएँ न केवल उपहासास्पद होती हैं वरन् अपने व्यक्तित्व का वजन घटाती है।

🔶 कुछ लोगों को शरीर के विभिन्न अंगों से विभिन्न प्रकार की निरर्थक क्रिया करने की आदत होती है। इसे मानसिक अस्त-व्यस्तता ही कहना चाहिए। बिना विचारे काम करने की ऐसी निष्प्रयोजन क्रियाएँ जिनके करने की कोई आवश्यकता या उपयोगिता नहीं है लगातार या बार-बार करना यह सिद्ध करता है कि मस्तिष्क के साथ शारीरिक क्रिया-कलाप का सम्बन्ध टूट गया। काम करने से पूर्व उसके प्रयोजन को ध्यान में रखने की व्यवस्था असम्बद्ध हो गई। यह बड़ी उपहासास्पद और दयनीय स्थिति है।

🔷 कुर्ते या कोट के सामने वाले बटन मरोड़ना, उंगलियां चटकाना, जमाइयाँ लेते रहना, आँखें मिचकाना, बैठे-बैठे पैर हिलाना, हाथ में कोई चीज लेकर उसे मरोड़ना, खटखटाना, पेन्सिल को मुँह में डालना, पिन से कान या दाँत कुरेदना, मूँछें ऐंठते रहना, नाक में उँगलियाँ डालते रहना, दाँत से नाखून कुतरना, किसी के घर जाकर उसकी पुस्तकें तथा वस्तुएँ उलटना-पलटना, किसी के शरीर को धक्के दे देकर बात करना आदि ऐसी हरकतें हैं जो आदत से सम्मिलित हो जाने के बाद अपने को तो बुरा नहीं लगता, पर दूसरे लोग इन्हें बहुत ही बचकाना मानते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1975 पृष्ठ 31
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1975/January/v1.31

👉 जीवन को सार्थक बनाया या निरर्थक गँवाया जाय (भाग 3)

🔷 उपलब्ध वैभव का उपयोग एक ही है कि सृष्टा के प्रत्यक्ष कलेवर इस विराट विश्व में सौन्दर्य संवर्धन, सत्प्रवृत्तियों के परिपोषण में अपनी क्षमता नियोजित किये रहे और सृष्टा का श्रम सार्थक करे, उसका मनोरथ अगले उपहारों के रूप में महामानव, ऋषि, मनीषी, देवता, सिद्ध पुरुष एवं भगवान अवतार बनने जैसी पदोन्नतियों का लाभ मिलता है। जो प्रमाद बरतते, विश्वासघात करते और उपलब्धियों को संकीर्ण स्वार्थपरता के लिए प्रयुक्त करते हैं, उन्हें सुविधा छिनने और प्रताड़ना सहने का दुहरा दण्ड भुगतना पड़ता है। नरक-स्वर्ग की बात सभी जानते हैं। कुकर्मियों का चौरासी लाख योनियों में परिभ्रमण करना सर्वविदित है। यह इसी प्रमाद का प्रतिफल है।

🔶 जिसमें मनुष्य जीवन को लूट का माल समझा गया और उसे विलास व्यामोह की निजी लिप्साओं के लिए प्रयुक्त किया गया। बैंक का खजांची यदि हस्तगत हुई राशि का अपने निज के लिए उपयोग कर ले, सरकारी शस्त्र भंडार का स्टोर कीपर उन आयुधों को दस्युओं या शत्रुओं के हाथों थमा दे, मिनिस्टर अपने अधिकारों का प्रयोग सम्बन्धियों को लाभ देने के लिए करने लगे तो निश्चय ही उसे अपराधियों के कटघरे में खड़ा किया जायेगा। मनुष्य भी यदि जीवन सम्पदा को वासना, तृष्णा, अहंता जैसे क्षुद्र प्रयोजनों में खर्च करता है, तो समझना चाहिए कि आज जिसे अधिकार माना जा रहा है कल उसी को अपराध गिना जायेगा। और ठीक वैसा ही दण्ड मिलेगा जैसा कि प्रमादी, विश्वासघाती सेनाध्यक्ष को कोर्ट मार्शल द्वारा मिलता है।

🔷 अच्छा हो समय रहते भूल सुधरे और वह उपक्रम बने जो जिम्मेदारों और ईमानदारों को शोभा देता है। यदि ऐसा कुछ विचार विश्वास मन में उभरे तो फिर अपनाने योग्य विधा एक ही है कि शरीर वहन के लिए निर्वाह भर की व्यवस्था बनाने के उपरान्त शेष समूची क्षमता को उन प्रयोजनों में खपा दिया जाय, जिनसे विश्व व्यवस्था का सन्तुलन बनता है और सार्वभौम प्रगति का, सत्प्रवृत्ति संवर्धन का सुयोग बनता है। मनुष्य इस भूमिका को निभा सकने की स्थिति में असंदिग्ध रूप से समर्थ है। उसकी निजी आवश्यकताएँ इतनी कम है और उसकी पूत के साधन इतने अधिक है कि उस सन्तुलन को बिठाने में किसी को भी राई रत्ती भर कठिनाई अनुभव नहीं होनी चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Amrit Chintan 27 Jan

🔷 My affectionate scholars,
Life is a continous process from one life to the next and so on. The human nature and character brings all the impressions of previous life, which impregnates the thinking and his behaviour in the present life. One has to react, by himself from the point the present life starts. The art of living is to give a positive resistance to evil thoughts and control his actions and also develop and inculcate all what is good in life for self and others.
 
🔶 Power of mind is super. All the stages of life of pleasure and sorrow and ever your bondage and salvation depend on this mind power. The mind totally commands life. Our ancient Rishis mention that if man can control his own mind. He can achieve every thing worth achieve i.e. Arth, Dharma, Kama and Salvation. The sacredness of life and love for all develop by right thinking of mind. That is why it is said that if one can control own mind he controls the world.

🔷 Realization of God can be achieved by aquiring true wisdom. Man’s thinking is controlled by guidance of his intere in soul. That is why where the goods are collected and served are no less than any temple of God.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 7)

🔷 मित्रो! अध्यात्म जीवन जीने की कला है। जीवन किस तरह से जिया जा सकता है और जीवन को समग्र और समर्थ कैसे बनाया जा सकता है, इसके लिए है-अध्यात्म। वह अध्यात्म आज दुनिया से समाप्त हो गया है और उसके स्थान पर जादू आकर हावी हो गया है। हमारे और आपके सिर पर जादू बैठा हुआ है। अध्यात्म में आदमी को स्वावलम्बी बनना पड़ता था और अपने आपको परिष्कृत एवं श्रेष्ठ बनाना पड़ता था, लेकिन वह प्रक्रिया आज न जाने कहाँ खत्म हो गयी। उसके स्थान पर परावलम्बन आकर हम पर हावी हो गया। हम हर चीज को पराये से माँगने में विश्वास करने लगे हैं। हम यह विश्वास करने लगे हैं कि कोई भूत-पलीत आयेगा, कोई साधु-बाबा आयेगा और हमें सुख-शांति और सिद्धियाँ दे करके, मुक्ति देकर के और कुछ दे करके चला जायेगा।

🔶 मित्रो! अध्यात्म का सत्यानाश हो गया और धर्म चौपट हो गया। धर्म का सत्यानाश हो गया। समाज की सुव्यवस्था के लिए जिन सत्परम्पराओं का परिपालन करना चाहिए, जिन नागरिक कर्तव्यों को आदमी को समझना चाहिए और जिन सामाजिक जिम्मेदारियों को आदमी को निभाना चाहिए, उससे आदमी लाखों मील दूर चला गया। धर्म के नाम पर केवल उसके कलेवर को और आडम्बरों को छाती से चिपका कर बैठ गया। आज धर्म का सत्यानाश हो गया और सर्वनाश हो गया। आस्तिकता का सर्वनाश हो गया। यह क्या हो गया? यह आ गयी बाढ़ और आ गया भूकंप, जिससे सब मटियामेट हो गया। अब ईश्वर नाम की कोई चीज नहीं बची। ईश्वर स्तुति की विशेषताएँ, स्तुति की महत्ताएँ, मंत्र जप की विशेषताएँ आदि सबका प्रभाव जो मनुष्य के जीवन पर आना चाहिए था, वह सब चला गया, सब बाढ़ में बह गया। उसके स्थान पर केवल जादू रह गया। उसके स्थान पर केवल ठगी रह गयी है। अब केवल रह गया है कि हम भगवान को यह चीज देकर अमुक चीज, अमुक सिद्धियाँ प्राप्त कर लें। अमुक मंत्र घुमाकर अमुक चीज प्राप्त कर लें, स्वार्थ साध लें।

🔷 आज सारा का सारा मानव समुदाय इसी अज्ञान में डूबा हुआ है। इसलिए मनुष्य में जो सुख और शांति लाने की व्यवस्थाएँ थीं, वे सब चौपट हो गयीं, उनका सत्यानाश हो गया। आज सब कुछ चौपट दिखाई पड़ रहा है। हमें चारों ओर अंधकार दिखाई पड़ रहा है। हमको चारों ओर पतन दिखाई पड़ रहा है। हमें पीड़ाओं से चारों ओर से घिरा हुआ मनुष्य दिखाई पड़ रहा है। जबकि इस जमाने में इस संसार में ऐसी कोई चीज नहीं है, जिसको हम मनुष्य के लिए अभाव कह सकें। अभाव कहाँ है? जमीन में से कितना सारा अनाज पैदा होता है। अभाव कहाँ है? कैसी अच्छी हवा चला करती है। अभाव किस चीज का है? ढेरों पानी भरा पड़ा है। कपड़े के लिए जमीन ढेरों की ढेरों रुई पैदा कर देती है। फिर अभाव किस चीज का है? किसी चीज का अभाव नहीं है। मित्रो! हमारे पड़ोसी हैं, हमारी स्त्री है, बच्चे हैं, हमारे पास चिड़िया घूमती है और जानवर घूमते हैं। कैसा सुंदर संसार है। फिर अभाव किस बात का है? पीड़ायें किस बात की? कष्ट किस बात का? किसी बात का कष्ट नहीं है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 24)

👉 आओ, गुरु को करें हम नमन

🔶 गुरुगीता अध्यात्मविद्या के साधकों की प्राणचेतना का स्रोत है। इसके महामंत्रों के अनुशीलन से साधकों को नवप्राण मिलते हैं। उनमें आत्मतत्त्व का अंकुरण होता है। ब्रह्मविद्या स्फुरित होती है। वे यह सत्य जानने में समर्थ हो पाते हैं कि सद्गुरु ही सदाशिव हैं। भगवान् महेश्वर ने ही शिष्य-साधक पर कृपा करने के लिए गुरुदेव का रूप धरा है। गुरु और इष्ट में कोई भेद नहीं है। निराकार परब्रह्म परमेश्वर की सर्वव्यापी चेतना ही कृपालु सद्गुरुदेव के रूप में साकार हुई है। सद्गुरु को नमन इष्ट-आराध्य को नमन है। सद्गुरु को समर्पण सर्वव्यापी परमेश्वर को समर्पण है। गुरु और गोविन्द दो नहीं हैं। गुरु ही गोविन्द हैं और गोविन्द ही गुरु हैं।
  
🔶 पूर्व मंत्र में गुरुभक्त साधकों ने इस सत्य की किंचित् झलक पायी, जिसमें बताया गया है कि शिष्य को यह सत्य भली भाँति जान लेना चाहिए कि गुरु से श्रेष्ठ अन्य कोई भी तत्त्व नहीं है। ऐसे परम श्रेष्ठ और शिष्य वत्सल गुरुदेव की सेवा करना शिष्य का कर्त्तव्य है। उनके द्वारा किए जाने वाले लोक कल्याणकारी कार्यों में शिष्य को उत्साहित होकर भागीदार होना चाहिए। अंशदान-समयदान और बन सके तो जीवनदान करने में किसी भी शिष्य को कोई भी संकोच नहीं होना चाहिए।

🔶 जिसे सेवा करने में अभी संकोच या हिचकिचाहट है, समझना चाहिए—उसमें शिष्यत्व अंकुरित ही नहीं हुआ है। मात्र दीक्षा संस्कार का कर्मकाण्ड करा लेने भर से कोई शिष्य नहीं हुआ करता। इसके लिए तो ‘सीस उतारे भुईं धरे’ वाली कबीर बाबा की उक्ति को साकार करना पड़ता है। जब शिष्य बन गए तो, अहं के विसर्जन में संकोच क्यों? जब हम अपने को शिष्य कहाते हैं, तो फिर गुरुवर को नमन में देरी किसलिए?
  
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 45

गुरुवार, 25 जनवरी 2018

👉 सच्ची भक्ति की महिमा

🔶 एक बुढ़िया माई को उनके गुरु जी ने बाल-गोपाल की एक मूर्ती देकर कहा- "माई ये तेरा बालक है,इसका अपने बच्चे के समान प्यार से लालन-पालन करती रहना।"
बुढ़िया माई बड़े लाड़-प्यार से ठाकुर जी का लालन-पालन करने लगी।

🔷 एक दिन गाँव के बच्चों ने देखा माई मूर्ती को अपने बच्चे की तरह लाड़ कर रही है! बच्चो ने माई से हँसी की और कहा - "अरी मैय्या सुन यहाँ एक भेड़िया आ गया है, जो छोटे बच्चो को उठाकर ले जाता है।

🔶 मैय्या अपने लाल का अच्छे से ध्यान रखना, कही भेड़िया इसे उठाकर ना ले जाये..!" बुढ़िया माई ने अपने बाल-गोपाल को उसी समय कुटिया मे विराजमान किया और स्वयं लाठी (छड़ी) लेकर दरवाजे पर बैठ गयी।

🔷 अपने लाल को भेड़िये से बचाने के लिये बुढ़िया माई भूखी -प्यासी दरवाजे पर पहरा देती रही। पहरा देते-देते एक दिन बीता, फिर दुसरा, तीसरा, चौथा और पाँचवा दिन बीत गया।.....

🔶 बुढ़िया माई पाँच दिन और पाँच रात लगातार, बगैर पलके झपकाये -भेड़िये से अपने बाल-गोपाल की रक्षा के लिये पहरा देती रही। उस भोली-भाली मैय्या का यह भाव देखकर, ठाकुर जी का ह्रदय प्रेम से भर गया, अब ठाकुर जी को मैय्या के प्रेम का प्रत्यक्ष रुप से आस्वादन करने का लोभ हो आया!

🔷 भगवान बहुत ही सुंदर रुप धारण कर, वस्त्राभूषणों से सुसज्जित होकर माई के पास आये। ठाकुर जी के पाँव की आहट पाकर मैय्या ड़र गई कि "कही दुष्ट भेड़िया तो नहीं आ गया, मेरेलाल को उठाने !" मैय्या ने लाठी उठाई और भेड़िये को भगाने के लिये उठ खड़ी हूई!

🔶 तब श्यामसुंदर ने कहा - "मैय्या मैं हूँ, मैं तेरा वही बालक हूँ -जिसकी तुम रक्षा करती हो!" माई ने कहा - "क्या? चल हट तेरे जैसे बहुत देखे है, तेरे जैसे सैकड़ो अपने लाल पर न्यौछावर कर दूँ, अब ऐसे मत कहियो ! चल भाग जा यहा से..!

🔷 " (बुढ़िया माई ठाकुर जी को भाग जाने के लिये कहती है, क्योकि माई को ड़र था की कही ये बना-ठना सेठ ही उसके लाल को ना उठा ले जाये )।

🔶 ठाकुर जी मैय्या के इस भाव और एकनिष्ठता को देखकर बहुत ज्यादा प्रसन्न हो गये । ठाकुर जी मैय्या से बोले :-"अरी मेरी भोली मैय्या, मैं त्रिलोकीनाथ भगवान हूँ, मुझसे जो चाहे वर मांग ले, मैं तेरी भक्ती से प्रसन्न हूँ" बुढ़िया माई ने कहा - "अच्छा आप भगवान हो, मैं आपको सौ-सौ प्रणाम् करती हूँ ! कृपा कर मुझे यह वरदान दीजिये कि मेरे प्राण-प्यारे लाल को भेड़िया न ले जाय" अब ठाकुर जी और ज्यादा प्रसन्न होते हुए बोले - "तो चल मैय्या मैं तेरे लाल को और तुझे अपने निज धाम लिए चलता हूँ, वहाँ भेड़िये का कोई भय नहीं है।" इस तरह प्रभु बुढ़िया माई को अपने निज धाम ले गये।

🔷 भगवान को पाने का सबसे सरल मार्ग है, भगवान जी को प्रेम करो - निष्काम प्रेम जैसे बुढ़िया माई ने किया!

👉 संस्कारो पर नाज

बेटा अब खुद कमाने वाला हो गया था ... इसलिए बात-बात पर अपनी माँ से झगड़ पड़ता था ये वही माँ थी जो बेटे के लिए पति से भी लड़ जाती थी। मगर अब ...