शनिवार, 23 जून 2018

👉 "आओ करें गुरु को हृदयंगम"

🔷 स्वयं में आपको समहित हम कर सकें.......
गुरुवर ज्यादा नहीं आपके चरणों के धूल भी हम बन सकें......
कुछ ऐसा प्रयास करने की प्रेरणा मिल सके........
आपको हृदयंगम करने की जागृति यदि मिले......
हम कुरीतियों से लड़ सके..........

🔶 न मधुमास चाहिए......
न ही प्रसिद्धि अगाध चाहिए......
कठिन से कठिन परिस्थिति में बस आपका साथ चाहिए........
करते हैं आज ,आपको स्वयं को अर्पण...........
शायद इसे ही कहते हैं समर्पण......

🔷 चरणों में सफलता का आभाष हो न हो...........
आपके आंखों में खुशी देख सकें,
वो छोटे छोटे कृत्यों को करने का
अनुराग हमें हो.......
नभ को छूने की चाह नहीं......
पर धरती पर ही नभ को उतारने का विश्वास हमें हो.......

🔶 हम क्या थे.........
यह मात्र आप जानते हैं......
हमें पारश बनने का आप आश्वासन देते हैं..........
अपने प्रज्ञा पुत्र पुत्रियों को आराधक कहते हो......
हम आपके हैं और आप हमारे.....
यह विश्वास हमें चाहिए......
गुरुवर आपको हृदयंगम कर सकें
 वह अनुशासन हम बांध सकें.....
आपके बलिदानों का मान हम रख सकें.......
वह आस हमें चाहिए.......
आपको दुबारा सशरीर पाने के लिए.......
हम गुरुवर आपको हृदयंगम कर सकें.......
वो निष्ठा हमें दे दीजिए......

👉 आज का सद्चिंतन 23 June 2018

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 23 June 2018


👉 अभागा राजा और भाग्यशाली दास

🔷 एक बार एक गुरुदेव अपने शिष्य को अहंकार के ऊपर एक शिक्षाप्रद कहानी सुना रहे थे। एक विशाल नदी जो की सदाबहार थी उसके दोनो तरफ दो सुन्दर नगर बसे हुये थे! नदी के उस पार महान और विशाल देव मन्दिर बना हुआ था! नदी के इधर एक राजा था राजा को बड़ा अहंकार था कुछ भी करता तो अहंकार का प्रदर्शन करता वहाँ एक दास भी था बहुत ही विनम्र और सज्जन!

🔶 एक बार राजा और दास दोनो नदी के वहाँ गये राजा ने उस पार बने देव मंदिर को देखने की ईच्छा व्यक्त की दो नावें थी रात का समय था एक नाव मे राजा सवार हुआ और दुजि मे दास सवार हुआ दोनो नाव के बीच मे बड़ी दूरी थी!

🔷 राजा रात भर चप्पू चलाता रहा पर नदी के उस पार न पहुँच पाया सूर्योदय हो गया तो राजा ने देखा की दास नदी के उसपार से इधर आ रहा है! दास आया और देव मन्दिर का गुणगान करने लगा तो राजा ने कहा की तुम रातभर मन्दिर मे थे! दास ने कहा की हाँ और राजाजी क्या मनोहर देव प्रतिमा थी पर आप क्यों नही आये!

🔶 अरे मेने तो रात भर चप्पू चलाया पर ..... गुरुदेव ने शिष्य से पुछा वत्स बताओ की राजा रातभर चप्पू चलाता रहा पर फिर भी उसपार न पहुँचा ? ऐसा क्यों हुआ ? जब की उसपार पहुँचने मे एक घंटे का समय ही बहुत है!

🔷 शिष्य - हॆ नाथ मैं तो आपका अबोध सेवक हुं मैं क्या जानु आप ही बताने की कृपा करे देव! ऋषिवर - हॆ वत्स राजा ने चप्पू तो रातभर चलाया पर उसने खूंटे से बँधी रस्सी को नही खोला!

🔶 और तुम जिन्दगी भर चप्पू चलाते रहना पर जब तक अहंकार के खूंटे को उखाड़कर नही फेकोगे आसक्ति की रस्सी को नही काटोगें तुम्हारी नाव देव मंदिर तक नही पहुंचेगी!

🔷 हॆ वत्स जब तक जीव स्वयं को सामने रखेगा तब तक उसका भला नही हो पायेगा! ये न कहो की ये मैने किया ये न कहो की ये मेरा है ये कहो की जो कुछ भी है वो सद्गुरु और समर्थ सत्ता का है मेरा कुछ भी नही है जो कुछ भी है सब उसी का है!

🔶 स्वयं को सामने मत रखो समर्थ सत्ता को सामने रखो! और समर्थ सत्ता या तो सद्गुरु है या फिर इष्टदेव है , यदि नारायण के दरबार मे राजा बनकर रहोगे तो काम नही चलेगा वहाँ तो दास बनकर रहोगे तभी कोई मतलब है!

🔷 जो अहंकार से ग्रसित है वो राजा बनकर चलता है और जो दास बनकर चलता है वो सदा लाभ मे ही रहता है!

🔶 इसलिये नारायण के दरबार मे राजा नही दास बनकर चलना!

http://awgpskj.blogspot.com/2016/09/blog-post_3.html

👉 सादा जीवन उच्च विचार अन्योन्याश्रित (अन्तिम भाग)

🔷 घर के बड़े या कमाऊ लोग मात्र अधिक श्रेय पाकर संतुष्ट हो जाते हैं। व्यक्तिगत उपभोग के लिए अधिक सम्पत्ति उड़ाते रहने की छूट नहीं माँगते। वे जानते हैं कि संयुक्त परिवार में सभी का समान हक है। कमाऊ हीरे मोतियों से लदें और बिना कमाऊ चीथड़े लपेटकर घूमें, तो यह संयुक्त परिवार कहाँ रहा? यह समूचा समाज एक परिवार है। उसके वरिष्ठों को कनिष्ठों का अधिक ध्यान रखना चाहिए।

🔶 अभिभावक स्वयं दूध न पीकर भी बच्चों के लिए उसे किसी प्रकार जुटाते हैं। मरीज के लिए फलों का प्रबन्ध किया जाता है, जबकि समर्थ दाल और नमक के सहारे भी रोटी गले उतारते रहते है। यदि समर्थ का विशेष अधिकार माना जाय तो फिर असमर्थों का ईश्वर ही रक्षक है। उस आपा धापी के रहते मनुष्य समाज की सभ्यता, संस्कृति, नीति, उदारता जैसे आदर्शों की चर्चा करने का हक न रह जायेगा। जिसकी लाठी तिसकी भैंस का जंगली कानून यदि मनुष्यों में भी चल पड़ा और सुयोग्यों ने अधिक सुविधा साधन हड़पना आरम्भ कर दिया तो समझना चाहिए कि मनुष्य ने अपनी नैतिक वरिष्ठता गँवा दी और प्रेत पिशाच जैसी रीति-नीति अपना ली।

🔷 सादा जीवन-उच्च विचार का सिद्धान्त मानवी नैतिकता की सही व्याख्या करता है। जिसके ऊँचे विचार हों, जो भावना के क्षेत्र में उत्कृष्टता संजोये हो, उसे अपने ऊपर यह अनुबन्ध कठोरता पूर्वक लागू करना चाहिए कि जीवन चर्या सादगी एवं मितव्ययता से पूर्ण हो। मितव्ययता का अर्थ कृपणता बरतना और कुपात्रों के लिए सम्पदा जमा करते जाना नहीं वरन् यह है कि औसत नागरिक का स्तर शिरोधार्य करते हुए पूरी सामर्थ्य के साथ श्रम किया जाय और जो निर्वाह से अधिक हो उसे हाथों-हाथ सत्प्रयोजनों के लिए लगा दिया जाय।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 महान् योगी अनन्ता बाबा

🔷 गुरूभक्त साधक महान् योगी अनन्ता बाबा का मार्मिक प्रंसग है। जिस समय बाबा ने अपना यह प्रंसग सुनाया ,वह एक आदिवासी गाँव में रहते थे। आदिवासी उन्हें अपने देवता मानकर पूजते थे, श्रद्धा करते थे। बाबा उनके लिए माता- पिता ,एवं भगवान् थे। बाबा भी इन ग्रामवासियों का ध्यान अपने बच्चों की तरह रखते थे। बहुत पढ़े- लिखे न होने पर भी उन्होंने इन भोले गाँववासियों को शिक्षा का संस्कार देने की कोशिश की थी। अपने साधारण ज्ञान एवं असाधारण आध्यात्मिक ऊर्जा के द्वारा वह इन सरल ग्रामीण का कल्याण करते रहते थे।

🔶 उनके पास आश्चर्यकारी शक्तियाँ थीं। एक बार जब किसी ने उनसे पूछा कि उनको ये अद्भुत विद्याएँ कहाँ से मिलीं? तो उन्होंने अपने पुराने झोले से एक फटी हुई पुस्तक निकाली। यह पुस्तक गुरूगीता की थी। उन्होंने इस पुस्तक को अपने माथे से लगाया। ऐसा करते हुए उनकी आँखें भर आयीं। वह अपने अतीत की यादों में खो गये और जब उबरे, तब उनकी आँखों में गुरूभक्ति का प्रकाश था। समूचे मुख पर श्रद्धा की अनोखी दीप्ति थी। अपनी स्मृतियों को कुरेदते हुए उन्होंने कहा कि- बचपन से ही प्रभु ने मुझे अपना रखा था। शायद तभी उन्होंने मुझे संसार में रमने नहीं दिया। एक के बाद एक अनेक कष्ट मेरे जीवन में आते चले गये।

🔷 छोटा ही था, तब घाघरा नदी की बाढ़ में सब कुछ बह गया था। माता- पिता, स्वजन- परिजन मुझे अपने कहने वाला कोई न था। बाढ़ मुझे भी बहा ले गयी थी ,पर मुझे जब होश आया, तब मैंने स्वयं को एक सुनसान स्थान में बने शिव मंदिर में पाया। मेरा सिर एक वृद्ध महात्मा की गोद में था और वे बड़े प्यार से मेरे माथे पर हाथ फेर रहे थे। मेरे आँखें खोलने पर उन्होंने मेरी स्थिति जानी कुछ हलवा खाने को दिया। कई दिन बाद जब मैं स्वस्थ हुआ, तो उन्होंने मुझे पढ़ाना शुरू किया। संस्कृत व हिन्दी का साधारण ज्ञान देने के बाद एक दिन उन्होंने मुझे गुरूगीता की पोथी थमायी और बोले -बेटा! इसी ने मेरा कल्याण किया है और यही तुम्हारा भी कल्याण करेगी। मेरा कोई शिष्य नहीं है, तुम भी नहीं हो सकते। भगवान् भोलेनाथ सबके गुरू हैं, उन्हें ही अपना गुरू एवं ईश्वर मानो। गुरूगीता उन्हीं की वाणी है, इसकी साधना से उन सर्वेश्वर को प्रसन्न करो।

🔶 इसी के साथ उनहोंने बतायी गुरूगीता की पाठविधि। साथ ही उन्होंने कहा कि कोई साधना कठिन तप एवं पवित्र भावना के बिना सफल नहीं होती। उन महान् सन्त के सान्निध्य में यह साधना चलती गयी। अंतःकरण के कोनों में आध्यात्मिक उजाले की किरणें भरती गयीं। गुरूगीता की कृपा से सब कुछ स्वतः प्राप्त होता गया। समय के साथ अंतस् की संवेदना इतनी व्यापक होती गयी कि सभी कुछ मिलता गया। जब उन महान् सन्त ने अपना शरीर छोड़ा ,तब मैं वहाँ से चलकर यहाँ आ गया और जीव सेवा को ही शिव सेवा मान लिया। प्रभु की कृपा से मुझे सब कुछ सहज प्राप्त है। गुरूगीता के अंतर रहस्यों को जो भी जान लेगा, उसे भी ऐसा ही दिव्य अनुदान मिल जायेगा।

✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 195

👉 Control and Refinement of Hormones (Last Part)

🔷 Growth of the body is maintained by the pineal gland in the brain. Drastic changes in one’s growth –– especially of height, are caused by the disorderly functioning of this small ‘dot’ sized endocrine gland. Despite having excellent physique and charming appearance, do not have the natural masculine (or feminine) tendencies because of the abnormal levels of certain hormones.

🔶 Impotency is also attributed to hormonal disorders in general. Whenever the germs and viruses or any substance, which is ‘foreign’ or ‘toxic’ to its normal functioning, invades the body, some of the hormones secreted by the endocrine glands react instantaneously. These stimulate the B-cells in the blood to recognize the antigens and harmful microphages and produce specific antibodies to eliminate the invaders.

🔷 The hormones also participate in the struggle of the body to fight the infections/diseases during this defensive activity. This struggle of hormones induces psychological effects that are manifested as –– restlessness, irritation, anger and anguish in the diseased persons. As stated earlier, the endocrine glands are affected by internal state of the mind and emotions and accordingly generate the feelings of joy, enthusiasm, courage and alacrity, or that of dole, dullness, despair and apprehension etc.

📖 Akhand Jyoti- June- 2003

👉 क्रोध हमारा आन्तरिक शत्रु है (भाग 2)

🔷 क्रोध दुःख के चेतन कारण के साक्षात्कार से उत्पन्न होता है। कभी-2 हम दुःख के अनुमान मात्र से उद्विग्न हो उठते हैं। अमुक ने हमारे लिए ऐसा बुरा सोचा, या कोई षड्यन्त्र बनाया-ऐसा सोच कर हम क्रोध से तिलमिला उठते हैं, आँख भौं सिकोड़ लेते हैं, चेहरा सुर्ख हो उठता है और हम यह अवसर देखा करते हैं कि कब वह व्यक्ति आये और कब हम प्रतिशोध लें।

🔶 क्रोध में दो भाव मूल रूप से विद्यमान रहते हैं- (1) साक्षात्कार के समय दुःख (2) उसके कारण के सम्बन्ध का परिज्ञान। दुःख के कारण की स्पष्ट धारणा जब तक न हो, तब तक क्रोध की भावना का उदय नहीं होता। कारण का ज्ञान क्रोध की उत्पत्ति में सहायक होता है। यदि किसी ने हमारा अहित किया है और हम उससे अप्रसन्न हैं, तो क्रोध का भाव मन की किसी गुप्त कन्दरा में छिपा रहता है।

🔷 क्रोध का सम्बन्ध मन के अन्य विकारों से बड़ा घनिष्ठ है। क्रोध के वशीभूत होकर हमें उचित अनुचित का विवेक नहीं रहता और हम हाथापाई कर उठते हैं बातों-बातों ही में उखड़ उठना, लड़ाई झगड़ा साधारण सी बात हैं। यदि तुरन्त क्रोध का प्रकाशन हो जाय, तब तो मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से ठीक है, पर यदि वह अन्त प्रदेश में पहुँच कर एक भावना ग्रन्थि धन जाय, तो बड़ी दुःखदायी होती है। बहुत दिनों तक टिका हुआ क्रोध वैर कहलाता है। वैर एक ऐसी मानसिक बीमारी है जिसका कुफल मनुष्य को दैनिक जीवन में भुगतना पड़ता है। वह अपने आपको संतुलित नहीं रख पाता। जिससे उसे वैर है, उसके उत्तम गुण, भलाई, पुराना प्रेम, उच्च संस्कार इत्यादि सब विस्मृत कर बैठता है। स्थायी रूप से एक भावना ग्रन्थि बन जाने से क्रोध का वेग और उग्रता तो धीमी पड़ जाती है किन्तु दूसरे व्यक्ति को सजा देने, नुकसान पहुँचाने या पीड़ित करने की कुत्सित भावना निरन्तर मन को दग्ध किया करती है।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति मई 1950 पृष्ठ 16
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/May/v1.16

👉 आस्तिकता का वातावरण

🔷 प्रत्येक विचारशील व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह अपने जीवन को सार्थक एवं भविष्य को उज्ज्वल बनाने की आधारशिला-आस्तिकता को जीवन में प्रमुख स्थान देने का प्रयत्न करे। ईश्वर को अपना साथी, सहचर मानकर हर घड़ी निर्भय रहे और सन्मार्ग से ईश्वर की कृपा एवं कुमार्ग से ईश्वर की सजा प्राप्त होने के अविचल सिद्धान्त को हृदयंगम करता हुआ अपने विचारों और आचरणों को सज्जनोचित बनाने का प्रयत्न करता रहे। इसी प्रकार जिसे अपने परिवार में, स्त्री बच्चों से सच्चा प्रेम हो, उसे भी यही प्रयत्न करना चाहिए कि घर के प्रत्येक सदस्य के जीवन में किसी न किसी प्रकार आस्तिकता का प्रवेश हो। परिवार का बच्चा-बच्चा ईश्वर विश्वासी बने।

🔶 अपने परिवार के लोगों के शरीर और मन को विकसित करने के लिए जिस प्रकार भोजन और शिक्षण की व्यवस्था की जाती है उसी प्रकार आत्मिक दृष्टि से स्वस्थ बनाने के लिए घर में बाल-वृद्ध सभी की उपासना में निष्ठा एवं अभिरुचि बनी रहे। इसके लिए समझाने - बुझाने का तरीका सबसे अच्छा है। गृहपति का अनुकरण भी परिवार के लोग करते है इसलिए स्वयं नित्य नियमपूर्वक नियत समय पर उपासना करने के कार्यक्रम को ठीक तरह निबाहते रहा जाय। घर के लोगों से जरा जोर देकर भी उनकी ढील पोल को दूर किया जा सकता है।

🔷 आमतौर से अच्छी बातें पसन्द नहीं की जातीं और उन्हें उपहास तथा उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता है। यही वातावरण अपने घर में भी धुला हुआ हो सकता है, पर उसे हटाया तो जाना ही चाहिए। देर तक सोना, गंदे रहना, पढ़ने में लापरवाही करना, ज्यादा खर्च करना, बुरे लोगों की संगति आदि बुराइयां घर के किसी सदस्य में हो तो उन्हें छुड़ाने के लिए प्रयत्न करना पड़ता है। क्योंकि यह बातें उनके भविष्य को अन्धकारमय बनाने वाली, अहितकर सिद्ध हो सकती हैं। उसी प्रकार नास्तिकता और उपासना की उपेक्षा जैसे आध्यात्मिक दुर्गुणों को भी हटाने के लिए घर के लोगों को जरा अधिक सावधानी और सफाई से कहा सुना जाय तो भी उसे उचित ही माना जाएगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1965 पृष्ठ 6


http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/January/v1.6

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग 33)

युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव ऐसे ही आध्यात्मिक चिकित्सक थे। मानवीय चेतना के सभी दृश्य- अदृश्य आयामों की मर्मज्ञता उन्हें हासिल थी। जब भी कोई...